करोड़पति का बेटा जन्म से बहरा था — तब तक, जब तक कर्मचारी ने कुछ ऐसा किया कि सब हैरान रह गए।

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“करोड़पति का बेटा जन्म से बहरा था — तब तक, जब तक कर्मचारी ने कुछ ऐसा किया कि सब हैरान रह गए”


भाग 1: विक्रम सिंघानिया और उनका दुख

बॉम्बे मेडिसिटी हॉस्पिटल को मेडिकल चमत्कारों का मंदिर माना जाता था। यहां के सफेद संगमरमर के गलियारों में कदम रखते ही यह महसूस होता था कि जैसे दुनिया की सबसे बड़ी हस्तियां इस अस्पताल में आती-जाती हैं। भारत के सबसे अमीर आदमी विक्रम सिंघानिया और उनकी पत्नी अंजलि भी यहाँ आए थे, लेकिन उनके साथ कुछ अलग था।

उनकी दुनिया आजकल बहुत बदल चुकी थी, क्योंकि उनके बेटे आरव को जन्म से बहरा बताया गया था। डॉक्टरों ने यह पुष्टि की थी कि उनका बेटा कभी नहीं सुन पाएगा। यह खबर विक्रम और अंजलि के लिए एक बहुत बड़ा झटका था। एक ऐसा सपना जो उन्होंने अपने बेटे को लेकर देखा था, वह एक झटके में टूट गया।

डॉक्टर गौतम खन्ना, जो देश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित विशेषज्ञ थे, ने विक्रम और अंजलि को निराश करने वाली खबर दी। “आपके बेटे की श्रवण तंत्रिकाएं पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हैं। कोई भी सर्जरी उसे ठीक नहीं कर सकती,” डॉक्टर ने कहा।

विक्रम, जो एक सफल व्यापारी थे, इस खबर को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। “आपको अफसोस है?” उन्होंने गुस्से में पूछा। “मेरा बेटा जीवन भर खामोशी में रहेगा, और आपको बस अफसोस है?”

अंजलि ने उसे शांत करने की कोशिश की, लेकिन विक्रम शांत नहीं हो पा रहे थे। वह असंभव को स्वीकार नहीं करना चाहते थे। विक्रम ने तय किया कि वह किसी भी उपाय से अपने बेटे की मदद करेंगे।


भाग 2: विक्रम की निरंतर कोशिशें

दिन बीतते गए, और विक्रम की कोशिशें कम नहीं हुईं। उन्होंने दुनिया के सबसे बेहतरीन डॉक्टरों से संपर्क किया। यूरोप, अमेरिका, और एशिया के विशेषज्ञों से सलाह ली। लेकिन हर बार, उन्हें एक ही जवाब मिला – “हम कुछ नहीं कर सकते।”

विक्रम ने अपने कार्यालय के कक्ष में घंटों बिताए, विशेषज्ञों से संपर्क किया, और बड़े पैमाने पर प्रयोगात्मक उपचार के बारे में सोचा। उन्होंने अपना पैसा भी झोंका, लेकिन किसी डॉक्टर के पास कोई जवाब नहीं था।

अंजलि अब पूरी तरह से अपने बेटे आरव के पास बैठने लगी थीं। उनका दिल टूट चुका था, लेकिन वह अपने बेटे के लिए कुछ भी करने को तैयार थीं। वह आरव के लिए गाती रहतीं, उसे अपना प्यार देतीं, लेकिन वह जानती थीं कि उनके गाने कभी भी उसके कानों तक नहीं पहुँचेंगे।


भाग 3: आशा देवी का आगमन

एक दिन, जब विक्रम और अंजलि बैठकर एक बार फिर से उम्मीद खोने लगे थे, तब एक महिला उनके घर आई। उसका नाम था आशा देवी। वह 40 साल की उम्र के आसपास लग रही थी और एक घरेलू सहायिका के रूप में काम करने आई थी।

आशा देवी ने विक्रम और अंजलि से कुछ अजीब तरीके से बात की। वह न केवल एक कर्मचारी थी, बल्कि उसकी आँखों में एक ऐसी समझ थी, जैसे वह विक्रम और अंजलि के दर्द को पूरी तरह से समझती हो। वह इतनी शांत और गंभीर थी कि अंजलि को यह महसूस हुआ कि शायद उसने कुछ खास देखा हो।

“क्या आपको बच्चों के साथ अनुभव है?” अंजलि ने पूछा।

आशा देवी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “हां, मैंने कई घरों में काम किया है जहाँ छोटे बच्चे थे। मुझे बच्चों से बहुत प्यार है। वे एक अलग तरीके से दुनिया को देखते हैं।”

यह सुनकर अंजलि ने एक दिन आरव को आशा के पास लाने का फैसला किया। आशा ने धीरे-धीरे आरव के पास जाकर उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। हालांकि, आशा ने महसूस किया कि जब वह आरव के पास बैठती, तो वह धीरे-धीरे अपनी आँखों से उसे देखता था।

आशा ने देखा कि आरव के कानों में कुछ हलचल हो रही थी। वह उसे देखता था, और कभी-कभी वह थोड़ा सिर घुमा लेता था। यह कोई संयोग नहीं था। आशा ने धीरे से कहा, “यह बच्चा बहरा नहीं है, वह सुन सकता है।”

अंजलि को यह सुनकर विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने डॉक्टरों से कहा था कि आरव कभी नहीं सुन पाएगा। लेकिन आशा देवी की बातों ने उन्हें एक नई उम्मीद दी।


भाग 4: विक्रम का अहसास

आशा देवी ने विक्रम और अंजलि को बताया कि वह अपने बच्चे के बारे में जानती हैं कि वह पूरी तरह से बहरा नहीं है। उसकी सुनने की क्षमता कुछ हद तक अवरुद्ध है। विक्रम को पहले विश्वास नहीं हुआ, लेकिन आशा ने उन्हें आरव के कानों में डाले गए अवरोध को दिखाया।

“यह कुछ ऐसा है, जिसे शायद डॉक्टर्स नहीं देख पाए।” आशा ने कहा। “यह अवरोध धीरे-धीरे हटा सकता है, और आपका बेटा सुन सकता है।”

यह सुनकर विक्रम और अंजलि की आँखों में चमक आ गई। विक्रम ने तुरंत डॉक्टर से संपर्क किया और आरव की नई जांच शुरू करवाई। और जैसे ही डॉक्टरों ने आरव के कानों में जाँच की, उन्होंने पाया कि आरव के कानों में अवरोध था, जिसे आसानी से हटाया जा सकता था।

यह एक चमत्कार जैसा था। आरव को सुनने की शक्ति वापस मिल सकती थी। विक्रम और अंजलि की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था।


भाग 5: आरव की सुनने की शक्ति वापस

आरव की इलाज के बाद धीरे-धीरे सुनने की क्षमता वापस आई। विक्रम और अंजलि की खुशी का ठिकाना नहीं था। उन्होंने देखा कि उनका बेटा अब धीरे-धीरे आवाजों को पहचानने लगा था। आरव के लिए यह एक नई दुनिया थी, और वह इसे पूरी तरह से अनुभव कर रहा था।

एक दिन, जब विक्रम और अंजलि ने उसे अपनी गोदी में लिया, तो आरव ने पहली बार अपने पिता की आवाज को पहचाना और मुस्कुराया। यह वह पल था जब विक्रम ने पहली बार महसूस किया कि उनका बेटा अब दुनिया को सुन सकता है।

आशा देवी ने उन्हें बताया, “मैंने जो देखा, वह सही था। कभी-कभी हमें बाहर की दुनिया से ज्यादा दिल से देखना चाहिए।”


भाग 6: विक्रम की जिम्मेदारी

विक्रम ने सोचा कि वह इस चमत्कार के बारे में सबको बताने की कोशिश करेंगे, लेकिन उन्होंने देखा कि इस प्रक्रिया में बहुत से लोग शामिल थे। वह जानते थे कि इस चमत्कार की सच्चाई को समाज में फैलाना जरूरी है, ताकि ऐसे बच्चों को भी मदद मिल सके।

विक्रम ने एक फाउंडेशन की शुरुआत की, जो सुनने की समस्या वाले बच्चों के इलाज में मदद करती थी। उनका यह कदम केवल उनके बेटे आरव के लिए नहीं था, बल्कि उन सभी बच्चों के लिए था, जिनकी सुनने की शक्ति किसी कारणवश छीन ली गई थी।

उन्होंने फैसला किया कि यह फाउंडेशन केवल आर्थिक मदद नहीं, बल्कि हर बच्चे को उनकी आवाज वापस दिलाने के लिए काम करेगा। विक्रम और अंजलि ने इस मिशन में अपने बेटे की तरह प्यार और उम्मीद से काम किया।