बाप को मारा तो बेटे ने थाने पर Army से घेराव करा दिया 🔥 | वर्दी की ताकत

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वर्दी का मान: मेजर विक्रम की न्याय यात्रा

अध्याय 1: माटी का लाल और सरहद का रक्षक

उत्तर भारत के एक छोटे से गाँव ‘अमरोही’ की सुबह हमेशा की तरह सुनहरी थी। गाँव के किनारे फैले हरे-भरे खेत और मिट्टी की सोंधी खुशबू किसी जन्नत से कम नहीं थी। इन खेतों के बीच 65 वर्षीय किशन सिंह अपनी हल चला रहे थे। किशन सिंह एक साधारण किसान थे, लेकिन उनका व्यक्तित्व किसी ऊँचे बरगद के पेड़ जैसा था—मजबूत और स्वाभिमानी।

किशन सिंह का कुल जमा पूँजी उनके ये दो एकड़ खेत और उनका बेटा ‘विक्रम’ था। विक्रम, जो आज भारतीय सेना में मेजर विक्रम सिंह के नाम से जाना जाता था। किशन सिंह अक्सर अपने खेतों की मिट्टी को हाथ में लेकर बुदबुदाते, “यह मिट्टी मेरी माँ है और विक्रम मेरा गुरूर।”

गाँव वाले अक्सर किशन सिंह से कहते, “चाचा, आपका बेटा मेजर है, आप क्यों इस उम्र में इतनी हाड़-तोड़ मेहनत करते हैं?”

किशन सिंह मुस्कुराकर जवाब देते, “थकान तो होती है भाई, पर जब सरहद पर तैनात बेटे का ख्याल आता है, तो सब मिट जाती है। मेरा बेटा वहां दुश्मनों से लड़ रहा है ताकि मुल्क चैन से सो सके, तो क्या मैं यहाँ अपनी माटी की सेवा नहीं कर सकता? यह मिट्टी और उसका खून, दोनों सच्चे हैं।”

अध्याय 2: राणा का साया और अन्याय की दस्तक

लेकिन अमरोही की इस शांति पर एक काला साया मंडरा रहा था—चौधरी ठाकुर सिंह। ठाकुर सिंह इस जिले का सबसे बड़ा जमींदार था, जिसके संबंध राजधानी के मंत्रियों और वजीरों से थे। उसे अपनी शक्ति का इतना अहंकार था कि वह जिसे चाहता, उसकी जमीन हड़प लेता।

ठाकुर सिंह की नजर किशन सिंह के उन दो एकड़ खेतों पर थी, जो सड़क के किनारे थे और एक बड़े प्रोजेक्ट के लिए बेशकीमती थे। ठाकुर सिंह का दाहिना हाथ था पुलिस इंस्पेक्टर राणा, एक ऐसा भ्रष्ट अधिकारी जिसने अपनी वर्दी को ठाकुर की गुलामी में गिरवी रख दिया था।

एक दोपहर, जब किशन सिंह पेड़ की छांव में बैठकर अपने बेटे की भेजी हुई चिट्ठी पढ़ रहे थे, तभी वहां ठाकुर सिंह की काली जीप आकर रुकी। इंस्पेक्टर राणा और ठाकुर सिंह नीचे उतरे।

“किशन सिंह, शराफत इसी में है कि चुपचाप इन कागजों पर अंगूठा लगा दे,” ठाकुर सिंह ने सिगार का धुआं छोड़ते हुए कहा। “वरना यह जमीन तो जाएगी ही, साथ में तेरी जान भी जाएगी। यहाँ कानून नहीं, राणा का हुक्म चलता है।”

किशन सिंह धीरे से उठे, अपनी पगड़ी को संभाला और सीधे ठाकुर की आंखों में आंखें डालकर बोले, “यह माटी मेरी माँ है चौधरी, और किशन सिंह का सर कट सकता है मगर अपनी माँ का सौदा नहीं कर सकता।”

राणा दहाड़ा, “तेरी ये मजाल! राणा की आंखों में आंखें डालता है? मिट्टी में मिला दूंगा तुझे और तेरे इस झूठे गुरूर को।” उसने किशन सिंह को धक्का दिया, जिससे वे जमीन पर गिर पड़े। लेकिन बूढ़े किसान की आंखों में खौफ नहीं, बल्कि नफरत थी।

अध्याय 3: जुल्म की इंतहा

ठाकुर सिंह ने सूरज ढलने तक का वक्त दिया था। जब किशन सिंह नहीं माने, तो रात के अंधेरे में इंस्पेक्टर राणा अपने कुछ सिपाहियों के साथ किशन सिंह के घर पहुँचा। उन्होंने बूढ़े इंसान को बेरहमी से घसीटा। किशन सिंह चिल्लाते रहे, “मेरा बेटा सरहद पर है! वह तुम्हें नहीं छोड़ेगा!”

राणा हंसा, “तेरा बेटा सरहद पर होगा, यहाँ का राजा मैं हूँ।” उसने किशन सिंह की पगड़ी उतारकर जमीन पर फेंक दी और उन्हें जीप में डालकर थाने ले गया। लॉकअप में बंद करके उन्हें भूखा-प्यासा रखा गया और उन पर तशद्दुद (जुल्म) किया गया। गाँव वाले डरे हुए थे, किसी की हिम्मत नहीं थी कि पुलिस स्टेशन जाकर विरोध करे।

उसी रात, मेजर विक्रम अपनी छुट्टियों की मंजूरी मिलने के बाद गुपचुप तरीके से गाँव पहुँचे। वे अपने पिता को सरप्राइज देना चाहते थे। लेकिन जब वे अपने घर पहुँचे, तो वहां सन्नाटा था। घर का दरवाजा टूटा हुआ था और आँगन में उनके पिता की पगड़ी धूल में सनी पड़ी थी।

विक्रम का खून खौल उठा। एक फौजी के लिए उसके पिता का सम्मान और उसकी पगड़ी सबसे पवित्र होती है। गाँव के एक काका ने दौड़ते हुए आकर बताया, “बेटा विक्रम, इंस्पेक्टर राणा तुम्हारे बाबा को घसीट कर थाने ले गया है।”

अध्याय 4: थाने में अपमान

मेजर विक्रम अपनी पूरी वर्दी में, मेडल्स से सजे हुए सीने के साथ पुलिस स्टेशन पहुँचे। उन्होंने सोचा था कि एक वर्दी वाला दूसरे वर्दी वाले का सम्मान करेगा।

“मेरे बाप को किस जुर्म में उठाया इंस्पेक्टर? मुझे जवाब चाहिए,” विक्रम ने कड़क आवाज में पूछा।

राणा अपनी कुर्सी पर पैर रखकर बैठा था। उसने विक्रम को ऊपर से नीचे तक देखा और उपहास उड़ाते हुए कहा, “ये बॉर्डर नहीं है फौजी, पुलिस स्टेशन है। आवाज नीचे रख और बाहर निकल।”

विक्रम ने लॉकअप की तरफ देखा, जहाँ उनके पिता अधमरी हालत में पड़े थे। विक्रम की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने संयम बरतते हुए कहा, “इंस्पेक्टर साहब, मैं आपसे इज्जत से बात कर रहा हूँ। मेरे बाप को रहा कर दीजिए, वे बेगुनाह हैं।”

राणा उठा और विक्रम के करीब आकर उसके कंधों पर लगे मेजर के रैंक को छूते हुए बोला, “तुम्हारी ये वर्दी, तुम्हारा ये रैंक, यहाँ कोई कीमत नहीं रखते मेजर साहब। निकल जाओ यहाँ से, वरना तुम्हें भी अंदर कर दूंगा।” उसने विक्रम को धक्का देकर थाने से बाहर निकाल दिया।

अध्याय 5: सेना का गौरव और कर्नल का आदेश

थाने के बाहर खड़े विक्रम ने अपनी वर्दी की ओर देखा। यह अपमान सिर्फ उनका नहीं था, बल्कि उस हर जवान का था जो सरहद पर खून बहाता है। उन्होंने तुरंत अपने कमांडिंग ऑफिसर, कर्नल शर्मा को फोन लगाया।

“कर्नल साहब, मैं मेजर विक्रम बोल रहा हूँ। सर, आज एक बेटे की नहीं, एक हिंदुस्तानी फौजी की वर्दी की तौहीन हुई है। पुलिस ने मेरे वालिद को अवैध रूप से कैद किया है और मेरी वर्दी का मजाक उड़ाया है। मुझे एक्शन की इजाजत चाहिए सर।”

कर्नल शर्मा, जो खुद एक उसूलों वाले अफसर थे, गरज पड़े, “मेजर विक्रम, एक फौजी की तौहीन पूरे मुल्क की तौहीन है। अपनी यूनिट को तैयार रखो। हम 15 मिनट में पहुँच रहे हैं। आज इंसाफ होकर रहेगा।”

अध्याय 6: घेराबंदी और न्याय

थाने के अंदर राणा और ठाकुर सिंह जश्न मना रहे थे। वे सोच रहे थे कि फौजी डर कर भाग गया। तभी अचानक जमीन कांपने लगी। टायरों की चीख और भारी ट्रकों की गड़गड़ाहट सुनाई दी।

हवलदार भागते हुए अंदर आया, “साहब! गजब हो गया! पूरी फौज ने थाने को घेर लिया है!”

राणा बाहर निकला तो उसके होश उड़ गए। पुलिस स्टेशन के चारों तरफ सेना के ट्रक खड़े थे, जवान अपनी पोजीशन ले चुके थे और मशीनगनें थाने की ओर तनी हुई थीं। कर्नल शर्मा और मेजर विक्रम जीप से नीचे उतरे।

कर्नल शर्मा की आवाज लाउडस्पीकर पर गूंजी, “इंस्पेक्टर राणा! बाहर आओ! इंडियन आर्मी यहाँ पहुँच चुकी है। लॉकअप की चाबियाँ लेकर तुरंत बाहर आओ, वरना हम दरवाजा तोड़ना जानते हैं।”

ठाकुर सिंह अंदर से चिल्लाया, “मैं वजीर का दोस्त हूँ! मैं अभी फोन करता हूँ!” कर्नल ने उसका फोन छीनकर जमीन पर पटक दिया, “यहाँ न कोई वजीर आएगा, न कोई मंत्री। आज सिर्फ इंसाफ होगा।”

मेजर विक्रम दौड़कर अंदर गए। उन्होंने दीवार से चाबियाँ उठाईं और लॉकअप खोला। अपने पिता को सहारा देकर बाहर लाए। किशन सिंह ने अपने बेटे की वर्दी की ओर देखा और गर्व से बोले, “मैंने कहा था, मेरा बेटा आएगा।”

अध्याय 7: हिसाब बराबर

मेजर विक्रम ने इंस्पेक्टर राणा की आंखों में देखते हुए कहा, “राणा, तुमने कहा था कि इस वर्दी की कोई कीमत नहीं है। आज देखो, इसी वर्दी की ताकत ने तुम्हारे जुल्म के किले को ढहा दिया।”

कर्नल शर्मा ने आदेश दिया कि इंस्पेक्टर राणा और ठाकुर सिंह को गिरफ्तार करके जिला मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाए। सेना की मौजूदगी में भ्रष्टाचार का वह तंत्र ताश के पत्तों की तरह बिखर गया।

किशन सिंह अपने खेतों में वापस लौट आए। मेजर विक्रम ने अपनी छुट्टियों का बचा हुआ समय अपने पिता के साथ खेत जोतने में बिताया। गाँव वालों ने देखा कि वह मेजर, जो कल तक बंदूक थामे था, आज अपने पिता के साथ हल चला रहा था।

कहानी का संदेश: अन्याय चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, जब सत्य और साहस की वर्दी उसके सामने खड़ी होती है, तो उसे घुटने टेकने ही पड़ते हैं।


जय हिंद!