10 साल बाद बेटा DM. बनकर माँ के पास पहुंचा तो बूढी माँ टूटी-फूटी झोपड़ी में रह रही थी — फिर जो हुआ..

प्रायश्चित और ममता: एक डीएम की वापसी
गांव के आखिरी छोर पर, जहां इंसानी बस्तियां खत्म होने लगती हैं और वीराना शुरू होता है, वहां एक टूटी-फूटी सी झोपड़ी खड़ी थी। यह झोपड़ी नहीं, बल्कि गुजरे हुए वक्त का एक खंडहर थी। इसकी दीवारों की मिट्टी झड़ चुकी थी और छत की खपरैल जगह-जगह से टूट चुकी थी। हर बरसात में यह छत छलनी की तरह पानी टपकाती, मानो झोपड़ी भी अपने हालात पर रो रही हो।
उसी झोपड़ी के भीतर रहती थी 70 वर्षीय कस्तूरी देवी। चेहरे पर झुर्रियों का जाल, धुंधली पड़ चुकी आंखें और झुक चुकी कमर—उनकी काया देख कर लगता था कि उन्होंने अपनी उम्र का आधे से ज्यादा हिस्सा केवल इंतजार और दर्द में बिताया है। गांव वाले उन्हें ‘कस्तूरी देवी’ कहते थे, लेकिन अब उस नाम को पुकारने वाला कोई अपना नहीं बचा था। उनका बेटा मोहन, जिसे उन्होंने अपनी रगों के खून से सींचकर बड़ा किया था, दस साल पहले एक तूफानी रात में बिना कुछ कहे घर छोड़कर चला गया था।
अतीत की परछाइयां
वह दौर कस्तूरी देवी के जीवन का सुनहरा काल था, भले ही गरीबी चरम पर थी। उनके पति रामधन एक ईंट-भट्टे पर मजदूरी करते थे। घर में अभाव था, पर शांति थी। मोहन तब सात साल का था—मासूम और चंचल। लेकिन तकदीर को कुछ और ही मंजूर था। रामधन को एक गंभीर बीमारी ने घेरा। अस्पताल की दूरी और इलाज की कमी ने रामधन को छीन लिया।
विधवा होने के बाद कस्तूरी देवी के सामने पहाड़ जैसी जिंदगी थी। उन्होंने लोगों के घरों में बर्तन मांझे, खेतों में तपती धूप में निराई-गुड़ाई की, और कभी-कभी ईंटें भी ढोईं। उनका एक ही सपना था—मोहन को पढ़ा-लिखाकर एक बड़ा इंसान बनाना ताकि उसे कभी रामधन की तरह इलाज के बिना न मरना पड़े।
जैसे-जैसे मोहन बड़ा हुआ, गरीबी उसके स्वभाव में कड़वाहट भरने लगी। वह अपनी माँ की सख्ती से चिढ़ने लगा। कस्तूरी देवी उसे डांटती थीं, कभी-कभी मार भी देती थीं, क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं गांव के आवारा लड़कों की संगत मोहन को बिगाड़ न दे। वह सख्त थीं क्योंकि वह माँ थीं।
वह काली रात
जब मोहन 16 साल का हुआ, उसके भीतर का गुस्सा उबलने लगा। एक रात वह देर से घर लौटा, उसके बदन से शराब की तीखी गंध आ रही थी। कस्तूरी देवी का कलेजा कांप उठा। उन्होंने गुस्से में उसे एक थप्पड़ जड़ा और कहा, “तू मेरा बेटा कहलाने लायक नहीं है! तूने अपने पिता की आत्मा को दुखी कर दिया।”
ये शब्द मोहन के दिल में तीर की तरह चुभ गए। उस रात जब माँ सो गई, मोहन ने एक पुरानी फटी चादर में दो कपड़े बांधे और अंधेरी रात के सन्नाटे को चीरते हुए घर छोड़ दिया। सुबह जब कस्तूरी की आंख खुली, तो घर का आंगन सूना था। उस दिन से आज तक, कस्तूरी देवी की नजरें उस कच्चे रास्ते से कभी नहीं हटीं।
शहर का संघर्ष और सफलता
शहर की गलियों में मोहन भटकता रहा। भूख, अपमान और ठोकरों ने उसे यह अहसास कराया कि दुनिया माँ की डांट से कहीं ज्यादा बेरहम है। उसने एक छोटे से ढाबे पर बर्तन साफ करना शुरू किया। रात में लैंप पोस्ट की रोशनी में पुरानी किताबें पढ़ता। उसके अंदर एक ही जिद थी—कुछ ऐसा बनकर दिखाना कि दुनिया उसे पहचाने।
सालों की मेहनत, रातों की नींद हराम करने और अटूट संकल्प के बाद, मोहन ने सिविल सेवा की परीक्षा पास की। वह अब मोहन नहीं, ‘डीएम मोहन सिंह’ था। उसे पूरे जिले में सबसे सख्त और ईमानदार अफसर माना जाता था। लेकिन उसकी इस सफलता के पीछे एक गहरा सन्नाटा था—माँ का अभाव।
एक फाइल जिसने दुनिया हिला दी
एक दिन कलेक्टरेट के अपने आलीशान दफ्तर में मोहन फाइलों के अंबार के बीच बैठा था। तभी उसके सामने वृद्धावस्था पेंशन और आवास योजना की एक फाइल आई। उसमें एक रिपोर्ट लगी थी—गांव के आखिरी छोर पर असहाय स्थिति में रहने वाली एक वृद्धा की स्थिति पर।
जैसे ही उसकी नजर नाम पर पड़ी—‘कस्तूरी देवी’—मोहन के हाथ से कलम छूट गई। उसके माथे पर पसीना आ गया। दफ्तर की ठंडी एसी हवा भी उसे चुभने लगी। रिपोर्ट में लिखा था— “महिला चलने में असमर्थ है, झोपड़ी गिर रही है, पड़ोसी कभी-कभी खाना दे देते हैं।”
उस रात मोहन के बंगले में शांति नहीं थी। उसे अपनी माँ की वे डांटें, वह थप्पड़ और वह आखिरी रात याद आने लगी। उसे अहसास हुआ कि उसने जिस ऊंचाई को पाने के लिए माँ को छोड़ा था, वह ऊंचाई माँ के आंसुओं के सामने बौनी थी।
वापसी: डीएम नहीं, बेटा बनकर
अगली शाम, एक बिना बत्ती वाली साधारण सरकारी गाड़ी गांव की ओर बढ़ी। मोहन ने साधारण खादी का कुर्ता पहना था। वह अपनी पहचान छुपाकर अपनी माँ के पास पहुंचना चाहता था। गाड़ी गांव के बाहर रुकवाकर वह पैदल ही उस ओर चला जहां उसकी झोपड़ी थी।
रास्ते में वही पुराने पेड़, वही मिट्टी की महक। जब वह अपनी झोपड़ी के सामने खड़ा हुआ, तो उसका दिल बैठने लगा। उसने अंदर झांका—वहां एक कोने में उसकी माँ बैठी चूल्हे में फूंक मार रही थी। धुआं उसकी आंखों में जा रहा था और वह खांस रही थी।
मोहन ने कांपते हुए कहा, “माँ… पानी मिलेगा?”
कस्तूरी देवी ने पलटकर देखा। आंखों में धुंधलापन था, वह पहचान नहीं पाईं, पर माँ की ममता ने एक लोटा पानी आगे बढ़ा दिया। मोहन ने जब वह लोटा पकड़ा, तो उसके आंसू उसमें गिर रहे थे। वह फुट-फुटकर रोने लगा और माँ के पैरों में गिर पड़ा।
“माँ! मैं आ गया… मैं तेरा मोहन हूँ!”
झोपड़ी में सन्नाटा छा गया। कस्तूरी देवी के हाथ से लोटा गिर गया। उन्होंने कांपते हाथों से मोहन का चेहरा छुआ, उसकी हड्डियों को टटोला, जैसे यकीन कर रही हों कि यह हाड़-मांस का बेटा वही है जो 10 साल पहले खो गया था।
“तू जिंदा है मोहन? तू सच में आ गया?” माँ की चीख में दस साल का इंतजार और दर्द एक साथ बह निकला।
व्यवस्था का बदलाव
अगले दिन जब गांव वालों को पता चला कि कस्तूरी देवी का बेटा जिले का डीएम है, तो वहां मेला लग गया। जो प्रधान कभी कस्तूरी देवी की पेंशन की फाइल अटकाता था, वह हाथ जोड़कर खड़ा था।
लेकिन मोहन ने उस दिन किसी को सजा देने के बजाय व्यवस्था को सुधारने का फैसला किया। उसने गांव में चौपाल लगाई। उसने कहा, “आज मैं यहां डीएम बनकर नहीं, एक गुनाहगार बेटे के रूप में प्रायश्चित करने आया हूँ। इस गांव की हर माँ कस्तूरी देवी है और आज से कोई भी वृद्ध भूख या छत की कमी से नहीं मरेगा।”
उसने मौके पर ही विकास कार्यों की समीक्षा की। आवास योजना के तहत कस्तूरी देवी की झोपड़ी की जगह एक पक्का घर बनाने का आदेश दिया। लेकिन उन्होंने साफ कहा कि यह घर सिर्फ ईंटों का नहीं, बल्कि ‘ममता निवास’ होगा, जहां गांव की अन्य बेसहारा महिलाएं भी आसरा पा सकेंगी।
माँ की सीख
जब मोहन ने माँ से शहर चलने की जिद की, तो कस्तूरी देवी ने एक ऐतिहासिक बात कही। उन्होंने कहा, “बेटा, तू शहर में बड़ा अफसर है, वहां तेरी जरूरत फाइलों को है। मेरी जरूरत इस मिट्टी को है। तू जहां भी रहे, बस इतना याद रखना कि तेरी कुर्सी की ताकत किसी गरीब के आंसुओं को पोंछने के लिए है, उन्हें डराने के लिए नहीं।”
मोहन ने माँ की बात मान ली। आज वह गांव एक मॉडल विलेज बन चुका है। कस्तूरी देवी अब अपने पक्के घर के बरामदे में बैठती हैं, पर उनकी नजरें आज भी रास्ते पर रहती हैं—अब वह इंतजार दर्द का नहीं, बल्कि गर्व का है।
निष्कर्ष
यह कहानी हमें सिखाती है कि सफलता की हर सीढ़ी अधूरी है अगर उसका आधार माता-पिता का आशीर्वाद न हो। पद, पैसा और प्रतिष्ठा आते-जाते रहेंगे, लेकिन माँ की ममता का कोई विकल्प नहीं है। असली न्याय वही है जो एक बेटा अपनी माँ के प्रति और एक अफसर अपने समाज के प्रति कर सके।
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