बकरी चराने गई महिला के साथ ससुर ने कर दिया कारनामा/गांव के लोग और पुलिस सभी हैरान हो गए/

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फैसले की रात

    गाँव और घर

उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले का एक छोटा-सा गाँव—माधोपुर। सुबह-सुबह कच्चे रास्तों पर धूल की पतली परत उड़ती, आम के बगीचों में कोयल की आवाज़ें, और दूर खेतों से आती मेड़ों की खुशबू। यही माधोपुर था, जहाँ हर घर, हर आँगन में कोई न कोई कहानी दबे स्वर में चलती रहती।

राधा उसी गाँव की बहू थी—किसान परिवार में ब्याही गई, मेहनती, संस्कारी और शांत। उसके ससुर रघुवर, जिन्हें सब ‘रघुवर खाँ’ कहकर बुलाते, गाँव के पुराने गड़रिया थे। कभी उनके पास ढेरों बकरियाँ थीं, अब बस चालीस-पचास बची थीं। बेटा जितिन, उम्र तीस के ऊपर, पर काम से कोसों दूर। रात-रातभर दोस्तों संग अड्डेबाज़ी, सुबह चेहरे पर अलस, और दिन ढलते ही फिर राह भटकना। राधा के लिए घर दोहरी जिम्मेदारियों का चक्र था—खेत, रसोई, पशु, और बुज़ुर्गों की सेवा। तेजस्वी आँखें, माथे पर सधा हुआ आँचल, और दिल में एक अटूट धैर्य।

रघुवर की शराब की आदत पूरे गाँव में मशहूर थी। जेब में पैसा आते ही वह ‘मिलन चौराहे’ की देसी दुकान तक पहुँच जाते। राधा जानती थी कि रातें उनके नशे में गुजरती हैं, दिन सन्नाटे में। पर उसे क्या? उसका काम था घर बचाए रखना, बिखरती इज़्ज़त को समेटे रखना।

    बहाने और बहू

एक दिन सुबह, घर के आँगन में बकरियों को दाना डालते समय राधा ने सुना—“राधा! आज मेरी तबियत कुछ ठीक नहीं। तुम बकरियों को गन्ने के खेतों की तरफ ले जाओ। मैं शाम तक गाँव के काम से लौट आऊँगा।”

रघुवर के स्वर में खुरदरापन था, पर नजरों में कुछ और। राधा ठिठकी। रोज़ यह काम वही करते थे, वह बस घर का मोर्चा संभालती। उसने धीरे कहा—“बाबा, मैं अकेली कैसे…?”

तभी जितिन आया। आँखों के नीचे काले घेरे, बाल बेतरतीब। “अरे, कर लेगी! खेत वहीं तो हैं। पगडंडी की राह जानती है तू। और बाबा भी थोड़ी दूर साथ चल देंगे।”

राधा के सामने कोई विकल्प नहीं था। सुबह के नौ बजे थे। एक कपड़े की पोटली में रोटी-सब्ज़ी बाँधी, बकरियों का झुंड आगे-आगे, वह पीछे-पीछे। रघुवर ने लाठी उठाई, एक बीड़ी सुलगाई, और थोड़ी दूरी बनाकर चल दिए।

    खेत, खामोशी और डर

गाँव से कुछ दूर गन्ने की लंबी कतारें थीं—हरी दीवारों सी। भीतर हवा कम पहुँचती, पर निजता ज़्यादा होती। राधा को ऐसे खेत हमेशा डराते थे। वह बकरियों को खाली मेड़ों की तरफ मोड़ती, ताकि खुला आकाश दिखता रहे। लेकिन रघुवर की चाल आज सीधी गन्नों के भीतर थी।

“उधर घुमाओ,” उसने इशारा किया। “यहाँ चारा अच्छा है।”

राधा ने हिम्मत बाँधी—“बाबा, धूप है, खुला खेत ठीक है।”

रघुवर अचानक ठिठका। जेब से मुड़े-तुड़े नोट निकाले—“यह रख ले। तेरे काम आएँगे। घर में तंगी है ना?”

राधा पीछे हट गई। “ज़रूरत नहीं।”

“बहुत अभिमान है तुझे?” रघुवर की आवाज़ पैनी हुई। “हमारा घर है, हमारी मर्जी!”

राधा ने बकरियों को सीटी बजाकर आगे किया, पर तभी एक रुक्ष हाथ ने उसकी कलाई जकड़ ली। वह चीख उठी। “छोड़िए, बाबा!”

खेत की गहराई में, जहाँ कोई इंसानी आहट नहीं, वह संघर्ष बेआवाज़-सा होने लगा। राधा ने दाँत भींच लिए, आँखों में पानी तैर आया। “आप ऐसा नहीं कर सकते… मैं आपकी बहू हूँ…”

पर इंसान जब गिरता है, तो रिश्ते पहले टूटते हैं। रघुवर की आँखें लाल थीं और हाथ कठोर। उसने उसकी चुन्नी से उसके हाथ बाँधने की कोशिश की। राधा ने पाँव टिका कर धक्का दिया, “बाबा! होश में आइए।”

उसका प्रतिरोध, उसकी गिरफ्त—और बीच में घूमता हुआ आसमान। शर्म, भय, असहायता—तीनों मिलकर एक लंबा, थका देने वाला सन्नाटा बन गए। जब यह सब थमा, तब दोपहर ढल चुकी थी। राधा की आँखें सूनी थीं। रघुवर ने उसे धमकी दी—“जुबान खोलकर देख, तेरी दुनिया हिलवा दूँगा। तलाक दिलवा दूँगा। कौन रखेगा तुझे?”

राधा ने कुछ नहीं कहा। उसने अपनी साड़ी ठीक की, बकरियों को संभाला, और घर की राह पकड़ ली। रास्ते भर उसे अपने पाँवों तले ज़मीन डूबती लगी।

    थाली की खनक और भीतर की खामोशी

शाम को घर लौटकर भी उसने किसी से कुछ नहीं कहा। रसोई में आटे की लोई, चूल्हे की आँच और परोसती थाली के बीच, उसकी उँगलियाँ काँपती रहीं। जितिन लौटा तो नज़रे चुराता रहा। उसने पूछा भी नहीं—“सब ठीक?”

राधा ने अगले कई दिनों तक हिम्मत नहीं जुटाई। हर रात में एक डर था कि दहलीज़ पर फिर कोई साया उतरेगा। कई बार लगा कि सब बता दे—जितिन को, अपनी पड़ोसन शांति को, प्रधान की औरत भीला को। पर शर्म ने गला दबा लिया। गाँव की पंचायतें सवाल पहले पूछती हैं, सहारा बाद में देती हैं। और तालाब में एक लहर उठती है तो उसकी मार किनारों तक जाती है।

रघुवर का मन भी शैतानी के सागर में गहरा उतर चुका था। मौका मिलते ही वह राधा की नजरों को पकड़ लेता—गंदी मुस्कान, गलीज शब्द, और वो इरादे जो दीवारों से टकराकर टूटती ध्वनि बन जाते। राधा ने घर की कई कुंडियाँ मजबूत कर लीं, पर भीतर का भय खुला ही रहा।

    ज़मीनदार और सौदा

माधोपुर का ज़मीनदार था—करणवीर सिंह। उम्र पचास के ऊपर, रुआब में डूबा, और पैसे की गुर्राहट में पला। उसे रघुवर की आदतें पता थीं। एक शाम, उसने ‘बैठक’ में रघुवर को बुलवाया। महुआ की गंध, ताश की खड़खड़, और लालटेन की लौ—“रघुवर, सुना है तेरी बहू बड़ी सुन्दर है।”

रघुवर हँसा—कुटिल। “सुन्दर है तो क्या हुआ?”

“मुझे चाहिए…” करणवीर ने मुँह से हथेली हटाई। “एक रात। कीमत बता।”

शब्दों ने दहलीज़ लाँघी। रघुवर की आँखों में वह चमक जागी जो गिरती आत्माओं में जन्म लेती है। “पाँच हज़ार।”

करणवीर ने थैली उठाई। “तीन अभी, दो बाद में। आज रात।”

“जितिन?” करणवीर ने पूछा।

“रात नौ बजे तक फैक्टरी का बहाना करके निकल जाता है। घर खाली रहता है…” रघुवर की आवाज़ में समर्पण था—पतित समर्पण। “आ जा। काम हो जाएगा।”

    किवाड़, कुंडी और चीख

उस रात, साढ़े नौ बजे, जब गाँव की गलियों में कुत्तों का भौंकना भी थक चुका था, राधा ने आँगन में दीया रखा और भीतर जाने लगी। दरवाज़े पर खटखट हुई। उसने परदे को थोड़ा हटाया—बाहर रघुवर था, साथ में करणवीर। राधा ने दरवाज़ा बंद करने की कोशिश की, पर एक बलिष्ठ हाथ दरवाज़े और जामुन की चौखट के बीच आकर अटका—कुंडी टूट गई।

अंदर शक्ति और संख्या का खेल चालू हो गया। राधा ने पूरी ताकत से चीखने की कोशिश की, पर पड़ोस की दीवारों को सुनाई देने लायक हवा नहीं थी। कमरे में मिट्टी के आलमारी, खाट, और चूल्हे का धुआँ—इन सबने मिलकर उसके विरोध की आवाज़ को सोख लिया। हथेलियों ने दुपट्टा ढँका, रस्सी ने हाथ बाँधे, और इज़्ज़त का एक फूल मसलकर फैला दिया गया, बार-बार, बेतहाशा।

जब दोनों की वासना की थकान संतोष बनी, उन्होंने थूक निगला और हँसते हुए बाहर की चौकी पर बैठकर शराब खोली—“औरत तो औरत है, बहू हो या गैर।”

रघुवर ने थैली समेटी—“रात बाकी है, फिर भी…”

राधा भीतरी कमरे के कोने में पड़ी रही। उसके आँसू सूख गए थे, पर आँखें अब भी भीगी थीं।

    लौटता पति

ठीक ग्यारह पैंतीस पर दरवाज़े पर फिर खटखट हुई—ज्यादा तेज़। राधा के गले में बंद चीख बाहर आई—“कौन?”

“मैं… जितिन।”

राधा ने कुंडी खोली। जितिन का चेहरा चिंता से भरा था। शायद फैक्टरी की नौकरी की बात एक और झूठ थी। भीतर कदम रखते ही उसने देखा—दरवाज़े के पास गिलास, दूसरे कमरे में शराब की बोतल, और चौकी पर करणवीर और रघुवर—बेखबर, बेपरवाह।

“यह क्या चल रहा है?” जितिन की आवाज़ काँपी।

राधा ने उसके हाथ थामे—उसे किनारे वाले कमरे में खींच लिया। उसने दिमाग में बंद पड़े हुजरे का दरवाज़ा खोला—“तुम्हारे पिता… और करणवीर—दोनों… मेरे साथ…”

जितिन हँसा—पहली बार की तरह, अविश्वास से। “तू पगला गई है? वो मेरे पिता हैं!”

राधा ने अपनी साड़ी के फटे सिरे दिखाए, बाँहों पर रस्सी के जलते निशान, गर्दन पर सूजी हुई रेखाएँ। जितिन का चेहरा रंग बदलता गया—जैसे किसी ने भीतर का रक्त खौलते पानी में बदल दिया हो। बाहर से करणवीर की शराब में डूबी हँसी आई—“बहू, चूल्हे पर कुछ है क्या?”

यह आवाज़ जैसे किसी ने आग में घी उँडेल दिया हो। जितिन ने आस-पास देखा—एक कुल्हाड़ी दीवार से टिकी पड़ी थी। राधा ने खूँटी से गंडासा उतारा—“आज फैसला होगा।”

    खून और कानून

कमरे का दरवाज़ा खुला। जितिन बाहर आया—कुल्हाड़ी हवा में। करणवीर ने गरदन ऊपर उठाई—“ऐ, लड़के—”

वाक्य अधूरा रह गया। धार ने हवा चिरी और गरदन पर बैठ गई। एक-दो नहीं, तीन वार—खून का फव्वारा, चौकी पर छपाक, मिट्टी ने उसे पी लिया जैसे बरसों से इसी प्यास में तड़प रही हो। रघुवर घबराकर उठा—“जितिन! तू—”

राधा आगे बढ़ी। उसकी आँखें अब भीगी नहीं थीं। उनमें एक ठंडी रोशनी थी—जो दर्द से नहीं, निर्णय से आती है। “उसका जो अंग तुम्हारे लिए हथियार बना, वही आज तुम्हारी सज़ा बनेगा।”

गंडासा नीचे उतरा। चीख फटी—बाहर के नीम पर बैठी चिड़िया उड़ गई, कुत्ते ने दूर से भौंका, तब भी इस घर की दीवारें सब सुनती रहीं और सब छुपाती रहीं।

कुछ मिनटों के बाद, कमरे में दो जिस्म पड़े थे—एक की आँखें उलटी थीं, दूसरे की सांस किसी तरह कटी-कटी बची थी। राधा कंपकंपाई, पर गिरा नहीं। जितिन ने उसके कंधे पर हाथ रखा—“चलो, थाने चलते हैं। जो किया, उसके बाद भागना नहीं—कहानी छुपानी नहीं।”

राधा ने सिर हिलाया। उसने आँचल सिर पर रखा, दरवाज़ा बंद किया, और दोनों चल पड़े—पैरो में ठोस संकल्प।

    बयान और बयार

रात के सवा बारह, माधोपुर चौकी। इंस्पेक्टर देविंदर सिंह—अनुभवी, थका हुआ, पर आँखों में झाँकने की आदत अब भी जिंदा। उसने ऊपर से नीचे तक दोनों को देखा—कपड़ों पर खून, एक कुल्हाड़ी पर जमी ताज़ा लाली, और आँखों में अनकही आग।

“कहो।” आवाज़ स्थिर रखी।

राधा ने एक-एक बात कही। पहली खेत की, फिर रातों की, फिर सौदे की। हर शब्द उसके हक की दस्तक था। देविंदर बीच-बीच में कागज़ पर नोट लिखता गया, पर उसकी आँखें अक्सर काँच के पार राधा के चेहरे पर अटक जातीं—क्या यह सच है? उसके पुराने अनुभव ने धीरे-धीरे गर्दन झुका दी—हाँ।

पुलिस फौरन मौके पर पहुँची। शव, सबूत, टूटे दरवाज़े की कुंडी, कमरे की उथल-पुथल, दुपट्टे पर रस्सी के निशान—हर चीज़ कहानी के शब्दों को प्रमाण बनाती गई। सुबह होते-होते गाँव में खबर फैल चुकी थी। पंचायत की चौपाल में कानाफूसी—“बहू ने—पति ने—सरपंच—रघुवर—”

पुलिस ने करणवीर की संपत्ति सील की, रघुवर का इतिहास खोला—पुरानी शिकायतें, पुरानी ढीठता। किसी ने कल तक कुछ नहीं कहा था, आज सबके पास पुराने राज़ थे। इंस्पेक्टर ने कड़वा मुस्कुराया—“गाँव खामोश रहता है—जब तक खून न गिरे।”

    अदालत की देहरी

मामला अदालत पहुँचा। आरोप—हत्या के। बचाव—न्यायसंगत प्रतिरक्षा, निरंतर उत्पीड़न, सामाजिक-आर्थिक मजबूरी, और तत्काल उकसावे की स्थिति। सरकारी वकील कानून की धाराओं का सहारा लेते, बचाव पक्ष मानवीय सच्चाई की। कुर्सियों पर बैठे लोगों के माथे पर सिकुड़ी लकीरें, पीछे बेंचों पर बैठी औरतों की आँखें—कभी राधा पर, कभी न्यायाधीश पर।

गवाह आए—पड़ोसन शांति ने रातों की आशंकाएँ बताईं, भीला ने खेतों वाली अजनबी चीखें, चौकीदार ने सौदा होते सुना था—“बैठक में रौशनी देर तक थी, आवाज़ें थीं, हँसी थी।” पुलिस ने सबूत रखे—दुपट्टे के रेशों पर उंगलियों के निशान, कमरे की मिट्टी पर पैरों के निशान, शराब के गिलासों पर लार का विश्लेषण। फोरेंसिक ने कहा—“संघर्ष के संकेत स्पष्ट।”

न्यायाधीश ने फाइलें पलटीं—हर पन्ना एक हांफता सच। “समाज में स्त्री की गरिमा की रक्षा प्रारम्भिक कर्तव्य है,” उन्होंने कहा। “जब संस्थान मौन रहें, कानून मुक्ति का मार्ग बनता है।”

निर्णय आया—जितिन और राधा पर हत्या का दोष नहीं, बल्कि आवश्यकता की चरम स्थिति में किए गए कृत्य की विधिक मान्यता के अंतर्गत उपयुक्त राहत। उन्हें सुधारात्मक निगरानी, पर कोई कठोर कारावास नहीं। हाँ, रघुवर और करणवीर के विरुद्ध स्त्री-अपराधों का रिकॉर्ड दर्ज, और पंचायत तंत्र की विफलता पर कड़ी टिप्पणी। साथ ही, पुलिस को निर्देश—गाँव में महिला सुरक्षा और त्वरित सहायता तंत्र स्थापित हो।

अदालत के बाहर, हवा में पहली बार एक अलग-सी गंध थी—संकोच की जगह आत्मसम्मान की। लोगों ने राधा को देखा—किसी ने झुकी नजर से, किसी ने सचेत सम्मान से। राधा ने किसी की ओर देखा ही नहीं—उसकी आँखें दूर, किसी उजली सुबह पर टिकी थीं।

    लौटना

राधा अपने घर लौटी—अब वह घर वैसा नहीं रहा। चौखट पर नया ताला था, कुंडी मज़बूत। दीवार पर एक छोटा-सा कैलेंडर—हर तारीख पर एक बिंदी, जैसे बताती हो कि हर दिन, हर रात दर्ज है। रसोई में उसने चूल्हा जलाया—आग की पीली-लाल जीभें उठीं। उसने रोटियाँ सेंकी—हर फूली रोटी उसे याद दिलाती कि धीरज भी एक रोटी की तरह है—धीमी आँच पर ही फूलता है।

गाँव के स्कूल में उसने लड़कियों को पढ़ाने का काम संभाला—गर्मी में दो घंटे, सर्दी में तीन। उसे कोई वेतन नहीं मिलता था, पर उसके भीतर का बैकुलापन भरता जाता। एक दिन छोटी निधि ने पूछा—“काकी, डर नहीं लगता?”

राधा ने मुस्कुरा कर कहा—“डर लगता है। पर डर जब सच के साथ खड़ा होता है, तो दुश्मन डरता है।”

    पंचायत और प्रतिबंध

इंस्पेक्टर देविंदर ने गाँव में “सखी केंद्र” शुरू करवाया—महिलाओं के लिए एक कमरा, एक फोन, और दो प्रशिक्षित कार्यकर्ता। गाँव की दीवारों पर लिख दिया गया—“किसी भी प्रकार के हिंसा/उत्पीड़न पर 1091 पर कॉल करें।” पहली बार, पुराने पत्थरों पर नए अक्षर उगे।

पंचायत में नियम बने—रात आठ के बाद शराब की खुलेआम बिक्री नहीं; बैठकों में लालटेन जलाने का समय तय; और किसी भी बहू-बेटी के संदिग्ध मामले में महिला समिति की उपस्थिति अनिवार्य। लोग हँसे भी—“कौन मानेगा?” पर कानून की छाया लंबी होती है—कुछ लोग अब पर्दों के पीछे भी घबराते हैं।

    बारिश का दिन

जुलाई की बारिश। कच्चा रास्ता कीचड़ में फिसलता, आम के पेड़ों का पानी झरता। राधा ने छज्जे पर खड़ी होकर बुहारन से पानी के रास्ते बनाए। दूर, स्कूल की घंटी बजी। उसने थैले में किताबें रखीं। दहलीज़ पर खड़ी हुई तो लगा—यह वही दहलीज़ है जहाँ चीखें दम तोड़ती थीं। उसने क्षण भर के लिए आँखें बंद कीं और भीतर से एक शांत आवाज़ आई—“अब यहाँ वादे जन्म लेते हैं।”

जैसे ही वह बाहर निकली, पड़ोस की शांति ने आवाज़ दी—“बहू, नई लड़कियाँ भी आने लगीं तेरे पास। तू जो पढ़ाती है, बातों में जो ताकत है… अच्छा लगता है।”

राधा ने हँसकर कहा—“मैं कुछ नहीं करती, बस दरवाज़ा खुला रखती हूँ।”

    अंतिम मोड़

एक दिन पुलिस की जीप गाँव में आई—इंस्पेक्टर देविंदर उतरे। “राधा बहू, शहर में महिला सुरक्षा पर जिला संगोष्ठी है। तुम्हें बोलना है।”

राधा ने घूँघट थोड़ा सा खिसकाया—शर्म नहीं, आदत। “मैं? क्या कहूँगी?”

“वही, जो रातों ने तुमसे कहा,” इंस्पेक्टर ने नम्रता से कहा। “कि सच सुनाई देने में शर्म नहीं होनी चाहिए। तुम्हारी कहानी किसी और की ढाल बनेगी।”

शहर के सभागार में, जब राधा ने माइक पकड़ा, उसके हाथ हल्के काँपे—पर शब्द नहीं। उसने गाँव का नाम लिया—माधोपुर। उसने दहलीज़ों, कुंडियों, खेतों, और बैठकों के किस्से कहे। उसने बताया कि कानून सिर्फ धाराएँ नहीं—धीरे-धीरे चलने वाली एक रोशनी है, जो अंधेरों में घुसकर दीवारों पर रास्ते बनाती है। उसने कहा—“जो हुआ, वह मेरे साथ नहीं होना चाहिए था। पर जो मैंने किया, वह हर उस औरत का हक है जो अपने सच की रक्षा करना चाहती है। हम छूटी आवाज़ नहीं, पूरी कहानी हैं। हमें आधा मत पढ़ो।”

तालियाँ बजीं। किसी ने खड़े होकर ताली बजाई—फिर सबने।

    फैसले की रात—अंदर

कई रातें ऐसे आईं जब राधा नींद में सहमकर उठ बैठी—चीख भीतर से आती, वह पानी पीकर वापस लेट जाती। एक रात उसने सपने में खुद को उस खेत में पाया—पर इस बार उसकी मुट्ठी में रस्सी नहीं, कलम थी। सुबह उठी तो उसने दीवार पर बड़ा-सा लिख दिया—“फैसला रात में नहीं, दिन में पढ़ा जाता है।”

जितिन अब बदला हुआ था। उसने सच को पहले दिन नहीं माना, पर देखने की आदत सीख ली। उसने शहर में मजदूरी पकड़ ली; थके हाथों से रात को घर लौटता, राधा के हाथ से चाय पीता, और कभी-कभार खामोशी में उसका हाथ थाम लेता। शादियाँ सिर्फ सिंदूर से नहीं, संकट से बनती हैं—उनका रिश्ता अब शब्दों के पार पहुँचता जा रहा था।

    समापन—गाँव की हवा

समय बीता। माधोपुर में अब भी पुराने किस्से दुहराए जाते, पर धीरे-धीरे शब्द बदल रहे थे। कोई कहता—“बहू ने हद कर दी”—तो कोई जवाब देता—“नहीं, उसने हदों को ठीक किया।” बच्चों की किताबों में अब एक पाठ जोड़ दिया गया—“हिम्मत और हक।” सखी केंद्र की दीवार पर पोस्टर लगे थे—“आवाज़ उठाओ।” और सबसे ऊपर, ज़मीनदार की पुरानी बैठक के सामने एक लोहे का ताला लटकता—जंग खाता, चुप।

राधा ने अपनी खिड़की से खेतों की ओर देखा—गन्ने की लंबी कतारें अब भी थीं, पर अब वहाँ जाने में उतना भय नहीं था। उसने अपने गले में पड़ी चाबी को मोड़ा—घर के अंदर और बाहर, दोनों तरफ के ताले ठीक हैं। उसने मुस्कराहट के साथ दहलीज़ पार की—बगल में थैला, सिर पर हल्का सा आँचल। रास्ते में उसे कई बचियाँ मिलीं—“काकी, आज कहानी?”

राधा ने कहा—“हाँ, आज कहानी—पर इस बार तुम सुनाओगी। मैं सुनूँगी।”

और वह चल पड़ी—गाँव की उसी पगडंडी पर, जहाँ कभी उसके कदम काँपे थे, अब वहीं उसके पीछे आत्मविश्वास के छोटे-छोटे कदम दौड़ रहे थे। हवा में हल्की बारिश की गंध थी—नए मौसम की दस्तक। और उस दस्तक में एक अडिग घोषणा—फैसले की रात बीत चुकी है। अब दिन का समय है।

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