धर्मेंद्र का आनन-फानन में अंतिम संस्कार क्यों किया?

धर्मेंद्र के अंतिम संस्कार पर सवाल: क्या बॉलीवुड के ही-मैन को मिला न्याय?
“हम वह मर्द हैं जो मौत का स्वागत मेहमानों की तरह करते हैं।”
धर्मेंद्र का यह मशहूर डायलॉग उनके निधन के बाद सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है। लेकिन इसी के साथ कई सवाल भी उठ रहे हैं—क्या वाकई बॉलीवुड के इतने बड़े कलाकार, पद्म भूषण से सम्मानित धर्मेंद्र को उनके अंतिम सफर में वह इज्जत और सम्मान मिला, जिसके वे हकदार थे?
राजकीय सम्मान की कमी: क्यों उठे सवाल?
धर्मेंद्र को 2012 में कांग्रेस सरकार के दौरान पद्म भूषण मिला था। ऐसे सम्मानित व्यक्ति को आमतौर पर अंतिम संस्कार के समय राजकीय सम्मान दिया जाता है—बंदूक सलामी, तिरंगे में लिपटा पार्थिव शरीर, जनता और फैंस को अंतिम दर्शन का मौका। लेकिन धर्मेंद्र के अंतिम संस्कार की कोई ऐसी तस्वीर सामने नहीं आई जिसमें उनके पार्थिव शरीर को राजकीय सम्मान मिला हो। आनन-फानन में उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया, मीडिया को श्मशान घाट में प्रवेश नहीं मिला, और परिवार या सरकार की ओर से कोई औपचारिक राजकीय श्रद्धांजलि नहीं दी गई।
यह सवाल भाजपा सरकार से भी पूछा जा रहा है—आखिरकार धर्मेंद्र को वह सम्मान क्यों नहीं मिला? क्यों इतनी जल्दी सबकुछ निपटा दिया गया? क्या यह परिवार का फैसला था या सरकार की ओर से कोई चूक?
मीडिया में धर्मेंद्र की खबरें गायब क्यों?
धर्मेंद्र के निधन के बाद, टीवी और अखबारों में उनकी खबरें शुरू के कुछ घंटों तक ही दिखीं। जल्दी ही उनकी यादें सिमट गईं और दूसरी खबरें—प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अयोध्या कार्यक्रम, राम मंदिर में झंडा फहराना—टीवी पर छा गईं। क्या धर्मेंद्र इतने छोटे कलाकार थे कि उनकी अंतिम विदाई पर देशभर में चर्चा नहीं होनी चाहिए थी? श्रीदेवी को भी पद्म भूषण मिला था, उनका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ हुआ था। फिर धर्मेंद्र के साथ ऐसा क्यों नहीं हुआ?
परिवार, राजनीति और धर्मेंद्र का सफर
धर्मेंद्र का परिवार भी चर्चा में रहा—पहली पत्नी प्रकाश कौर से चार बच्चे (सनी, बॉबी, अजयता, विजेता) और दूसरी पत्नी हेमा मालिनी से दो बेटियां (ईशा, अहाना)। धर्मेंद्र ने इस्लाम धर्म अपनाकर हेमा मालिनी से शादी की थी। खुद धर्मेंद्र, हेमा मालिनी और बोबी देओल भाजपा सांसद रहे हैं। फिर भी महाराष्ट्र की भाजपा सरकार में उन्हें राजकीय सम्मान क्यों नहीं मिला?
उनके निधन की खबर 24 नवंबर को आई, लेकिन 10-12 दिन पहले ही उनकी तबीयत खराब होने की अफवाहें मीडिया में आ चुकी थीं। परिवार ने बार-बार मीडिया को अफवाहों से बचने की अपील की थी। 10 तारीख को अस्पताल में भर्ती हुए, दो दिन वेंटिलेटर पर रहे, फिर घर लौटे। अचानक 24 नवंबर को निधन और कुछ ही घंटों में अंतिम संस्कार। फैंस को अंतिम दर्शन का मौका तक नहीं मिला।
धर्मेंद्र: जिंदा दिल, बेबाक कलाकार
धर्मेंद्र कभी दब्बू या डरपोक नहीं रहे। वे बेबाक बोलने वाले, जिंदादिल इंसान थे। सुभाष घई को फिल्म सेट पर थप्पड़ मारना हो या अवार्ड लॉबी पर खुलकर बोलना—धर्मेंद्र ने हमेशा अपनी बात रखी।
300 फिल्मों में 150 हिट, लेकिन कभी लीड एक्टर के तौर पर अवार्ड नहीं मिला। उन्होंने खुद मंच पर कहा—“हर साल नया सूट सिलवाता था कि शायद इस बार अवार्ड मिलेगा, लेकिन अब सूट सिलवाना छोड़ दिया।”
धर्मेंद्र ने राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन के साथ सुपरहिट फिल्में दीं। अमिताभ बच्चन को “जंजीर” जैसी फिल्म दिलवाई, शाहरुख खान को हेमा मालिनी की फिल्म में लेने की सलाह दी, सलमान खान को अपना तीसरा बेटा माना। उन्होंने रोमांटिक हीरो, एक्शन हीरो और ही-मैन की छवि से पूरे देश में अपना मुकाम बनाया।
उनके डायलॉग्स आज भी लोगों की जुबान पर हैं—
“कफ़न ओढ़ने वाले घंटे नहीं घड़ियां गिनते हैं।”
“झूठ के चेहरे पर नकाब नहीं रुकता।”
“हमारी बर्दाश्त को कमजोरी मत समझना।”
“मर्द का खून और औरत के आंसू जब तक ना बहे उनकी कीमत नहीं लगाई जा सकती।”
इतनी जल्दी क्यों हुआ अंतिम संस्कार?
धर्मेंद्र के निधन के बाद परिवार रो रहा था, अस्पताल में बोबी और सनी देओल भावुक थे। लेकिन अंतिम संस्कार में सबकुछ इतनी जल्दी क्यों हुआ? क्या परिवार नाराज था? क्या मीडिया से बचना चाहते थे? या सरकार ने राजकीय सम्मान देने में चूक की? फैंस को अंतिम दर्शन क्यों नहीं मिला?
यह सवाल आज धर्मेंद्र के चाहने वालों, बॉलीवुड के फैंस और आम जनता के मन में हैं। क्या यह सबकुछ सामान्य था? या कहीं कुछ ऐसा था जो नहीं होना चाहिए था?
आपकी राय क्या है?
धर्मेंद्र जैसे कलाकार के साथ ऐसा व्यवहार होना चाहिए था? क्या आपको लगता है कि सरकार या परिवार ने कोई चूक की? क्या फैंस को अंतिम दर्शन का अधिकार मिलना चाहिए था? क्या धर्मेंद्र को राजकीय सम्मान मिलना चाहिए था?
नीचे कमेंट में अपनी राय जरूर लिखें।
क्योंकि ऐसे कलाकार सिर्फ फिल्में नहीं, बल्कि देश की संस्कृति और यादों का हिस्सा होते हैं।
धन्यवाद।
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