फेक एनकाउंटर में DSP लाल सिंह समेत 4 पुलिसवालों को जेल और देश छोड़कर भागी IPS ज्योति बेलुर की कहानी
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फेक एनकाउंटर: डीएसपी लाल सिंह, आईपीएस ज्योति बेलूर और चार मजदूरों की कहानी
जनवरी 1997 की सर्दियों की एक सुबह थी। दिल्ली के प्रधानमंत्री आवास के ठीक सामने कुछ लोग बैठे थे – बूढ़े, बच्चे, महिलाएँ, सभी के चेहरे पर गहरी उदासी और आँखों में आँसू। सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें घेर लिया, सवाल किए, डांटा। लेकिन उन लोगों ने हाथ जोड़कर बस एक ही इल्तजा की – “हमारे बच्चों का कत्ल हो गया है, साहब। हम चाहते हैं कि प्रधानमंत्री जी आदेश दें और इसकी जांच सीबीआई से हो।”
सुरक्षा वालों ने भरोसा दिलाया, “आप चिंता मत करिए, आपकी बात प्रधानमंत्री तक पहुँचा देंगे।” इसके बाद वे लोग अपने घर लौट गए, लेकिन उनकी आवाज़ प्रधानमंत्री तक पहुँची। उस समय देश के प्रधानमंत्री थे एचडी देवगोड़ा। मामला गंभीर था, इसलिए पीएमओ की तरफ से आदेश हुआ – जांच सीबीआई को सौंपी जाए।
यह कहानी उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले के भोजपुर थाना क्षेत्र के मछरिया गाँव की है। यहाँ भोजपुर थाने का एसएचओ था लाल सिंह। तारीख थी 8 नवंबर 1996, शाम के लगभग चार बजे। एसएचओ ने वायरलेस पर सूचना दी, “302 के मुलजिम रणपाल, भगवत और विनोद को लेकर बजरंगपुर जा रहे थे, तभी मछरिया की पुलिया के पास बदमाशों ने घेर लिया, गोलियाँ चल रही हैं, बैकअप चाहिए।”
मौके पर भारी पुलिस बल पहुँचता है – एसपी देहात ओपी सागर, मोदीनगर की सीईओ और ट्रेनी आईपीएस ऑफिसर ज्योति बेलूर, सब इंस्पेक्टर श्रीपाल सिंह और निवारी पुलिस स्टेशन के एएसआई एसके यादव। वहाँ पहुँचने पर पता चलता है कि दो बदमाश पहले ही मारे जा चुके हैं, दो ईख के खेत में छिपे हैं। एनकाउंटर शुरू होता है, दोनों को मार दिया जाता है।

पुलिस मीडिया को बुलाती है, पीठ थपथपाती है – “चार बदमाशों का एनकाउंटर कर दिया गया।” पुलिस की तरफ से 48 गोलियाँ चलीं, बदमाशों की तरफ से 16। हथियारों की बरसात होती है – रिवॉल्वर, कार्बाइन, स्टेन गन, AK-47। लेकिन जब मीडिया पूछती है, “ये बदमाश कौन थे?” तो पुलिस कहती है, “हम पहचान नहीं पाए।” कोई परिवारवाले संपर्क नहीं करते, पुलिस अंतिम संस्कार भी करवा देती है।
दो-तीन दिन बाद अखबारों में खबर छपती है – “पुलिस ने मुठभेड़ में निर्दोष मजदूरों को मार दिया।” फोटो भी छपता है – जसवीर उर्फ पप्पू (23), जलालुद्दीन (17), अशोक (17), प्रवेश (17)। ये सभी मोदीनगर के मजदूर थे। खबर छपते ही परिवारवालों, स्थानीय नेताओं में गुस्सा फैल जाता है। लोग सड़कों पर उतर आते हैं, धरना-प्रदर्शन शुरू हो जाता है।
अधिकारियों ने मामले की जांच हापुड़ के सीओ को दी, लेकिन उन्होंने लीपापोती कर दी, फाइनल रिपोर्ट लगा दी। परिवारवालों को ताज्जुब था – “हमारे बच्चे तो फैक्ट्री में मजदूरी करते हैं, कैसे बदमाश हो सकते हैं?” कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था। परेशान होकर वे दिल्ली पहुँचते हैं, प्रधानमंत्री आवास के सामने बैठ जाते हैं। संसद सदस्य रमेश चंद्र तोमर ने मामला उठाया, लोकसभा स्पीकर इंद्रजीत गुप्ता और प्रधानमंत्री देवगोड़ा के पास गए। आखिरकार आदेश हुआ – जांच सीबीआई से हो।
1 फरवरी 1997 को सिफारिश, 7 अप्रैल को सीबीआई को जांच सौंप दी गई। सीबीआई ने एफआईआर दर्ज की – एसएचओ लाल सिंह, सब इंस्पेक्टर जोगिंदर सिंह, कांस्टेबल सूर्यभान, कांस्टेबल सुभाष चंद्र, रणवीर सिंह। 10 सितंबर 2001 को सीबीआई ने चार्जशीट अदालत में पेश की।
लेकिन इससे पहले ही ट्रेनी आईपीएस ऑफिसर ज्योति बेलूर मौका पाकर मई 2001 में देश छोड़कर इंग्लैंड भाग गईं। उन्हें आभास था कि चार्जशीट में उनका नाम भी होगा। बाद में पता चला कि जसवीर के शरीर में जो गोली लगी थी, वह ज्योति बेलूर की सरकारी रिवॉल्वर से चली थी। लेकिन वह कभी वापस नहीं आईं, इंग्लैंड में प्रोफेसर बन गईं। भारत ने प्रत्यार्पण की कोशिश की, इंग्लैंड ने इंकार कर दिया।
अदालत में मामला चलता रहा, 20 साल 103 दिन बीत गए। 20 फरवरी 2017 को विशेष सीबीआई कोर्ट गाजियाबाद ने 226 पेज के फैसले में सीबीआई की थ्योरी को सही माना – “वीरता का पुरस्कार और प्रमोशन पाने के लिए पुलिसवालों ने चार निर्दोष मजदूरों को मार डाला।”
जांच में पता चला – चारों मजदूर निहत्ते थे, चाय की दुकान पर बैठे थे। पुलिसवालों ने जीप में बैठाकर दो को पुलिया पर, दो को ईख के खेत में मार दिया। फिर वायरलेस से झूठी सूचना दी – “चार बदमाशों ने घेर लिया है, गोलियाँ चल रही हैं।” फिल्मी कहानी गढ़ी गई, लेकिन परिवारवालों ने हार नहीं मानी। प्रवेश की मां ने मकान, जमीन, प्लॉट सब बेच दिया, लेकिन लड़ाई जारी रखी। जसवीर की पत्नी दूसरी जगह शादी कर ली, बेटी का पता नहीं चला। अशोक की मां ने खेती की जमीन बेच दी, जलालुद्दीन की मां ने भी बहुत कुछ खोया।
आईपीएस ज्योति बेलूर के लिए बार-बार समन जारी हुए, लेकिन वह कभी वापस नहीं आईं। अदालत ने दोषी माना, लाल सिंह रिटायर हो चुका था, उसे उम्रकैद की सजा और पांच लाख रुपए जुर्माना लगा। बाकी पुलिसवालों को भी सजा मिली। रणवीर सिंह की मौत हो चुकी थी।
यह कहानी पूरे भारत को झकझोर गई थी। पहली बार कोई आईपीएस ऑफिसर देश छोड़कर भाग गया था। गरीब मजदूरों को मरने के बाद इंसाफ मिला। अदालत का फैसला भले देर से आया, लेकिन परिवारवालों ने कहा – “आज हम खुश हैं, हमें इंसाफ मिला।”
इस घटना का उद्देश्य किसी को परेशान करना नहीं है, बल्कि आपको जागरूक करना है। पाप का घड़ा भरता है, पुलिसवालों ने प्रमोशन और पुरस्कार के लिए कत्ल किया, लेकिन उनका बुढ़ापा सलाखों के पीछे गुजरेगा।
अंतिम संदेश
यह कहानी न्याय, संघर्ष और सच्चाई की है। गरीब परिवारों ने हिम्मत नहीं हारी, 20 साल तक लड़ाई लड़ी, हर चीज गंवाई, लेकिन इंसाफ पाया। न्याय देर से मिले, लेकिन मिलता जरूर है।
देश के नागरिकों को जागरूक रहना चाहिए, सवाल पूछना चाहिए, और सत्ता के गलत इस्तेमाल के खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिए। यह कहानी उन सभी के लिए है जो सच के लिए लड़ते हैं, चाहे कितनी भी मुश्किल हो।
जय हिंद!
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