आखिरी ख्वाहिश ने पूरी जेल को हिला दिया – एक कैदी और एक पुलिसवाली की कहानी
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💔 आखिरी ख्वाहिश ने पूरी जेल को हिला दिया – एक कैदी और एक पुलिसवाली की कहानी
I. कैदी नंबर 917 और आखिरी ख्वाहिश
मेरा नाम फराहा अंसारी है। मैं 40 साला लेडी इंस्पेक्टर हूँ। मेरी ज़िंदगी का ज़्यादातर हिस्सा अदालतों, थानों और जेल की दीवारों के बीच गुज़रा है। मैंने बेशुमार चेहरे देखे: कुछ नरम, कुछ सख्त, कुछ मासूम दिखने वाले और कुछ पत्थर दिल।
मगर कैदी नंबर 917—अर्जुन शर्मा—ने मुझे अजीब सी कशमकश में डाल दिया था। वह आम मुजरिम नहीं लगता था। आँखों में गहरी उदासी और चेहरे पर एक परसुकून ख़ामोशी, जैसे सब कुछ जानकर भी चुप बैठा हो। वह सिर्फ़ 19 साल का था। यह बात मेरे दिल में तीर की तरह चुभती थी कि जिस लड़के ने अभी दुनिया को ठीक से देखा भी नहीं, उसे अब दुनिया से रुखसत होना है। पुलिस की नौकरी ने मुझे सख्त दिल बना दिया था, मगर 917 के सामने दिल में एक नरमी सी जाग उठती थी।
मौत की सज़ा और माँ का यकीन
दो दिन बाद कैदी नंबर 917 को सज़ा-ए-मौत दी जानी थी। जब अर्जुन अपनी माँ और वालिद से आखिरी बार मिला, तो मंज़र दिल दहला देने वाला था। माँ अपने बेटे के गले लगकर जोर-जोर से रो रही थी। वह बार-बार कह रही थी: “तू बेगुनाह है!” उनका यह यकीन मुझे अंदर तक झिंझोड़ गया।
उसी दिन मुझे अर्जुन की आखिरी ख्वाहिश पूछने का हुक्म मिला। मैंने सोचा शायद वह घर वालों के साथ कुछ वक़्त मांगेगा या सादा सी ख्वाहिश कहेगा। मगर जब मैंने आहिस्तगी से पूछा, “अर्जुन, तुम्हारी कोई आखिरी ख्वाहिश है?” तो उसने एक लम्हे की खामोशी से मेरी तरफ़ देखा, फिर बोला, “मेरी एक ख्वाहिश है, मगर वादा करें कि उसे पूरा करेंगी।“
जब मैं उसे एसपी साहब के पास ले गई, और उन्होंने नरम लहजे में पूछा, “बेटा, तुम्हारी आखिरी ख्वाहिश क्या है?” तो जो अल्फाज़ अर्जुन के लबों से निकले, उन्होंने पूरे कमरे को साकित कर दिया।
अर्जुन ने कहा: “मैं ज़िंदगी में पहली और आखिरी बार शादी करना चाहता हूँ। अपनी बीवी के साथ एक रात गुज़ारना चाहता हूँ, फाँसी से पहले।“
एसपी साहब ने संजीदगी से कहा, “बेटा, शादी तो हम करवा सकते हैं। मगर सोचो, कौन ऐसी लड़की तुमसे शादी करेगी जब सब जानते हैं कि तुम्हें 2 दिन बाद सज़ा-ए-मौत दी जानी है?”
अर्जुन चुपचाप सुनता रहा, फिर बोला, “सर, आप फ़िक्र न करें। मेरी शादी ख़ुद-ब-ख़ुद हो जाएगी। बस मस्जिद में ऐलान करवा दें कि कैदी अर्जुन शर्मा अपनी सज़ा-ए-मौत से पहले एक दिन के लिए शादी करना चाहता है किसी ऐसी औरत से जो अपनी मर्ज़ी से उसकी दुल्हन बने।“
यह सुनकर मैं बेइख्तियार चौंक उठी।

II. दुल्हन का लिबास और रात का धोखा
मैंने ऐलान करवा दिया, मगर दिल में यक़ीन नहीं था कि कोई आएगा। मगर ऐलान के सिर्फ़ एक घंटे बाद, एक सिपाही हाँफता हुआ मेरे दफ़्तर में आया।
“मैडम! जेल के दरवाज़े पर एक लड़की दुल्हन के लिबास में खड़ी है, और उसके साथ एक पंडित जी भी हैं!”
एसपी और मैं दोनों हैरान रह गए। सामने 17-18 साल की एक नाज़ुक सी लड़की खड़ी थी। लाल जोड़े में मलबूस, पूरी तरह सजी हुई, मगर चेहरे पर एक अजीब सा सुकून और अज़्म था।
पंडित जी ने अदब से जवाब दिया, “साहब, यह लड़की ख़ुद आई है। मैंने मना किया, मगर वो नहीं मानी। उसने कहा कि वह अर्जुन शर्मा से शादी करना चाहती है।”
कानून कहता था कि कैदी की आखिरी ख्वाहिश पूरी की जाए। चुनाँचे, जेल के दफ़्तर में सादा सी रस्म के साथ अर्जुन और उस लड़की की शादी कर दी गई।
शादी मुकम्मल होने के बाद, अर्जुन ने मुस्कुराकर कहा, “अब आप वादे के मुताबिक़ मेरी दुल्हन को मेरे पास भेज दें। बस एक रात की बात है।“
मैंने उसे दुल्हन के सेल तक पहुँचाया। रात गहरी हुई, फिर अचानक जेल की फिज़ा एक चीख से गूँज उठी।
मैं दौड़ती हुई अर्जुन के सेल की तरफ़ पहुँची। दरवाज़ा खोला, तो वो लड़की दुल्हन के लिबास में खड़ी थी। चेहरा नक़ाब के नीचे, मगर पूरा बदन काँप रहा था।
“क्या हुआ? तुम तो अपनी मर्ज़ी से शादी करके आई थी।” मैंने तंज़िया लहजे में कहा।
वह काँपती आवाज़ में बोली, “मुझे यहाँ से निकालो। मैं यहाँ रहना नहीं चाहती।” अचानक, वह दरवाज़े की तरफ़ दौड़ पड़ी और तेज़ी से बाहर निकल गई। मैंने दरवाजा बंद किया और वापस दफ्तर आ गई। सारी रात ख्यालात में खोई रही।
III. अर्जुन की फ़रारी और असली दुल्हन का राज़
सुबह होते ही एसपी साहब गुस्से में दफ़्तर में दाखिल हुए। “इंस्पेक्टर फराहा! फ़ौरन जाकर देखो, अर्जुन कहाँ है?”
पर जब मैं दौड़ी और सेल खोला, तो अंदर एक मर्दाना लिबास में कोई शख्स दीवार के पास लेटा हुआ था। जब मैंने उसे उठाया, तो मेरे पाँव तले ज़मीन खिसक गई। वही लड़की, जो कल दुल्हन बनकर आई थी, अब अर्जुन के कपड़ों में मलबूस, बेहोश पड़ी थी।
एसपी साहब भी वहाँ आकर आग बगोला हो गए: “यह क्या तमाशा है? अर्जुन कहाँ है?“
हम सबके होश उड़ गए। अर्जुन फ़रार हो चुका था।
वह लड़की जब होश में आई, तो बिल्कुल पुरएतमाद अंदाज़ में बोली: “आप लोगों ने अर्जुन के साथ ज़ुल्म किया है। वह सज़ा-ए-मौत के लायक नहीं था।“
मैंने सख़्त लहजे में कहा, “लड़की, तुमसे सवालात होंगे। अगर तुमने सच न बताया, तो अंजाम अच्छा नहीं होगा।”
मगर वह मुतमइन थी। उसने कहा, “मैं अर्जुन के बारे में सारी सच्चाई बताऊँगी।“
मैंने गौर से देखा उसके चेहरे पर ना घबराहट थी ना पेशीमानी। मैंने पूछा, “क्या वो वाकई तुम्हारा भाई है? क्या तुम लोगों ने यह ढोंग रचाया था?”
वह आहिस्तगी से बोली, “नहीं, वो मेरा हक़ीक़ी भाई नहीं है।“
मेरे अंदर गुस्से की लहर दौड़ गई। “फिर तुमने यह सब क्यों किया? तुमने उससे शादी क्यों की? तुम दोनों ने जेल को बेवकूफ बनाया। अर्जुन फ़रार हो गया।”
वह आँखों में आँखें डालकर बोली: “आप ग़लत हैं। वो फ़रार नहीं हुआ। वो वापस आएगा। मुझे इतना यक़ीन है, क्योंकि वह जानता है कहाँ जाना है और कब वापस आना है। अब वो मेरा शौहर है। वो मुझे छोड़ने वाला नहीं।“
मंगेतर का बलिदान
उसने खामोशी तोड़ते हुए अपनी पूरी कहानी सुनाई। “मेरा नाम निशा है, और मेरी बड़ी बहन की मंगनी अर्जुन के साथ हुई थी। अर्जुन बचपन से बहादुर और बेखौफ लड़का था। एक रात बदमाश हमारे घर आए थे। अर्जुन ने दुश्मन का मुकाबला किया। झड़प के दौरान निशा की बड़ी बहन (जो अर्जुन की मंगेतर थी) मारी गई। अर्जुन ने लड़ाई में एक आदमी को चोट पहुँचाई, मगर वो क़त्ल नहीं था। यह हमारी इज़्ज़त बचाने की लड़ाई थी। असल क़ातिल वो बदमाश थे, मगर इल्ज़ाम अर्जुन पर मढ़ा गया।“
निशा ने कहा कि अगर उनके पास ताक़त या रब्त होता, तो शायद ऐसा न होता। इस दुनिया में कमज़ोरों के लिए इंसाफ मुश्किल है।
फिर उसने कहा, “यह सब अर्जुन की माँ की मंसूबाबंदी थी। वो ख़ुद अपनी दूसरी बेटी क़ुर्बान कर देती, मगर अपने बेटे को सज़ा-ए-मौत नहीं देती।“
निशा ने कहा कि उसने ख़ुद को इस मंसूबे के लिए पेश किया ताकि अर्जुन बच सके। उसी रात, अर्जुन दुल्हन के लिबास में बाहर निकला और लड़की (निशा) ने उसकी जगह ले ली।
अर्जुन की माँ ने निशा को एक बड़े वकील के पास भेजा, वही वकील जिसकी जान अर्जुन ने बरसों पहले बचाई थी। अदालत में जब सच सामने आया, तो साबित हो गया कि अर्जुन ने अपनी ग़ैरत के लिए लड़ाई लड़ी थी, जुर्म नहीं किया था।
अर्जुन को बाइज्ज़त बरी कर दिया गया, और वह आज़ाद हो गया। निशा ने आँसू पोंछते हुए कहा, “अर्जुन बेगुनाह था, और अब वह आज़ाद है।”
मैं देर तक खामोश बैठी रही। खिड़की से बाहर देखा, सुबह की हल्की रोशनी फैल रही थी। मैंने दिल में सोचा, कुछ कहानियाँ वक़्त के साथ मिटती नहीं। वो दिल के किसी कोने में हमेशा ज़िंदा रहती हैं। अर्जुन की आखिरी ख्वाहिश ने न सिर्फ़ उसे आज़ाद किया, बल्कि एक निर्दोष पर लगे कलंक को भी धो डाला।
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