फिल्म इंडस्ट्री में रीम शेख के साथ क्या गलत हुआ???

फिल्म इंडस्ट्री में अक्सर एक बात कही जाती है—“फिल्म सेट पर बनती है, लेकिन असली फिल्म एडिट टेबल पर बनती है।” दर्शक जिस कहानी को पर्दे पर देखते हैं, उसके पीछे कई परतें होती हैं: शूटिंग के फैसले, स्क्रिप्ट में बदलाव, प्रोड्यूसर की रणनीति, मार्केटिंग की जरूरतें और सबसे महत्वपूर्ण—फाइनल एडिट। इसी फाइनल एडिट की दुनिया से जुड़ी एक चर्चा हाल के दिनों में सोशल मीडिया और एंटरटेनमेंट सर्कल में तेजी से घूमी, जब अभिनेता ईशान खट्टर के एक बयान का हवाला देकर कहा गया कि उनकी फिल्म होमबाउंड में एक अभिनेत्री—रीम शेख—को उनके “पार्टनर” के रोल में कास्ट किया गया था, उनके साथ रोमांटिक सीन और यहां तक कि एक गाना भी शूट हुआ, लेकिन अंतिम कट में उनके सारे सीन हटाकर उन्हें फिल्म से लगभग “गायब” कर दिया गया।
यह मामला सिर्फ “सीन कट” होने की आम घटना भर नहीं लगता, क्योंकि यहाँ चर्चा यह है कि अभिनेत्री ने फिल्म का हिस्सा बनकर समय दिया, शूटिंग की, संभवतः अन्य प्रोजेक्ट्स छोड़े—लेकिन अंत में स्क्रीन पर उनकी मौजूदगी नहीं रही। ऐसे में सवाल उठता है: क्या यह केवल रनटाइम घटाने का व्यावहारिक निर्णय था, या यह इंडस्ट्री की उस संरचना का उदाहरण है जहां कम स्थापित (या टीवी बैकग्राउंड वाले) कलाकारों की हिस्सेदारी सबसे पहले “सैक्रिफाइस” कर दी जाती है?
महत्वपूर्ण नोट: नीचे दी गई बातों में कई पहलू सार्वजनिक चर्चाओं/वीडियो-नैरेशन पर आधारित हैं। वास्तविक तथ्य फिल्म के मेकर्स, आधिकारिक क्रेडिट्स, और संबंधित पक्षों के सत्यापित बयानों से ही तय होते हैं। अफेयर/रूमर्स जैसी बातों को तथ्य के रूप में नहीं, केवल “सोशल मीडिया नैरेटिव” की तरह समझना चाहिए।
1) आखिर “कट” क्यों होता है? रनटाइम और इंटरनेशनल प्लेटफॉर्म की रणनीति
चर्चा के अनुसार होमबाउंड का शुरुआती कट लगभग 3 घंटे के आसपास था, लेकिन बाद में उसे ट्रिम करके करीब 2 घंटे के भीतर लाया गया। कई फिल्मों में यह प्रक्रिया सामान्य है—क्योंकि लंबे रनटाइम का मतलब होता है:
थिएटर शोज़ की संख्या कम होना
दर्शकों का धैर्य/पेसिंग का जोखिम
कहानी का फोकस बिखरना
इंटरनेशनल फेस्टिवल/श्रेणी के अनुरूप “कट” की जरूरत
यह भी कहा गया कि फिल्म को इंटरनेशनल अवॉर्ड सर्किट (और “ऑस्कर्स योग्य” कैटेगरी/प्रेजेंटेशन) के हिसाब से टाइट कट बनाने की कोशिश की गई। सच यह है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कई बार कहानी का “कोर” संदेश और टोन बनाए रखना प्राथमिकता बन जाता है। ऐसे में सब-प्लॉट्स, रोमांटिक ट्रैक्स, कॉमिक ट्रैक्स—कई बार हटाए जाते हैं, भले वे शूट और एडिट दोनों हो चुके हों।
लेकिन यहां जो बात सबसे ज्यादा चुभती है, वह यह नहीं कि “सीन कट हुए”—बल्कि यह कि कथित तौर पर पूरा ट्रैक ही हट गया, यानी कलाकार का अस्तित्व ही अंतिम फिल्म से मिट गया।
2) “सीन कट” बनाम “एक्टर कट”: दो अलग चोटें
फिल्मों में सीन कट होना आम है। कई बड़े कलाकारों के सीन भी कट होते रहे हैं। पर दर्शकों और इंडस्ट्री दोनों के नजरिए से दो स्थितियों में फर्क है:
(क) कुछ सीन कट, पर किरदार मौजूद
इसमें कलाकार का योगदान, चेहरा, क्रेडिट—कुछ न कुछ दर्शकों तक पहुँचता है। करियर में “फिल्मोग्राफी” का हिस्सा बन जाता है।
(ख) पूरे किरदार का लगभग हट जाना
यह वह स्थिति है जिसकी वजह से सबसे ज्यादा विवाद और दुख पैदा होता है। कलाकार ने काम किया, पर स्क्रीन पर दिखा ही नहीं। दर्शक समझते हैं—“किरदार था ही नहीं।” और यहीं से “परसेप्शन” बनता है कि शायद कलाकार “नॉन-एसेंशियल” था, या उसकी परफॉर्मेंस कमजोर थी—जबकि असल कारण एडिटिंग स्ट्रैटेजी, रनटाइम, या कहानी की दिशा भी हो सकता है।
रीम शेख के मामले में चर्चा “(ख)” वाली स्थिति की है—और इसी वजह से इसे “अनफेयर” बताया जा रहा है।
3) टीवी से फिल्म तक: ट्रांजिशन के रास्ते में सबसे बड़ा डर
रीम शेख टीवी इंडस्ट्री में लंबे समय से सक्रिय रही हैं और युवा दर्शकों में उनकी पहचान है। टीवी के कलाकार जब फिल्मों में कदम रखते हैं, तो उनके लिए यह बदलाव सिर्फ माध्यम का नहीं होता; यह “इमेज”, “नेटवर्क”, “लॉबी”, “प्रोडक्शन बैकिंग” और “परसेप्शन” का बदलाव होता है।
टीवी में एक्टर “फेस” होता है—घर-घर दिखाई देता है।
फिल्मों में एक्टर “पोजिशन” होता है—कास्टिंग के पॉवर-सर्कल, पीआर, और स्टूडियो रिलेशनशिप के अनुसार टिकता है।
ऐसे में यदि किसी टीवी कलाकार की पहली/बड़ी फिल्म में ही उनका ट्रैक कट हो जाए, तो असर सिर्फ एक फिल्म तक सीमित नहीं रहता। यह करियर के लिए एक अजीब संदेश छोड़ देता है—कि “मेकर्स ने उसे जरूरी नहीं समझा।”
यही वजह है कि दर्शक और क्रिएटर्स दोनों इस मुद्दे पर संवेदनशील हो जाते हैं।
4) इंडस्ट्री की हायरार्की: सपोर्टिंग ट्रैक सबसे पहले क्यों कटता है?
वीडियो-नैरेशन में एक महत्वपूर्ण तर्क रखा गया: जब फिल्म को छोटा करना हो, तो अक्सर “सपोर्टिंग” और “कम स्थापित” कलाकारों के ट्रैक पहले कट होते हैं, क्योंकि:
बड़े सितारों/मुख्य किरदारों के सीन हटाना मार्केटिंग/स्टार वैल्यू के लिहाज से रिस्की होता है
कहानी का मेन आर्क उन्हीं पर टिका होता है
प्रोडक्शन-इन्वेस्टमेंट का बड़ा हिस्सा प्रमुख चेहरों पर होता है
यहाँ “न्याय” और “व्यावसायिकता” टकराते हैं। व्यावसायिक निर्णय कई बार इंसानी स्तर पर कलाकार के लिए बहुत कड़वा बन जाता है—क्योंकि कलाकार के लिए स्क्रीन पर दिखना ही उसकी पूंजी है।
5) क्या फिल्ममेकर्स का फैसला “सही” और “अनफेयर”—दोनों हो सकता है?
हाँ। यह बात जितनी विरोधाभासी लगती है, उतनी ही सच भी है।
फिल्म के दृष्टिकोण से: यदि रनटाइम घटाना जरूरी था और लव-ट्रैक मुख्य कहानी से ध्यान हटा रहा था, तो उसे हटाना “क्रिएटिवली जस्टिफायबल” माना जा सकता है।
एक्टर के दृष्टिकोण से: यदि किसी कलाकार को कास्ट करके, शूट कराकर, और अंत में पूरी तरह हटाकर “अनदेखा” कर दिया जाए, तो वह अनुभव मानसिक रूप से चोटिल करने वाला हो सकता है।
यानी एक ही फैसला फिल्म के लिए रणनीतिक रूप से सही हो सकता है, पर कलाकार के लिए भावनात्मक/पेशेवर रूप से अन्यायपूर्ण।
6) “परसेप्शन” की समस्या: दर्शक जो नहीं देखता, उसे मानता भी नहीं
इस पूरे विवाद में सबसे खतरनाक शब्द है—परसेप्शन।
जब किसी कलाकार का काम स्क्रीन पर आता ही नहीं, तो दर्शक उसके हुनर को जज नहीं कर सकता। लेकिन इंडस्ट्री और सोशल मीडिया अक्सर खाली जगह को अटकलों से भर देती है:
“शायद एक्टिंग अच्छी नहीं थी”
“शायद मेकर्स को फिट नहीं लगा”
“शायद प्रोफेशनलिज़्म इश्यू रहा होगा”
जबकि वास्तविक वजहें अक्सर तकनीकी और संरचनात्मक होती हैं—जैसे पेसिंग, स्क्रिप्ट का बदलना, या फेस्टिवल कट बनाम थिएट्रिकल कट का अंतर।
7) रीम शेख के आसपास का सोशल नैरेटिव: एज-गैप कास्टिंग और रूमर्स
वीडियो में यह भी कहा गया कि रीम को टीवी में कई बार उम्र में काफी बड़े अभिनेताओं के साथ कास्ट किया गया, और उनके बारे में अलग-अलग कलाकारों के साथ “अफेयर रूमर्स” भी सामने आते रहे। ऐसी बातें भारतीय मनोरंजन जगत में नई नहीं हैं—खासकर महिला कलाकारों के लिए, जिनके करियर के साथ गॉसिप को अक्सर मुफ्त में जोड़ दिया जाता है।
यहाँ दो बातें अलग करके समझना जरूरी है:
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एज-गैप कास्टिंग: यह इंडस्ट्री की पुरानी समस्या है। टीवी और फिल्मों में कम उम्र की एक्ट्रेस को बड़े उम्र के मेल लीड के साथ पेयर करना लंबे समय से होता आया है।
अफेयर रूमर्स: यह अक्सर सोशल मीडिया की अटकलें होती हैं, जिनका सत्यापन मुश्किल होता है और कई बार यह महिला कलाकार की इमेज को बेवजह नुकसान पहुंचाती हैं।
यदि रीम जैसे कलाकार अब टीवी से फिल्मों की ओर बढ़ना चाहती हैं, तो उन्हें काम के आधार पर स्पेस मिलना चाहिए—न कि सिर्फ रूमर्स के आधार पर जज किया जाना।
8) इंडस्ट्री के भीतर “वर्कप्लेस सेफ्टी” और यंग एक्टर्स का मुद्दा
वीडियो-नैरेशन में टीवी इंडस्ट्री में “ठरकी लोग” जैसे शब्दों के साथ एक गंभीर आरोप/अनुभव का संकेत भी दिया गया—कि कुछ जगहों पर पावर डायनेमिक्स के कारण युवा कलाकारों को असहज परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।
यह पहलू बहुत गंभीर है और इसे सनसनी की तरह नहीं, वर्कप्लेस एथिक्स की तरह देखना चाहिए:
सेट पर स्पष्ट गाइडलाइन्स
इंटीमेसी कोऑर्डिनेशन (जहाँ जरूरी हो)
माइनर/युवा कलाकारों की सुरक्षा
शिकायत का सुरक्षित तंत्र
कॉन्ट्रैक्ट में स्पष्ट शर्तें और सम्मानजनक व्यवहार
मनोरंजन उद्योग “ग्लैमर” के पीछे एक बड़ा वर्कप्लेस है। और हर वर्कप्लेस की तरह यहाँ भी जवाबदेही और सुरक्षा जरूरी है।
9) समाधान क्या? “कट” के बाद भी सम्मान और करियर सुरक्षा कैसे हो
यदि वाकई किसी कलाकार का ट्रैक एडिट में हटता है, तो इंडस्ट्री में कुछ बेहतर प्रैक्टिस अपनाई जा सकती हैं:
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पारदर्शी संवाद
मेकर्स कलाकार को समय रहते बताएँ कि ट्रैक कम/हट सकता है—ताकि कलाकार मानसिक रूप से तैयार रहे।
क्रेडिट और प्रोफेशनल रिकग्निशन
यदि शूट हुआ है, तो क्रेडिट/आभार/इंडस्ट्री रिकॉर्ड में उचित उल्लेख—कम से कम प्रोफेशनल सम्मान के लिए।
री-एडिट/डायरेक्टर्स कट/ओटीटी एक्सटेंडेड वर्ज़न
कई फिल्मों में बाद में एक्सटेंडेड कट आता है। अगर संभव हो, तो कट किए गए हिस्सों को “स्पेशल फीचर्स” या एक्सटेंडेड एडिशन में दिखाया जा सकता है।
कास्टिंग इक्विटी
“टीवी से आया है इसलिए पहले उसी को काटो”—यह सोच बदलनी होगी। प्रतिभा माध्यम से तय नहीं होती।
10) निष्कर्ष: रीम का मामला एक व्यक्ति नहीं, एक पैटर्न की तरफ इशारा करता है
रीम शेख के होमबाउंड से कथित तौर पर हटाए गए ट्रैक की चर्चा हमें दो स्तरों पर सोचने को मजबूर करती है।
पहला—फिल्ममेकिंग की व्यावहारिक सच्चाई: रनटाइम और फोकस के लिए एडिटिंग जरूरी है।
दूसरा—इंडस्ट्री की मानवीय सच्चाई: किसी कलाकार को कास्ट करके “अंत में शून्य” कर देना उसके करियर और आत्मविश्वास—दोनों पर चोट कर सकता है, खासकर तब जब वह टीवी से फिल्मों में ट्रांजिशन कर रहा/रही हो।
आज जरूरत इस बात की है कि सिनेमा की क्रिएटिव स्वतंत्रता बनी रहे, लेकिन कलाकारों के साथ व्यवहार में पारदर्शिता, सम्मान और प्रोफेशनल न्याय भी बना रहे। क्योंकि हर कट सीन सिर्फ फुटेज नहीं होता—कई बार वह किसी कलाकार की उम्मीदों, समय और करियर की दिशा का हिस्सा होता है।
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