नियति का संगम: इंडिया गेट की वह शाम

अध्याय 1: दिल्ली की सुनहरी शाम और यादों का बोझ

फरवरी का महीना दिल्ली में अपनी पूरी रंगत पर था। इंडिया गेट के चारों ओर फैली घास की चादर पर हजारों लोग अपनी शाम बिता रहे थे। बच्चों के गुब्बारों का शोर, फोटोग्राफरों की आवाजें और हवा में तैरती चटनियों की महक ने माहौल को जीवंत बना रखा था।

उसी भीड़ के बीच एक काली रंग की सरकारी एसयूवी (SUV) आकर रुकी। गाड़ी के दरवाजे पर ‘IPS’ की नेमप्लेट चमक रही थी। पिछली सीट से एक महिला उतरीं—IPS अधिकारी अदिति शर्मा। अदिति, जो आज राजस्थान कैडर की एक जांबाज पुलिस ऑफिसर के रूप में जानी जाती हैं, आज सादे कपड़ों में थीं। वे दिल्ली अपनी एक कॉन्फ्रेंस के लिए आई थीं और शाम को थोड़ा सुकून तलाशने इंडिया गेट पहुँच गई थीं।

अदिति ने चश्मा लगाया और लंबी दूरी तय कर अमर जवान ज्योति की ओर देखने लगीं। उनकी आँखों में आज वह सख्त अनुशासन नहीं था, बल्कि एक अजीब सा खालीपन था। वे आज उस शहर में थीं जहाँ 6 साल पहले उनकी दुनिया बसी थी और यहीं उजड़ भी गई थी। उनके मन में बार-बार एक ही चेहरा घूम रहा था—राहुल।

राहुल, उनका पति, जिसे उन्होंने 5 साल पहले तलाक के कागजात थमा दिए थे। राहुल एक मामूली बैंक क्लर्क था और अदिति उस समय सिविल सेवा (UPSC) की तैयारी कर रही थीं। अदिति की महत्वाकांक्षा और राहुल की सादगी के बीच दरार तब आई जब अदिति का चयन IPS के लिए हो गया। अहंकार ने जगह ली, और एक खुशहाल रिश्ता कोर्ट की सीढ़ियों पर दम तोड़ गया।

अध्याय 2: गोलगप्पों का वह ठेला और पहचान का झटका

अदिति पैदल चलते हुए इंडिया गेट के पास चाट-पकौड़ों वाली लेन की ओर बढ़ गईं। वे बचपन से ही गोलगप्पों (पानीपुरी) की शौकीन थीं। भीड़ काफी थी। तभी उनकी नजर एक सफेद शर्ट पहने आदमी पर पड़ी जो बड़ी मुस्तैदी से लोगों को पानीपुरी खिला रहा था। उसका चेहरा भाप और पसीने से ढका था, लेकिन उसके हाथ बड़ी सफाई से चल रहे थे।

अदिति अनजाने में उसी ठेले की ओर खिंची चली गईं। भीड़ में खड़ी होकर उन्होंने अपनी बारी का इंतजार किया। जैसे ही वे सामने पहुँचीं, उन्होंने कहा— “भैया, एक प्लेट…”

अदिति के शब्द बीच में ही रुक गए। सामने खड़ा आदमी भी जैसे जम गया। पसीने से भीगी वह शर्ट, फटी हुई आस्तीन और थका हुआ चेहरा—वह कोई और नहीं, राहुल था।

दोनों की नजरें मिलीं। इंडिया गेट का सारा शोर अदिति के कानों के लिए शांत हो गया। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि जिस राहुल को उन्होंने एक बैंक अधिकारी के रूप में छोड़ा था, वह आज दिल्ली की सड़कों पर पानीपुरी बेच रहा है।

“राहुल… तुम?” अदिति की आवाज कांप रही थी।

राहुल ने तुरंत अपनी नजरें नीचे कर लीं। उसके हाथों में पकड़ा हुआ दोना (कप) हल्का सा हिला। उसने सामान्य बनने की कोशिश की और धीमी आवाज में कहा, “जी मैडम, क्या लेंगे? खट्टा पानी या मीठा?”

अदिति का दिल जैसे किसी ने मुट्ठी में भींच लिया हो। उन्होंने राहुल का हाथ पकड़ना चाहा, पर राहुल पीछे हट गया। “मैडम, भीड़ बहुत है, लोग इंतजार कर रहे हैं।”

अध्याय 3: पतन की कहानी और राहुल का संघर्ष

अदिति वहीं किनारे एक बेंच पर बैठ गईं। उन्होंने अपनी सुरक्षा टीम को दूर रहने का इशारा किया। राहुल का ठेला जब थोड़ा खाली हुआ, तो वे फिर उसके पास गईं।

“राहुल, यह सब कैसे? तुम्हारी नौकरी? तुम्हारा घर? और यह…” अदिति ने ठेले की ओर इशारा किया।

राहुल ने एक फीकी मुस्कान दी। “तलाक के बाद सब कुछ बिखर गया, अदिति। बैंक की नौकरी में मन नहीं लगा, पिता जी की बीमारी में सारा पैसा निकल गया। कर्ज बढ़ता गया और अंत में घर भी बिक गया। दिल्ली में गुजारा करना था, तो यह शुरू कर दिया। अब यही मेरी पहचान है।”

अदिति की आँखों से आँसू छलक पड़े। उन्हें याद आया कि तलाक के वक्त उन्होंने राहुल से कहा था— “तुम्हारी कोई औकात नहीं है, तुम मेरे रुतबे के साथ कभी नहीं चल पाओगे।”

आज अदिति के पास रुतबा था, लाल बत्ती वाली गाड़ी थी, गनमैन थे, लेकिन उनके सामने खड़ा वह आदमी आज भी अपनी मेहनत की रोटी खा रहा था, बिना किसी शिकायत के।

अध्याय 4: वह रात और जमीर का फैसला

अदिति उस रात अपनी होटल के कमरे में सो नहीं पाईं। उन्हें वह दिन याद आया जब राहुल अपनी पूरी तनख्वाह अदिति की पढ़ाई और किताबों पर खर्च कर देता था। वह खुद फटे जूते पहनता था ताकि अदिति की कोचिंग की फीस भरी जा सके। और जब अदिति IPS बन गईं, तो उन्हें राहुल ‘छोटा’ लगने लगा।

अदिति ने मन ही मन खुद को धिक्कारा। उन्हें समझ आया कि राहुल का पानीपुरी बेचना उसकी विफलता नहीं, बल्कि उसकी ईमानदारी थी। वह चाहता तो अदिति के पास आकर मदद मांग सकता था, लेकिन उसने अपने स्वाभिमान को चुना।

अगली सुबह, अदिति ने एक बड़ा फैसला लिया। वे अपनी वर्दी में, पूरे काफिले के साथ राहुल के उसी ठिकाने पर पहुँचीं। पूरा इलाका सन्न रह गया। पुलिस वालों को लगा कि शायद कोई छापा पड़ने वाला है।

अध्याय 5: न्याय और पुनर्मिलन

अदिति राहुल के ठेले के पास पहुँचीं। राहुल उन्हें वर्दी में देखकर थोड़ा सहम गया। अदिति ने अपने गनमैन से कहा— “आज यहाँ कोई पुलिस वाला नहीं, बल्कि एक अपराधी खड़ी है।”

उन्होंने राहुल के सामने हाथ जोड़े। “राहुल, मुझे माफ कर दो। मैं अपनी ताकत के नशे में अंधी हो गई थी। असली ‘पावर’ वर्दी में नहीं, उस त्याग में थी जो तुमने मेरे लिए किया। तुमने मुझे IPS बनाया और मैंने तुम्हें सड़क पर ला दिया।”

राहुल की आँखों में आँसू थे। उसने कहा, “अदिति, मैंने कभी तुमसे नफरत नहीं की। मुझे गर्व था कि मेरी पत्नी देश की सेवा कर रही है। बस मेरा वक्त खराब था।”

अदिति ने उसी वक्त राहुल का हाथ पकड़ा। “राहुल, मेरा घर आज भी तुम्हारा इंतजार कर रहा है। यह वर्दी और यह रुतबा तुम्हारे बिना अधूरा है। क्या तुम मुझे एक मौका और दोगे?”

भीड़ ने तालियाँ बजाना शुरू कर दिया। इंडिया गेट की वह शाम एक टूटे हुए रिश्ते के जुड़ने की गवाह बनी।

अध्याय 6: एक नई शुरुआत

अदिति राहुल को अपने साथ ले गईं। उन्होंने राहुल को कोई बड़ा व्यापार शुरू करने में मदद की, लेकिन राहुल ने आज भी अपनी सादगी नहीं छोड़ी। अदिति अब जब भी वर्दी पहनकर घर से निकलती हैं, तो वे राहुल का चेहरा देखती हैं। उन्हें अहसास हो गया है कि दुनिया में सबसे बड़ी शक्ति पद नहीं, बल्कि वह इंसान है जो आपके सबसे बुरे वक्त में आपके साथ खड़ा रहा।

इंडिया गेट के पास आज भी वह जगह खाली है जहाँ राहुल का ठेला लगता था, पर उस शहर की हवाओं में आज भी एक सबक गूँजता है— “इंसान की कीमत उसके काम से नहीं, उसके किरदार से होती है।”


उपसंहार: यह कहानी हमें सिखाती है कि अहंकार रिश्तों का सबसे बड़ा दुश्मन है। सफलता तभी सार्थक है जब उसे साझा करने के लिए वह इंसान साथ हो जिसने आपकी नींव रखी थी। अदिति और राहुल का पुनर्मिलन केवल एक सुखद अंत नहीं, बल्कि उन हजारों लोगों के लिए एक सीख है जो तरक्की की दौड़ में अपनों को पीछे छोड़ देते हैं।