IPS OFFICER की गाड़ी के सामने एक बूढ़ी भिखारिन खाना मांगने लगी, भिखारिन निकली उनकी ही सगी माँ और फिर

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माँ की ममता और बेटे का हौसला

भाग 1: बचपन की धूप-छाँव

लखनऊ के एक छोटे से मोहल्ले में रमेश शर्मा का परिवार रहता था। रमेश रोज सुबह मेहनत-मजदूरी के लिए निकल जाता और उसकी पत्नी सविता देवी घर पर अपने चारों बच्चों की देखभाल करती। सबसे बड़ा बेटा अमित शर्मा, उम्र सात साल, उसके अलावा पूजा, मनोज और सबसे छोटा गुड्डू, जो अभी सविता की गोद में छह महीने का था।
रमेश भले ही साधारण मजदूर था, लेकिन उसके घर में प्यार और खुशी की कोई कमी नहीं थी। बच्चों के चेहरे पर हँसी देखकर रमेश की सारी थकान मिट जाती। सविता देवी भी एक आदर्श गृहिणी थी, जो घर को ममता से संवारती थी।

हर खुशहाल सफर के पीछे कुछ अनदेखे मोड़ छुपे होते हैं। एक दिन रमेश रोज की तरह काम पर गया, तभी एक भयानक सड़क हादसे का शिकार हो गया। तेज रफ्तार ट्रक ने उसे टक्कर मार दी। अस्पताल पहुँचने से पहले ही रमेश ने दम तोड़ दिया।
यह खबर सविता देवी तक पहुँची तो उसकी दुनिया ही उजड़ गई। मोहल्ले के लोग सांत्वना देने आए, लेकिन कोई उसके टूटे दिल को जोड़ नहीं सका। रमेश का अंतिम संस्कार हुआ, शोक सभा भी हुई, पर समय किसी के लिए नहीं रुकता। धीरे-धीरे लोग अपनी-अपनी जिंदगी में व्यस्त हो गए, लेकिन सविता के लिए वक्त जैसे थम सा गया।

अब उसके कंधों पर चार छोटे बच्चों की जिम्मेदारी थी। मोहल्ले के लोग कुछ दिनों तक मदद करते रहे, लेकिन वह सहारा भी धीरे-धीरे खत्म हो गया। घर में खाने के लाले पड़ गए। बच्चों के भूखे पेट को देखकर सविता का दिल तड़प उठता। अब उसे समझ आ गया था कि उसे खुद कुछ करना होगा।

भाग 2: मजबूरी की राह

पति की मौत के बाद सविता देवी की जिंदगी अंधकार में डूब गई थी। चार बच्चों के साथ एक अकेली माँ के लिए हर दिन एक नई चुनौती थी। सविता ने हिम्मत नहीं हारी, दूसरों के घरों में काम करने का फैसला किया। वह सुबह-सुबह उठकर कई घरों में झाड़ू-पोछा, बर्तन धोती।
लेकिन मुश्किल यह थी कि उसके पास छह महीने का बच्चा था, जिसे वह घर पर अकेला नहीं छोड़ सकती थी। मजबूरी में कभी-कभी गुड्डू को काम पर साथ ले जाती और बाकी बच्चों को घर में बंद करके छोड़ देती। लेकिन यह सिलसिला ज्यादा दिन नहीं चला। काम के दौरान बच्चों की चिंता में डूबी सविता ठीक से काम नहीं कर पाती थी।
धीरे-धीरे लोगों ने उसे काम से निकालना शुरू कर दिया। अब उसके पास ना तो काम था, ना ही घर में खाने को अन्न का एक दाना। बच्चे भूख से बिलखते हुए रोटी मांगते, लेकिन सविता सिर्फ उनकी खाली थाली देखकर रो पड़ती।
दीवार से सिर टिका कर वह खुद से सवाल करती, “क्या मैं एक अच्छी माँ हूँ?” बच्चों के कराहने की आवाजें सविता के दिल को अंदर तक तोड़ देतीं। रातों को जाग-जाग कर सोचती, “मेरे बच्चे भूख से मर जाएंगे, मैं क्या करूँ?”

भाग 3: माँ का कठिन फैसला

एक दिन जब बच्चों ने दो दिन से कुछ नहीं खाया था और उनकी आँखों में थकान और दर्द साफ झलक रहा था, सविता ने अपने दिल पर पत्थर रखकर एक फैसला लिया।
“मैं अपने बच्चों को अनाथ आश्रम में छोड़ दूंगी ताकि वे भूख से ना मरें। वहाँ कम से कम उन्हें खाना तो मिलेगा।”
यह फैसला लेना सविता के लिए आसान नहीं था। उसने अपने छोटे-छोटे बच्चों को गोद में उठाया, आँखों में आँसू लिए, और उन्हें अनाथ आश्रम ‘स्नेह बाल आश्रय गृह’ ले गई।
आश्रम के दरवाजे पर पहुँचकर सविता एक पल के लिए रुक गई। उसके हाथ काँप रहे थे, दिल तेजी से धड़क रहा था। वह बच्चों की मासूम आँखों में देखती, जो उसे भरोसे से निहार रहे थे, जैसे पूछ रहे हों, “माँ, हमें कहाँ ले जा रही हो?”

आखिरकार उसने दरवाजा खटखटाया। कर्मचारी बाहर आए। सविता फूट-फूट कर रोने लगी और कांपती आवाज में अपनी कहानी सुनाई।
“मैं इन मासूमों को पालने में असमर्थ हूँ। इन्हें अपने आश्रम में रख लीजिए। कम से कम यहाँ इन्हें भूख से तड़पना नहीं पड़ेगा।”
आश्रम के लोग उसकी हालत देखकर भावुक हो गए। उन्होंने बच्चों को अंदर बुलाया। सविता ने एक-एक करके अपने बच्चों को गले लगाया, उनके माथे को चूमा और धीमे से कान में कहा, “माँ तुमसे बहुत प्यार करती है, लेकिन मजबूरी के आगे हार गई।”

अमित, जो अब थोड़ा बड़ा हो चुका था, अपनी माँ की आँखों में आँसू देख रहा था। वह समझ नहीं पा रहा था कि उसकी माँ उसे क्यों छोड़ रही है।
उसने माँ का आँचल पकड़ कर कहा, “माँ, मुझे मत छोड़ो। मैं भूखा रह लूंगा, पर आपके बिना नहीं।”
सविता की रूह काँप गई। उसकी आँखों से आँसुओं की धार बह निकली। पर हालात इतने सख्त थे कि उसे मजबूरी में अपने बच्चों को छोड़ना पड़ा। वो बच्चों से दूर कदम बढ़ाने लगी। हर कदम के साथ उसका दिल टूट रहा था। वह पलट-पलट कर अपने बच्चों को देख रही थी, जिनकी मासूम आँखों में एक सवाल था — “माँ, क्या हमसे फिर कभी मिलने आओगी?”

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