कबाड़ से बनाया ऐसा यंत्र, पुलिस और आर्मी भी हैरान रह गई! 😱

धूल और डिजिटल जंग: राजू और कबाड़ का जादुई रडार
अध्याय 1: एक टूटा हुआ सपना और एक भयानक दोपहर
एक छोटे से कस्बे की धूल भरी दोपहर थी। सूरज ठीक सर के ऊपर चमक रहा था और गलियों में सन्नाटा पसरा हुआ था। जैसा अक्सर दोपहर के खाने के बाद भारत के छोटे शहरों में होता है। बिहार के एक पुराने घिसे-पिटे मकान के आंगन में एक नीम का पेड़ अपनी छाया बिछाए खड़ा था। उस छाया के नीचे एक पुरानी चारपाई बिछी थी, जिस पर 70 साल की सावित्री देवी लेटी हुई थीं। उनके चेहरे पर समय की लकीरें थीं; हर लकीर एक संघर्ष की कहानी बयां करती थी।
सावित्री देवी के पास ही जमीन पर चटाई बिछाए 13 साल का राजू बैठा था। राजू के हाथ में कोई खिलौना नहीं था, ना ही कोई मोबाइल फोन। उसके हाथों में पुराने बेकार हो चुके ट्रांजिस्टर का एक सर्किट बोर्ड था। राजू की दुनिया इन मशीनों में बसती थी। लोग उसे पागल कहते थे, कहते थे कि कूड़े से घर भरता रहता है। लेकिन सावित्री देवी, जिन्हें राजू प्यार से ‘दादी’ कहता था, जानती थीं कि उनका पोता साधारण नहीं है।
“राजू बेटा, अब छोड़ भी दे इस कबाड़ को। आ थोड़ा सो जा,” दादी ने अपनी कमजोर आवाज में कहा। राजू ने सिर नहीं उठाया, बस मुस्कुराते हुए बोला, “नहीं दादी, बस थोड़ा सा और। यह पुराना रेडियो फिर से बजने लगेगा। देख लेना, इसमें अभी भी जान बाकी है।”
दादी मुस्कुरा दीं। राजू के माता-पिता के गुजर जाने के बाद यही टूटी-फूटी मशीनें ही उसका परिवार और दोस्त बन गई थीं। दादी ने अपनी साड़ी के पल्लू में बंधी एक गांठ को टटोला। उसमें ₹50,000 थे। वह पैसे जो उन्होंने अपनी जिंदगी भर की पेंशन और दूसरों के घरों में बर्तन मांझकर जमा किए थे। वह चाहती थीं कि राजू किसी बड़े स्कूल में पढ़े, इंजीनियर बने।
तभी घर के कोने में रखे पुराने लैंडलाइन फोन की घंटी बजी—ट्रिंग… ट्रिंग…।
अध्याय 2: विश्वासघात की वह एक कॉल
दादी ने कांपते हाथों से रिसीवर उठाया। उधर से एक भारी और रौबदार आवाज आई, “क्या मैं सावित्री देवी से बात कर रहा हूं?” “जी, मैं ही बोल रही हूं। कौन साहब?” “मैं बिजली विभाग के मुख्य कार्यालय से बात कर रहा हूं, शर्मा। माता जी, आपका बिजली का बिल पिछले 3 महीनों से अपडेट नहीं हुआ है। आज रात 12:00 बजे आपका कनेक्शन काट दिया जाएगा।”
दादी का दिल जोर से धड़का। “लेकिन बेटा, राजू तो हर महीने बिल भरता है!” शर्मा नाम के उस आदमी ने सख्त लहजे में कहा, “सिस्टम में नहीं चढ़ा है माताजी। आज रात अंधेरा हो जाएगा। और दोबारा जोड़ने का जुर्माना ₹10,000 लगेगा।”
दादी घबरा गईं। “बेटा ऐसा मत करो। कोई उपाय बताओ।” उस आदमी की आवाज थोड़ी नरम हुई, “देखिए माताजी, एक तरीका है। बस ₹10 का वेरिफिकेशन चार्ज लगेगा। आपके मोबाइल पर एक मैसेज आएगा, बस वो नंबर मुझे बता दीजिए। मैं यहीं हेड ऑफिस से सब ठीक कर दूंगा।”
भोली-भाली दादी उस जाल में फंस चुकी थीं। उन्होंने राजू को आवाज नहीं दी, उन्हें लगा राजू छोटा है, वह क्या समझेगा? उन्होंने अपना पुराना कीपैड वाला मोबाइल उठाया और फोन पर आए उस ओटीपी (OTP) के छह अंकों को पढ़ दिया।
“शुक्रिया माताजी। बस अब फोन रख दीजिए। 2 मिनट में सब ठीक हो जाएगा।”
अध्याय 3: जब दुनिया उजाड़ हो गई
दादी ने राहत की सांस ली, लेकिन राजू का तकनीकी दिमाग खतरे की घंटी बजा रहा था। “दादी, उन्होंने आपसे कोई नंबर या मैसेज तो नहीं पूछा?” दादी ने सहज भाव से कहा, “हां, बस वो बैंक वाला मैसेज आया था। ₹10 कटने थे, मैंने बता दिया।”
राजू के हाथ से पेचकस गिर गया। उसने झपटकर मोबाइल उठाया। स्क्रीन पर मैसेज चमक रहा था: ‘आपके खाते से ₹50,000 डेबिट कर लिए गए हैं। शेष राशि: 0.00’
राजू की आंखों के सामने अंधेरा छा गया। “दादी… सारे पैसे चले गए। उन्होंने हमें ठग लिया।”
सावित्री देवी सन्न रह गई। उनकी जिंदगी भर की कमाई, राजू की फीस, राशन, सब एक पल में खत्म हो गया। वे दोनों दोपहर की चिलचिलाती धूप में नंगे पैर बैंक दौड़े, पुलिस थाने गए। लेकिन हर जगह उन्हें एक ही जवाब मिला— “आपने खुद ओटीपी बताया है, अब कुछ नहीं हो सकता। पुलिस इन अदृश्य चोरों को नहीं पकड़ सकती।”
उस रात घर में अंधेरा था। दादी आंगन में बुत बनी बैठी थीं। राजू दूर कोने में बैठा था, उसके हाथ में वही पुराना सर्किट बोर्ड था। उसकी आंखों में अब आंसू नहीं, एक आग थी।
“दादी, आप रोइए मत,” राजू ने धीमी लेकिन सख्त आवाज में कहा। “उन्होंने मशीन का इस्तेमाल करके हमें ठगा है ना? तो मैं भी अब वही करूंगा। मैं उन्हें ढूंढूंगा और वहीं मारूंगा जहां वे छिपे हैं।”
अध्याय 4: कबाड़ से बनी तलवार
अगले तीन दिन तक राजू स्कूल नहीं गया। उसने कस्बे के किनारे रहमान चाचा की कबाड़ की दुकान से कुछ पुराने माइक्रोवेव के मैग्नेटॉन, डिश टीवी के एंटीना और रेडियो रिसीवर खरीदे। उसने अपने कमरे को एक प्रयोगशाला बना दिया था।
वह जानता था कि ये साइबर ठग फर्जी सिम कार्ड का इस्तेमाल करते हैं। उसे एक ऐसा यंत्र बनाना था जो आसपास के सक्रिय मोबाइल सिग्नलों को पकड़ सके और उनकी दिशा बता सके।
रात भर की मेहनत और कई बार बिजली के झटके खाने के बाद, सुबह के 4:00 बजे राजू ने अंतिम तार जोड़ा। उसने एक पुराने स्कूल बैग के अंदर अपना ‘सिग्नल जैमर और रडार’ फिट किया। बाहर से देखने पर वह एक सामान्य फटा-पुराना बैग लगता था, लेकिन अंदर तारों और सर्किट का जाल था।
अध्याय 5: शेर की मांद में नन्हा शिकारी
राजू ने अपने यंत्र से कस्बे के बाहर पुराने खंडहरों के पास अजीबोगरीब सिग्नलों का एक गुच्छा पकड़ा था। वह अपनी साइकिल से शहर से 10 किलोमीटर दूर ईंट भट्ठे के खंडहरों तक पहुँचा।
वहां हवेली के अंदर का नजारा भयानक था। करीब 25 लड़के लैपटॉप और ट्रैक्टर की बैटरी लेकर बैठे थे। वे फोन पर किसी को डरा रहे थे, किसी को लालच दे रहे थे। बीच में उनका सरदार ‘मामू’ नोटों की गड्डियां गिन रहा था।
राजू ने दीवार के पीछे छिपकर अपने जैमर का पावर बटन दबाया और उसे 100% पर सेट कर दिया। अचानक अंदर हंगामा मच गया। सारे लैपटॉप का कनेक्शन कट गया, मोबाइल से सिग्नल गायब हो गए।
राजू ने अपने यंत्र से अपनी आवाज को उनकी फ्रीक्वेंसी पर प्रसारित किया, “चोरी का खेल खत्म! पुलिस आ रही है!”
मामू का चेहरा सफेद पड़ गया, लेकिन वह पुराना अपराधी था। उसने अपने फ्रीक्वेंसी डिटेक्टर से राजू की लोकेशन ट्रैक कर ली। “पकड़ो उसे! कोई बाहर दीवार के पीछे है!”
अध्याय 6: मौत और मिशन के बीच की दौड़
राजू अपनी साइकिल की ओर भागा। चार-पांच गुंडे लाठियां लेकर उसके पीछे दौड़े। राजू ने साइकिल को गन्ने के खेत में उतार दिया। कीछड़ में साइकिल फंस गई तो वह बैग लेकर रेलवे लाइन की तरफ भागा।
अंधेरा गहरा हो चुका था। सामने एक विशाल सिग्नल टॉवर खड़ा था। राजू के पीछे गुंडों की टॉर्च की रोशनी करीब आ रही थी। राजू ने सोचा— अगर मैं अपने छोटे से यंत्र को इस बड़े टॉवर के एंपलीफायर से जोड़ दूं, तो मेरा सिग्नल पूरे शहर में गूंजेगा।
उसने टॉवर की ठंडी लोहे की सीढ़ियों पर चढ़ना शुरू किया। नीचे से गुंडे चिल्ला रहे थे, “नीचे आ छोकरे, वरना जान से जाएगा!”
राजू टॉवर के सबसे ऊपरी हिस्से पर पहुँचा। बिजली के तारों की गूंज डरावनी थी। उसने अपने यंत्र के तारों को टॉवर के मुख्य ट्रांसमीटर से जोड़ा। यह खतरनाक था, उसे करंट लग सकता था। लेकिन जैसे ही उसने स्विच ऑन किया, पूरे कस्बे के हर रेडियो और मोबाइल पर एक ही आवाज गूंज उठी— राजू की आवाज, जो इन ठगों के अड्डे की लोकेशन बता रही थी।
उपसंहार: सवेरे की पहली किरण
अगले एक घंटे में पुलिस की गाड़ियां खंडहरों को घेर चुकी थीं। मामू और उसका पूरा गिरोह पकड़ा गया। पुलिस को वहां से करोड़ों की ठगी के दस्तावेज और सैकड़ों सिम कार्ड मिले।
अगले दिन अखबारों में खबर छपी— “13 साल के बच्चे ने किया अंतरराष्ट्रीय साइबर गैंग का पर्दाफाश।”
दादी के ₹50,000 वापस मिल गए थे। बैंक मैनेजर और पुलिस के वही अफसर जो राजू को दुत्कार रहे थे, अब उसके घर माला लेकर आए थे। लेकिन राजू इन सब से दूर अपने आंगन में बैठा, एक पुराने टूटे हुए फोन को ठीक कर रहा था।
सावित्री देवी ने उसके सिर पर हाथ रखा। राजू ने मुस्कुराकर कहा, “दादी, अब कोई तुम्हें अंधेरे का डर नहीं दिखा पाएगा। अब रोशनी हमारे अपने हाथ में है।”
उस छोटे से कस्बे की मिट्टी में अब एक नई कहानी दफन थी— एक ऐसी कहानी जहां तकनीक ने दिल को नहीं, बल्कि साहस ने तकनीक को जीता था।
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