बहन के साथ गलत होने पर भाई ने कर दिया कां*ड/पुलिस के उड़े होश/
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खून के रिश्ते और सिस्टम की हार: भगवानपुर का खूनी प्रतिशोध
1. बचपन की जिम्मेदारियां और इंद्र का संघर्ष
बरेली का भगवानपुर गाँव अपनी शांति के लिए जाना जाता था, लेकिन उसी गाँव के एक कोने में इंद्र सिंह अपनी छोटी बहन मीनाक्षी के साथ रहता था। इंद्र जब मात्र 15 साल का था, तभी उसके सिर से माता-पिता का साया उठ गया था। खेल-कूद की उम्र में उसके कंधों पर घर और बहन की जिम्मेदारी आ गई।
इंद्र गाँव से 5 किलोमीटर दूर एक गत्ता फैक्ट्री में मजदूरी करता था। धूल, शोर और मशीनों के बीच वह दिन-रात काम करता ताकि मीनाक्षी को एक अच्छी शिक्षा मिल सके। मीनाक्षी कॉलेज में पढ़ती थी और इंद्र का एक ही सपना था—”मेरी बहन पढ़-लिखकर कुछ बन जाए, फिर इसकी शादी एक अच्छे घर में करूँगा, उसके बाद ही मैं अपने बारे में सोचूँगा।”
2. फीस का बोझ और एक गलत फैसला
अक्टूबर 2025 का समय था। मीनाक्षी के कॉलेज की फीस जमा करने की आखिरी तारीख नजदीक थी। ₹6,000 की जरूरत थी। इंद्र के पास केवल ₹1,000 बचे थे क्योंकि फैक्ट्री से उसे समय पर पगार नहीं मिली थी। अपनी बहन की पढ़ाई को रुकते हुए वह नहीं देख सकता था।
इंद्र अपने गाँव के एक संपन्न लड़के तरुण के पास गया। तरुण का पिता पुलिस में दरोगा था, इसलिए पूरे गाँव में उसका खौफ और रसूख था। इंद्र ने तरुण से ₹5,000 उधार मांगे। तरुण ने मुस्कुराते हुए पैसे दे दिए, लेकिन उस मुस्कान के पीछे छिपी दरिंदगी को इंद्र नहीं पहचान पाया।

3. बस अड्डे पर तमाचा और तरुण का बदला
तरुण की नजर मीनाक्षी पर बहुत पहले से थी। पैसे देने के बाद उसने इसे अपना अधिकार समझ लिया। एक दिन जब मीनाक्षी कॉलेज जाने के लिए बस अड्डे पर खड़ी थी, तरुण वहां पहुँचा। उसने मीनाक्षी से कहा, “मैंने तेरे भाई को ₹5,000 दिए हैं, अब वो पैसे लौटाने की जरूरत नहीं है, बस तू मेरे साथ थोड़ा वक्त गुजार लिया कर।”
मीनाक्षी एक स्वाभिमानी लड़की थी। उसने बिना सोचे-समझे भरी महफिल में तरुण के गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया। गाँव वालों के सामने हुई इस बेइज्जती ने तरुण को आगबबूला कर दिया। उसने चिल्लाकर कहा, “मीनाक्षी, इस तमाचे की कीमत तुझे और तेरे भाई को चुकानी पड़ेगी। मैं तुम्हारी रूह कंपा दूंगा।”
4. विश्वासघात: ऑटो ड्राइवर और अपहरण की साजिश
तरुण ने मीनाक्षी को बर्बाद करने के लिए सुरेश नाम के एक ऑटो ड्राइवर को अपने साथ मिलाया। सुरेश वही ड्राइवर था जिसकी ऑटो में बैठकर मीनाक्षी रोज कॉलेज जाती थी। तरुण ने सुरेश को ₹10,000 का लालच दिया।
18 अक्टूबर 2025 को, जब मीनाक्षी ऑटो में बैठी, तो सुरेश ने उसे मुख्य रास्ते से ले जाने के बजाय एक सुनसान रास्ते पर मोड़ दिया। जब मीनाक्षी ने विरोध किया, तो सुरेश ने बहाना बनाया कि ऑटो में खराबी है। उसने अचानक एक सुनसान ईख (गन्ने) के खेत के पास ऑटो रोकी और चाकू की नोक पर मीनाक्षी को खेत के अंदर खींच लिया। वहां तरुण पहले से ही अपनी मोटरसाइकिल लेकर तैयार खड़ा था।
उस दिन उन दोनों ने मिलकर मीनाक्षी की अस्मत के साथ खिलवाड़ किया। तरुण ने उसे धमकी दी, “अगर पुलिस या भाई को बताया, तो मैं तेरे भाई इंद्र को जान से मार दूंगा। मेरा बाप पुलिस में है, मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा।”
5. अस्पताल का सच और इंद्र का टूटना
मीनाक्षी डर के मारे खामोश रही। वह एक महीने तक अंदर ही अंदर घुटती रही। दिसंबर 2025 की एक सुबह, घर का काम करते समय मीनाक्षी अचानक बेहोश हो गई। घबराया हुआ इंद्र उसे अस्पताल ले गया।
महिला डॉक्टर ने जाँच के बाद जो कहा, उसने इंद्र की दुनिया उजाड़ दी। डॉक्टर ने बताया, “तुम्हारी बहन एक महीने की प्रेग्नेंट है।”
इंद्र के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसे लगा कि उसकी बहन ने उसे धोखा दिया है। लेकिन जब मीनाक्षी ने बिलखते हुए तरुण और सुरेश की पूरी दरिंदगी सुनाई, तो इंद्र का खून खौल उठा। उसने अपनी बहन को गले लगाया और कहा, “मैं तुझे इंसाफ दिलाऊंगा।”
6. विफल सिस्टम: पुलिस और पंचायत का दोहरा चेहरा
इंद्र अपनी बहन को लेकर थाने पहुँचा। वहां दरोगा अजीत सिंह बैठा था, जो तरुण के पिता सुखपाल का करीबी दोस्त था। उसने इंद्र की बात सुनने के बजाय उसे ही डांटना शुरू कर दिया। दरोगा ने कहा, “तुम जैसे गरीब लोग अमीर लड़कों को फंसाकर पैसे ऐंठने की कोशिश करते हो। यहाँ से भाग जाओ, वरना तुम्हें ही अंदर कर दूंगा।”
हारकर इंद्र गाँव के सरपंच दिलबाग सिंह के पास गया और पंचायत बुलाई। पंचायत में तरुण और सुरेश को बुलाया गया। मीनाक्षी ने सबके सामने अपना दुख बताया, लेकिन तरुण ने बेशर्मी से कहा, “ये भाई-बहन मिलकर मुझे ब्लैकमेल कर रहे हैं। मैंने तो इनकी मदद की थी।”
सरपंच और गाँव के अन्य रसूखदार लोगों ने तरुण के डर से उसी का साथ दिया और इंद्र को चेतावनी दी कि वह बड़े लोगों पर झूठे इल्जाम न लगाए। उस दिन इंद्र को समझ आ गया कि गरीबों के लिए न तो कानून है और न ही समाज।
7. खूनी प्रतिशोध: इंद्र बना हैवान
पंचायत से खाली हाथ लौटने के बाद इंद्र के अंदर का इंसान मर चुका था और एक कातिल जन्म ले चुका था। उसने घर के कोने में रखी एक गंडासी (बड़ा चाकू) उठाई और उसे धार दी।
शाम को उसे खबर मिली कि तरुण और सुरेश एक पुरानी बैठक में शराब पी रहे हैं और उसकी बहन की बेइज्जती का जश्न मना रहे हैं। इंद्र वहां बिजली की तरह पहुँचा। इससे पहले कि तरुण कुछ समझ पाता, इंद्र ने गंडासी से उसके हाथ-पैर काट दिए और फिर उसकी गर्दन धड़ से अलग कर दी। सुरेश ने भागने की कोशिश की, लेकिन इंद्र ने उसे दौड़ाकर उसके सिर पर कई वार किए। देखते ही देखते दोनों दरिंदे खून से लथपथ होकर जमीन पर ढेर हो गए।
8. आत्मसमर्पण और एक अनुत्तरित प्रश्न
इंद्र वहां से भागा नहीं। उसने खुद पुलिस को फोन किया। जब पुलिस और गाँव वाले वहां पहुँचे, तो मंजर देखकर सबके होश उड़ गए। इंद्र ने शांत स्वर में कहा, “आज मेरी बहन को इंसाफ मिल गया।”
पुलिस ने इंद्र को गिरफ्तार कर लिया। जब उसने थाने में अपनी पूरी कहानी सुनाई, तो पुलिसकर्मियों के भी रोंगटे खड़े हो गए। हालांकि उसने अपराध किया था, लेकिन गाँव के कई लोग उसे मन ही मन सही मान रहे थे।
निष्कर्ष: क्या इंद्र सिंह गलत था?
आज इंद्र सिंह जेल में है और मीनाक्षी का भविष्य अंधकारमय है। इस घटना ने समाज के सामने कई कड़वे सवाल छोड़े हैं:
यदि पुलिस अपना काम करती, तो क्या इंद्र को हथियार उठाना पड़ता?
यदि समाज और पंचायत ने सच का साथ दिया होता, तो क्या गाँव में दो कत्ल होते?
एक भाई के पास अपनी बहन के सम्मान की रक्षा के लिए और क्या रास्ता बचा था?
इस घटनाक्रम के बारे में आपकी क्या राय है? क्या इंद्र का प्रतिशोध सही था या उसे अभी भी कानून का इंतजार करना चाहिए था? अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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