Zalim Maa Apne Do Masoom Bachon Ko Chhor Kar Jab Apne Aashiq Ke Sath Chali Gayi 😢

गुनाहों का बोझ और ममता की हार: एक अंतहीन पछतावा

भूमिका: एक उजाड़ आँगन और टूटती उम्मीदें

सूरज की हल्की धूप आँगन के कच्चे फर्श पर फैल रही थी, लेकिन उस घर की हवाओं में एक अजीब सी खामोशी और भारीपन था। यह कहानी है ज़ैनब की—एक 25 साल की खूबसूरत मगर बेहद खुदगर्ज औरत, जिसके लिए उसकी अपनी इच्छाएं और रंगीन ख्वाब उसके मासूम बच्चों और ममता से कहीं ऊपर थे।

ज़ैनब अपनी लकड़ी की कुर्सी पर बैठी बड़े इत्मीनान से अपने नाखूनों पर नेल पेंट लगा रही थी। उसके चेहरे पर एक बनावटी मुस्कुराहट थी। इसी बीच उसके फोन की घंटी बजी। फोन उठाते ही उसके चेहरे पर चमक आ गई। दूसरी तरफ फारूक था—उसका पुराना आशिक। ज़ैनब ने हौले से कहा, “बस आ रही हूँ फारूक, थोड़ा इंतज़ार करो।”

वह जाने के लिए उठी ही थी कि पीछे से एक कमज़ोर और सिसकती हुई आवाज़ आई। 10 साल का अहमद अपनी नन्ही बहन को बाहों में लिए खड़ा था। “अम्मा, छोटी कब से भूखी है, रो रही है। इसे कुछ खिला दो ना।”

अहमद की आँखों में बेबसी थी, लेकिन ज़ैनब के चेहरे पर ममता के बजाय नफरत की लकीरें उभर आईं। वह चीखकर बोली, “तुम दोनों तो मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी रुकावट हो! पहले तुम्हारा बाप था और अब तुम दोनों। जाओ, मेरी नज़रों से दूर हो जाओ!”

ज़ैनब ने अपना पर्स उठाया और दरवाज़ा ज़ोर से बंद करके बाहर निकल गई। उस बंद दरवाज़े की गूँज अहमद के दिल पर खंजर की तरह लगी। उसने अपनी रोती हुई बहन को सीने से लगाया और कहा, “चुप हो जा मेरी परी, मैं हूँ ना।”

अतीत के पन्ने: एक नेक शौहर और ज़ैनब की बेरुखी

ज़ैनब के माता-पिता ने उसकी शादी कामरान से की थी। कामरान एक सीधा-सादा, मेहनती और बेहद नेक दिल इंसान था। वह खेतों में पसीना बहाता ताकि ज़ैनब और बच्चों को खुश रख सके। लेकिन ज़ैनब के लिए कामरान एक ‘बोर देहाती’ से बढ़कर कुछ नहीं था। उसे कामरान की मोहब्बत में कोई कशिश नज़र नहीं आती थी।

अल्लाह ने उन्हें अहमद जैसा बेटा दिया, पर ज़ैनब का मन तो अब भी फारूक की यादों में बसा था। वह अक्सर बहाने बनाकर फारूक से मिलने जाती, जबकि पीछे अहमद घर में रोता रहता। कामरान जब शाम को थका-हारा घर आता, तो अक्सर ज़ैनब घर पर नहीं होती थी। वह खुद अहमद को दूध पिलाता, उसे संभालता और चुपके से आँसू बहाता।

एक बार कामरान ने ज़ैनब को फारूक के साथ बाइक पर जाते देख लिया। जब उसने घर आकर ज़ैनब से पूछा, तो वह शर्मिंदा होने के बजाय आग-बबूला हो गई। उसने कामरान पर ही शक करने का आरोप मढ़ दिया। कामरान चुप हो गया, पर उसका दिल अंदर से टूट चुका था।

तबाही की शुरुआत: कामरान की मौत और ज़ैनब का फरार होना

कुछ समय बाद ज़ैनब ने एक बेटी को जन्म दिया। लेकिन उसी दौरान कामरान की तबीयत बिगड़ी और वह इस दुनिया से कूच कर गया। कामरान की मौत ज़ैनब के लिए दुख नहीं, बल्कि ‘आज़ादी’ का पैगाम लेकर आई। अब उसे रोकने वाला कोई नहीं था।

वह दिन भर सजती-संवरती और बच्चों को अकेला छोड़कर फारूक के साथ बाहर रहती। गाँव की औरतें उसे देखकर थूकती थीं, पर ज़ैनब को किसी की परवाह नहीं थी। और फिर एक काली रात आई, जब ज़ैनब अपने दोनों मासूम बच्चों को सोता और बिलखता छोड़कर अपने आशिक फारूक के साथ हमेशा के लिए भाग गई। उसे लगा कि अब वह अपनी ‘रंगीन दुनिया’ में रानी बनकर रहेगी।

कर्मों का हिसाब: फारूक का घर और हकीकत का सामना

ज़ैनब फारूक के साथ रहने लगी, पर उसकी खुशियाँ महज़ दो दिन की मेहमान थीं। निकाह के दो दिन बाद ही फारूक के बड़े खेतों में अचानक आग लग गई। उसका सारा कारोबार राख हो गया। वे एक बड़े घर से निकलकर एक तंग और बदबूदार मिट्टी के घर में रहने को मजबूर हो गए।

ज़ैनब जिसे ‘सोने का महल’ समझ रही थी, वह अब एक कैदखाना बन चुका था। फारूक अब उस पर चिल्लाता, “तुम मनहूस हो! जब से तुम मेरी ज़िंदगी में आई हो, मेरी किस्मत जल गई है।” छह साल बीत गए, पर ज़ैनब को कोई औलाद नहीं हुई। फारूक उसे ‘बांझ’ कहकर ताने देने लगा।

एक दिन फारूक ने अपनी ज़िंदगी में एक नई और खूबसूरत लड़की को लाया और ज़ैनब से कहा, “यह मेरी नई बीवी है।” ज़ैनब के विरोध करने पर फारूक ने उसे धक्का देकर घर से बाहर निकाल दिया और कहा, “तुमने अपने पहले शौहर और बच्चों को धोखा दिया, मुझे क्या यकीन कि तुम मुझे वफादारी दोगी?”

दर-दर की ठोकरें और पछतावा

ज़ैनब अब सड़क पर थी। उसका हुस्न ढल चुका था, बाल बिखरे थे और कपड़े फटे हुए। वह अब एक भिखारन बन चुकी थी। वह गलियों में हाथ फैलाती, लोग उसे चंद सिक्के या बासी रोटी दे देते। रात के अंधेरे में जब वह किसी चबूतरे पर सोती, तो उसे अपने उन बच्चों की याद आती जिन्हें वह बेसहारा छोड़ आई थी।

बरसों बीत गए। एक दिन उसने फैसला किया कि वह अपने पुराने गाँव जाएगी। वह देखना चाहती थी कि उसके बच्चे किस हाल में हैं।

फर्श से अर्श तक: अहमद और मारिया की कहानी

जब ज़ैनब अपने पुराने गाँव पहुँची, तो उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ। जहाँ उसका मिट्टी का टूटा-फूटा घर था, वहाँ अब एक आलीशान पक्का मकान खड़ा था। उसने पास खड़ी एक महिला से पूछा, “बीबी, यह घर किसका है?”

महिला ने मुस्कुराकर कहा, “यह अहमद साहब का घर है। वे अपनी बहन मारिया के साथ यहाँ रहते हैं। सुना है बचपन में इनकी माँ इन्हें छोड़कर भाग गई थी। अहमद ने अपनी नन्ही बहन को गोद में लेकर दर-दर भीख माँगी, लोगों के ताने सहे, पर हिम्मत नहीं हारी। उसने मेहनत की, कारोबार किया और आज वह इस इलाके का सबसे अमीर और नेक इंसान है।”

ज़ैनब के सीने में एक तीर सा लगा। वही अहमद जिसे वह मनहूस कहती थी, आज अर्श पर था।

एक अजनबी भिखारन की ममता

ज़ैनब ने कांपते हाथों से उस आलीशान घर का दरवाज़ा खटखटाया। दरवाज़ा एक खूबसूरत जवान लड़की ने खोला। वह हूबहू ज़ैनब की जवानी की तस्वीर थी—वह मारिया थी। ज़ैनब ने नज़रें झुकाकर कहा, “बेटी, कुछ खाने को दे दो।”

मारिया अंदर गई और रोटियाँ व कुछ सिक्के लाकर ज़ैनब की झोली में डाल दिए। मारिया ने मुस्कुराकर कहा, “अल्लाह आपको आसानी दे अम्मा।”

तभी घर के बाहर एक गाड़ी रुकी और एक प्रभावशाली जवान व्यक्ति बाहर निकला। वह अहमद था। वह अपनी बहन से हँसते हुए बात कर रहा था। ज़ैनब ने अपने बेटे को पहचान लिया, पर अहमद के लिए वह केवल एक ‘अजनबी भिखारन’ थी।

ज़ैनब की हिम्मत जवाब दे गई। वह सड़क के किनारे बैठकर फूट-फूटकर रोने लगी। “काश मैंने अपने बच्चों को न छोड़ा होता! काश मैंने अपने नेक शौहर की कदर की होती!”

कहानी का सार

ज़ैनब के पास अब न घर था, न औलाद, न इज़्ज़त। उसके पास केवल पछतावा और एक खाली प्याला था। अल्लाह ने उन बच्चों की किस्मत बदल दी जिन्हें उसने बेसहारा छोड़ा था, और उसे उसके गुनाहों की सजा इसी दुनिया में दे दी।

सबक: जो औरतें अपने महरम रिश्तों और ममता को छोड़कर गैर-महरमों पर भरोसा करती हैं, उनका अंत अक्सर ऐसा ही दर्दनाक होता है। ममता की हार कभी भी जीत का रास्ता नहीं बन सकती।

समाप्त