आत्मनिर्भरता की यात्रा – भाग 2

फोन कट गया था, पर मेरे मन में हलचल अभी बाकी थी। अगले दिन पुणे की सुबह कुछ अलग थी। मैं अपने होम ऑफिस में बैठी थी, खिड़की से बाहर देख रही थी। ठंडी हवा चल रही थी, पर मेरे मन में एक अजीब सा सुकून था। कल रात जो हुआ, वो मेरे जीवन का सबसे बड़ा मोड़ था। बेटे ने जो किया, उसका दर्द तो था, पर उसके बाद जो हुआ, उसने मुझे और मजबूत बना दिया।

नया सफर

शाम को मेरे पास एक कॉल आया। मेरी पुरानी दोस्त माया शर्मा थी। उसने कहा, “कल्पना, कल तुम्हारे साथ जो हुआ, वो मैंने अखबार में पढ़ा। तुमने बहुत साहस दिखाया।” मैंने मुस्कुरा कर जवाब दिया, “माया, कभी-कभी हालात ही इंसान को साहसी बना देते हैं।” माया ने मुझे एक ऑफर दिया – उसकी सोसाइटी में बुजुर्ग महिलाओं के लिए एक फाइनेंशियल अवेयरनेस वर्कशॉप करनी थी। उसने कहा, “तुम्हारी कहानी सबको प्रेरणा देगी।”

मैंने हां कह दी। अगले दिन मैं माया की सोसाइटी गई। वहां 30-35 महिलाएं थीं – विधवा, सीनियर सिटीजंस, कुछ अकेली, कुछ परिवार के साथ। मैंने अपनी कहानी सुनाई, डॉक्यूमेंट्स की अहमियत, बैंक अकाउंट्स की सुरक्षा, और आत्मनिर्भरता के बारे में बात की। सबने ध्यान से सुना, सवाल पूछे। एक महिला रेखा जी ने कहा, “कल्पना जी, आपके बेटे ने जो किया, क्या आप उसे कभी माफ कर पाएंगी?”

मैंने मुस्कुरा कर कहा, “माफ करना आसान नहीं है, पर मां का दिल हमेशा नरम होता है। अभी वक्त लगेगा, पर मैं चाहती हूं कि वो अपनी गलती सुधारे।” वर्कशॉप के बाद कई महिलाएं मेरे पास आईं। किसी ने अपने बेटे की धोखाधड़ी की कहानी सुनाई, किसी ने अपने पति के बाद अकेले जीने की चुनौतियां बताईं। मैंने सबको एक ही बात कही – “अपनी ताकत पहचानिए, अपने हक के लिए लड़िए।”

नया क्लाइंट – नया चैलेंज

अगले हफ्ते मेरे पास एक नया क्लाइंट आया – मिसेज सुलक्षणा देशमुख। वह भी विधवा थीं, दो बेटियां थी, दोनों विदेश में रहती थीं। उन्होंने मुझे अपने घर का इंटीरियर डिजाइन करने के लिए बुलाया। जब मैं उनके घर गई, उन्होंने कहा, “कल्पना जी, मेरे पास पैसे हैं, पर रिश्तों की कमी है। बेटियां सालों से नहीं आईं। मैं चाहती हूं कि मेरा घर सुंदर बने, ताकि जब वे आएं तो उन्हें लगे कि मां ने अकेले सब संभाल लिया।”

मैंने उनके लिए एक खूबसूरत डिजाइन तैयार किया – उनके पति की यादों से जुड़ा एक स्टडी रूम, बेटियों के लिए अलग-अलग थीम वाले बेडरूम, और एक सोलह आने मराठी किचन। काम के दौरान हम दोनों की दोस्ती हो गई। सुलक्षणा जी ने मुझसे पूछा, “कल्पना जी, क्या कभी अकेलापन डराता है?” मैंने कहा, “कभी-कभी, पर जब आपके पास अपना काम, अपने सपने और आत्मविश्वास हो, तो अकेलापन भी साथी बन जाता है।”

अथर्व की जिंदगी में नया मोड़

इधर अथर्व की जिंदगी बदल चुकी थी। बिल्डर के केस के बाद उसकी नौकरी गई, शादी टूट गई, और वह डिलीवरी बॉय बन गया। एक दिन मुझे उसके दोस्त आदित्य का फोन आया। आदित्य बोला, “आंटी, अथर्व बहुत परेशान है। वो दिन-रात काम करता है, पर बहुत टूट गया है।” मैंने आदित्य से कहा, “उससे कहो कि मेहनत करे, वक्त सब बदल देता है।”

कुछ महीने बीते। अथर्व ने धीरे-धीरे 5 लाख बिल्डर को लौटा दिए। वह हर महीने अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा केस में डालता था। एक दिन उसने मुझे मैसेज किया – “मां, क्या मैं आपसे मिल सकता हूं?” मैंने जवाब दिया – “जब तुम 10 लाख चुका लोगे, तब आना।”

नई शुरुआत – महिलाओं का ग्रुप

मेरी वर्कशॉप्स अब नियमित हो गई थीं। पुणे के अलग-अलग इलाकों में महिलाएं मुझे बुलाती थीं। मैंने एक ग्रुप बनाया – “स्वावलंबन महिला मंडल”। इसमें 20 महिलाएं जुड़ गईं। हर महीने हम मिलते, अपने अनुभव साझा करते, बैंकिंग, प्रॉपर्टी, कानून, और आत्मनिर्भरता पर चर्चा करते। मैंने सबको सिखाया – PAN कार्ड, आधार, FD, लोन, रिटायरमेंट प्लानिंग, सबकुछ।

एक दिन हमारे ग्रुप में एक नई महिला आई – शीतल पाटिल। वह बहुत घबराई हुई थी। बोली, “मेरे बेटे ने मेरी सारी ज्वेलरी बेच दी। अब मैं क्या करूं?” मैंने उसे गले लगाया। कहा, “शीतल जी, सबसे पहले पुलिस में शिकायत दर्ज कराओ। फिर अपने बैंक अकाउंट्स को सुरक्षित करो। और सबसे जरूरी, खुद को कमजोर मत समझो।”

हमारे ग्रुप की महिलाएं अब एक-दूसरे की मदद करने लगी थीं। कोई बैंक में साथ जाती, कोई वकील से सलाह दिलाती, कोई डॉक्यूमेंट्स संभालने में मदद करती। धीरे-धीरे सबका आत्मविश्वास बढ़ गया।

अथर्व की वापसी

करीब एक साल बाद अथर्व ने 10 लाख चुका दिए। उसने मुझे फिर मैसेज किया – “मां, अब मैं आ सकता हूं?” मैंने उसे अपने घर बुलाया। वह आया – सूखा सा चेहरा, थकान झलक रही थी, पर आंखों में पछतावा था। उसने मेरे सामने सिर झुका दिया। बोला, “मां, मुझे माफ कर दो। मैंने बहुत बड़ी गलती की। अपने लालच में सब खो दिया।”

मैंने उसे गले लगा लिया। कहा, “बेटा, माफ करना आसान नहीं है, पर सीखना जरूरी है। आज तुमने अपनी गलती मान ली, यही सबसे बड़ी बात है।” अथर्व रो पड़ा। बोला, “मां, अब मैं ईमानदारी से जीना चाहता हूं। आपकी तरह आत्मनिर्भर बनना चाहता हूं।”

मैंने उसे अपने इंटीरियर डिजाइन का काम सिखाना शुरू किया। उसे क्लाइंट्स के साथ साइट विजिट पर ले गई। उसे डिजाइनिंग, मार्केटिंग, अकाउंटिंग सब सिखाया। धीरे-धीरे वह सीखने लगा। उसकी जिंदगी में नया मकसद आ गया।

नताशा की वापसी

एक दिन नताशा का भी फोन आया। उसने कहा, “आंटी, मुझे अथर्व से मिलना है। क्या मैं आ सकती हूं?” मैंने हां कह दी। नताशा आई, उसने अथर्व से बात की। बोली, “अथर्व, जो हुआ उसका दुख है, पर अगर तुम सच में बदल गए हो तो मैं तुम्हें एक मौका देना चाहती हूं।” अथर्व ने कहा, “नताशा, अब मैं खुद को साबित करना चाहता हूं। मैं तुम्हें फिर कभी धोखा नहीं दूंगा।” दोनों ने फिर से दोस्ती की शुरुआत की।

समाज में बदलाव

मेरी कहानी अब पुणे के अखबारों में छपने लगी थी। लोग मुझे बुलाते – स्कूल, कॉलेज, NGOs, बैंक, हर जगह। मैं महिलाओं को आत्मनिर्भरता, सुरक्षा, और कानून के बारे में बताती थी। एक दिन एक कॉलेज में लेक्चर देने गई। वहां लड़कियों ने पूछा, “आंटी, आप इतनी मजबूत कैसे बनीं?” मैंने कहा, “हर इंसान के अंदर ताकत है। बस उसे पहचानना होता है।”

मेरी वर्कशॉप्स अब महाराष्ट्र के बाहर भी होने लगीं। मुंबई, नागपुर, औरंगाबाद से बुलावा आने लगा। मैंने महिलाओं का एक ऑनलाइन फोरम शुरू किया – “स्वावलंबन नेटवर्क”। इसमें 500 से ज्यादा महिलाएं जुड़ गईं। हर कोई अपनी कहानी, सवाल, और समाधान साझा करती थी।

अथर्व का प्रायश्चित

अथर्व ने लगातार मेहनत की। 3 साल में उसने बिल्डर को 35 लाख चुका दिए। उसकी जिंदगी बदल गई थी। अब वह इंटीरियर डिजाइन के छोटे-छोटे प्रोजेक्ट्स लेने लगा था। उसकी मेहनत रंग लाई। एक दिन उसने मुझे एक चिट्ठी दी – “मां, आज मैं खुद पर गर्व कर सकता हूं। आपने मुझे सही राह दिखाई। अब मैं जानता हूं कि रिश्तों की असली कीमत क्या होती है।”

नताशा और अथर्व ने फिर से शादी का फैसला किया। पर इस बार सबकुछ ईमानदारी से हुआ। शादी में सिर्फ परिवार और करीबी दोस्त थे। नताशा की मां ने मुझसे कहा, “कल्पना जी, आपने अपने बेटे को इंसान बना दिया। ऐसी मां हर घर में होनी चाहिए।”

अंतिम विचार

आज मैं अपने घर में बैठी हूं। मेरे पास मेरा काम है, मेरा ग्रुप है, मेरा बेटा है – जिसने अपनी गलती सुधार ली। मेरी दुकान से किराया आ रहा है, एफडी से ब्याज मिल रहा है। मैं आत्मनिर्भर हूं। मेरे पास सच्चे रिश्ते हैं – प्यार, सम्मान और भरोसा।

अगर आप भी मेरी तरह अपनी जिंदगी में मुश्किलों से जूझ रहे हैं, तो याद रखिए – हर रात के बाद सुबह आती है। हर दर्द के बाद सुकून मिलता है। बस हिम्मत मत हारिए। अपने हक के लिए लड़िए, अपनी ताकत पहचानिए, और सबसे जरूरी – अपने आत्मविश्वास को कभी खोने मत दीजिए।