पिता से परेशान होकर बेटी ने उठाया गलत कदम /जिसको देखकर S.P साहब के होश उड़ गए/

धुंधला जमीर और टूटते सपने
भाग 1: अलवर की एक शाम और नाथूराम का पतन
राजस्थान के अलवर जिले में बसा इंद्रगढ़ गांव अपनी शांति के लिए जाना जाता था। इसी गांव की एक संकरी गली में नाथूराम का छोटा सा घर था। नाथूराम एक साधारण दिहाड़ी मजदूर था। शुरुआत में वह बहुत मेहनती था, उसके हाथों की मेहनत से घर का चूल्हा जलता था और परिवार खुश था। लेकिन कहते हैं कि बुरा वक्त अक्सर बुरी आदतों को साथ लेकर आता है।
धीरे-धीरे नाथूराम को नशा करने की लत पड़ गई। शराब की उस एक बोतल ने उसके जीवन की खुशियों को निगलना शुरू कर दिया। अब वह मजदूरी से जो भी कमाता, वह शराब के ठेके पर लुटा देता। उसकी हालत इतनी गिर चुकी थी कि नशा पाने के लिए वह अपने जमीर और नैतिकता की हर सीमा लांघने को तैयार रहता था।
भाग 2: कांता और तान्या – मर्यादा की प्रतिमूर्ति
नाथूराम के इस उजाड़ होते घर में दो दीये अभी भी जल रहे थे। उसकी पत्नी कांता देवी, जो एक अत्यंत सरल और संस्कारी महिला थी। वह अपने घर को जोड़ने की पूरी कोशिश करती थी। पति की बुरी आदतों के बावजूद वह उसे अपना परमेश्वर मानती थी और हर अपमान सहकर भी घर का काम करती थी।
उनकी एक बेटी थी, तान्या। तान्या 12वीं कक्षा की छात्रा थी। वह पढ़ने में बहुत होशियार और अपने भविष्य को लेकर बहुत गंभीर थी। वह एक सरकारी स्कूल में जाती थी और उसकी आँखों में बड़े सपने थे। तान्या अपनी माँ के संघर्ष को देखती थी और चाहती थी कि पढ़-लिखकर वह अपनी माँ को इस नरक से बाहर निकाले।
भाग 3: 8 दिसंबर 2025 – साजिश की शुरुआत
तारीख थी 8 दिसंबर 2025। सुबह के करीब 8:30 बजे थे। तान्या हमेशा की तरह स्कूल जा चुकी थी। घर में कांता अपने पति को समझा रही थी कि उसे नशे की लत छोड़ देनी चाहिए।
लेकिन आज नाथूराम के मन में कुछ और ही चल रहा था। उसने कांता से कहा, “कांता, तान्या अब बड़ी हो गई है। उसकी शादी के लिए हमें पैसों की जरूरत है। हम बहुत गरीब हैं, ऐसे में मजदूरी से काम नहीं चलेगा। तुम भी मेरे साथ काम पर चलो।” कांता, जो अपनी बेटी के सुख के लिए कुछ भी करने को तैयार थी, तुरंत मान गई। उसे लगा कि उसका पति शायद सुधर रहा है और परिवार के भविष्य के लिए गंभीर है।
तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। रतन मिस्त्री खड़ा था, जो गांव में बड़े-बड़े बंगले बनाने का काम करता था। रतन की नजरें कांता पर पड़ते ही उसकी नीयत डगमगा गई। उसने नाथूराम से कहा कि सरपंच दिलावर सिंह के नए घर के लिए दो मजदूरों की जरूरत है।
भाग 4: सरपंच की काली नजर
तीनों सरपंच दिलावर सिंह के निर्माणाधीन बंगले पर पहुँचे। शाम तक सबने काम किया। दिलावर सरपंच गांव का प्रभावशाली व्यक्ति था, लेकिन उसका चरित्र संदिग्ध था। जब उसकी नजर कांता की सादगी और सुंदरता पर पड़ी, तो उसके मन में खोट आ गया।
दिलावर सरपंच जानता था कि नाथूराम को शराब के लिए किसी भी हद तक गिराया जा सकता है। उसने नाथूराम को अकेले में बुलाया और लालच दिया। उसने शराब की बोतलें और कुछ रुपयों का प्रलोभन देकर कांता के सम्मान के साथ समझौता करने का प्रस्ताव रखा। एक शराबी के लिए रिश्ते और मर्यादा का कोई मोल नहीं रह गया था। नाथूराम ने पैसों और नशे की खातिर अपनी पत्नी की गरिमा का सौदा कर दिया।
उसने कांता को धोखे से सरपंच के एक एकांत कमरे में भेजा। कांता को लगा कि सरपंच कोई काम की बात करना चाहते हैं, लेकिन कमरे के अंदर का दृश्य देखकर वह कांप उठी। सरपंच ने मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ दीं और कांता के साथ दुर्व्यवहार किया। कांता मदद के लिए चिल्लाती रही, लेकिन बाहर खड़ा उसका पति शराब की बोतल में अपनी आत्मा डुबो चुका था।
भाग 5: ब्लैकमेलिंग का नया सिलसिला
इस घटना के बाद कांता टूट चुकी थी। जब वह घर लौटी, तो उसने तान्या से कुछ नहीं कहा। वह नहीं चाहती थी कि उसकी बेटी का मन मैला हो। लेकिन मुसीबतें अभी खत्म नहीं हुई थीं।
अगले दिन जब नाथूराम फिर से मजदूरी पर गया, तो रतन मिस्त्री ने उसे अकेला पाया। रतन ने उस रात की सारी घटना देख ली थी। वह अब कांता को ब्लैकमेल करने लगा। वह कांता के घर पहुँचा और धमकी दी कि अगर उसने उसकी बात नहीं मानी, तो वह पूरे गांव में यह बात फैला देगा, जिससे तान्या की बदनामी होगी और उसका भविष्य बर्बाद हो जाएगा। अपनी बेटी के सम्मान को बचाने के लिए कांता एक बार फिर मजबूर हो गई। रतन मिस्त्री ने भी उसका अनुचित लाभ उठाया।
भाग 6: 15 दिसंबर – सच्चाई का सामना
15 दिसंबर का दिन आया। तान्या स्कूल की फीस लेने के लिए अचानक घर लौटी। घर के अंदर का दृश्य देखकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। उसने देखा कि सरपंच दिलावर सिंह उसके घर के अंदर मौजूद था। तान्या को सब समझ आ गया। उसने अपनी माँ पर क्रोध किया, लेकिन कांता ने रोते हुए सारी सच्चाई बता दी।
कांता ने बताया कि यह सब उसकी मर्जी से नहीं, बल्कि उसके पिता नाथूराम के दबाव और लालच की वजह से हो रहा है। तान्या को विश्वास नहीं हुआ। लेकिन जब शाम को नाथूराम घर आया और तान्या ने उससे सवाल किए, तो नाथूराम ने शर्मिंदा होने के बजाय तान्या को चुप रहने को कहा और अपनी पत्नी के इस शोषण को ‘घर की जरूरत’ बताया।
उस पल तान्या को अहसास हुआ कि उसका पिता अब पिता नहीं रहा, बल्कि एक ऐसा व्यक्ति बन चुका है जो अपनी लत के लिए अपने ही परिवार को दांव पर लगा चुका है। तान्या को डर सताने लगा कि कल को उसका पिता उसे भी नशे की खातिर किसी के हाथों बेच सकता है।
भाग 7: अंतिम निर्णय और आत्मसमर्पण
उस रात तान्या और कांता ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्हें लगा कि अगर नाथूराम जीवित रहा, तो वह उनकी गरिमा को पूरी तरह खत्म कर देगा। जब नाथूराम शराब के नशे में धुत होकर सो गया, तो मां-बेटी के अंदर का दबा हुआ आक्रोश फूट पड़ा।
तान्या ने कुल्हाड़ी उठाई और कांता ने रसोई का चाकू। नफरत और आत्मरक्षा के उस क्षण में उन्होंने नाथूराम पर हमला कर दिया। शराब के नशे में डूबा हुआ नाथूराम प्रतिकार भी नहीं कर सका और उसकी जीवनलीला समाप्त हो गई।
घटना को अंजाम देने के बाद दोनों के मन में कोई डर नहीं था, केवल एक अजीब सी शांति थी। वे सीधे पुलिस स्टेशन पहुँचीं और अपना जुर्म कबूल कर लिया। पुलिस ने नाथूराम का शव बरामद किया और कांता तथा तान्या को गिरफ्तार कर लिया।
निष्कर्ष: समाज के लिए एक प्रश्न
यह कहानी यहीं समाप्त होती है, लेकिन पीछे कई सवाल छोड़ जाती है। क्या नाथूराम का कृत्य एक पिता और पति के रूप में स्वीकार्य था? क्या समाज में शराब की लत रिश्तों को इतना खोखला कर सकती है? और अंत में, क्या कांता और तान्या का उठाया गया कदम न्यायोचित था या कानून को हाथ में लेना गलत था?
यह मामला अब न्यायालय के अधीन है, लेकिन इंद्रगढ़ गांव के लोग आज भी उस रात के बारे में सोचकर सिहर उठते हैं।
लेखक का संदेश: नशा केवल स्वास्थ्य को नहीं, बल्कि मनुष्य के जमीर और उसके पूरे परिवार को नष्ट कर देता है। रिश्तों की मर्यादा ही समाज की असली नींव है।
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