बि-दाईमा मनै रुवायो छोरी-श्रीमतीलाई सहने शक्ति दिनु भगवान🙏😭 | prashant tamang bidai darjeeling

प्रस्तावना: बागडोगरा से दार्जिलिंग तक एक भावभीनी यात्रा

प्रसिद्ध गायक, इंडियन आइडल सीजन 3 (2007) के विजेता और पहाड़ों की सादगी भरी आवाज़ के धनी प्रशांत तमांग का पार्थिव शरीर नई दिल्ली से विमान द्वारा पश्चिम बंगाल के बागडोगरा हवाईअड्डे लाया गया। बागडोगरा पहुंचते ही एयरपोर्ट पर कलाकारों, शुभचिंतकों और प्रशंसकों की भीड़ उमड़ पड़ी। हर कोई गले में दर्द और आंखों में नमी लिए अपने चहेते कलाकार को अंतिम श्रद्धांजलि देने आया था। एयरपोर्ट से पार्थिव देह को उनके गृह ज़िले दार्जिलिंग के लिए रवाना किया गया, जहां परिवार की उपस्थिति में उनके अंतिम संस्कार की तैयारी की गई।

यह सिर्फ एक कलाकार का जाना नहीं था; यह एक युग का शांत हो जाना था—एक ऐसा युग जिसमें सादगी, मेहनत और ईमानदारी की गायकी ने लाखों दिलों को छुआ। प्रशांत के निधन की खबर ने संगीत जगत के साथ-साथ आम लोगों को भी शोक में डुबो दिया। सोशल मीडिया पर शोक संदेशों की बाढ़ आ गई—“सदाबहार मुस्कान वाला लड़का,” “पहाड़ों की आवाज़,” “हमारा अपना हीरो”—ऐसे अनगिनत शब्दों में लोग अपनी संवेदनाएं व्यक्त करते रहे।

पार्थिव देह के स्वागत का दृश्य: भीड़, मौन और बिछोह

बागडोगरा एयरपोर्ट पर जो दृश्य दिखाई दिया, वह किसी राज्य-शोक जैसा था। कलाकार, राजनेता, स्थानीय प्रतिनिधि, पुलिस बल के साथी और आम जन—सब कतारों में खड़े होकर मौन श्रद्धांजलि दे रहे थे। जिन कंधों ने कभी पुलिस वर्दी में ड्यूटी निभाई, वही कंधे आज अपने साथी के पार्थिव शरीर के पीछे-पीछे श्रद्धा से झुके चले जा रहे थे। पुष्पचक्र, तिरंगा, और पहाड़ी संस्कृति के पारंपरिक वस्त्रों में लिपटे लोग—हर चेहरा एक कहानी कह रहा था। कोई इंडियन आइडल के दिनों का पोस्टर थामे था, तो कोई मोबाइल स्क्रीन पर उनका कोई पुराना गीत चलाकर बस सुनता ही जा रहा था।

दार्जिलिंग के लिए निकली अंतिम यात्रा में रास्ते भर लोग घरों और दुकानों के बाहर निकलकर खड़े हो गए। किसी ने चुपचाप हाथ जोड़ दिए, किसी ने दूर से ही फूल अर्पित किए, तो किसी ने बच्चों को गोद में उठाकर दिखाया—“ये वही हैं, जिन्होंने हमारे पहाड़ों की आवाज़ को दुनिया तक पहुंचाया।”

परिवार का दर्द: पत्नी की विह्वलता और बेटी की मासूमियत

प्रशांत की पत्नी—गीता थापा (मार्थ एली)—ने जब पहली बार सार्वजनिक रूप से अपनी भावनाएं साझा कीं, तो उनके शब्दों में टूटन साफ झलक रही थी। उन्होंने बताया कि दिल्ली में अचानक सीने में दर्द के बाद सब कुछ पलों में बदल गया। “मैं उनके साथ थी… कभी सोचा नहीं था कि इस तरह उन्हें अलविदा कहना पड़ेगा,” उनके ये शब्द सुनते ही मौजूद हर व्यक्ति की आंखें भर आईं।

उनकी नन्ही बेटी आर्या अपने पिता के बेहद करीब थी। प्रशांत, जो मंचों पर लाखों के सामने मुस्कुराते थे, घर लौटकर बेटी के साथ खेलते, उसे लोरी सुनाते, और कई बार कार्यक्रम तक टाल देते—सिर्फ उसके साथ समय बिताने के लिए। परिजनों ने बताया कि वह अपने परिवार के लिए “पहाड़” की तरह खड़े रहते—शांत, मजबूत और आश्वस्त करने वाले।

मां के निधन के बाद से वे अक्सर दार्जिलिंग की पहाड़ियों में बने पुराने घर का जिक्र करते। कोरोना के दिनों में दिल्ली में अटके रहने और अपने प्रिय मामा से अंतिम समय में न मिल पाने की कसक भी उनके मन के किसी कोने में बसी थी। करीबी बताते हैं—“वे बहुत अंदर से भावुक थे; मंच पर जो दर्द उनकी आवाज़ में सुनाई देता, वह उनके जीवन के अनुभवों से निकला था।”

एक असाधारण सफर: दार्जिलिंग से इंडियन आइडल तक

4 जनवरी 1983 को दार्जिलिंग में जन्मे प्रशांत का बचपन उसी पहाड़ी सादगी में बीता। परिवार का सहारा—पिता—एक हादसे में जल्दी चले गए। परिवार की जिम्मेदारियां युवा कंधों पर तेजी से आ गईं। पढ़ाई के साथ जीवन की दौड़ इतनी कठिन हो चली कि उन्होंने कोलकाता पुलिस में कांस्टेबल के रूप में नौकरी पकड़ी। वर्दी पहनकर ड्यूटी करना—और थकान के बावजूद दिल में सपनों को जिंदा रखना—यही उनकी दिनचर्या थी।

पुलिस ऑर्केस्ट्रा ने उनकी आवाज़ को मंच दिया। लोगों से जुड़ने का सलीका, भावनाओं को सुरों में पिरोने की कला, और श्रोताओं की साँसों के साथ ताल मिलाना—यह सब वहीं से निखरा। एक दिन उन्होंने फैसला किया—इंडियन आइडल सीजन 3 के लिए ऑडिशन देंगे। न कोई बड़ा बैकग्राउंड, न कोई ‘गॉडफादर’। बस एक सच्ची आवाज़ और साहस।

मंच पर आते ही जैसे समय थम गया। सुरों ने जीवन की कथा सुनाई—पहाड़ों की ठंडी हवा, घर की याद, पिता की उसूलों की छाप, और माँ के आँचल की गरमाहट। जज चुप हो गए, दर्शक शांत, और देश ने इस आवाज़ को अपना लिया। “यह सिर्फ गाता नहीं, महसूस कराता है”—लोग कहते। हर राउंड में वोट बढ़ते गए। दार्जिलिंग से लेकर कोलकाता, उत्तर-पूर्व से लेकर देशभर—लोगों ने पोस्टर लगाए, रैली निकाली, फोन से वोट किए। और फिर वह दिन आया—प्रशांत तमांग इंडियन आइडल बने। यह विजय सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं थी; यह हर संघर्षरत युवक की उम्मीद की विजय थी, हर नेपाली-भाषी समुदाय के आत्मगौरव की विजय थी।

आइडल के बाद की असली लड़ाई: उम्मीदें, दबाव और निरंतरता

शो जीतना आसान नहीं—और शो के बाद टिके रहना उससे भी कठिन। प्रशांत ने यह चुनौती स्वीकार की। उन्होंने कार्यक्रम किए, एल्बम रिकॉर्ड किए, और हमेशा अपनी जड़ों से जुड़े रहे। उनकी गायकी में अनावश्यक दिखावा नहीं था; वे वही गाते जो उनके भीतर से निकलता। हिंदी, नेपाली और अन्य भाषाओं में उनके गीत श्रोताओं की निजी यादों का हिस्सा बनते चले गए—असारे महिना, मन साइली, जाला रेलमा, सरोज, गोरखा पलटन, बी को करले—कई गीतों की गूंज पहाड़ों से मैदान तक सुनाई दी।

लोगों की अपेक्षाएं बड़ी थीं—हर बार कुछ नया, कुछ अलग। उन्होंने उस दबाव को मुस्कान के साथ स्वीकार किया। मंच पर आते, श्रोताओं से संवाद करते, और गीत में अपना मन उड़ेल देते। यही उन्हें “आइडल” से आगे “कलाकार” बनाता है।

अभिनय का अध्याय: गायक से अभिनेता तक

इंडियन आइडल के दो-तीन साल बाद प्रशांत ने नेपाली सिनेमा का रुख किया। वरिष्ठ संगीतकार नारायण रायमाझी की फिल्म ‘गोरखा पलटन’ से उन्होंने बतौर अभिनेता डेब्यू किया। इसके बाद ‘परदे’, ‘परदे 2’, ‘अंगालो यो माया को’, ‘निशानी’ और हालिया नेपाली फिल्म ‘पहचान’ में उनके काम की सराहना हुई। इन फिल्मों में उनकी भूमिकाएं प्रवासी नेपाली समुदाय के दर्द, घर लौटने की लालसा, और पहचान की तलाश जैसे विषयों से जुड़ी रहीं—और शायद इसी वजह से उनकी अदाकारी में भी वही सच्चाई दिखी जो उनकी गायकी में थी।

हाल के समय में वे हिंदी वेब सीरीज ‘पाताल लोक’ (सीजन 2) में भी दिखाई दिए, जहाँ उनके किरदार को सराहा गया। रिपोर्ट्स के अनुसार, वे सलमान खान की फिल्म ‘बैटल ऑफ गलवान’ में भी नजर आने वाले थे—यह उनके करियर का एक बड़ा मोड़ हो सकता था। वे परदे पर जितने सहज दिखते, कैमरे के पीछे उतने ही विनम्र और प्रोफेशनल रहते।

अचानक विदाई: दिल का दौरा और कुछ मिनटों में बदल गई दुनिया

दिल्ली में उनके घर पर उस सुबह सब कुछ सामान्य था। परिवार बताता है—वह हंस रहे थे, दिन की सामान्य बातों पर चर्चा कर रहे थे। अचानक सीने में दर्द उठा, और कुछ ही मिनटों में स्थिति बिगड़ती चली गई। परिजन घबराकर उन्हें द्वारका के निजी अस्पताल ले गए। कार में एक खामोशी थी—दुआओं की फुसफुसाहट, और बीच-बीच में आश्वस्त करने के शब्द। अस्पताल में डॉक्टरों की कोशिशों के बाद खबर आई—वे नहीं रहे।

यह खबर बिजली की तरह फैली। “अभी तो हाल में अरुणाचल में पूरे जोश से गाते दिखे,” लोगों ने कहा। “उन्हें कोई गंभीर बीमारी नहीं थी,” परिजनों ने बताया। यही अचानकपन सबको तोड़ गया—फैंस, साथी कलाकार, और सबसे बढ़कर परिवार।

दार्जिलिंग का शोक: भीड़, प्रार्थनाएं और पहाड़ों की खामोशी

दार्जिलिंग की सड़कों पर उस दिन सामान्य रौनक नहीं थी। दुकानों पर हलचल कम, गलियों में धीमी-धीमी बातचीत, और पहाड़ी हवा में एक अजीब-सी खामोशी। लोग समूहों में खड़े होकर उनके गीत गुनगुना रहे थे। स्कूली बच्चे, कॉलेज के छात्र, टैक्सी यूनियन के ड्राइवर, चाय बागान के मजदूर—हर तबके के लोग उनके बारे में अपनी यादें साझा कर रहे थे: “इंडियन आइडल के वक्त हम सबने मिलकर वोट किया था,” “उनके गाने पर हमारा पहला डांस था,” “उन्होंने मेरे कठिन दिनों में सहारा दिया।”

उनकी अंतिम यात्रा में सैकड़ों की तादाद में लोग शामिल हुए। पारंपरिक ढंग से श्रद्धांजलि दी गई, मंत्रोच्चार हुआ, और पहाड़ों के बीच वह स्वर—जो कभी इस धरती का था—आकाश में विलीन हो गया।

समुदाय और पहचान: एक आवाज़, जो सीमा से परे थी

प्रशांत तमांग सिर्फ एक गायक नहीं थे; वे नेपाली-भाषी समुदाय की उस अस्मिता का चेहरा थे, जिसे अक्सर बड़े मंचों पर प्रतिनिधित्व नहीं मिलता। इंडियन आइडल की जीत के बाद से ही गोर्खा और नेपाली-भाषी समुदाय में एक स्वाभिमान की लहर आई। “हम भी कर सकते हैं”—यह विश्वास उन्होंने जगाया। उनकी आवाज़ ने संस्कृतियों के बीच पुल का काम किया—हिंदी गाने में पहाड़ों की महक, नेपाली गीतों में व्यापक भारतीय श्रोता-वर्ग की स्वीकृति—यह उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी।

साथी कलाकारों और नेताओं की श्रद्धांजलि

सोशल मीडिया और मंचों पर साथ काम कर चुके कलाकारों ने उनके व्यक्तित्व को याद किया—“शांत, कम बोलने वाले, लेकिन काम में सौ फीसदी देने वाले,” “स्टेज से उतरकर भी वही सादगी,” “हर जूनियर के लिए समय निकालना।” पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी दुख व्यक्त किया और कहा कि प्रशांत सिर्फ गायक नहीं, दार्जिलिंग की पहचान थे।

कोलकाता पुलिस में उनके साथियों ने उनकी पुरानी तस्वीरें साझा कीं—जब वे वर्दी में थे, और ऑर्केस्ट्रा के साथ कार्यक्रम करते थे। “वह आज भी हमारे दिलों में ‘कॉन्स्टेबल-सिंगर’ हैं—जो ड्यूटी के बाद सपनों को थामे रहता था,” एक साथी ने लिखा।

अंतिम रिकॉर्डिंग और आखिरी वीडियो: यादों का अमिट दस्तावेज

उनकी अचानक विदाई के बाद जो वीडियो वायरल हुआ—जिसमें वे घर पर बैठकर एक गीत गा रहे हैं—वह करोड़ों के लिए स्मृति का स्वरूप बन गया। चेहरे पर हल्की मुस्कान, आंखों में पहाड़ों की चमक, और सुरों में वही पुरानी सच्चाई। फैंस लिख रहे हैं—“यह आखिरी वीडियो नहीं, उनका आखिरी तोहफा है।” किसी ने लिखा—“जब भी टूटता हूं, उन्हें सुनता हूं। आज टूटकर भी उन्हें ही सुन रहा हूं।”

यह वीडियो सिर्फ एक प्रस्तुति नहीं; यह एक जीवन-दर्शन है—सरल रहो, सच्चे रहो, और जो हो, पूरे मन से हो।

निजी जीवन: एक साथी, एक पिता, एक बेटा

2011 में उन्होंने एयर होस्टेस गीता थापा से शादी की। दोनों की मुलाकात उड़ान के दौरान हुई—पहले दोस्ती, फिर साथ। प्रशांत एक संजीदा पति और खेलने-कूदने वाले पिता थे—जो बेटी की हँसी के लिए बड़े से बड़ा कार्यक्रम टाल देते। परिवार के बुजुर्ग कहते हैं—“वह घर में उतने ही सहज थे जितने मंच पर। कभी ऊंची आवाज़ नहीं, कभी दिखावा नहीं।”

मां के गुजरने के बाद वे अक्सर कहते—“मैं मां को खुश करना चाहता था।” मामा के निधन के समय दार्जिलिंग न जा पाने का दुख वे भीतर ही भीतर ढोते रहे। शायद यही वजह थी कि वे परिवार के साथ हर छोटी-बड़ी खुशी को जी-भरकर जीना चाहते थे।

विरासत: सुर, सादगी और संघर्ष का संगम

प्रशांत तमांग की विरासत सिर्फ गीतों की सूची नहीं; यह एक पूरे दर्शन का नाम है—

सपनों को थामे रखो, चाहे परिस्थितियां कैसी भी हों।
कामयाबी के बाद भी जमीन से जुड़े रहो।
कला का सार सादगी और सच्चाई में है, दिखावे में नहीं।
परिवार, समुदाय और अपने लोगों से प्रेम तुम्हें ऊँचा उठाता है।

उनके गीत अब समारोहों, स्कूल कार्यक्रमों, पहाड़ी त्योहारों और निजी प्लेलिस्टों में सदैव गूंजते रहेंगे। युवा कलाकार उन्हें देखकर सीखेंगे कि प्रतिभा और विनम्रता का मेल ही कलाकार को लंबी दूरी तक ले जाता है।

विदाई की घड़ी: पहाड़ों ने अपनी आवाज़ को सलाम किया

दार्जिलिंग में जब अंतिम संस्कार की विधियां पूरी हुईं, तो मौसम भी जैसे मौन हो गया। लोगों ने कहा—“पहाड़ों ने अपनी सबसे प्यारी आवाज़ को सलाम किया।” किसी बुजुर्ग ने धीरे से कहा—“उनके जाने से खामोशी बढ़ गई है, लेकिन यह खामोशी भी उनकी ही है—शांत, गूढ़, गहरी।”

फूलों की बारिश, प्रार्थनाओं की धुन, और दूर तक फैला सन्नाटा—इन सबके बीच एक बात साफ थी: प्रशांत तमांग चले गए, पर उनकी धड़कनें अब भी लोगों के दिलों में धड़क रही हैं।

निष्कर्ष: हमेशा के लिए अमर—एक नाम, एक स्वर, एक प्रेरणा

प्रशांत तमांग सिर्फ एक कलाकार नहीं, एक प्रेरणा थे। उनकी कहानी बताती है कि मेहनत, सादगी और ईमानदारी से कोई भी पहाड़ पार किया जा सकता है। उन्होंने अपने स्वर से सीमाएं मिटाईं, समुदायों को जोड़ा, और दुख-सुख के बीच लोगों को आश्वस्त किया—“सब ठीक होगा।”

आज जब हम उन्हें अलविदा कह रहे हैं, तो यह भी कह रहे हैं—“धन्यवाद, प्रशांत। तुमने हमारे सपनों को आवाज़ दी, हमारे दुखों को शब्द दिए, और हमारी खुशियों को सुर।”

उनका नाम, उनका काम और उनका प्रभाव—सब कुछ हमेशा अमर रहेगा।
जब भी पहाड़ों की हवा चलेगी, जब भी कोई सादा-सा गीत दिल को छुएगा, जब भी कोई युवा मंच पर पहली बार खड़ा होगा—प्रशांत तमांग याद आएंगे।

प्रशांत, तुम्हें शत-शत नमन।
तुम्हारी आत्मा को शांति मिले।
तुम हमेशा हमारे दिलों में गूंजते रहोगे।