Kala Ilm Ka Anjaam 😨 | Be Aulad Bhaiyon Ke Ghar Paida Hua Aisa Baccha Ki Dekh Ke Hue Sab Hairaan

अंधी बहन की दुआ – लालच, सजा और माफी की कहानी
प्रस्तावना
यह कहानी है एक गांव की, जहां दो सगे भाइयों ने दौलत के लालच में अपनी अंधी बहन ज़ैनब को सूखे कुएं में फेंक दिया। वे समझते थे कि ज़ैनब उनकी गरीबी का कारण है। लेकिन अल्लाह की कुदरत ने ऐसा सबक दिया कि उनकी औलाद की हालत देखकर पत्थर दिल इंसान भी रो पड़े। एक बच्चा बिना आंखों के पैदा हुआ, दूसरा जानवर जैसा चेहरा लेकर आया। यह कहानी आपके दिल को छू जाएगी, सोच बदल देगी और रिश्तों की अहमियत समझा देगी।
1. गांव की खुशहाल दुनिया
पुराने जमाने की बात है। एक छोटे से गांव में तीन भाई-बहन रहते थे – काशिफ, आसिफ और उनकी छोटी बहन ज़ैनब। मां-बाप के इंतकाल के बाद तीनों एक-दूसरे का सहारा बन गए। ज़ैनब जन्म से अंधी थी, मगर उसका दिल आईने की तरह साफ था। दोनों भाई अपनी बहन को बहुत प्यार करते, उसे कभी महसूस नहीं होने देते कि उसकी आंखों में रोशनी नहीं है। ज़ैनब भी भाइयों की आहट से पहचान लेती थी कि कौन आया है। उसकी दुआ हमेशा यही रहती – “अल्लाह मेरी आंखों की रोशनी चाहे ना दे, मगर मेरे भाइयों की जिंदगी में कभी अंधेरा मत आने देना।”
समय बीता, दोनों भाइयों की शादी हो गई। काशिफ की बीवी शबाना और आसिफ की बीवी रुसाना थी। शुरू में सब ठीक चला, लेकिन धीरे-धीरे घर में गरीबी ने पैर पसार लिए। भाइयों का कारोबार ठप हो गया, खेतों की फसलें सूख गईं। घर में तंगी बढ़ गई। ज़ैनब बेचारी अंधी थी, ज्यादा काम नहीं कर सकती थी। वह कोने में बैठकर तस्बीह पढ़ती और घर की बरकत के लिए दुआ करती।
2. लालच का जहर
जब गरीबी आती है, इंसान की अक्ल पर पर्दा पड़ जाता है। शबाना और रुसाना ज़ैनब को बोझ समझती थीं। अब खुलकर ताने देने लगीं – “यह अंधी तुम्हारे घर की बरकत खा गई है। जब से जवान हुई है, घर में खुशहाली नहीं रही। कुछ कमा नहीं सकती, बस बैठकर रोटियां तोड़ती है। इसी के काले साए की वजह से तुम दोनों भाइयों की कमाई नहीं हो रही।”
काशिफ और आसिफ शुरू में अपनी बीवियों को डांट देते थे, लेकिन रोज-रोज की तंगी और तानों ने उनके दिल में जहर घोलना शुरू कर दिया। वे सोचने लगे – शायद सही कह रही हैं। मां-बाप के रहते सब ठीक था, अब बर्बाद हो रहे हैं।
एक दिन गांव में एक बाबा आया, देखने में डरावना, गले में अजीब मालाएं, आंखों में लालच। गांव वाले उसे “काली जुबान वाला बाबा” कहते थे। शबाना और रुसाना छुपकर उस बाबा के पास गईं। गरीबी का रोना रोया – “हम अमीर क्यों नहीं बन रहे?”
बाबा ने नाटक किया, आंखें बंद कीं, फिर बोला – “तुम्हारे घर में एक बोझ है, जिसकी आंखों में रोशनी नहीं है, लेकिन वह तुम्हारी किस्मत का उजाला खा रही है। वह अंधी लड़की खजाने पर सांप बनकर बैठी है। जब तक वह घर में रहेगी, तुम दाने-दाने को तरस जाओगे।”
रुसाना ने पूछा – “क्या करना होगा?”
बाबा शैतानी हंसी हंसकर बोला – “घर से निकालने से काम नहीं चलेगा। उसे ऐसी जगह छोड़ना होगा, जहां से वह कभी वापस ना आ सके। गांव के उत्तर में काली घाटी का सूखा कुआं है। वहां छोड़ आओ, तो नोटों की बारिश होगी। याद रखना, उसे जिंदा छोड़ना है, खून नहीं बहाना।”
3. साजिश की रात
शाम को काशिफ और आसिफ थके हारे घर लौटे। बीवियों ने बाबा की बात नमक-मिर्च लगाकर सुनाई। पहले तो काशिफ का दिल कांपा – “यह क्या कह रही हो? वह हमारी सगी बहन है। जिम्मेदारी है। मौत के मुंह में कैसे छोड़ सकते हैं?”
आसिफ, जो गरीबी से तंग आ चुका था, बोला – “अगर एक ज़ैनब के जाने से घर के हालात बदल जाए, बच्चों का भविष्य बन जाए, तो क्या बुराई है? वैसे भी वह अंधी है, उसकी जिंदगी का क्या मकसद है? बस एक जिंदा लाश की तरह जी रही है।”
शैतान अपना काम कर चुका था। रात भर दोनों भाइयों और उनकी बीवियों के बीच फुसफुसाहट होती रही। दूसरी तरफ ज़ैनब, इन साजिशों से बेखबर, नमाज पर बैठी भाइयों के लिए दुआ मांग रही थी – “मेरे रब, मेरे भाइयों की मुश्किलें आसान कर दे। चाहे मेरी जान ले ले, मगर उन्हें खुश रख।”
सुबह हुई, मगर घर के लोगों का जमीर मर चुका था। काशिफ और आसिफ ज़ैनब के पास गए। काशिफ ने आवाज में झूठी मिठास घोलकर कहा – “ज़ैनब, गुड़िया तैयार हो जा। आज तुझे बड़े पीर बाबा की दरगाह पर ले चलेंगे। वहां की दुआ बहुत कबूल होती है। शायद वहां जाने से गरीबी दूर हो जाए, तेरी आंखों की रोशनी भी आ जाए।”
ज़ैनब का चेहरा खुशी से खिल उठा। “सच भाईजान, आप मुझे घुमाने ले जाओगे? मैं अभी तैयार होती हूं।” उसने अपना पुराना बुर्का पहना, भाइयों का हाथ थाम लिया। तीनों घर से निकले। ज़ैनब बहुत खुश थी। उबड़-खाबड़ रास्ते पर भी हंसते हुए चल रही थी, क्योंकि उसे भाइयों के कंधों पर भरोसा था। लेकिन वह नहीं जानती थी, ये रास्ता दरगाह की तरफ नहीं, काली घाटी के सूखे कुएं की ओर जा रहा है।
4. काली घाटी का सूखा कुआं
जंगल गहरा होता जा रहा था, परिंदे अजीब आवाजें निकाल रहे थे, हवा में डरावनी खामोशी थी। काशिफ और आसिफ के कदम भारी हो रहे थे, मगर दौलत का नशा आंखों पर पट्टी बांध चुका था। क्या वाकई अपनी फूल जैसी बहन को कुएं में फेंक देंगे?
जंगल घना, डरावना होता जा रहा था। झाड़ियां कपड़ों में उलझ रही थीं, मगर वे रुके नहीं। बीच-बीच में जंगली जानवरों की आवाजें आ रही थीं। ज़ैनब डर के मारे काशिफ का हाथ जोर से पकड़ लेती – “भाईजान, यह कैसी दरगाह है? रास्ता कितना उबड़-खाबड़ है। मुझे डर लग रहा है। क्या हम सही रास्ते पर हैं?”
काशिफ का गला सूख रहा था – “हां, गुड़िया। बस पहुंचने वाले हैं। तू डर मत, तेरे भाई तेरे साथ हैं ना।”
दोपहर हो गई। सूरज सर पर था, मगर घने पेड़ों की वजह से जंगल में शाम जैसा अंधेरा था। आखिरकार वे उस जगह पहुंच गए – पुराना सूखा कुआं, आसपास सूखी घास, अजीब सी बदबू। आसिफ ने इशारा किया – “यही जगह है। जल्दी कर, सूरज ढलने से पहले काम खत्म करना है।”
दोनों भाई कुएं के किनारे खड़े हो गए। ज़ैनब को अजीब महसूस हुआ – “भाई, आप लोग चुप क्यों हो गए? क्या हम दरगाह पहुंच गए?”
आसिफ ने झूठ बोला – “हां, ज़ैनब। यह बहुत पुरानी करामाती जगह है। बाबा ने कहा था, यहां थोड़ी नीचे एक इबादत की जगह है। तुझे वहां बैठकर हमारे और घर की बरकत के लिए दुआ मांगनी होगी।”
ज़ैनब भोली थी, भाइयों पर आंख बंद कर भरोसा करती थी – “ठीक है भाई, जैसा कहोगे वैसा करूंगी। बस मुझे बिठा दो।”
आसिफ ने काशिफ को इशारा किया। एक पल की खामोशी छाई। जंगल की हवाएं भी जैसे सांस रोककर खड़ी हो गईं। और फिर आसिफ ने ज़ैनब को जोर से धक्का दिया।
“या अल्लाह!”
ज़ैनब की चीख जंगल के सन्नाटे को चीरती हुई गूंज उठी। कुआं गहरा था, मगर किस्मत से उसमें पानी नहीं था, नीचे सूखे पत्ते और नरम मिट्टी थी। ज़ैनब धड़ाम से गिरी, चोटें आईं, शरीर छिल गया, मगर सांसें नहीं टूटीं। वह जिंदा थी।
ऊपर खड़े भाइयों ने नीचे झांककर देखा – अंधेरे में साफ नहीं दिख रहा था, बस ज़ैनब के रोने-कराहने की आवाज आ रही थी – “भाईजान, मुझे निकालो, डर लग रहा है!”
काशिफ का दिल बैठने लगा, कुएं की तरफ लपका, मगर आसिफ ने उसका हाथ पकड़कर खींचा – “पागल हो गया है क्या? निकाला तो बाबा का मंत्र टूट जाएगा। छोड़ उसे, चल घर चलते हैं। अब अमीर बनने के दिन शुरू हो गए हैं।”
काशिफ रोने लगा – “वो जिंदा है, पुकार रही है।”
“रहने दे, थोड़ी देर में आवाज बंद हो जाएगी। जानवर खा जाएंगे या भूख-प्यास से मर जाएगी। चल यहां से।”
नीचे कुएं में ज़ैनब बार-बार ऊपर हाथ उठा रही थी – “भाई, आप कहां हो? छोड़कर मत जाओ। बहुत डर लग रहा है। अम्मी, अब्बू, कोई मुझे बचाओ।”
उसकी मासूम पुकार पत्थर भी पिघला देती, मगर भाइयों के कदम नहीं रुके। वे बहन को अंधेरे कुएं में तड़पता छोड़कर भाग निकले।
5. कुएं में अकेली ज़ैनब
भाइयों के जाने की आहट ज़ैनब के तेज कानों ने सुन ली। उसे यकीन नहीं हुआ – “नहीं, मेरे भाई ऐसा नहीं कर सकते। मजाक मत करो, वापस आ जाओ। मैं वायदा करती हूं, कम खाना खाऊंगी, कभी नए कपड़े नहीं मांगूंगी। मुझे यहां मत छोड़ो।”
लेकिन जवाब में सिर्फ उसकी आवाज गूंज कर वापस आई। जंगल खामोश हो गया। अब वहां सिर्फ अंधी ज़ैनब थी, गहरा कुआं और मौत का साया।
काशिफ और आसिफ घर पहुंचे, शाम ढल चुकी थी। पसीने से भीगे चेहरे, फूली सांसें। घर के दरवाजे पर शबाना और रुसाना बेसब्री से इंतजार कर रही थीं – “काम हो गया? वो बला चली गई?”
आसिफ – “हां, अब कभी वापस नहीं आएगी। कुआं गहरा है, वहां कोई जाता नहीं।”
काशिफ कोने में बैठकर सिर पकड़कर रोने लगा – “बहन थी, वहां अकेली तड़प रही होगी।”
शबाना – “अब आंसू बहाने का क्या फायदा। जो किया, बच्चों के लिए किया। अब देखना, कैसे दिन फिरते हैं।”
अगली सुबह गांव में झूठ फैला दिया – “ज़ैनब जंगल में रास्ता भटक गई, शायद किसी जानवर का शिकार हो गई।” गांव वाले अफसोस करके रह गए, किसी को शक नहीं हुआ।
6. अल्लाह का करम
कुएं में ज़ैनब की सांसे चल रही थीं। रात भर रोती रही, चीखती रही, कोई सुनने वाला नहीं था। भूख-प्यास से हलक सूख गया, शरीर में दर्द, दिल का दर्द उससे ज्यादा। उसे यकीन नहीं हो रहा था – जिन भाइयों के लिए दुआ की, वही जान के दुश्मन बन गए।
जब उम्मीद टूटने लगी, आसमान की तरफ चेहरा उठाया – “या अल्लाह, मेरे भाई छोड़ गए, मगर तू तो नहीं छोड़ेगा ना। अगर मेरी जिंदगी बाकी है, तो मदद कर।”
कहते हैं, जब दुनिया छोड़ देती है, अल्लाह का सहारा आता है।
उसी जंगल में रहीम चाचा नाम के बूढ़े लकड़हारे रहते थे। रोज सूखी लकड़ियां चुनने जंगल आते थे। उस दिन रास्ता भटककर काली घाटी की तरफ निकल आए। कुएं के पास से किसी के रोने की आवाज सुनी। पहले तो डर गए – “कहीं चुड़ैल तो नहीं?” मगर आवाज में दर्द महसूस हुआ – “अल्लाह, कोई मुझे बचाओ।”
रहीम चाचा की हिम्मत बंधी। धीरे-धीरे कुएं के पास गए, झांककर देखा – अंधेरे में एक लड़की। “बेटी, कौन हो, कैसे गिरी?”
ज़ैनब – “बाबा, मैं ज़ैनब हूं। देख नहीं सकती, गिर गई हूं। बचा लो बाबा।”
रहीम चाचा नेक दिल थे। रस्सी डाली, बड़ी मुश्किल से ज़ैनब को बाहर निकाला। उसकी हालत देखकर आंखों में आंसू आ गए। “बेटी, यहां कैसे पहुंची? साथ कोई था?”
ज़ैनब चुप हो गई। सच बता सकती थी – भाइयों ने धक्का दिया। मगर बहन का दिल भाई का गुनाह छुपा गया – “रास्ता भटक गई थी, पैर फिसल गया।”
रहीम चाचा उसे अपने घर ले गए। बूढ़ी पत्नी ने बेटी बना लिया। ज़ैनब ने सोच लिया – अब कभी भाइयों के पास नहीं जाएगी। किस्मत अल्लाह पर छोड़ दी, रहीम चाचा की सेवा में लग गई।
7. भाइयों के घर में दौलत
काशिफ और आसिफ के घर में सचमुच जादू हो गया। ज़ैनब को कुएं में फेंकने के कुछ दिनों बाद खेत में खुदाई करते वक्त सोने के सिक्कों की हांडी मिली। कारोबार चल पड़ा। दौलत आते ही तेवर बदल गए – पक्का मकान, अच्छे कपड़े, गांव वालों को हिकारत से देखना। कहते – “मनहूस अंधी के जाते ही लक्ष्मी आ गई। वही रुकावट थी।”
शबाना और रुसाना रानियों की तरह रहने लगीं। फिर खुशखबरी आई – दोनों गर्भवती हो गईं। घर में खुशियों के ढोल बजने लगे।
आसिफ – “देख भाई, बाबा ने सच कहा था। अंधी को हटाते ही वारिस आने की खबर आ गई।”
काशिफ – “सही कह रहा है तू। दिल पर पत्थर ना रखते, तो आज भी गरीबी में सड़ रहे होते।”
महीने गुजरते गए, पेट बढ़ता गया, घमंड भी। डिलीवरी का दिन आया। दाइयां आईं। काशिफ, आसिफ बाहर मिठाइयां लेकर तैयार – कब बच्चे की आवाज आए, जश्न मनाएं।
8. औलाद का अज़ाब
अंदर से चीखने की आवाजें आ रही थीं। काफी देर बाद बच्चे के रोने की आवाज आई – मगर सामान्य नहीं, जानवर के रंभाने जैसी। दाई कांपती हुई बाहर भागी – “अरे ओ बदनसीबों, अंदर जाकर देखो, क्या पैदा किया है? औलाद नहीं, खुदा का कहर है।”
दोनों भाइयों के पैरों तले जमीन खिसक गई। मिठाई के डिब्बे गिर गए। दौड़कर अंदर गए। दोनों भाबियां बिस्तर पर कांप रही थीं, अपने ही बच्चों से डर रही थीं।
काशिफ ने हिम्मत करके शबाना की गोद में रखा बच्चा देखा – कपड़े में लिपटा। जैसे ही चेहरे से कपड़ा हटाया, चीख निकल गई। बच्चे का चेहरा इंसान जैसा, मगर आंखें नहीं थीं – सपाट चमड़ी, पलकें भी नहीं, बस खाली मांस। बच्चा अंधेरे में हाथ-पैर मार रहा था, रो रहा था।
काशिफ को तुरंत बहन ज़ैनब याद आ गई – उसकी आंखें थी, मगर रोशनी नहीं थी। अब उसके घर में ऐसा बेटा आया, जिसकी आंखें ही नहीं बनी थीं।
दूसरी तरफ आसिफ की चीख – रुखसाना का बेटा रो नहीं रहा था, अजीब सी गुर्राने की आवाजें निकाल रहा था। चेहरा जानवर जैसा – कान बकरी की तरह लंबे, जबड़ा बाहर, मुंह में नुकीले दांत, लाल-लाल आंखें।
आसिफ – “यह मेरा बच्चा नहीं हो सकता। कोई जानवर है, हटाओ इसे।”
रुसाना रोते हुए – “दूध कैसे पिलाऊं? काट खाएगा।”
घर में मातम छा गया। दाइयां तौबा-तौबा कर रही थीं। बूढ़ी औरत – “जरूर कोई बड़ा गुनाह किया है। यह औलाद नहीं, खुदा का अज़ाब है।”
काशिफ और आसिफ एक-दूसरे को देख रहे थे – जुबान बंद, दिल चीख-चीखकर कह रहा था – “यह ज़ैनब की बद्दुआ है।”
शाम होते-होते खबर पूरे गांव में फैल गई। लोग देखने के लिए भीड़ लगाने लगे – किसी ने कहा चुड़ैल का साया, किसी ने हराम की कमाई। अल्लाह ने मुंह काला कर दिया।
काशिफ अपने बिना आंखों वाले बेटे को देख रहा था – भूख से बिलख रहा था। याद आया, कैसे बहन को कुएं में भूखा-प्यासा छोड़ दिया था। आज उसका बेटा अंधेरे में था।
आसिफ अपने जानवर जैसे बेटे से नफरत कर रहा था – “जंगल में फेंक आओ, नहीं पालूंगा।”
9. तौबा और माफी
गांव के इमाम साहब आए – बच्चों को देखा, गहरी सांस ली। दोनों भाइयों से पूछा – “सच-सच बताओ, किसी मासूम का दिल दुखाया है? किसी का हक मारा है? अल्लाह बेवजह ऐसी निशानियां नहीं भेजता।”
काशिफ का जज्बात काबू से बाहर – “हां, इमाम साहब, हमसे गुनाह हुआ है। बहुत बड़ा गुनाह।”
आसिफ ने कोहनी मारी – “कोई गुनाह नहीं किया। बाबा ने फंसाया।”
गुस्से में जंगल की तरफ भागा, बाबा की तलाश में। गुफा के पास पहुंचे – कोई नहीं था, बस राख का ढेर। पत्थर पर लिखा – “दौलत मिल गई, अब सजा भुगतो। खून के रिश्तों को मिट्टी में मिलाते हैं, उनकी नस्लें मिट्टी हो जाती हैं।”
दोनों भाई समझ गए – बाबा इंसान नहीं, शैतान का रूप था।
रात हो चुकी थी। घर लौटे, बच्चों के रोने की डरावनी आवाजें – जैसे बद्दुआ दे रहे हों।
काशिफ – “भाई, यह सब ज़ैनब की वजह से है। हमने उसे जिंदा मार दिया। अगर अज़ाब से बचना है, तो कुएं जाना होगा। शायद उसकी लाश मिले, इज्जत से दफना सकें, अल्लाह से माफी मांग सकें।”
आसिफ – “ठीक है, कल सुबह कुएं पर जाएंगे।”
10. कुएं पर माफी की तलाश
सुबह दोनों भाई कफ़न और फावड़ा लेकर घर से निकले। शबाना और रुसाना दरवाजे पर रो रही थीं – अब दौलत नहीं, ज़ैनब की याद आ रही थी।
काली घाटी पहुंचे, वही पुराना कुआं। आसिफ ने हिम्मत जुटाई, कुएं के पास गया – बदबू, मक्खियां सोच रहा था। मगर कुएं से गीली मिट्टी और फूलों की खुशबू आ रही थी।
“भाई, देखो!”
कुआं खाली था – ना ज़ैनब, ना लाश, ना खून। सिर्फ रंग-बिरंगे फूल।
“यह कैसे हो सकता है? हमने यहीं फेंका था। कहां गई?”
पागलों की तरह झाड़ियों में ढूंढने लगे।
तभी हवा के झोंके में सुरीली, रूहानी आवाज – कुरान की आयतें पढ़ रही थी।
“भाई, सुना? यह तो ज़ैनब जैसी आवाज है। मगर वो तो मर चुकी होगी।”
आवाज थोड़ी दूर बनी झोपड़ी से आ रही थी। दोनों भाई मंत्रमुग्ध होकर आवाज की तरफ खींचे चले गए। उम्मीद की किरण जाग उठी।
झोपड़ी के बाहर चबूतरे पर रहीम चाचा और पत्नी बैठे थे, सामने सफेद कपड़ों में लड़की – चेहरा नूर से चमकता, आंखें बंद, सुकून भरा चेहरा, अल्लाह का कलाम पढ़ रही थी। वो ज़ैनब थी।
काशिफ, आसिफ को यकीन नहीं हुआ – जिंदा, खुशहाल, नूरानी। गरीबी, लाचारी नहीं थी।
दूसरी तरफ दोनों भाई – करोड़पति, मगर चेहरे काले, आंखें धंसी, दिल बेचैन।
ज़ैनब ने आयत पढ़ना बंद किया, हवा में सूंघा – “मुझे भाइयों की खुशबू आ रही है।”
काशिफ के हाथ से फावड़ा गिर गया।
रहीम चाचा गुस्से से – “तुम भाई नहीं, कसाई हो। अल्लाह की लाठी पड़ी, तो बहन याद आ गई। चले जाओ वरना कुत्तों से नुचवा दूंगा।”
ज़ैनब ने हाथ उठाया – “रुक जाइए चाचा।”
नीचे झुकी, भाइयों के सिर छुए – कोई नफरत नहीं, बस दया।
“भाई, जिस दिन आपने कुएं में धक्का दिया, बहुत दुख हुआ, मगर उसी वक्त माफ कर दिया। जानते हो क्यों – आप मेरा खून हो। बहन नाराज हो सकती है, मगर नफरत नहीं।”
दोनों भाई जमीन पर गिर पड़े – दौलत, घमंड, लालच सब धूल बन गया।
“ज़ैनब, हम पापी, कातिल। सिक्कों के लिए तेरा सौदा किया। लगा बोझ है, मगर तू बरकत थी। अल्लाह ने कैसी सजा दी – औलाद अज़ाब है।”
“बहन, माफ कर दे। तौबा कबूल कर ले। बच्चों को बचा ले।”
11. माफी और चमत्कार
ज़ैनब – “रोने से गुनाह नहीं धुलते, तौबा से धुलते हैं। चलो घर ले चलो, भतीजों से मिलना है।”
इज्जत से सहारा देकर घर लाए। शबाना, रुसाना डरावने बच्चों को देखकर रो रही थीं, ज़ैनब को देखकर पैरों में गिर पड़ीं – “माफ कर दो ननद साहिबा। अक्ल पर पत्थर पड़ गए थे।”
ज़ैनब ने मुस्कुराकर उठाया – “भाभी, जो हुआ भूल जाओ। बच्चे कहां हैं, गोद में दो।”
काशिफ डरते-डरते बेटे को लाया – आंखें नहीं थी। आसिफ जानवर जैसे बेटे को लाया।
ज़ैनब ने काशिफ के बेटे को गोद में लिया, सपाट चेहरे को छुआ, आंखों से आंसू टपके, दुआ मांगी –
“या अल्लाह, भाइयों ने गलती की, मगर बच्चे बेकसूर हैं। मेरी नेकियां इन बच्चों को दे दे, तौबा कबूल कर, आंगन खुशियों से भर दे। तू कुदरत वाला है, मिट्टी को सोना बना दे।”
दुआ खत्म भी नहीं हुई थी कि कमरे में ठंडी, खुशबूदार हवा चली। जैसे फरिश्ते उतर आए हों।
अचानक काशिफ का बेटा जोर से रोया, बंद चमड़ी पर हलचल, पलकें बनीं, खूबसूरत काली आंखें खोल दीं।
“मेरा बेटा देख सकता है!”
शबाना खुशी से चीख पड़ी।
आसिफ के बेटे का चेहरा बदलने लगा – नुकीले दांत गायब, कान सामान्य, प्यारा बच्चा बन गया।
चमत्कार देखकर काशिफ, आसिफ सजदे में गिर गए – “तेरा शुक्र है मालिक।”
पूरा घर “अल्लाहहु अकबर” की आवाज से गूंज उठा।
12. सबक और नई जिंदगी
उस दिन के बाद काशिफ, आसिफ बदल गए। हराम की कमाई, लालच छोड़ दिया। मेहनत-मजदूरी करने लगे, घर में सुकून था। ज़ैनब घर की रानी थी, दोनों भाई-भाभियां उसकी सेवा में लगे रहते।
गांव वालों ने भी सबक सीखा – ढोंगी बाबा की राख पर थूका, समझ गए जादू-टोना झूठ है। असली ताकत दुआ और ईमान में है।
ज़ैनब ने घर को जन्नत बना दिया। बच्चों को कहानियां सुनाती – “लालच आग है, अपनों को जला देती है। माफी पानी है, जली चीज को हरा कर देती है। कभी किसी को कम मत समझना, अल्लाह जिसे चाहता है, इज्जत देता है।”
उपसंहार
इस कहानी से सीख मिलती है – दौलत के लिए खून के रिश्तों को धोखा मत देना। पाप का बदला इसी दुनिया में मिलता है, पुण्य कभी बेकार नहीं जाता। बहनें घर की रहमत होती हैं, उनकी कद्र करो।
अगर आपको ज़ैनब की यह कहानी पसंद आई हो, तो दोस्तों के साथ जरूर शेयर करें। सच्चाई के रास्ते पर चलें।
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