ऑटो में उदास बैठी महिला को कोतवाली ने ₹500 दिए, और फिर… | उत्तर प्रदेश संभल शेखर केस की कहानी
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ऑटो में उदास बैठी महिला कोतवाली ने ₹500 दिए और फिर…
प्रस्तावना
उत्तर प्रदेश के संभल जिले की एक सर्द सुबह। बाजार में हलचल थी, लोग अपने-अपने काम में व्यस्त थे। ऑटो रिक्शा स्टैंड पर कपिल अपने ऑटो में सवारियों का इंतजार कर रहा था। कपिल के जीवन में खुशियाँ बहुत कम थीं। माँ के गुजर जाने के बाद वह अकेला पड़ गया था, लेकिन मेहनत से जीने की जिद उसमें बाकी थी। उसी दिन उसकी मुलाकात एक ऐसी महिला से हुई, जिसकी कहानी ने उसके जीवन की दिशा ही बदल दी।
अध्याय 1: ऑटो में बैठी उदासी
कपिल ने ऑटो भरा और सवारियों को उनकी मंजिल तक पहुँचाया। सभी ने अपना किराया दिया और उतर गए, लेकिन एक महिला अपनी गोद में एक साल की बच्ची लिए ऑटो में बैठी रह गई। कपिल ने कहा, “माँजी, आप भी उतरिए और किराया दीजिए।”
महिला थोड़ी मायूस होकर बोली, “मेरे पास सिर्फ ₹8 हैं, किराया ₹50 है।” कपिल हैरान था, लेकिन उसके स्वर में कोई गुस्सा नहीं था। उसने पूछा, “ऐसा क्या हुआ? आपके पास पैसे क्यों नहीं हैं?”
महिला ने अपनी पूरी कहानी सुनाई—उसका नाम सुमन था, पति जेल में था, ससुराल वाले ताने देते थे, और अब मायके जा रही थी, लेकिन जेब में पैसे नहीं थे। कपिल ने चुपचाप अपने पास से ₹500 निकालकर उसे दे दिए। “यह लीजिए, आगे की यात्रा के लिए और घर में भी कुछ ले जाइए। अगर और जरूरत हो तो मुझे बता देना।”
सुमन की आँखों में आंसू थे, लेकिन अब उनमें उम्मीद की चमक थी। उसने कपिल का नंबर लिया और शुक्रिया कहा।

अध्याय 2: सुमन की कहानी
सुमन संभल के एक गाँव की रहने वाली थी। उसकी शादी हाथरस के शेखर से हुई थी। शेखर पढ़ाई-लिखाई में कमजोर था, माता-पिता की बात नहीं मानता था। घरवालों ने सोचा, शादी के बाद सुधर जाएगा। शादी के बाद सुमन ससुराल आ गई, लेकिन शेखर ने मजदूरी शुरू कर दी। घर की हालत ठीक नहीं थी, लेकिन सुमन ने सब सह लिया।
कुछ समय बाद सुमन गर्भवती हुई। शेखर ने सोचा, मजदूरी से घर नहीं चलेगा; उसने गलत रास्ता चुन लिया—चोरी करने लगा। एक दिन चोरी करते पकड़ा गया, पुलिस ने जेल भेज दिया। सुमन अकेली रह गई, ससुराल में ताने मिलते, खर्चा बढ़ गया, और बच्ची के जन्म के बाद हालात और बिगड़ गए।
अध्याय 3: मायके की ओर सफर
सुमन ने फैसला किया कि अब मायके चली जाएगी। जेब में पैसे नहीं थे, लेकिन बच्ची को लेकर ऑटो में बैठ गई। कपिल ने उसकी मदद की। सुमन मायके पहुंची, घरवालों ने सहारा दिया। “कोई बात नहीं बेटी, यहीं रहो।” सुमन ने कपिल को पैसे लौटाने की सोची। सात-आठ दिन बाद वह बाजार गई, वहाँ कपिल मिला। सुमन ने पैसे लौटाने चाहे, लेकिन कपिल ने मना कर दिया। “अगर कभी जरूरत हो, तो मुझे बता देना।”
उस शाम सुमन ने कपिल को फोन किया। दोनों में बातें शुरू हुईं, धीरे-धीरे दोस्ती गहरी होती गई। दोनों अकेले थे, दर्द साझा किया। बातों-बातों में प्यार हो गया। सुमन ने मायके में सबको बताया, “कपिल मुझे अच्छा रखता है, मैं उसके साथ रहना चाहती हूँ।” घरवालों ने हामी भर दी।
अध्याय 4: नया रिश्ता, पुरानी परछाईं
सुमन कपिल के साथ रहने लगी। कपिल ने सुमन और उसकी बच्ची को अपनाया। दोनों की जिंदगी सामान्य हो गई। लेकिन शेखर की सजा पूरी हो गई, वह जेल से बाहर आया। घरवालों ने बताया, “तेरी पत्नी मायके चली गई है।” शेखर मायके गया, सुमन को वापस लाने की जिद की। सुमन ने कहा, “मैं कपिल के साथ खुश हूँ, तुम्हारे साथ नहीं जाना चाहती।”
शेखर ने धमकी दी, “अगर तुम नहीं आईं, तो मैं खुदकुशी कर लूंगा।” घरवालों ने दबाव बनाया, सुमन वापिस आ गई। लेकिन शेखर ने फिर शराब, नशा, और मारपीट शुरू कर दी। सुमन टूट गई। एक दिन वह फिर मायके चली गई और साफ कह दिया—अब वापस नहीं आऊँगी।
अध्याय 5: अपराध की रात
कुछ समय बाद संभल के एक सुनसान इलाके में एक लाश मिली। पुलिस ने पहचान के लिए फोटो सोशल मीडिया पर डाला। सुमन के भाई ने पहचान लिया—यह शेखर था। पुलिस ने जांच शुरू की। सुमन, कपिल, और सुमन के भाई को हिरासत में लिया गया। पूछताछ में सुमन ने सब सच बता दिया—शेखर की मारपीट से तंग आकर उन्होंने एक प्लान बनाया। कपिल और सुमन का भाई शेखर को ऑटो में बैठाकर सुनसान जगह ले गए, शराब पिलाई, और फिर उसे मार दिया।
पुलिस ने तीनों को गिरफ्तार कर लिया। अदालत में मुकदमा चला। सुमन, कपिल, और भाई को सजा मिली। शेखर की जिंदगी खत्म हो गई, लेकिन सबसे बड़ा सवाल उस मासूम बच्ची का था—जिसे अब न माँ मिली, न पिता।
अध्याय 6: समाज का आईना
इस घटना ने पूरे इलाके को हिला दिया। लोग कहने लगे—अगर कपिल ने सुमन को ₹500 न दिए होते, तो शायद यह सब न होता। लेकिन क्या सच इतना सीधा था? क्या गरीबी, मजबूरी, और रिश्तों की दरारें ही ऐसी घटनाओं की वजह होती हैं? या समाज की संवेदनहीनता, सिस्टम की कमजोरी, और इंसानियत की कमी?
कपिल ने मदद की थी, उसका इरादा नेक था। लेकिन हालात ने सब उल्टा कर दिया। सुमन ने प्यार, सहारा और सम्मान चाहा, लेकिन जिंदगी ने उसे अपराध की राह पर धकेल दिया। शेखर ने गलत रास्ता चुना, उसकी सजा मिली। लेकिन सबसे बड़ा नुकसान उस बच्ची को हुआ, जिसे किसी की गलती की सजा मिली।
अध्याय 7: सीख
इस कहानी से यही सबक मिलता है—गरीबी, मजबूरी और रिश्तों की उलझनें इंसान को कहीं भी ले जा सकती हैं। मदद करना अच्छा है, लेकिन हालात को समझना और सही रास्ता चुनना उससे भी जरूरी है। हर इंसान की जिंदगी में तकलीफें आती हैं, लेकिन उनसे लड़ना, सही फैसला लेना, और दूसरों की भलाई सोचकर आगे बढ़ना सबसे बड़ा धर्म है।
समाज को चाहिए कि ऐसे मामलों में संवेदनशीलता, सहानुभूति और इंसानियत को प्राथमिकता दे। कानून अपना काम करेगा, लेकिन समाज को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए, ताकि कोई बच्चा बिना माँ-बाप के न रहे, कोई महिला मजबूरी में अपराध की राह न चुने, और कोई कपिल अपनी नेकदिली के लिए दोषी न ठहराया जाए।
समापन
यह कहानी सिर्फ एक अपराध की नहीं, बल्कि समाज की सच्चाई, रिश्तों की उलझन, और इंसानियत की परीक्षा है। अगर आपको यह कहानी पसंद आई हो, तो इसे जरूर साझा करें, ताकि हर कोई समझ सके—मदद कीजिए, लेकिन समझदारी से। और कभी किसी मजबूर को अकेला न छोड़िए।
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