Punjabi family stopped at Delhi airport… What the children said — police surprised! 

 

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Delhi Airport पर रोकी गई पंजाबी फैमिली — बच्चों ने जो कहा, उसने पुलिस को चौंका दिया

दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की रात हमेशा की तरह बेचैन थी।
घड़ी रात के लगभग 2 बजा रही थी, लेकिन टर्मिनल–3 में नींद का नामोनिशान नहीं था।
नीली–सफेद रोशनी, ट्रॉली की आवाज़ें, दूर से आती उड़ानों की घोषणाएँ और सुरक्षा बलों की तेज़ नज़रें—सब कुछ अपनी तयशुदा लय में चल रहा था।

इसी भीड़ और भागदौड़ के बीच, एक पंजाबी परिवार चुपचाप इमिग्रेशन लाइन में खड़ा था।

पिता, हरजीत सिंह, करीब 40 साल के, साधारण से कपड़े, थका हुआ चेहरा।
माँ, सिमरन कौर, सिर पर हल्का दुपट्टा, आँखों में चिंता।
और उनके दो बच्चे—
10 साल की मीरा और 7 साल का अर्जुन

बाहर से देखने पर वे बिल्कुल आम परिवार लग रहे थे।
लेकिन कुछ ही मिनटों में, यही परिवार पूरे टर्मिनल का ध्यान खींचने वाला था।

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❖ “Excuse me… please step aside”

इमिग्रेशन अधिकारी ने हरजीत का पासपोर्ट पलटते हुए अचानक भौंहें चढ़ाईं।
कंप्यूटर स्क्रीन पर कुछ सेकंड तक देखता रहा, फिर बिना सिर उठाए बोला—

“Sir, please step aside.”

हरजीत के हाथ हल्के से काँप गए।
सिमरन ने तुरंत बच्चों को अपने पास खींच लिया।

“Is there any problem?” हरजीत ने धीमी आवाज़ में पूछा।

अधिकारी ने जवाब नहीं दिया।
बस एक इशारा किया।

कुछ ही पलों में दो CISF जवान पास आ गए।
परिवार को इमिग्रेशन काउंटर से हटाकर एक अलग कमरे की ओर ले जाया गया।

आस–पास खड़े लोग फुसफुसाने लगे।
किसी ने कहा—“Illegal travel case होगा।”
किसी ने कहा—“Human trafficking?”

लेकिन सच्चाई इन अफवाहों से कहीं ज़्यादा अजीब और गहरी थी।


❖ पूछताछ का कमरा

कमरे की दीवारें सफेद थीं।
एक मेज, चार कुर्सियाँ और कोने में लगा कैमरा।

हरजीत और सिमरन को आमने–सामने बिठाया गया।
बच्चों को अलग कुर्सियों पर।

दिल्ली पुलिस का एक इंस्पेक्टर अंदर आया—
नाम था इंस्पेक्टर राघव वर्मा

अनुभवी, शांत, लेकिन आँखें हर छोटी बात पकड़ लेने वाली।

“Mr. Harjeet Singh,” उसने फाइल खोलते हुए कहा,
“आप पहली बार विदेश जा रहे हैं?”

हरजीत ने सिर हिलाया।
“हाँ… Canada.”

“काम के लिए?”

हरजीत रुका।
“परिवार के साथ… settle होने।”

इंस्पेक्टर ने पासपोर्ट, वीज़ा, टिकट सब ध्यान से देखा।
काग़ज़ों में कोई सीधी गड़बड़ी नहीं थी।

लेकिन फिर उसने वह सवाल पूछा, जिसने कमरे का माहौल बदल दिया—

“आप बच्चों के biological father हैं?”

सिमरन ने झट से जवाब दिया—
“हाँ, बिल्कुल।”

इंस्पेक्टर ने बच्चों की ओर देखा।
“बच्चों से भी पूछ लेते हैं।”


❖ बच्चों से सवाल

मीरा और अर्जुन पहली बार इतने बड़े कमरे और वर्दी वालों के बीच थे।
अर्जुन सिमरन का दुपट्टा पकड़े हुए था।

इंस्पेक्टर ने नरमी से पूछा—
“Beta, तुम्हारा नाम क्या है?”

“मीरा,” लड़की ने कहा।

“और ये?”
“मेरा भाई अर्जुन।”

“ये आपके पापा हैं?”

मीरा ने एक सेकंड के लिए हरजीत को देखा।
फिर कहा—

“नहीं।”

कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।

सिमरन चौंक गई।
“मीरा! क्या बोल रही है तू?”

इंस्पेक्टर ने हाथ उठाकर सिमरन को रोका।
“Let her speak.”

अर्जुन ने भी सिर हिलाया।
“ये हमारे पापा नहीं हैं।”

हरजीत का चेहरा सफेद पड़ गया।
“बेटा, ये क्या कह रहे हो?”

इंस्पेक्टर की आँखें तेज़ हो गईं।

“तो फिर कौन हैं ये?” उसने पूछा।

मीरा ने धीरे–धीरे कहा—

“ये अंकल हैं। हमें यहाँ छोड़ने वाले।”


❖ पुलिस हैरान

यह अब साधारण इमिग्रेशन मामला नहीं था।
संभावित child trafficking का मामला बन चुका था।

इंस्पेक्टर राघव ने तुरंत वरिष्ठ अधिकारियों को सूचना दी।
बच्चों को चाइल्ड प्रोटेक्शन ऑफिसर के पास ले जाने की तैयारी होने लगी।

लेकिन फिर मीरा ने जो कहा, उसने पूरी कहानी को उलट दिया।


❖ “We asked him to take us”

इंस्पेक्टर ने मीरा से पूछा—
“तुम्हें पता है तुम क्या कह रही हो?”

मीरा ने सिर हिलाया।
“हाँ। हमें सब पता है।”

“तो फिर सच बताओ। ये लोग कौन हैं?”

मीरा ने गहरी साँस ली।

“हम orphanage में रहते थे। पंजाब में।
हमने खुद उनसे कहा था कि हमें यहाँ से ले चलें।”

कमरे में बैठे सभी लोग एक–दूसरे को देखने लगे।

“तुमने… खुद कहा?” इंस्पेक्टर ने दोहराया।

अर्जुन ने बीच में कहा—
“हाँ। हमें वहाँ नहीं रहना था।”


❖ orphanage की कहानी

मीरा की आवाज़ स्थिर थी, जैसे वह यह कहानी कई बार अपने मन में दोहरा चुकी हो।

“हम पाँच साल से orphanage में थे।
वहाँ खाना मिलता था, स्कूल भी…
लेकिन हर साल कोई न कोई बच्चा चला जाता था।”

“कहाँ?” इंस्पेक्टर ने पूछा।

“कभी adoption… कभी बस… गायब।”

सिमरन और हरजीत चुप बैठे थे।
उनकी आँखों में आँसू थे, लेकिन वे कुछ बोल नहीं रहे थे।

मीरा ने आगे कहा—

“एक दिन हमनें सुना कि एक दीदी रो रही थीं।
उनकी छोटी बहन को किसी ने नहीं अपनाया।
उस रात वो बच्ची नहीं मिली।”

कमरे का तापमान जैसे गिर गया।


❖ हरजीत और सिमरन की सच्चाई

अब इंस्पेक्टर ने हरजीत की ओर देखा।

“अब आप बोलिए।”

हरजीत ने सिर झुका लिया।

“साहब… हम उनके असली माता–पिता नहीं हैं।
लेकिन हम तस्कर भी नहीं हैं।”

सिमरन ने रोते हुए कहा—

“हमारा बच्चा 8 साल पहले मर गया था।
उसके बाद डॉक्टरों ने कहा… मैं माँ नहीं बन सकती।”

हरजीत ने बात आगे बढ़ाई—

“हम orphanage में volunteer काम करते थे।
वहीं मीरा और अर्जुन से मिले।”

“एक दिन ये बच्चे हमारे पास आए।
खुद।”

मीरा ने सिर हिलाया।

“हमने कहा—
‘Uncle, हमें यहाँ से ले चलो।
हम अच्छे बच्चे हैं।’”


❖ कानूनी पेंच

इंस्पेक्टर राघव अब असमंजस में था।
कानून के अनुसार, यह illegal adoption था।
लेकिन नैतिक रूप से?

“तो आपने फर्जी काग़ज़ बनाए?”
हरजीत ने धीरे से कहा—

“हाँ।”

कमरे में यह स्वीकारोक्ति भारी पड़ गई।

“क्यों?”
“क्योंकि सिस्टम सालों से हमें चक्कर लगवा रहा था।
और बच्चे… हर दिन डर में जी रहे थे।”


❖ वह सवाल जिसने सब बदल दिया

इंस्पेक्टर ने बच्चों की ओर देखा।

“अगर हम तुम्हें वापस orphanage भेज दें…?”

मीरा ने तुरंत कहा—

“नहीं।”

अर्जुन की आँखें भर आईं।

“वहाँ रात को दरवाज़े बंद हो जाते हैं।
और कोई आता है… हम उसका नाम नहीं जानते।”

कमरे में मौजूद हर अधिकारी समझ गया—
यह मामला सिर्फ इमिग्रेशन का नहीं था।
यह एक बड़े, गहरे अपराध की ओर इशारा कर रहा था।


❖ जाँच का विस्तार

अगले 48 घंटों में—

orphanage पर छापा पड़ा

बच्चों के बयान दर्ज हुए

कई रिकॉर्ड गायब पाए गए

दो कर्मचारी हिरासत में लिए गए

एक child trafficking network का पर्दाफाश हुआ।

और यह सब शुरू हुआ…
दिल्ली एयरपोर्ट पर दो बच्चों के एक वाक्य से।


❖ अंत नहीं, शुरुआत

हरजीत और सिमरन को गिरफ़्तार नहीं किया गया।
उन पर केस चला, लेकिन कोर्ट ने मानवीय आधार पर ज़मानत दी।

मीरा और अर्जुन को अस्थायी रूप से चाइल्ड केयर में रखा गया—
लेकिन उनकी मुलाक़ात हरजीत–सिमरन से बंद नहीं हुई।

कुछ महीनों बाद, लंबी कानूनी लड़ाई के बाद—

दोनों बच्चों को आधिकारिक रूप से adopt करने की अनुमति मिल गई।

एयरपोर्ट पर रोका गया वह पंजाबी परिवार…
आज एक पूरा परिवार है।


❖ आख़िरी सवाल

अगर उस रात मीरा सच न बोलती…
अगर पुलिस सिर्फ काग़ज़ देखकर फैसला कर लेती…

तो कितने बच्चे आज भी गायब रहते?

कभी–कभी सच सबसे छोटे मुँह से निकलता है—
और सबसे बड़ी साज़िश को उजागर कर देता है।

आप क्या करते, अगर आप उस अधिकारी की जगह होते?
कानून या इंसानियत?

यही सवाल इस कहानी को सिर्फ कहानी नहीं,
एक आईना बना देता है।