डॉक्टर बोले अब नहीं बचेंगे सबसे बड़े नेता… तभी रिक्शावाले ने जो किया, पूरा देश हिल गया

.
.
.

डॉक्टर बोले अब नहीं बचेंगे प्रधानमंत्री… तभी रिक्शावाले ने जो किया, पूरा देश हिल गया

प्रस्तावना

दिल्ली की सर्द सुबह थी। सूरज की पहली किरणें राजपथ पर बिखर रही थीं, लेकिन आज कोई चहल-पहल नहीं थी। राजधानी के दिल में सन्नाटा था — वो सन्नाटा जो अक्सर किसी बड़े तूफान से पहले आता है। इसी सन्नाटे में एक पुराना सा ई-रिक्शा धीरे-धीरे सड़क के किनारे सरक रहा था। उसकी बैटरी पुरानी थी, पहियों से हल्की चरमराहट निकल रही थी, लेकिन उसे चलाने वाला लड़का पूरे भरोसे के साथ हैंडल थामे हुए था।

उसका नाम था आर्यन। उम्र मुश्किल से 21 साल। चेहरे पर हल्की दाढ़ी, आंखों के नीचे काले घेरे — जैसे कई रातों की नींद उधार ली हो। बदन पर साधारण शर्ट, पैंट के घुटनों पर सिलाई, पैरों में घिसी हुई चप्पल। लोग उसे देखते और कहते — “ओए रिक्शा वाले, जल्दी चल!” कोई उसका नाम नहीं पूछता था, क्योंकि दिल्ली में नाम सिर्फ उन्हीं के पूछे जाते हैं जिनकी हैसियत होती है।

संघर्ष की शुरुआत

आर्यन हर सुबह 5 बजे उठता। सबसे पहले मां की दवाइयों का डिब्बा देखता — कौन सी गोली खत्म होने वाली है। फिर चुपचाप घर से निकल जाता, ताकि मां की नींद ना टूटे। रिक्शा चलाना उसकी मजबूरी थी, लेकिन सपना उसकी जिद थी। दिन में वह दिल्ली की वीआईपी सड़कों पर रिक्शा चलाता, रात में वही लड़का सरकारी मेडिकल कॉलेज की लाइब्रेरी में बैठा मिलता — एक हाथ में पेन, दूसरे में मोटी-मोटी मेडिकल की किताबें। वह फाइनल ईयर का स्टूडेंट था।

कॉलेज में उसे सब जानते थे। टीचर्स कहते थे — “यह लड़का अगर हालात से ना हारा तो बहुत आगे जाएगा।” लेकिन हालात रोज उसे याद दिलाते थे कि वह कहां से आया है। जब वह कॉलेज से लौटकर रिक्शा स्टैंड पर खड़ा होता, दूसरे रिक्शा वाले हंसते — “डॉक्टर बनेगा तू? पहले बैटरी बदलवा!” आर्यन मुस्कुरा देता। उसकी मुस्कान जवाब नहीं थी, भरोसा थी।

उसे याद था पिता का चेहरा — जो एक दिन अचानक चले गए थे। पीछे छोड़ गए थे मां, कुछ कर्ज और एक अधूरा सपना — “मेरा बेटा डॉक्टर बने।”

सपनों का अस्पताल

उस सुबह भी आर्यन रिक्शा लेकर उसी बड़े अस्पताल के बाहर खड़ा था, जो देश के सबसे सुरक्षित और महंगे अस्पतालों में गिना जाता था। कांच की ऊंची इमारत, बाहर खड़े गार्ड, अंदर चमचमाते फर्श। आर्यन के लिए वह अस्पताल सिर्फ एक इमारत नहीं था — वह उसके सपनों का आईना था। कई बार वह रिक्शा रोक कर ऊपर देखता और खुद से कहता — “एक दिन इसी गेट से अंदर जाऊंगा, रिक्शा लेकर नहीं, डॉक्टर बनकर।”

तूफान की आहट

दोपहर के करीब 12:30 बजे थे। धूप तेज हो चुकी थी। दिल्ली की सड़कें हमेशा की तरह शोर से भरी थीं। तभी अचानक माहौल बदल गया। दूर से सायरन की आवाज आई — लेकिन यह आम एंबुलेंस का सायरन नहीं था। यह आवाज भारी थी, लंबी थी, डराने वाली थी।

आर्यन ने गर्दन घुमा कर देखा — काली गाड़ियों का काफिला, एक नहीं, दो नहीं, दर्जनों गाड़ियां। आगे-पीछे सुरक्षाकर्मी, हथियार, वायरलेस, भागदौड़। पूरी सड़क कुछ सेकंड में सील कर दी गई। लोग घबराकर इधर-उधर हटने लगे। आर्यन का दिल अचानक तेज धड़कने लगा। उसने पहले भी वीआईपी मूवमेंट देखा था, लेकिन आज कुछ अलग था।

गाड़ियों की रफ्तार में घबराहट थी। सिक्योरिटी के चेहरों पर तनाव था। एक काली एंबुलेंस अस्पताल के गेट के सामने आकर रुकी। उसके दरवाजे खुले और तभी किसी ने फुसफुसाकर कहा — “प्रधानमंत्री!” आर्यन का दिल जैसे एक पल को रुक गया।

प्रधानमंत्री — देश का सबसे सुरक्षित आदमी। यहां इस हालत में? स्ट्रेचर बाहर निकाला गया। चारों ओर डॉक्टर दौड़ पड़े। आर्यन ने सिर्फ एक झलक देखी — सफेद चेहरे पर पसीना, ऑक्सीजन मास्क, सीने पर हाथ कस कर रखा हुआ। लेकिन उस एक झलक में उसने बहुत कुछ पढ़ लिया। उसकी आंखें डॉक्टर की नहीं थीं, वो एक स्टूडेंट की आंखें थीं — जो हर लक्षण पहचानना सीख चुका था।

ठंडी त्वचा, तेज लेकिन अनियमित सांसें, चेहरे की रंगत — आर्यन का गला सूख गया। यह नॉर्मल अटैक नहीं है। उसके दिमाग में मेडिकल की किताबें जैसे खुलने लगीं — लाइनों पर लाइनें, डायग्राम, केस स्टडी। प्रधानमंत्री को तेजी से अंदर ले जाया गया। गेट बंद हो गए।

देश की चिंता

अस्पताल के बाहर मीडिया की भीड़ जमा होने लगी। ब्रेकिंग न्यूज़ चलने लगी — “प्रधानमंत्री की तबीयत अचानक बिगड़ी।” देश भर में चिंता का माहौल। आर्यन रिक्शे के पास खड़ा था। उसके हाथ कांप रहे थे। वह जानता था अंदर क्या हो रहा होगा — देश के सबसे बड़े डॉक्टर, देश की सबसे बड़ी जिम्मेदारी, और वक्त बहुत कम।

करीब एक घंटे बाद अस्पताल के अंदर से कुछ वरिष्ठ डॉक्टर बाहर आए। चेहरे पर थकान, माथे पर पसीना, आंखों में डर। कोई कुछ बोल नहीं रहा था। फिर एक सीनियर डॉक्टर ने बहुत धीमी लेकिन भारी आवाज में कहा — “हम पूरी कोशिश कर रहे हैं, लेकिन हालत बेहद नाजुक है।” यह शब्द नहीं थे, यह चेतावनी थी।

आर्यन ने आसपास खड़े कुछ जूनियर स्टाफ को बातें करते सुना — मेडिकल टर्म्स जो आम आदमी नहीं समझ सकता, लेकिन वह समझ रहा था। और जितना समझ रहा था, उतना ही डर उसके सीने में बैठता जा रहा था। यह रास्ता सही नहीं है। उसका दिल कह रहा था।

आखिरी उम्मीद

उसने रिक्शे की चाबी जेब में डाली। एक पल के लिए मां का चेहरा याद आया। फिर पिता की आवाज — “डर मत बेटा, सही काम से कभी पीछे मत हटना।” आर्यन ने गहरी सांस ली और अस्पताल की ओर कदम बढ़ा दिए। उसे नहीं पता था आगे क्या होगा, बस इतना पता था — अगर आज वह चुप रहा तो शायद देश का सबसे बड़ा आदमी मर जाएगा, और वह जिंदगी भर खुद को माफ नहीं कर पाएगा।

अस्पताल के मुख्य गेट के अंदर कदम रखते ही आर्यन को महसूस हुआ — जैसे वह किसी और ही दुनिया में आ गया हो। बाहर दिल्ली की सड़कें थीं — शोर, हॉर्न, भीड़। और अंदर — सफेद दीवारें, तेज लाइटें, मशीनों की लगातार बीप, और हवा में तैरता हुआ डर।

हर कोई भाग रहा था — नर्सें, वार्ड बॉय, डॉक्टर। सबके चेहरे पर एक ही सवाल लिखा था — “क्या आज इतिहास बदलेगा?” आर्यन एक कोने में खड़ा था। पसीना उसकी कनपटियों से बह रहा था, लेकिन उसकी नजरें हर हरकत को पकड़ रही थीं। स्ट्रेचर के पहिए, ऑक्सीजन सिलेंडर की आवाज, डॉक्टरों की फुसफुसाहट — वो सब समझ रहा था।

प्रधानमंत्री को सीधे सीसीयू से ऑपरेशन थिएटर की ओर ले जाया गया। गेट बंद हो गए। सुरक्षा इतनी कड़ी कि परिंदा भी पर ना मार सके। बाहर मीडिया की भीड़ बेकाबू होती जा रही थी। हर चैनल, हर माइक चीख रहा था — “डॉक्टर साहब, देश जानना चाहता है, क्या प्रधानमंत्री सुरक्षित हैं?”

ऑपरेशन थिएटर के बाहर

लेकिन अंदर किसी के पास जवाब नहीं था। ऑपरेशन थिएटर के बाहर एक लंबा कॉरिडोर था — वहीं खड़े थे देश के सबसे बड़े नाम — कार्डियोलॉजी, न्यूरोलॉजी, क्रिटिकल केयर। सफेद कोट में लिपटे लोग, लेकिन आज कोई हीरो नहीं लग रहा था।

एक सीनियर डॉक्टर ने मॉनिटर की ओर देखते हुए धीमे से कहा — “ब्लॉकेज बहुत गंभीर है। यह केस हमारी किताबों से बाहर जा रहा है।” दूसरा डॉक्टर बोला — “अगर हम आक्रामक हुए, तो टेबल पर ही सब खत्म हो सकता है।” तीसरा डॉक्टर चुप था — उसकी चुप्पी सबसे भारी थी।

आर्यन थोड़ी दूरी पर खड़ा यह सब सुन रहा था। हर शब्द उसके सीने में हथौड़े की तरह लग रहा था। उसे याद आ रही थी लाइब्रेरी की वो रातें, पुराने जर्नल्स, वो एक तकनीक जिसे पढ़ते वक्त उसने सोचा था — “अगर कभी जरूरत पड़ी…” उसका दिल जोर से धड़कने लगा। उसे लगा जैसे समय उसकी ओर देख रहा हो और पूछ रहा हो — “अब भी चुप रहोगे?”

साहस का फैसला

आर्यन ने आगे बढ़ने की कोशिश की, लेकिन तभी एक सिक्योरिटी ऑफिसर ने उसका रास्ता रोक लिया। आवाज में आदेश था — “मैं डॉक्टर से बात करना चाहता हूं,” आर्यन बोला।

ऑफिसर ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। फिर हल्की हंसी — “रिक्शा वाले, पीछे हट। यह जगह तेरे लिए नहीं है।” वो शब्द “रिक्शा वाला” आर्यन के भीतर कुछ चुभ गए। लेकिन उसने खुद को संभाला — “सर, मैं मेडिकल स्टूडेंट हूं, फाइनल ईयर। मुझे लगता है इलाज गलत दिशा में जा रहा है।”

ऑफिसर का चेहरा सख्त हो गया — “ज्यादा होशियारी मत दिखा। एक कदम और बढ़ाया तो बाहर फेंक दूंगा।” आसपास खड़े कुछ स्टाफ ने भी सुना — कोई मुस्कुरा दिया, कोई सिर हिलाने लगा — “आजकल हर कोई डॉक्टर बन गया है।”

आर्यन ने होंठ भींच लिए। तभी कॉरिडोर में हलचल हुई। एक सीनियर डॉक्टर बाहर आए — चेहरे पर साफ थकान थी। और उनके मुंह से वह शब्द निकले जो पूरे देश ने थोड़ी देर बाद टीवी पर सुने — “अब उन्हें बचा पाना बहुत मुश्किल है।”

यह लाइन नहीं थी, यह फैसला था। कॉरिडोर में सन्नाटा छा गया। कुछ नर्सों की आंखें भर आईं। आर्यन का दिल बैठ गया। वह जानता था — अगर अब कुछ नहीं बदला गया तो अगला अपडेट और भयानक होगा।

आखिरी दांव

उसने हिम्मत जुटाई — दो कदम आगे बढ़ा। इस बार उसकी आवाज में डर नहीं था — “सर…” डॉक्टर ने पलट कर देखा, थोड़ा झुंझलाहट के साथ — “कौन हो तुम?”

“मेरा नाम आर्यन है। मैं फाइनल ईयर मेडिकल स्टूडेंट हूं। सर, अगर अभी भी वही प्रोसीजर चला तो हार्ट इसे सह नहीं पाएगा।”

कॉरिडोर में कुछ लोग ठिटक गए। डॉक्टर की भौंह तंग गई — “तुम क्या कहना चाहते हो?”

आर्यन ने तेज सांस ली, फिर बोलना शुरू किया — धीरे, साफ और बिल्कुल सटीक शब्दों में — “सर, यह सिर्फ ब्लॉकेज नहीं है, यह मल्टीलेवल कॉम्प्लिकेशन है। अगर हम उसी रूट से जाएंगे तो रिस्क बहुत ज्यादा है। एक और तरीका है, लेकिन वो रिस्की है।”

डॉक्टर ने ठंडे स्वर में कहा — “और वो तरीका तुम्हें कैसे पता?”

आर्यन ने सिर झुका लिया, फिर नजर उठाई — “क्योंकि मैंने उसे पढ़ा है सर, और क्योंकि हमारे पास खोने के लिए अब कुछ नहीं बचा।”

एक पल के लिए कोई कुछ नहीं बोला। कॉरिडोर में खड़ी मशीनों की बीप और तेज सुनाई देने लगी। तभी पीछे से एक भारी आवाज आई — “कौन है यह लड़का?”

सब ने पलट कर देखा — प्रधानमंत्री के सुरक्षा अधिकारी। कठोर चेहरा, ठंडी आंखें।

डॉक्टर ने धीमे से कहा — “एक मेडिकल स्टूडेंट है, खुद को बहुत बड़ा समझ रहा है।”

सिक्योरिटी ऑफिसर ने आर्यन को घेरा — “अगर प्रधानमंत्री को कुछ हुआ, तो इसकी जिम्मेदारी लेगा?”

आर्यन ने बिना हिचकिचाए जवाब दिया — “हां।” यह एक शब्द नहीं था, यह उसकी पूरी जिंदगी का दांव था।

कॉरिडोर में फिर सन्नाटा छा गया। डॉक्टरों ने एक दूसरे की ओर देखा — डर, अहंकार और मजबूरी तीनों आपस में लड़ रहे थे। ऑपरेशन थिएटर के अंदर मॉनिटर की आवाज तेज हो गई — समय खत्म हो रहा था।

सीनियर डॉक्टर ने गहरी सांस ली, फिर भारी आवाज में कहा — “इसे अंदर ले चलो।”

ऑपरेशन थिएटर का इतिहास

आर्यन की आंखों में एक पल के लिए नमी आई, फिर उसने खुद को संभाला। वह जानता था — अब जो होगा, वह सिर्फ एक मरीज का इलाज नहीं होगा, वह एक रिक्शा वाले की औकात और पूरे सिस्टम की सोच का इम्तिहान होगा।

दुनिया दो हिस्सों में बंट गई — एक तरफ बाहर खड़ा देश, टीवी स्क्रीन से चिपकी करोड़ों आंखें, सांस रोक कर बैठा मीडिया, डर और अफवाहों से भरी दिल्ली। और दूसरी तरफ अंदर — मौत से सीधा सामना।

ऑपरेशन थिएटर की सफेद लाइटें जल रही थीं। मशीनों की लगातार बीप किसी टाइम बम जैसी लग रही थी। प्रधानमंत्री ऑपरेशन टेबल पर थे — चेहरा पीला, सांसें उधार की, दिल लड़खड़ाता हुआ।

आर्यन ने जैसे ही हाथ स्क्रब किए, उसे अपने हाथों की कंपकंपी साफ महसूस हुई। यह वही हाथ थे जो कुछ घंटे पहले रिक्शे का हैंडल पकड़े थे, जो मां की दवाइयां गिनते थे, जो किताबों के पन्ने पलटते थे। और आज — आज उन्हीं हाथों में देश की सबसे बड़ी जिम्मेदारी थी।

सीनियर डॉक्टरों की टीम चारों ओर खड़ी थी — कोई खुलकर कुछ नहीं बोल रहा था, सबकी निगाहें आर्यन पर थीं — जैसे पूछ रही हों, “अब क्या?”

डॉक्टर वर्मा ने सख्त आवाज में कहा — “साफ-साफ बोलो, तुम्हें क्या करना है?”

आर्यन ने मॉनिटर की ओर देखा — हार्ट रेट गिर रही थी, ब्लड प्रेशर खतरनाक लेवल पर। “अगर अभी भी वही रास्ता लिया गया तो दिल यह झटका नहीं झेलेगा। हमें रेट्रोग्रेड अप्रोच अपनानी होगी।”

कमरे में हलचल मच गई। एक डॉक्टर चिल्ला पड़ा — “यह पागलपन है! यह प्रोसीजर भारत में कभी ट्राई ही नहीं हुआ।” दूसरा बोला — “अगर नस फट गई तो ब्लीडिंग कंट्रोल नहीं होगी।” तीसरा गुस्से में था — “अगर पेशेंट टेबल पर मर गया तो सीधे हम सब जेल जाएंगे।”

आर्यन ने धीरे से कहा — “और अगर कुछ नहीं किया गया तो वह अभी मर जाएंगे।”

एक पल के लिए सब चुप हो गए। बीप-बीप मॉनिटर की आवाज और तेज हो गई। एनस्थेटिस्ट चिल्लाया — “बीपी ड्रॉप कर रहा है।” समय अब दुश्मन बन चुका था।

डॉक्टर वर्मा ने दांत भींचते हुए कहा — “ठीक है। लेकिन एक भी गलती हुई तो इसकी जिम्मेदारी तुम्हारी।”

काबिलियत का इम्तिहान

आर्यन ने सिर हिलाया। उसे किसी जिम्मेदारी का डर नहीं था, उसे सिर्फ वक्त का डर था। नर्स ने हिचकिचाते हुए उपकरण उसकी ओर बढ़ाए। सीनियर डॉक्टरों के हाथ पीछे थे — आज लीड वही कर रहा था, जिसे कुछ घंटे पहले रिक्शा वाला कहा गया था।

आर्यन ने स्क्रीन पर नसों की तस्वीरें ध्यान से देखीं — ब्लॉकेज बेहद खतरनाक जगह पर था, जिसे मेडिकल भाषा में “विडो मेकर” कहा जाता है। उसने गाइड वायर उठाया — हाथ स्थिर हो चुके थे, जैसे भीतर कहीं कोई आवाज कह रही हो — “डर अब काम का नहीं।”

वायर अंदर जा रहा है — उसने शांत स्वर में कहा। पूरे कमरे में सन्नाटा। हर आंख स्क्रीन पर थी। वायर थोड़ा आगे बढ़ा — फिर रुक गया। बीप-बीप हार्ट रेट फिर गिरा — “हम पेशेंट खो रहे हैं!” किसी ने चिल्लाकर कहा।

डॉक्टर गुप्ता आगे बढ़े — “बस बहुत हुआ, इसे रोको!” उन्होंने आर्यन का हाथ पकड़ने की कोशिश की — और उसी पल आर्यन फट पड़ा — “हाथ मत लगाइए!”

उसकी आवाज में ऐसा जोर था कि सब ठिठक गए — “अगर अभी रोका तो यह यही खत्म हो जाएगा। मुझे काम करने दीजिए।”

कमरे में कुछ सेकंड तक कोई सांस नहीं ली। आर्यन ने गहरी सांस ली। वायर को एक अलग एंगल पर मोड़ा — एक ऐसी तकनीक जो उसने सिर्फ रिसर्च में देखी थी। धीरे-बहुत धीरे वायर आगे बढ़ा — और अचानक वायर क्रॉस कर गया।

नर्स की आवाज कांप उठी — “डॉक्टर वर्मा, यह कैसे?” मॉनिटर पर तस्वीर बदलने लगी — ब्लड फ्लो वापस आता दिखा, हार्ट रिदम स्टेबल हो रही है। किसी ने कहा — “बीप अब तेज और नियमित!”

पूरा ऑपरेशन थिएटर जैसे जिंदा हो उठा। आर्यन के माथे से पसीना टपक रहा था, लेकिन उसने काम नहीं छोड़ा। कुछ मिनट बाद — स्टेंट प्लेस्ड, ब्लीडिंग कंट्रोल में, वाइटल स्टेबल।

एक सीनियर डॉक्टर कुर्सी पर बैठ गया — उसके पैर कांप रहे थे। डॉक्टर वर्मा ने भराई आवाज में कहा — “प्रधानमंत्री खतरे से बाहर हैं।”

यह शब्द बाहर नहीं गए थे, लेकिन अंदर यह शब्द इतिहास बन चुके थे।

कानून और इंसानियत

आर्यन ने धीरे से उपकरण नीचे रखे — उसके हाथ अब भी हल्के कांप रहे थे। डॉक्टर वर्मा ने उसकी ओर देखा — कुछ सेकंड तक कुछ नहीं बोले, फिर धीरे से कहा — “आज तुमने सिर्फ एक जान नहीं बचाई, आज तुमने हमें हमारी औकात याद दिला दी।”

लेकिन खुशी ज्यादा देर नहीं टिकी। ऑपरेशन थिएटर का दरवाजा खुला और बाहर कानून खड़ा था — पुलिस अधिकारी, सख्त चेहरे, नोटपैड — “कौन है जिसने सर्जरी की?”

आवाज ठंडी थी। कमरे में फिर सन्नाटा। आर्यन आगे आया — “मैं।”

अधिकारी ने बिना भावना के कहा — “आपको हिरासत में लिया जाता है। बिना लाइसेंस मेडिकल प्रैक्टिस, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मामला।”

हथकड़ियां चमकी — वही हाथ जिन्होंने कुछ मिनट पहले देश के सबसे बड़े दिल को धड़काया था, अब कानून के सामने थे। आर्यन ने कोई विरोध नहीं किया — बस एक पल के लिए आंखें बंद की। उसे मां की आवाज याद आई — “बेटा, सही करना, डरना मत।”

उसने हाथ आगे बढ़ा दिए — और बाहर अभी देश को पता भी नहीं था कि प्रधानमंत्री बच चुके हैं।

देश की प्रतिक्रिया

हथकड़ियों की ठंडी धातु आर्यन की कलाई से चिपक चुकी थी — जैसे किसी ने उसकी नसों में दौड़ते खून को पल भर के लिए रोक दिया हो। ऑपरेशन थिएटर के बाहर वही लंबा सफेद कॉरिडोर था — जहां कुछ देर पहले तक जिंदगी और मौत के बीच खड़े लोग अपनी सांसे थामे प्रार्थनाएं कर रहे थे। वही जगह अब धीमी-धीमी फुसफुसाहटों से भर चुकी थी — कोई कह रहा था “यही है वह लड़का”, कोई पहचानने की कोशिश कर रहा था “रिक्शा वाला”, कोई हैरानी से बुदबुदा रहा था “इसी ने बचाया है।”

लेकिन कानून को इन फुसफुसाहटों से कोई मतलब नहीं होता। कानून ना तो आंसू देखता है और ना ही इरादे। पुलिस अधिकारी ने सख्त, सपाट और बिना किसी हिचक के कहा — “आपको हिरासत में लिया जा रहा है। बिना लाइसेंस मेडिकल प्रक्रिया करना एक गंभीर अपराध है।”

आर्यन ने कोई बहस नहीं की, ना अपनी सफाई दी, ना आवाज ऊंची की। उसकी आंखों में डर नहीं था — बस एक अजीब सा सुकून था — जैसे वह अपने भीतर जानता हो कि उसने जो किया वो गलत नहीं था।

बाहर अस्पताल के गेट पर मीडिया का सैलाब उमड़ पड़ा था — कैमरे चमक रहे थे, माइक आगे बढ़े हुए थे, ब्रेकिंग न्यूज़ चीख रही थी — “प्रधानमंत्री खतरे से बाहर।” लेकिन उसी स्क्रीन के नीचे एक और लाइन चल रही थी — जिसने पूरे देश की सांसें रोक दी थीं — “जिस युवक ने जान बचाई, वो पुलिस हिरासत में।”

यहीं पर पूरा देश ठिठक गया। सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई। सड़क पर चलते लोग रुक-रुक कर अपने फोन देखने लगे। चाय की दुकानों पर कप हवा में थम गए — और हर जुबान पर बस एक ही सवाल था — “अगर उसने ना किया होता…?”

न्याय की पुकार

आर्यन को पुलिस वैन में बैठा दिया गया। वैन धीरे-धीरे आगे बढ़ी। उसने खिड़की से बाहर देखा — वही सड़कें थीं, वही लोग थे, वही शहर था। लेकिन आज पहली बार कोई उसे “ओए रिक्शा वाले” कहकर नहीं बुला रहा था। आज निगाहों में तिरस्कार नहीं, बल्कि सवाल, सम्मान और बेचैनी थी।

उधर अस्पताल के वीआईपी वार्ड में प्रधानमंत्री की आंखें धीरे-धीरे खुल रही थीं। कमरे में सन्नाटा छा गया — मशीनों की बीप साफ सुनाई देने लगी। डॉक्टरों ने राहत की सांस ली।

प्रधानमंत्री ने बेहद धीमी और थकी हुई आवाज में पूछा — “मैं जिंदा हूं?”

एक सीनियर डॉक्टर ने सिर झुकाकर कहा — “जी सर।”

प्रधानमंत्री की नजरें कमरे में मौजूद डॉक्टरों के चेहरों पर घूमीं — जैसे किसी को ढूंढ रही हों, कुछ अधूरा सा था। उन्होंने फिर पूछा — “जिसने ऑपरेशन किया, वो कहां है?”

कमरे में चुप्पी और गहरी हो गई — किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी। आखिरकार डॉक्टर वर्मा ने कांपती आवाज में कहा — “सर, वो अभी यहां नहीं है।”

“क्यों?” — इस बार आवाज में कमजोरी नहीं, एक सीधा सवाल था।

डॉक्टर ने सच कहते हुए कहा — “वो मेडिकल स्टूडेंट है, रिक्शा चलाता है। कानूनन उसे गिरफ्तार कर लिया गया है।”

एक पल के लिए कमरे की हवा भारी हो गई — जैसे ऑक्सीजन कम हो गई हो। प्रधानमंत्री ने आंखें बंद कर ली — उस चेहरे पर थकान थी, दर्द था, लेकिन उससे ज्यादा एक गहरी सोच थी। फिर उन्होंने धीरे-धीरे आंखें खोली — और अब उनकी आवाज में कोई कमजोरी नहीं थी, बस ठोस सच्चाई थी — “जिसने मेरी जान बचाई, अगर वही जेल में है तो आज सबसे बड़ा अपराध हम कर रहे हैं।”

फोन उठाए गए, फाइलें खुली, आदेश दिए गए — सिस्टम हिलने लगा।

सम्मान और बदलाव

कुछ ही घंटों में पुलिस वैन अचानक रुकी। दरवाजा खुला। एक अधिकारी ने नरमी से कहा — “आर्यन, आपको रिहा किया जा रहा है।”

आर्यन को कुछ समझ नहीं आया। हथकड़ियां खुली — जैसे किसी ने उसके हाथों से नहीं, बल्कि उसके भाग्य से जंजीरें खोल दी हों। अगले ही पल उसे सीधे अस्पताल ले जाया गया। वीआईपी वार्ड का दरवाजा खुला — सामने वही इंसान था जिसकी सांसे उसने अपने हाथों से बचाई थी।

प्रधानमंत्री ने उसे देखा — साधारण कपड़े, झुकी हुई निगाहें, चेहरे पर कोई घमंड नहीं, कोई शर्म नहीं, बस एक शांत सच्चाई। प्रधानमंत्री ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और कहा — “धन्यवाद, डॉक्टर।”

आर्यन की आंखें भर आईं, उसकी आवाज कांप गई — “मैं डॉक्टर नहीं हूं, सर — अभी।”

प्रधानमंत्री मुस्कुराए — वो मुस्कान किसी पद की नहीं, किसी इंसान की थी — “डिग्री कागज देती है, डॉक्टर तुम्हारा दिल बना चुका है।”

वह पल सिर्फ दो लोगों के बीच का नहीं था — वह पूरे देश के लिए एक आईना था।