इंसानियत बनाम पहचान: कोटद्वार की एक घटना ने फिर छेड़ी जरूरी बहस
उत्तराखंड के कोटद्वार से हाल ही में एक ऐसा वीडियो सामने आया जिसने समाज, धर्म और इंसानियत को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। यह मामला एक बुज़ुर्ग दुकानदार, कुछ स्वयंभू संगठनों के विरोध और एक युवक की साहसिक दखल से जुड़ा है — जिसने माहौल को एक अलग दिशा दे दी।

क्या है पूरा मामला?
कोटद्वार के एक बुज़ुर्ग दुकानदार पिछले लगभग 30 वर्षों से स्कूल ड्रेस और कपड़ों की दुकान चला रहे हैं। उनकी दुकान का नाम “बाबा” शब्द से जुड़ा हुआ है। वायरल वीडियो में कुछ लोग उनसे यह कहते दिखाई देते हैं कि वे अपनी दुकान के नाम से “बाबा” शब्द हटाएं और ऐसा नाम रखें जो उनके धर्म को सीधे दर्शाए।
वीडियो में बहस बढ़ती है। दुकानदार यह समझाने की कोशिश करते हैं कि उनका नाम और पहचान पहले से दर्ज है और दुकान वर्षों पुरानी है। लेकिन दबाव बनाया जाता है कि नाम बदला जाए।
एक युवक की एंट्री — और बदल गया माहौल
इसी दौरान एक युवक वहां आता है और सवाल उठाता है — “किसी को अपनी दुकान का नाम रखने से कौन रोक सकता है?”
वह कहता है कि यह देश सबका है और किसी को मजबूर नहीं किया जा सकता कि वह अपनी पहचान बदल ले।
जब उससे नाम पूछा जाता है तो वह खुद को “मोहम्मद दीपक” बताता है — एक ऐसा जवाब जो किसी एक धर्म की सीमा में बंधा नहीं लगता, बल्कि एक संदेश देता है।
दीपक का संदेश — धर्म से ऊपर इंसानियत
बाद में सामने आए एक बयान में उस युवक ने कहा:
“मैं पहले इंसान हूं। मरने के बाद मुझे जवाब इंसानियत को देना है, किसी धर्म को नहीं।”
उसने सभी धर्मों के अभिवादन — जय श्री राम, अस्सलाम वालेकुम, सत श्री अकाल — बोलकर यह बताने की कोशिश की कि पहचान से पहले मानवता है।
उसका साफ संदेश था कि देश को नफरत नहीं, मोहब्बत की जरूरत है।
सोशल मीडिया पर बहस
वीडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर दो तरह की प्रतिक्रियाएं दिखीं।
कुछ लोग युवक की हिम्मत और सोच की सराहना कर रहे हैं।
कुछ लोग इसे पहचान और आस्था का मुद्दा बता रहे हैं।
लेकिन एक बड़ा वर्ग इस घटना को सामाजिक सौहार्द के लिए चेतावनी की तरह देख रहा है।
खामोशी भी एक भूमिका निभाती है
इतिहास गवाह है कि समाज में कट्टरता सिर्फ उन लोगों से नहीं बढ़ती जो उसे फैलाते हैं, बल्कि उनसे भी बढ़ती है जो चुप रहते हैं। जब आम लोग अन्याय देखकर भी बोलते नहीं, तो गलत सोच को जगह मिलती है।
गांधी की याद क्यों आई?
देश के इतिहास में कई बार यह बात दोहराई गई है कि अगर लोग एक-दूसरे के लिए खड़े हों — चाहे वह किसी भी धर्म के हों — तो तनाव कम हो सकता है।
विचार यह रहा है कि समाज की मजबूती आपसी रक्षा और सम्मान में है, न कि विभाजन में।
सबसे बड़ा सवाल
क्या पहचान सिर्फ नाम से तय होती है?
क्या इंसानियत की जगह पहचान ले सकती है?
और क्या हम एक-दूसरे के लिए खड़े होने का साहस रखते हैं?
कोटद्वार की यह घटना सिर्फ एक दुकान या एक नाम का मामला नहीं है — यह उस दिशा की याद दिलाती है जिसमें समाज जा सकता है, और उस उम्मीद की भी कि एक व्यक्ति की आवाज फर्क ला सकती है।
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