जिस रात एक बच्ची ने मौत को हरा दिया
मुंबई की वह रात किसी साधारण रात जैसी नहीं थी।
आसमान गुस्से में था, बिजली बार-बार चमक रही थी, और बारिश ऐसे बरस रही थी जैसे शहर के सारे पाप धो देना चाहती हो।
शहर के चमकते इलाकों से दूर, बदबूदार नालों और कच्ची झोपड़ियों के बीच, एक टूटी-फूटी झोपड़ी अपनी आख़िरी साँसें गिन रही थी।
उस झोपड़ी के अंदर, एक पुरानी चारपाई पर 65 साल की शारदा पड़ी थीं। तेज बुखार, उखड़ती साँसें, और सीने में घरघराहट — जैसे जिंदगी और मौत रस्साकशी कर रहे हों।
चारपाई के पास बैठी थी 10 साल की दुबली-पतली बच्ची — शिवानी।
उसकी आँखों में उम्र से कहीं ज्यादा समझ थी।

दादी और आख़िरी उम्मीद
“दादी पानी पियो…”
शिवानी ने कांपते हाथों से गिलास लगाया।
दो घूंट उतरते ही शारदा को तेज खांसी आई। खांसी के साथ हल्का खून भी निकला।
शिवानी घबरा गई।
घर में पैसे नहीं थे। खाना नहीं था। दवा तो दूर की बात।
वह दिन भर कूड़ा बीनती थी, लेकिन बारिश के कारण कबाड़ी की दुकान भी बंद थी।
शारदा ने उसका हाथ पकड़ा।
“मेरे बाद रोना मत… तू शेरनी है।”
“आप कहीं नहीं जा रही!” शिवानी चीख पड़ी।
लेकिन वह समझ गई — समय कम है।
तूफान से लड़ती एक बच्ची
रात के अंधेरे में वह प्लास्टिक का टुकड़ा सिर पर डालकर डॉक्टर ढूंढने निकल पड़ी।
झोला-छाप डॉक्टर ने दरवाजा खोला।
“पैसे हैं?”
“कल दे दूंगी…”
“भाग यहां से!”
दरवाजा बंद।
शिवानी की दुनिया जैसे वहीं टूट गई।
तभी उसे सरकारी अस्पताल याद आया।
5 किलोमीटर दूर।
बारिश में।
रात के 2 बजे।
और दादी बेहोश।
ठेला और हिम्मत
उसने पड़ोसी का सब्जी वाला ठेला उठाया।
दादी को उस पर लिटाया।
और खुद ठेला खींचना शुरू किया।
कीचड़ में धंसते पैर।
कांपता शरीर।
लेकिन दिल में एक ही आवाज —
“दादी को बचाना है।”
अस्पताल का दरवाज़ा
रात 2 बजे वह अस्पताल पहुंची।
“मदद करो…”
उसकी आवाज फुसफुसाहट बन चुकी थी।
नर्सों ने शारदा को अंदर लिया।
शिवानी को बाहर रोक दिया गया।
वह ठिठुरती हुई कोने में बैठ गई।
एक और जंग शुरू
तभी अस्पताल में अफरा-तफरी मच गई।
एक महंगी कार रुकी।
बाहर निकले शहर के बड़े बिल्डर — विक्रम खन्ना।
उनकी गर्भवती पत्नी प्रसव पीड़ा में तड़प रही थी।
उसे तुरंत ओटी में ले जाया गया।
कुछ देर बाद डॉक्टर बाहर आए।
चेहरे पर तनाव।
“हम सिर्फ मां या बच्चे में से एक को बचा सकते हैं…”
विक्रम टूट गया।
“मुझे दोनों चाहिए… जितना पैसा चाहिए ले लो…”
लेकिन विज्ञान हार चुका था।
एक आवाज जिसने सब रोक दिया
अचानक एक धीमी आवाज आई —
“अगर आप लोग फैसला करते रहे… तो दोनों मर जाएंगे।”
सबने देखा —
वह शिवानी थी।
कीचड़ से सनी, छोटी सी बच्ची।
“बच्चा उल्टा है… और नाल गले में फंसी है…”
उसने कहा।
डॉक्टर सन्न।
“तुम्हें कैसे पता?”
“मुझे अंदर जाने दो।”
जब उम्मीद आख़िरी थी
विक्रम बोला —
“डॉक्टर, इसे कोशिश करने दो। जिम्मेदारी मेरी।”
डॉक्टर मजबूर थे।
शिवानी को स्क्रब कराया गया।
वह स्टूल पर चढ़ी।
उसने आंखें बंद कीं।
उसे दादी की आवाज सुनाई दी —
“बच्चा जब फंसे तो खींचना नहीं, रास्ता दिखाना…”
उसने तेल मांगा।
धीरे-धीरे बच्चे की पोजीशन बदली।
नाल ढीली की।
सही वक्त पर दबाव दिया।
और…
जिंदगी की पहली चीख
कमरे में सन्नाटा।
फिर —
एक नवजात की रोने की आवाज गूंजी।
बच्चा जिंदा।
मां सुरक्षित।
डॉक्टरों की आंखें नम।
विक्रम रो पड़ा।
“फरिश्ते ने बचाया…”
और फरिश्ता बेहोश हो गया
थकान, भूख और कमजोरी से
शिवानी वहीं गिर पड़ी।
ड्रिप लगी।
जब होश आया, उसने पहला सवाल पूछा —
“मेरी दादी कहां है?”
एक कर्ज जो इंसानियत ने चुकाया
शारदा जनरल वार्ड में मौत से लड़ रही थीं।
विक्रम भड़क उठा।
“इन्हें वीआईपी ट्रीटमेंट दो! अभी!”
दुनिया के बेहतरीन डॉक्टर बुलाए गए।
इलाज शुरू हुआ।
सच्चाई का खुलासा
डॉक्टर ने पूछा —
“तुम्हें ये सब कैसे आता है?”
शिवानी बोली —
“मेरी दादी गांव की दाई थीं…
उन्होंने मुझे सब सिखाया…”
आख़िरी विदाई
शारदा ने शिवानी का हाथ पकड़ा।
“मेरा हुनर अब तेरे हाथों में है…
कभी गरीब से मुंह मत मोड़ना…”
फिर मॉनिटर सीधी लाइन दिखाने लगा।
शिवानी नहीं रोई।
वह समझ चुकी थी —
कुछ लोग जाते नहीं, विरासत बन जाते हैं।
नई शुरुआत
विक्रम ने कहा —
“आज से ये मेरी बेटी है।”
शिवानी खन्ना।
15 साल बाद
लंदन का रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स।
तालियों की गड़गड़ाहट।
स्टेज पर खड़ी थीं —
डॉ. शिवानी खन्ना
यंगेस्ट सर्जन ऑफ द ईयर।
पहली पंक्ति में बैठे थे
सफेद बालों वाले विक्रम खन्ना
और एक जवान लड़का — आर्यन।
वही बच्चा
जिसे उसने उस रात बचाया था।
सीख
डिग्री डॉक्टर बनाती है,
लेकिन दया इंसान बनाती है।
कभी-कभी भगवान सफेद कोट में नहीं,
फटे कपड़ों में आते हैं।
और हाँ —
मौत पैसे से नहीं,
हिम्मत से हारती है।
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