Registan Main Budhy Fakeer Ko Ak Jaawan Ladki Mili
रेगिस्तान की सुनसान जगह पर एक कच्चे घर में बूढ़ा फकीर बख्श रहता था। उसकी उम्र 70 वर्ष से ऊपर थी। वह अकेला था, जीवन की थकान और तन्हाई उसके चेहरे पर साफ झलकती थी। एक दिन अचानक दरवाजे पर जोर से दस्तक हुई। बूढ़ा चौंक कर उठ बैठा और गुस्से में बोला, “दरवाजा तोड़ना है क्या? आ रहा हूँ।” जब उसने दरवाजा खोला, तो सामने एक जवान और खूबसूरत लड़की खड़ी थी। बारिश में भीगी हुई उसके कपड़े शरीर से चिपके हुए थे, आंखों में डर था, चेहरे पर थकान थी और होंठ कांप रहे थे। उसके बाल बिखरे हुए थे और वह कांप रही थी।
बूढ़े ने हैरानी से पूछा, “तुम कौन हो? यहां रेगिस्तान में अकेली क्या कर रही हो?” लड़की ने कांपती आवाज में कहा, “मुझे अंदर आने दो। मैं तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं।” बूढ़ा पीछे हट गया, माथे पर बल पड़ गए। “मेरे साथ? लेकिन क्यों? तुम हो कौन?” लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया, बस एक नजर उसके चेहरे पर डाली और जबरदस्ती अंदर चली गई। बूढ़ा हैरान रह गया और गुस्से में बोला, “तुम कौन हो और तुम्हारी इतनी हिम्मत कि मेरे घर में यूं घुस आई हो? अगर किसी ने देख लिया तो लोग क्या सोचेंगे, एक जवान लड़की एक बूढ़े के साथ रह रही है।”
लड़की जिसका नाम निशा था, बूढ़े का हाथ पकड़कर रोने लगी। “मेरा इस दुनिया में कोई नहीं रहा। दो दिन पहले मेरी शादी हुई थी, लेकिन मेरे पति की मौत हो गई। ससुराल वालों ने मुझे मनहूस कहकर घर से निकाल दिया। कहते हैं तुम हमारे बेटे को खा गई हो।” बूढ़े की आंखों में नरमी आ गई, लेकिन वह चुप रहा। निशा ने बात जारी रखी, “मैं अपने मायके गई तो उन्होंने कहा, तुम्हारा घर अब ससुराल है, वापस वहीं जाओ। मैंने अपनी सांस से मिन्नतें की, कहा, ‘मेरा क्या कसूर है?’ लेकिन उन्होंने भी धक्के देकर निकाल दिया।”
बूढ़े ने गहरी सांस ली और धीरे से कहा, “ठीक है बेटी, तुम यहां रह सकती हो जब तक चाहो, लेकिन अगर किसी ने देख लिया तो लोग बातें करेंगे।” निशा सिर झुका कर एक कोने में बैठ गई। बारिश थम चुकी थी, लेकिन उसके कपड़े अभी भी भीगे हुए थे। बूढ़े ने उसे एक चादर दी और कहा, “यह ले लो, ठंड लग जाएगी।”
अगले दिन निशा ने बूढ़े के लिए चाय बनाई। वह चुपचाप उसके पास आई और बोली, “चाय पी लीजिए।” बूढ़े ने हैरानी से देखा, “तुमने बनाई है?” निशा ने मुस्कुराकर सिर हिला दिया। समय गुजरता गया। निशा धीरे-धीरे बूढ़े के करीब आने लगी। कभी उसके पैर दबाती, कभी उसका हाथ पकड़कर अपने पास बैठा लेती। वह बूढ़े का सिर दबाती, तेल लगाकर मालिश करती। बूढ़ा पहले तो झिझकता रहा, लेकिन फिर उसने निशा को बेटी के बजाय नाम से बुलाना शुरू किया। शायद उसके दिल में भी कोई जज्बा जाग उठा था।
रात को जब बूढ़ा सो जाता, निशा उसके पास आकर घंटों तक उसे देखती रहती। उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक होती, जैसे वह किसी खोई हुई दुनिया को तलाश रही हो। एक दिन बूढ़े ने निशा से पूछा, “तुम्हें यहां कैसा लग रहा है?” निशा ने धीरे से कहा, “यहां सुकून है। तुम्हारे पास आकर मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं सुरक्षित हूं।” बूढ़े ने नजरें झुका ली। वह उस एहसास से लड़ रहा था जो उसके दिल में जन्म ले रहा था। एक बूढ़ा व्यक्ति जिसने मोहब्बत को बरसों पहले दफन कर दिया था, अब एक जवान लड़की की मौजूदगी से बेचैन हो रहा था।

निशा ने एक दिन बूढ़े के हाथ पकड़कर कहा, “तुम बहुत अच्छे हो। दुनिया में सबने मुझे ठुकराया लेकिन तुमने मुझे पनाह दी।” बूढ़े ने कुछ कहना चाहा लेकिन शब्द उसके होठों पर आकर रुक गए। निशा ने मुस्कुरा कर कहा, “क्या मैं तुम्हारे लिए कुछ बना लूं? खाने में क्या पसंद है?” बूढ़े ने पहली बार दिल से मुस्कुरा कर कहा, “जो तुम बनाओगी, वही पसंद आएगा।” निशा रोज बूढ़े के लिए खाना बनाती, उसके कपड़े धोती और घर की सफाई करती। वह एक पत्नी की तरह उसके साथ रहने लगी, लेकिन उनके बीच कोई रिश्ता नहीं था, बस एक खामोशी, एक कुर्बत, एक एहसास।
बूढ़े ने महसूस किया कि निशा की मौजूदगी ने उसकी जिंदगी में रंग भर दिए हैं। वह जो बरसों से तन्हा था, अब उसके दिल में एक चमक थी, एक उम्मीद थी। लेकिन वह जानता था कि यह सब अस्थाई है। दुनिया की नजरों में यह रिश्ता अजीब है, नामंजूर है।
एक रात जब चांदनी रेत पर चमक रही थी, निशा बूढ़े के पास आई और उसके करीब बैठ गई। “क्या तुम्हें कभी मोहब्बत हुई थी?” उसने पूछा। बूढ़े ने लंबी खामोशी के बाद कहा, “हाँ, बहुत साल पहले। लेकिन वह मोहब्बत वक्त के साथ मिट्टी में दफन हो गई।” निशा ने धीरे से कहा, “शायद मोहब्बत कभी मरती नहीं, बस छिप जाती है और किसी दिन फिर से जाग उठती है।” बूढ़े ने उसकी तरफ देखा और पहली बार उसकी आंखों में वह चमक नजर आई जो बरसों पहले किसी और के लिए थी। निशा ने उसका हाथ थामा और कहा, “मैं यहां रहना चाहती हूं हमेशा।” बूढ़े ने कुछ न कहा, बस आसमान की तरफ देखा जैसे किसी जवाब की तलाश में हो।
फकीर बख्श की जिंदगी में निशा की आमद एक अजीब सी तब्दीली ले आई थी। वह जो बरसों से तन्हाई का आदि था, अब हर सुबह निशा की आवाज से जागता, हर शाम उसकी मौजूदगी से सुकून पाता। निशा ने घर को संवारना शुरू कर दिया था। कच्चे आंगन में झाड़ू लगाती, दीवारों पर कपड़ा फेरती, रसोई में कुछ ना कुछ पकाती रहती। फकीर बख्श अक्सर उसे खामोशी से देखता रहता। उसके दिल में एक अजीब सी खींच पैदा हो गई थी। वह जानता था कि निशा जवान है, खूबसूरत है, और वह खुद एक बूढ़ा थका हुआ शख्स। लेकिन दिल के जज्बात उम्र नहीं देखते।
एक दिन निशा ने फकीर बख्श के लिए परांठे बनाए। वह थाली लेकर आई और कहा, “आज कुछ खास बनाया है।” फकीर बख्श ने मुस्कुराकर कहा, “खास मेरे लिए?” निशा ने शरारत से कहा, “और किसके लिए? यहां और कौन है?” फकीर बख्श ने परांठा उठाया और एक निवाला लेते ही रुक गया, “यह तो बहुत मजेदार है।” निशा खुश होकर बोली, “बस आपकी तारीफ ही काफी है।”
दिन गुजरते गए। निशा अब फकीर बख्श के साथ बैठकर बातें करती, उसकी पुरानी यादें सुनती और कभी-कभी उसके कंधे पर सिर रखकर चुप हो जाती। फकीर बख्श के दिल में एक नरम कोना बन चुका था। वह निशा को सिर्फ एक मेहमान नहीं समझता था, बल्कि जैसे वह उसकी जिंदगी का हिस्सा बन गई हो।
एक रात जब आसमान पर चांदनी छाई हुई थी, निशा ने फकीर बख्श से कहा, “कभी-कभी सोचती हूं अगर मेरी जिंदगी में वह हादसा ना हुआ होता, तो शायद मैं कभी आपसे ना मिलती।” फकीर बख्श ने धीरे से कहा, “जिंदगी के रास्ते अजीब होते हैं। कभी दुख हमें वहां ले जाते हैं जहां सुकून छुपा होता है।” निशा ने उसकी तरफ देखा, “आपने मुझे पनाह दी, इज्जत दी, सुकून दिया। मैं कभी नहीं भूलूंगी।” फकीर बख्श ने नजरें झुका ली। वह कुछ कहना चाहता था, लेकिन जुबान साथ नहीं दे रही थी।
निशा ने उसका हाथ थामा, “क्या आपको मेरी मौजूदगी से कोई परेशानी है?” फकीर बख्श ने फौरन कहा, “नहीं, बिल्कुल नहीं, तुम हो तो घर में रौनक है।” निशा ने मुस्कुराकर कहा, “तो फिर मुझे जाने को मत कहना।” फकीर बख्श ने सिर हिला दिया, “जब तक चाहो यहां रहो।”
लेकिन दुनिया की नजरें अब उन पर पड़ने लगी थीं। करीबी गांव के कुछ लोग जो कभी-कभार रेगिस्तान से गुजरते थे, निशा को फकीर बख्श के साथ देखने लगे थे। बातें होने लगीं, फुसफुसाहटें शुरू हो गईं। एक दिन एक बूढ़ी औरत फकीर बख्श के घर आई और बोली, “फकीर बख्श, लोग बातें कर रहे हैं। कहते हैं तुमने एक जवान लड़की को अपने घर में रखा हुआ है।” फकीर बख्श ने शांत लहजे में जवाब दिया, “उसे पनाह दी है, इज्जत दी है।” बूढ़ी औरत ने तंज से कहा, “इज्जत या कुछ और?” फकीर बख्श ने दरवाजा बंद कर दिया, लेकिन उसके दिल में एक कांटा चुभ गया।
निशा ने सब कुछ सुन लिया था। वह फकीर बख्श के पास आई और बोली, “अगर मेरी मौजूदगी आपके लिए बोझ बन रही है, तो मैं चली जाती हूं।” फकीर बख्श ने तुरंत कहा, “नहीं, तुम कहीं नहीं जाओगी।” निशा की आंखों में आंसू आ गए। “लोग बातें कर रहे हैं, आपकी इज्जत को नुकसान पहुंच रहा है।” फकीर बख्श ने उसका हाथ थामा, “तुम मेरी इज्जत हो।” निशा ने धीरे से कहा, “तो फिर मुझे अपना लो।” फकीर बख्श चौंक गया, “क्या मतलब?” निशा ने नजरें झुका ली, “शादी कर लो मुझसे ताकि दुनिया को जवाब मिल जाए।” फकीर बख्श ने लंबी खामोशी के बाद कहा, “मैं बूढ़ा हूं, तुम जवान हो। लोग कहेंगे मैंने तुम्हें पनाह देकर फायदा उठाया।” निशा ने कहा, “लोग तो वैसे भी बातें कर रहे हैं, लेकिन अगर हम एक दूसरे के लिए हैं तो रिश्ता क्यों नहीं?”
फकीर बख्श ने आसमान की तरफ देखा, जैसे किसी इशारे की तलाश में हो। फिर धीरे से बोला, “अगर तुम तैयार हो तो मैं भी तैयार हूं।” अगले दिन फकीर बख्श और निशा ने सादगी से निकाह कर लिया। ना कोई गवाह था, ना कोई रस्म, बस दो दिलों का वादा था। रेगिस्तान की खामोशी ने उनके रिश्ते की गवाही दी।
अब निशा फकीर बख्श की बीवी थी। वह पहले से ज्यादा मोहब्बत से उसका ख्याल रखती, उसके लिए खाना बनाती, उसके कपड़े सीती और रात को उसके साथ बैठकर तारों की बातें करती। फकीर बख्श ने महसूस किया कि उसकी जिंदगी का जो खालीपन था वह भर गया है। निशा ने उसे जीने का नया मकसद दिया था।
लेकिन वक्त कभी एक जैसा नहीं रहता। एक दिन फकीर बख्श की तबीयत खराब हो गई। वह बुखार में तप रहा था और निशा उसके पास बैठी उसका माथा पोंछ रही थी, दवा दे रही थी और दुआएं मांग रही थी। फकीर बख्श ने कमजोर आवाज में कहा, “निशा, अगर मैं ना रहा तो तुम क्या करोगी?” निशा ने आंसुओं से भरी आंखों से कहा, “आपके बिना कुछ नहीं।” फकीर बख्श ने धीरे से कहा, “जीना सीखो मेरे लिए।” निशा ने उसका हाथ थामा, “आपके बिना जीना मुमकिन नहीं।” फकीर बख्श मुस्कुराया, “मोहब्बत में कुर्बानी होती है, जुदाई भी।” निशा ने कहा, “लेकिन मेरी मोहब्बत में सिर्फ आप हैं।”
कुछ दिनों बाद फकीर बख्श की हालत और बिगड़ गई। निशा ने गांव से हकीम बुलाया, लेकिन सब बेअसर रहा। फकीर बख्श की सांसें कमजोर पड़ने लगीं। आखिरी रात निशा उसके पास बैठी थी। फकीर बख्श ने धीरे से कहा, “निशा, तुमने मुझे जिंदगी दी। तुम मेरी आखिरी खुशी हो।” निशा रोते हुए बोली, “आप मेरे सब कुछ हैं।” फकीर बख्श मुस्कुराया, आंखें बंद की और हमेशा के लिए सो गया।
निशा ने उसकी कब्र रेगिस्तान में बनाई जहां वह पहली बार आई थी। वह रोज उसकी कब्र पर जाती, फूल रखती और कहती, “तुम मेरे हो हमेशा के लिए।” रेगिस्तान की बारिश अब निशा के आंसुओं से भीगती थी। लेकिन वह जानती थी मोहब्बत कभी मरती नहीं, वो बस एक याद बनकर दिल में रह जाती है।
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