IPS बेटी के सामने रो पड़ा बुज़ुर्ग ब्राह्मण| कुंभ मेले में खोई बेटी की सच्ची कहानी | Emotional Story

.
.
.

कुंभ की भीड़ में खोई बेटी

सुबह की धूप पुलिस अधीक्षक कार्यालय की सीढ़ियों पर बेरहमी से बरस रही थी।
डामर की सड़क तवे की तरह तप रही थी और खाकी वर्दियों में तैनात सिपाहियों की पीठ पसीने से भीग चुकी थी। सायरनों की आवाज़, गाड़ियों की आवाजाही और आदेशों की कठोर पुकार के बीच एक ऐसा दृश्य उभरा, जिसे किसी ने पहले गंभीरता से नहीं लिया।

मुख्य द्वार की ओर एक बुज़ुर्ग व्यक्ति लाठी टेकता हुआ बढ़ रहा था।

उसके पांवों में चप्पल नहीं थी।
धूप से जली ज़मीन पर नंगे पांव चलते हुए वह बार-बार लड़खड़ा जाता, फिर खुद को संभालता और आगे बढ़ता। उम्र सत्तर के पार रही होगी। धोती मैली और फटी हुई थी, जैसे बरसों से किसी नए कपड़े ने उसके शरीर को छुआ ही न हो। माथे पर चंदन का धुंधला-सा तिलक और गले में तुलसी की कंठी—जो उसके सनातनी संस्कारों और ईश्वर में अटूट विश्वास की गवाही दे रहे थे।

लेकिन उसकी आंखें…
उन आंखों में विश्वास नहीं था।
उनमें था दर्द, असहायता और वर्षों से दबा हुआ एक अंतहीन शोक।

उसका नाम था पंडित दीनाना

वह कांपती आवाज़ में गेट पर खड़े संतरी से बोला,
“बेटा… बड़े साहब से मिलना है। एक रपट लिखवानी है।”

संतरी ने ऊपर से नीचे तक उसे देखा—जैसे इंसान नहीं, कोई बोझ हो।
होंठों पर उपेक्षा भरी मुस्कान आई।

“यह कोई धर्मशाला नहीं है बाबा। यह एसपी मैडम का दफ्तर है। जाओ, किसी थाने में जाओ। यहां भीड़ मत बढ़ाओ।”

शब्द तीर बनकर दीनाना के सीने में उतर गए।

वह कुछ पल खड़ा रहा, फिर जैसे भीतर की सारी ताकत खत्म हो गई हो—वहीं सीढ़ियों के पास तपती ज़मीन पर बैठ गया।
आंखों से आंसू टपकने लगे।

“हे भगवान…”
उसकी सिसकी हवा में घुल गई।
“मेरी कोई नहीं सुनता। मेरी सावित्री अस्पताल में तड़प रही है… और यहां कोई मेरी सुनने वाला नहीं।”


ऊपर का कमरा

एसपी कार्यालय की दूसरी मंज़िल पर वातानुकूलित केबिन में आईपीएस अदिति सिंह फाइलों में डूबी हुई थीं।

बत्तीस साल की उम्र, तेज धार जैसी बुद्धि, अनुशासन में ढली हुई। अपराधियों के लिए भय और आम जनता के लिए भरोसे का नाम। लेकिन इस कठोर वर्दी के भीतर एक संवेदनशील मन भी था, जो अन्याय देखकर बेचैन हो उठता था।

अचानक उनकी नज़र खिड़की से बाहर गई।

नीचे धूप में बैठा वह बूढ़ा आदमी…
झुकी हुई कमर, कांपते कंधे और आंखों से बहते आंसू।

अदिति का दिल एक पल को ठिठक गया।

उन्हें अपने पिता की छवि याद आ गई—वैसी ही झुकी पीठ, वैसी ही थकी आंखें।

उन्होंने घंटी बजाई।

“दीपक!”
हवलदार दौड़ता हुआ आया।

“नीचे गेट पर वह बुज़ुर्ग कौन है? और धूप में क्यों बैठा रो रहा है?”

दीपक ने लापरवाही से कहा,
“मैडम, कोई भिखारी लगता है। शायद ड्रामा कर रहा है।”

यह सुनते ही अदिति का चेहरा सख्त हो गया।

“ड्रामा?”
उनकी आवाज़ में आग थी।
“एक बुज़ुर्ग की बेबसी तुम्हें ड्रामा लगती है?”

“उसे तुरंत, पूरे सम्मान के साथ मेरे केबिन में लेकर आओ। और उस संतरी से कहना—अगर दोबारा किसी फरियादी से ऐसा व्यवहार किया, तो वर्दी उतर जाएगी।”


एक मुलाक़ात जो किस्मत बदल दे

कुछ ही देर में पंडित दीनाना कांपते कदमों से केबिन में लाए गए।

ठंडी हवा में भी उनका पसीना नहीं सूख रहा था।
डर उनके चेहरे पर साफ़ लिखा था।

अदिति ने आगे बढ़कर खुद उन्हें सहारा दिया।

“बैठिए बाबा… डरिए मत।”

उन्होंने अपने हाथों से उन्हें पानी पिलाया।

उस एक स्पर्श में वर्षों की सख्ती पिघल गई।

दीनाना फूट-फूट कर रो पड़े।

उन्होंने अपनी पोटली दिखाई—
“बेटी… इसमें मेरी पत्नी सावित्री की दवाइयों के पैसे थे। कुंभ से लौटते समय मंदिर की सीढ़ियों पर किसी ने छीन लिया। थाने गया, वहां मुझे भगा दिया गया…”

अदिति सुनती रहीं।
फिर एक सवाल किया—

“बाबा… आपकी कोई संतान नहीं है?”

दीनाना की आंखें शून्य में टिक गईं।

“थी…”
आवाज़ कांप गई।
“एक बेटी थी। गुंजन। पच्चीस साल पहले कुंभ के मेले में… भीड़ में खो गई।”

गुंजन।

यह नाम अदिति के कानों में हथौड़े की तरह बजा।

उनका बचपन…
अनाथालय…
पुराना नाम…
टखने का जला हुआ निशान…

अदिति घुटनों के बल बैठ गईं।

“बाबा… क्या आपकी बेटी को अमरूद बहुत पसंद थे?”
“क्या आप उसे गुड़िया रानी कहते थे?”

दीनाना हक्के-बक्के रह गए।

“हां… तुम कैसे जानती हो?”

अदिति की आंखों से आंसू बह निकले।

“क्योंकि… मैं ही आपकी गुंजन हूं।”


पिता का आंसू, बेटी की गोद

कमरे में समय थम गया।

दीनाना कांपते हाथों से अदिति के सिर पर हाथ रख पाए।

“मेरी बेटी…”
“मेरी गुड़िया…”

आईपीएस अधिकारी—जिससे पूरा जिला कांपता था—आज एक पिता के पैरों में सिर रखकर रो रही थी।

यह मिलन केवल खून का नहीं था।
यह धैर्य, विश्वास और नियति का मिलन था।


न्याय का मार्ग

अदिति ने जाना कि मां सावित्री वृद्धाश्रम में बीमार पड़ी हैं।
चाचा धनराज ने धोखे से संपत्ति हड़प ली।

अब बेटी नहीं रुकी।

इंस्पेक्टर जिसने पिता को भगा दिया था—सस्पेंड हुआ।
चाचा धनराज—गिरफ्तार हुआ।
गांव वालों ने सच बोला।
जमीन वापस मिली।


अंत नहीं, संदेश

आज पंडित दीनाना और सावित्री अपने ही घर के आंगन में बैठे हैं।
तुलसी फिर हरी है।
दीपक जल रहा है।

अदिति जानती हैं—
वर्दी का असली रंग खाकी नहीं, मानवीयता है।

और यह कहानी हमें बस इतना याद दिलाती है—

माता-पिता ईश्वर का सबसे जीवित रूप हैं।
जो उन्हें ठुकराता है, वह कभी सुख नहीं पाता।