पत्नी ने अफ़सर बनने से पहले पति को तलाक दे दियाजॉइनिंग के बाद फिर जो हुआ… कोई सोच भी नहीं सकता |

सपनों की वेदी: जब सफलता ने रिश्तों का गला घोंट दिया

यह कहानी आदित्य और काव्या की है, लेकिन वास्तव में यह उन हजारों मूक संघर्षों की कहानी है जो अक्सर बंद कमरों और अनकही रातों में दम तोड़ देते हैं। यह एक ऐसे पति की कहानी है जिसने अपनी दुनिया बेच दी ताकि उसकी पत्नी एक नया संसार बसा सके, और एक ऐसी पत्नी की कहानी है जिसे ऊँचाइयों पर पहुँचकर अपनी ही नींव ‘बोझ’ लगने लगी।

अध्याय 1: एक साधारण शुरुआत, एक असाधारण सपना

आदित्य एक बहुत ही साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाला युवक था। स्वभाव से शांत, मेहनती और संतोषी। जब उसकी शादी काव्या से हुई, तो उसे लगा कि उसकी साधारण जिंदगी में एक रंग भर गया है। काव्या सुंदर थी, बुद्धिमान थी और उसकी आँखों में एक ऐसी चमक थी जिसे आदित्य ‘जूनून’ समझ बैठा।

शादी की पहली रात काव्या ने आदित्य से कहा था, “आदित्य, मैं सिर्फ एक गृहिणी बनकर नहीं रह सकती। मुझे अफसर बनना है। मुझे समाज में अपनी पहचान बनानी है।”

आदित्य ने उसका हाथ थामकर कहा, “काव्या, तुम्हारे सपने अब मेरे सपने हैं। अगर तुम्हें आगे बढ़ने के लिए मेरी जरूरत पड़ेगी, तो तुम मुझे हमेशा अपने पीछे खड़ा पाओगी।” उस समय आदित्य को अंदाजा भी नहीं था कि यह वादा उसे किस हद तक तोड़ देगा।

अध्याय 2: संघर्ष की काली रातें

वे शहर के एक छोटे से किराए के कमरे में रहने लगे। काव्या ने लोक सेवा आयोग (PCS) की तैयारी शुरू कर दी। किताबें, कोचिंग की महंगी फीस, टेस्ट सीरीज और शहर का खर्च—आदित्य की छोटी सी निजी नौकरी के लिए यह सब संभालना नामुमकिन सा था।

आदित्य ने अपनी जरूरतों को मारना शुरू कर दिया। उसने दो-दो शिफ्ट में काम किया। दिन में ऑफिस की नौकरी और रात को कभी डिलीवरी बॉय का काम तो कभी गार्ड की ड्यूटी।

कई बार ऐसा होता कि घर में सिर्फ एक व्यक्ति के लायक खाना बचता। आदित्य चुपचाप मुस्कुरा कर कह देता, “काव्या, मैंने ऑफिस में दोस्तों के साथ खा लिया था, तुम खा लो।” जबकि हकीकत में उसका पेट भूख से मरोड़ ले रहा होता था। काव्या अपनी पढ़ाई में इतनी डूबी रहती कि उसने कभी आदित्य की आँखों के नीचे बढ़ते काले घेरों या उसकी घिसी हुई चप्पलों पर ध्यान नहीं दिया।

अध्याय 3: पुश्तैनी जमीन और पत्नी के गहने

एक समय ऐसा आया जब काव्या की मुख्य परीक्षा के लिए दिल्ली के एक बड़े संस्थान में दाखिला लेना जरूरी हो गया। फीस लाखों में थी। आदित्य के पास कोई बचत नहीं थी। उसने बिना काव्या को बताए अपने गाँव की वह पुश्तैनी जमीन बेच दी, जो उसके पिता ने बड़ी मुश्किल से बचाकर रखी थी।

जब काव्या ने पूछा कि इतने पैसे कहाँ से आए, तो आदित्य ने झूठ बोल दिया, “मेरे एक दोस्त ने उधार दिए हैं, तुम बस अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो।”

कुछ समय बाद, जब इंटरव्यू की बारी आई, तो पहनावे और रहने-सहने का खर्च और बढ़ गया। आदित्य ने एक-एक करके काव्या के वे गहने भी गिरवी रख दिए जो उसकी माँ ने बड़े चाव से उसे दिए थे। वह खाली अलमारी को देखकर अक्सर अकेले में रोता, पर काव्या के सामने हमेशा एक चट्टान की तरह खड़ा रहता।

इसी बीच उनके जीवन में एक छोटी सी परी आई—आर्या। आर्या के आने से खुशियाँ तो बढ़ीं, पर जिम्मेदारियाँ और ज्यादा भारी हो गईं। आदित्य ने अपनी नींद का त्याग कर दिया ताकि काव्या पढ़ सके और आर्या की देखभाल भी हो सके।

अध्याय 4: सफलता का नशा और बदलता व्यवहार

अंततः वह दिन आया जिसका सबको इंतजार था। काव्या ने परीक्षा पास कर ली और वह एक अधिकारी बन गई। पूरा गाँव खुश था, आदित्य की आँखों में गर्व के आँसू थे। उसे लगा कि उसके सालों का संघर्ष सफल हो गया।

लेकिन, जैसे ही काव्या के कंधों पर सितारे लगे, उसकी सोच की जमीन खिसकने लगी। अब उसका उठना-बैठना बड़े अफसरों, मंत्रियों और रसूखदार लोगों के बीच होने लगा। जब कोई उससे पूछता कि उसके पति क्या करते हैं, तो काव्या को ‘प्राइवेट नौकरी’ या ‘स्ट्रगलर’ कहते हुए शर्म महसूस होने लगी।

उसे आदित्य के वे खुरदुरे हाथ, उसकी साधारण भाषा और उसकी थकावट अब ‘अनपढ़पन’ लगने लगी। उसे लगने लगा कि आदित्य उसकी नई ‘प्रोफाइल’ के साथ मेल नहीं खाता। यहाँ तक कि अपनी मासूम बेटी आर्या भी उसे अपने करियर की राह में एक बाधा नजर आने लगी।

अध्याय 5: विश्वासघात और तलाक

एक दिन काव्या ने वह कदम उठाया जिसकी कल्पना आदित्य ने कभी नहीं की थी। उसने आदित्य को बुलाया और बहुत ही रूखे स्वर में कहा, “आदित्य, हम दोनों का स्तर अब अलग है। तुम एक ही जगह रुक गए हो और मैं बहुत आगे बढ़ गई हूँ। मुझे लगता है कि हमारा साथ अब संभव नहीं है।”

आदित्य स्तब्ध रह गया। उसने काव्या की आँखों में देखा, पर वहाँ उसे प्यार की जगह सिर्फ सत्ता का अहंकार नजर आया। उसने धीरे से पूछा, “काव्या, क्या मेरी बेची हुई जमीन, गिरवी रखे गहने और वे भूखी रातें भी मेरे ‘स्तर’ को नहीं बढ़ा पाईं?”

काव्या ने नजरें फेर लीं। उसने आदित्य पर कई बेबुनियाद आरोप लगाए और अंततः तलाक के कागजों पर हस्ताक्षर कर दिए। जिस आदमी ने उसे ‘अफसर’ बनाया, उसे ही काव्या ने अपनी जिंदगी से कूड़े की तरह बाहर फेंक दिया।

अध्याय 6: सत्ता का खोखलापन और अकेलापन

तलाक के बाद काव्या की नई जिंदगी शुरू हुई। शानदार बंगला, लाल बत्ती वाली गाड़ी और चारों तरफ ‘जी हुजूर’ करने वाले लोग। उसने आर्या को भी कुछ समय बाद ‘करियर’ का हवाला देकर आदित्य के पास वापस भेज दिया।

काव्या अब पूरी तरह स्वतंत्र थी। इसी दौरान उसकी नजदीकियां विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी से बढ़ीं। वह अधिकारी चतुर था और काव्या के भोलेपन (या अहंकार) का फायदा उठाना जानता था। उसने काव्या को अपनी उँगलियों पर नचाना शुरू किया। काव्या को लगा कि उसे अपनी पसंद का साथी मिल गया है, लेकिन हकीकत में वह सिर्फ एक मोहरा थी।

जल्द ही काव्या का नाम कई गलत फाइलों और घोटालों में आने लगा। जिस अधिकारी पर उसने भरोसा किया था, संकट आते ही उसने काव्या को अकेला छोड़ दिया। ऑफिस में लोग अब उसे सम्मान की नजर से नहीं, बल्कि शक की नजर से देखने लगे थे।

अध्याय 7: आत्म-बोध और पछतावा

एक रात काव्या अपने आलीशान बंगले के ड्राइंग रूम में अकेली बैठी थी। सन्नाटा इतना गहरा था कि उसे अपनी सांसें भी भारी लग रही थीं। अचानक उसे बैंक से एक पुराना नोटिस मिला। वह नोटिस आदित्य के नाम था, जो अभी भी उन गहनों का ब्याज भर रहा था जो उसने काव्या की पढ़ाई के लिए गिरवी रखे थे।

काव्या की आँखों से पर्दे गिरने लगे। उसे याद आया कि जब वह बीमार होती थी, तो आदित्य पूरी रात जागकर उसकी सेवा करता था। उसे याद आया कि कैसे आदित्य ने खुद फटे हुए जूते पहने ताकि काव्या नई किताबें खरीद सके।

उसे एहसास हुआ कि जिस ‘सम्मान’ के लिए उसने अपना घर उजाड़ा, वह सम्मान रेत के महल की तरह ढह रहा था। और जिस ‘प्यार’ को उसने ठुकराया, वही उसके जीवन की एकमात्र असली पूंजी थी।

अध्याय 8: वापसी का दरवाजा बंद था

पछतावे की आग में जलती हुई काव्या एक शाम आदित्य के पुराने घर पहुँची। वह घर अब पहले से बेहतर स्थिति में था। खिड़की से उसने देखा कि आदित्य अपनी बेटी आर्या को पढ़ा रहा था। दोनों के चेहरों पर एक ऐसी शांति और मुस्कान थी, जो काव्या ने पिछले कई सालों में महसूस नहीं की थी।

आदित्य ने काव्या को देखा। उसकी आँखों में न तो नफरत थी और न ही प्यार। सिर्फ एक खालीपन था।

काव्या ने रोते हुए कहा, “आदित्य, मुझे माफ कर दो। मैं भटक गई थी। मुझे अब समझ आया कि असली सफलता क्या होती है।”

आदित्य ने शांति से जवाब दिया, “काव्या, तुमने सफलता को चुना और मैंने सुकून को। तुमने मुझे उस दिन नहीं छोड़ा था जब तुमने तलाक दिया था, तुमने मुझे उस दिन छोड़ दिया था जब तुमने मेरे संघर्ष का मजाक उड़ाया था। अब यह घर और यह बेटी मेरी दुनिया है, और इस दुनिया में तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं बची है।”

उपसंहार: जीवन की सीख

काव्या वापस लौट गई, अपनी उसी तन्हाई और कानूनी लड़ाइयों के बीच। उसने वह सब कुछ पा लिया था जो उसने चाहा था—पद, प्रतिष्ठा और पैसा। लेकिन उसने वह सब कुछ खो दिया था जो एक इंसान को इंसान बनाए रखता है।

आदित्य आज भी एक साधारण जीवन जी रहा है, लेकिन उसकी बेटी की आँखों में उसके लिए जो सम्मान है, वह किसी भी सरकारी मेडल से बड़ा है।

कहानी की सीख: ऊँचाइयों पर पहुँचकर उन सीढ़ियों को कभी लात मत मारो जिनके सहारे तुम ऊपर पहुँचे हो, क्योंकि उतरते वक्त उन्हीं सीढ़ियों की जरूरत पड़ती है। सफलता अगर अपनों को खोकर मिले, तो वह सफलता नहीं, सबसे बड़ी हार है।

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