महिला ने सोने के हार को ऐसी जगह छुपा लिया जिसकी वजह से महिला के साथ हुआ हादसा/

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भाग 1: कंजूस सेठ और उसकी सुंदर पत्नी

बलरामपुर के तुलसीपुर गाँव में पंकज कुमार नाम का एक व्यक्ति रहता था। पंकज की कपड़े की एक छोटी सी दुकान थी, जो उसकी मेहनत और व्यापारिक सूझबूझ के कारण दिन-दूनी रात-चौगुनी तरक्की कर रही थी। दुकान पर ग्राहकों का तांता लगा रहता था और पंकज अच्छा-खासा पैसा कमाता था। लेकिन पंकज के व्यक्तित्व में एक बहुत बड़ा दोष था—उसका बेतहाशा लालच। वह उस किस्म का आदमी था जिसे समाज में ‘मक्खीचूस’ कहा जाता है। गाँव वाले कहते थे कि यदि पंकज के दूध में मक्खी गिर जाए, तो वह दूध फेंकने के बजाय मक्खी को निचोड़कर बाहर फेंकता था और फिर उस दूध को पी जाता था।

पंकज की पत्नी थी आरजू देवी। आरजू जितनी सुंदर थी, उतनी ही सादगी में रहने को मजबूर थी। उसे सजने-संवरने का बहुत शौक था, लेकिन पंकज की कंजूसी की वजह से उसके पास पहनने के लिए केवल तीन साड़ियाँ थीं, जिन्हें वह धो-धोकर और बदल-बदल कर पहनती थी। आरजू की आँखों में एक बड़ा सपना था—सोने का एक हार। पिछले एक साल से वह हर दिन पंकज से गुजारिश करती थी, “जी, एक छोटा सा सोने का हार बनवा दीजिए।” लेकिन पंकज एक कान से सुनता और दूसरे से निकाल देता। उसके लिए पैसा तिजोरी में रखने की चीज़ थी, पत्नी के गले की शोभा बढ़ाने की नहीं।

भाग 2: नौकर विकास और वासना का जाल

जैसे-जैसे दुकान का काम बढ़ा, पंकज को एक नौकर की ज़रूरत महसूस हुई। पहले तो उसका लालची मन नौकर को तनख्वाह देने के विचार से ही पीछे हट गया, लेकिन जब काम हाथ से निकलने लगा, तो उसने विकास नाम के एक सुंदर और हट्टे-कट्टे नौजवान को नौकरी पर रख लिया। तय हुआ कि विकास दुकान का काम भी देखेगा और घर के छोटे-मोटे काम भी करेगा।

जिस दिन विकास पहली बार पंकज के घर पहुँचा, आरजू को देखते ही उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने इतनी सुंदर महिला पहले कभी नहीं देखी थी। दूसरी तरफ, आरजू भी विकास के व्यक्तित्व की ओर आकर्षित हुए बिना न रह सकी। पति की उपेक्षा और कंजूसी ने उसके मन में जो खालीपन पैदा किया था, उसे भरने के लिए उसे विकास एक सहारा दिखने लगा।

10 अक्टूबर 2025 की वह सुबह आरजू के जीवन में एक नया मोड़ लेकर आई। पंकज दुकान पर अपना टिफिन भूल गया था। जब उसने फोन किया, तो आरजू टिफिन लेकर दुकान पहुँची। वहाँ विकास और आरजू की नज़रें मिलीं और उस एक पल में बहुत कुछ बदल गया। उसी दिन पंकज ने बताया कि उसे सामान खरीदने के लिए दो दिनों के लिए दिल्ली जाना पड़ेगा। आरजू के लिए यह एक सुनहरा मौका था।

पंकज के जाते ही आरजू ने विकास को रात में घर आने का न्योता दिया। लेकिन यह केवल शारीरिक आकर्षण नहीं था; आरजू के मन में अपना ‘सोने का हार’ पाने का लालच अभी भी जिंदा था। उसने विकास के सामने एक शर्त रखी—वह उसके साथ समय बिताएगी, लेकिन बदले में विकास को उसे पैसे देने होंगे। विकास, जो आरजू की सुंदरता पर मोहित था, अपनी ₹14,000 की तनख्वाह में से ₹5,000 उसे देने को तैयार हो गया। उस रात बंद कमरों में नैतिकता की सारी दीवारें ढह गईं।

भाग 3: चोरी और शक की शुरुआत

कुछ समय तक यह सिलसिला चलता रहा। आरजू का लालच बढ़ता गया। ₹5,000 से सोने का हार आना मुमकिन नहीं था। उसने विकास को उकसाया कि वह पंकज की दुकान के गल्ले (तिजोरी) से पैसे चुराए। विकास ने वही किया। वह दुकान से चोरी करता और आधा पैसा आरजू को दे देता। लेकिन पाप के पैर नहीं होते। विकास का आरजू के घर बार-बार आना पड़ोसियों की नज़रों में खटकने लगा।

दिनेश नाम के एक पड़ोसी ने पंकज को आगाह किया, “पंकज भाई, तुम्हारा नौकर तुम्हारी पीठ पीछे तुम्हारे घर बहुत चक्कर काटता है।” पंकज, जो खुद चतुर था, फौरन सतर्क हो गया। उसने बिना कोई हंगामा किए विकास को नौकरी से निकाल दिया। आरजू के लिए यह एक बड़ा झटका था। उसका हार पाने का जरिया बंद हो गया था।

भाग 4: सुनार अनूप सिंह का खतरनाक प्रस्ताव

आरजू की बेचैनी देखकर उसकी एक सहेली सावित्री ने उसे गाँव के सुनार अनूप सिंह के बारे में बताया। सावित्री ने दबी जुबान में कहा, “अनूप सिंह के पास हार तो बहुत अच्छे हैं, लेकिन वह आदमी ‘नाड़े का ढीला’ (चरित्रहीन) है। अगर तुम उसे संभाल सको, तो हार तुम्हारा हो सकता है।”

हार की चाहत ने आरजू की बुद्धि पर पर्दा डाल दिया था। 3 नवंबर 2025 को वह अनूप सिंह की दुकान पर पहुँची। अनूप सिंह तो जैसे इसी मौके के इंतज़ार में था। उसने सीधे-सीधे प्रस्ताव रखा, “भाभी जी, हार तो मिल जाएगा, लेकिन उसके लिए आपको मुझे खुश करना होगा।” आरजू ने हामी भर दी। अनूप ने उसे अपने घर बुलाया क्योंकि उसकी पत्नी मायके गई हुई थी।

उस रात शराब के नशे में धुत अनूप सिंह और आरजू के बीच फिर से मर्यादाओं का उल्लंघन हुआ। लेकिन जब काम खत्म हुआ, तो अनूप अपनी बात से मुकर गया। उसने कहा, “आज हार तैयार नहीं है, कल रात फिर आना।” आरजू ठगी सी महसूस कर रही थी, लेकिन वह इतनी दूर आ चुकी थी कि पीछे मुड़ना नामुमकिन था।

भाग 5: वो काली रात और घातक चोरी

अगली रात आरजू फिर अनूप के घर पहुँची। फिर वही सब हुआ। इसके बाद अनूप उसे अपनी दुकान में ले गया और उसके सामने सोने के तीन कीमती हार रख दिए। आरजू की आँखों में चमक आ गई। उसका लालच चरम पर था। वह केवल एक नहीं, बल्कि और भी हार चाहती थी।

अचानक दुकान की बिजली गुल हो गई। अंधेरे का फायदा उठाकर आरजू ने एक हार अपने हाथ में ले लिया और दूसरा हार अनूप की नज़रों से बचाने के लिए अपने शरीर के ‘संवेदनशील हिस्से’ (निचले अंग) में छिपा लिया। उसे लगा कि अनूप उसे पकड़ नहीं पाएगा। जब लाइट आई, तो अनूप को एक हार गायब मिला। उसने आरजू की तलाशी ली, लेकिन हार हाथ नहीं आया। हारकर उसने आरजू को एक हार ले जाने दिया और विदा कर दिया।

भाग 6: हादसे का अंत

आरजू जीत की खुशी लेकर घर की ओर बढ़ी, लेकिन रास्ते में ही उसे असहनीय दर्द होने लगा। वह हार, जो उसकी जीत का प्रतीक था, अब उसके शरीर को अंदर से छलनी कर रहा था। घर पहुँचकर जब वह शौचालय में उसे निकालने की कोशिश करने लगी, तो तेज़ रक्तस्राव (Bleeding) शुरू हो गया। हार के नुकीले किनारों ने उसके अंदरूनी अंगों को बुरी तरह काट दिया था।

खून इतना अधिक बहने लगा कि आरजू फर्श पर गिर पड़ी। दर्द और मौत को करीब देखकर उसने अपने सोते हुए पति पंकज को जगाया। जब पंकज ने खून से लथपथ अपनी पत्नी को देखा, तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। मरते-मरते आरजू ने अपनी पूरी काली करतूत और उस हार की कहानी बयान कर दी।

रात के 1 बजे पंकज उसे लेकर अस्पताल पहुँचा, लेकिन बहुत देर हो चुकी थी। डॉक्टरों ने कहा कि अत्यधिक खून बह जाने के कारण उसे बचाना नामुमकिन है। चार घंटे के संघर्ष के बाद आरजू ने दम तोड़ दिया।

निष्कर्ष

आरजू देवी की यह दुखद कहानी हमें यह सिखाती है कि लालच की कोई सीमा नहीं होती और जब यह लालच नैतिकता की सीमाओं को लांघ जाता है, तो अंत केवल विनाश होता है। आरजू ने एक हार के लिए अपना चरित्र, अपना परिवार और अंततः अपनी जान दांव पर लगा दी। लेकिन इस कहानी में पंकज कुमार का लालच भी कम गुनहगार नहीं था। यदि उसने अपनी पत्नी की जायज इच्छाओं को समय पर पूरा किया होता और अपनी कंजूसी को प्रेम से ऊपर न रखा होता, तो शायद आरजू कभी गलत रास्तों पर न भटकती।

आरजू की मृत्यु के बाद तुलसीपुर गाँव की वह सुबह आम दिनों जैसी नहीं थी। हवा में एक भारीपन था और पंकज कुमार के उस घर में, जहाँ कभी समृद्धि की चर्चा होती थी, अब केवल सन्नाटा और पश्चाताप की चीखें गूँज रही थीं। आरजू की मौत ने केवल एक जीवन का अंत नहीं किया, बल्कि कई जिंदगियों को मलबे में तब्दील कर दिया।

पंकज कुमार का अंतहीन पश्चाताप पंकज, जो कभी एक-एक पैसे को दाँतों से पकड़कर रखता था, आज अपनी तिजोरी में रखे नोटों के बंडलों को देखकर फूट-फूट कर रो रहा था। उसे समझ आ गया था कि उसके पास जमा वह सारा धन बेकार है, जो उसकी पत्नी की एक छोटी सी इच्छा पूरी न कर सका। वह सोने का हार, जिसे पाने के लिए आरजू ने अपनी जान दे दी, अब पंकज के लिए किसी जहरीले नाग जैसा था। समाज में उसकी इज्जत मिट्टी में मिल चुकी थी। लोग उसे सहानुभूति की नजर से नहीं, बल्कि एक ऐसे ‘लालची पति’ के रूप में देख रहे थे जिसकी कंजूसी ने उसकी पत्नी को भटकने पर मजबूर कर दिया। वह अब अकेलेपन की उस जेल में कैद हो गया था, जहाँ से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं था।

मासूम बबलू का उजड़ा बचपन इस पूरी घटना का सबसे दर्दनाक पहलू आरजू का बेटा बबलू था। वह मासूम नहीं जानता था कि उसकी माँ उसे छोड़कर कहाँ चली गई है। जिस घर में कल तक माँ की डाँट और दुलार था, वहाँ अब पुलिस की पूछताछ और पड़ोसियों की कानाफूसी थी। माँ के चरित्र पर उठने वाले सवालों और पिता की चुप्पी के बीच उस बच्चे का बचपन कहीं खो गया। एक माँ का साया उठ जाने और पिता के मानसिक रूप से टूट जाने के कारण बबलू का भविष्य अंधकारमय हो गया। वह उस पाप की सजा भुगतने के लिए अभिशप्त था, जो उसने किया ही नहीं था।

अनूप सिंह और विकास का हश्र कानून के हाथ लंबे थे। आरजू के मृत्यु पूर्व बयान और पंकज की शिकायत के आधार पर पुलिस ने जाँच शुरू की। अनूप सिंह सुनार, जिसे अपने पैसे और रुतबे पर बड़ा घमंड था, सलाखों के पीछे पहुँच गया। उसके घर की तलाशी ली गई, जहाँ से वह चोरी का हार बरामद हुआ। उसकी वर्षों की बनी-बनाई इज्जत नीलाम हो गई, उसका व्यापार ठप पड़ गया और उसका परिवार समाज के बहिष्कार के कारण गाँव छोड़ने पर मजबूर हो गया। वहीं विकास, जो कभी सुंदर भविष्य के सपने देखता था, चोरी और अनैतिक संबंधों के आरोप में जेल की हवा खाने लगा। उसका नाम अब एक ‘भरोसेमंद नौकर’ के रूप में नहीं, बल्कि एक ‘विश्वासघाती’ के रूप में लिया जाने लगा।

समाज के लिए एक सबक तुलसीपुर की गलियों में यह कहानी वर्षों तक एक चेतावनी की तरह सुनाई जाती रही। इस हादसे ने गाँव के हर घर को झकझोर कर रख दिया। इसने पुरुषों को सिखाया कि केवल धन कमाना ही काफी नहीं है, बल्कि अपनों की भावनाओं और सम्मान का ख्याल रखना भी जरूरी है। वहीं, इसने यह भी स्पष्ट कर दिया कि शॉर्टकट और गलत रास्ते से हासिल की गई खुशी हमेशा विनाश की ओर ले जाती है। आरजू का वह सोने का हार कभी उसके गले की शोभा नहीं बन पाया, बल्कि वह उसकी कफन की गाँठ बन गया।

अंततः, यह हादसा एक ऐसी स्याह लकीर खींच गया जिसने यह साबित कर दिया कि जब इंसान अपनी मर्यादा और ईमानदारी को त्याग कर लालच की अंधी दौड़ में दौड़ता है, तो मंजिल केवल श्मशान होती है।