बेटा चुप रहा, बहू मारती रही… SDM बेटी आई… फिर जो हुआ… इंसानियत रो पड़ी! | Emotional Story

रिश्तों का इंसाफ: एक एसडीएम बेटी की कहानी
अध्याय 1: भोपाल की व्यस्त सुबह और अधूरा मन
भोपाल की सुबह हमेशा अपनी रफ्तार से चलती थी। सूरज की पहली किरण के साथ ही कलेक्ट्रेट की ऊँची इमारत फाइलों की गूँज और सिपाहियों के बूटों की आवाज से जीवंत हो उठती थी। इसी प्रशासनिक तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थीं एसडीएम आस्था मिश्रा।
आस्था—28 वर्ष की एक तेजतर्रार अधिकारी, जिसकी आंखों में बुद्धिमत्ता और चेहरे पर एक सख्त अनुशासन झलकता था। शहर उन्हें ‘सागर की शेरनी’ कहता था, जिसने अभावों से लड़कर यह मुकाम हासिल किया था। लोग मिसाल देते थे कि एक गरीब घर की बेटी कैसे एसडीएम बन गई। लेकिन उस सफलता की चमक के पीछे आस्था का एक हिस्सा हर पल मर रहा था। उसे अपनी माँ, श्यामली देवी की याद सताती थी, जो सागर के एक छोटे से घर में अपने बेटे नितिन के साथ रहती थीं।
आस्था को हर दिन लगता था कि वह पूरी दुनिया को न्याय दे रही है, पर क्या वह अपने घर में न्याय कर पा रही है? वह माँ को फोन लगाती, पर उधर से अक्सर सन्नाटा मिलता या भाई नितिन की घबराई हुई आवाज। आज भी जब आस्था ने ऑफिस में अकेले होने पर माँ का नंबर मिलाया, तो चौथी बार भी फोन नहीं उठा। आस्था के दिल में कुछ चटक गया। उसे लगा जैसे हवा में भी कुछ अशुभ तैर रहा है।
अध्याय 2: सागर का सन्नाटा और एक माँ का दर्द
सागर की गलियों में रात पसर चुकी थी। जहाँ लोग सो रहे थे, वहाँ श्यामली देवी का दिल कांप रहा था। वे रसोई के कोने में बैठी आधा गिलास पानी और दो बासी रोटियां लेकर अपना पेट भरने की कोशिश कर रही थीं। उनके चेहरे पर पुराने दुखों की गहरी खरोंचें थीं।
तभी बाहर वाले कमरे से उनकी बहू, प्रहति की चीख गूँजी, “अरे बुढ़िया! अभी तक बैठी है?”
प्रहति की आवाज में केवल गुस्सा नहीं, बल्कि इंसानियत की मौत थी। श्यामली देवी ने झट से अपनी रोटी छुपा ली, जैसे वे कोई चोरी कर रही हों। जब वे कांपते कदमों से हॉल में आईं, तो प्रहति ने उन्हें ‘बोझ’ कहकर अपमानित करना शुरू कर दिया।
“दिन भर बस अपनी बेटी की फोटो देखकर रोती रहती है, और काम एक धेला नहीं करती!” प्रहति ने ताना मारा।
नितिन, जो वहीं बैठा था, उसने अपने मोबाइल से नजरें भी नहीं उठाईं। उसकी चुप्पी माँ के सीने में किसी खंजर की तरह उतर गई। माँ ने जब कहा कि “शायद मेरे मरने से तुम सबका बोझ कम हो जाए,” तो प्रहति ने गुस्से में जमीन पर प्लेट पटक दी। “हाँ, जाके मर जा कहीं!”
उसी वक्त बाहर एक सरकारी गाड़ी रुकी। दरवाजे का हैंडल घूमा और एसडीएम आस्था मिश्रा ने घर के अंदर कदम रखा।
अध्याय 3: कानून और ममता का टकराव
दरवाजा खुलते ही आस्था ने जो देखा, उसने उसकी आत्मा को झकझोर दिया। माँ दीवार से सटी कांप रही थी और प्रहति के हाथ में झाड़ू हवा में उठा हुआ था। आस्था की आँखों में खून उतर आया।
“प्रहति! झाड़ू नीचे रखो,” आस्था की आवाज में वह कड़क थी जिसने बड़े-बड़े अपराधियों को झुका दिया था।
आस्था ने दौड़कर माँ को गले लगा लिया। माँ के माथे पर चोट का निशान और कलाइयों पर नीले-काले घेरे देखकर आस्था का कलेजा फट गया। “माँ… यह किसने किया?” माँ ने कुछ नहीं कहा, बस रोने लगीं।
जब नितिन ने इसे ‘घर की बात’ कहकर दबाने की कोशिश की, तो आस्था उस पर बरस पड़ी। “जहाँ माँ को झाड़ू से पीटा जाए और भूखा रखा जाए, वह घर नहीं, नरक है नितिन!”
आस्था ने तुरंत इंस्पेक्टर राघव को फोन लगाया। “मेरे घर पर घरेलू हिंसा हो रही है, पुलिस भेजिए।” माँ ने हाथ जोड़े, “बेटी, घर टूट जाएगा।” पर आस्था ने रोते हुए कहा, “माँ, घर तो कब का टूट चुका है, बस ये दीवारें बची हैं।”
अध्याय 4: अस्पताल की रात और कड़वी हकीकत
माँ को अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टर की रिपोर्ट ने आस्था के होश उड़ा दिए। माँ के शरीर पर पुराने घावों के निशान थे, जो बताते थे कि यह प्रताड़ना महीनों से चल रही थी। आस्था वार्ड में माँ के सिरहाने बैठी रो रही थी। वह अपनी फाइलों में दूसरों का हक ढूंढती रही, और यहाँ उसकी अपनी माँ के हक को उसके ही अपनों ने कुचल दिया था।
बाहर नितिन और प्रहति खड़े थे। प्रहति अब पैरों में गिरकर माफी मांग रही थी, लेकिन उसकी आँखों में दर्द नहीं, जेल जाने का डर था। नितिन अभी भी ‘लोग क्या कहेंगे’ की चिंता में डूबा था।
आस्था बाहर आई और उसने भाई से केवल एक सवाल पूछा, “तूने माँ को क्यों नहीं बचाया?” नितिन ने कहा, “दीदी, मैं फंस गया था… प्रहति बच्चों को लेकर चली जाती।” आस्था ने उसे आइना दिखाया, “तो तूने बच्चों के लिए माँ को कुर्बान कर दिया?”
अध्याय 5: एक नया सवेरा
अगली सुबह, आस्था ने अपना फैसला सुना दिया। उसने प्रहति पर एफआईआर दर्ज करवाई और उसे कानून के हवाले कर दिया। जब नितिन ने माँ को वापस घर ले जाने की बात की, तो श्यामली देवी ने पहली बार अपना मौन तोड़ा।
“नितिन, मैंने तुझे बहुत बार माफ किया, पर अब मैं खुद को बचाना चाहती हूँ। मैं उस घर में वापस नहीं जाऊंगी।”
आस्था माँ को लेकर भोपाल आ गई। सरकारी क्वार्टर के शांत कमरे में जब पहली बार माँ ने चैन की सांस ली, तो उन्होंने आस्था से कहा, “बेटी, आज पहली बार मुझे डर नहीं लग रहा।”
आस्था ने माँ को अपनी गोद में सुलाया। उसे अहसास हुआ कि आज उसने केवल एक अधिकारी के रूप में नहीं, बल्कि एक बेटी के रूप में अपनी सबसे बड़ी जंग जीती थी। उसने दुनिया को बता दिया कि बुढ़ापा बोझ नहीं होता, और माँ का अपमान करने वाला चाहे कोई भी हो, कानून और कुदरत उसे कभी माफ नहीं करते।
निष्कर्ष: यह कहानी हमें सिखाती है कि सफलता तब तक अधूरी है जब तक आपके माता-पिता आपकी छत के नीचे सुरक्षित और सम्मानित महसूस न करें।
News
60 साल के बुजुर्ग को कॉफी नहीं दे रहा था रेस्टोरेंट स्टॉफ, फिर एक मैसेज से हिल गया पूरा रेस्टोरेंट
60 साल के बुजुर्ग को कॉफी नहीं दे रहा था रेस्टोरेंट स्टॉफ, फिर एक मैसेज से हिल गया पूरा रेस्टोरेंट…
पोती ने परेशान होकर उठाया बड़ा कदम/गांव के सभी लोग दंग रह गए/
पोती ने परेशान होकर उठाया बड़ा कदम/गांव के सभी लोग दंग रह गए/ रिश्तों का कत्ल: बागपत की एक दर्दनाक…
पुनर्जन्म | एक सैनिक की अधूरी कहानी। पुनर्जन्म की कहानी। Hindi Story
पुनर्जन्म | एक सैनिक की अधूरी कहानी। पुनर्जन्म की कहानी। Hindi Story सरहद पार का वादा: एक रूह, दो मुल्क…
7 साल बाद बेटी IAS बनकर लौटी… माँ-बाप को टूटी झोपड़ी में देखकर रो पड़ी | फिर जो हुआ…
7 साल बाद बेटी IAS बनकर लौटी… माँ-बाप को टूटी झोपड़ी में देखकर रो पड़ी | फिर जो हुआ… सोनपुर…
गुरु-शिष्य का रिश्ता और वो बंद कमरा | आखिर क्या हुआ था? | Investigation
गुरु-शिष्य का रिश्ता और वो बंद कमरा | आखिर क्या हुआ था? | Investigation 13 जुलाई 2025 की वह तारीख…
लाल किले पर गरीब लड़के का भाषण सुनकर PM भी रो पड़े 😭 | 26 January Heart Touching Story | Republic Day
लाल किले पर गरीब लड़के का भाषण सुनकर PM भी रो पड़े 😭 | सच्चाई का आईना: लाल किले की…
End of content
No more pages to load

