फेक IPS ने करोड़पति बुजुर्ग Doctor पति-पत्नी से 14.85 करोड़ ठगकर बनाया भिखारी!

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10 जनवरी 2026 की सुबह दिल्ली की हवा में सर्दी थी, लेकिन एक 77 साल की बुज़ुर्ग महिला के हाथों की कंपकंपी ठंड से नहीं थी। वह अपने मोबाइल को इस तरह पकड़े थी जैसे वह फोन नहीं—कोई फंदा हो, जो उसकी कलाई से बंधा हो। उसका चेहरा पीला पड़ चुका था, आँखों के नीचे नीली रेखाएँ थीं और होंठ बार-बार सूख रहे थे। वह डॉक्टर थी—लोगों के दिल की धड़कन सुनने वाली। आज वही धड़कन खुद अपने अंदर सुन नहीं पा रही थी।

वह थाने के भीतर दाखिल हुई, मानो कोई अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में पहुँचा हो। फर्क बस इतना था कि यहाँ “मरीज” उसका भरोसा था—और “चोट” उसके जीवन भर की कमाई पर लगी थी।

उसके कान में वही आवाज़ लगातार चल रही थी, जो पिछले कई दिनों से उसे जकड़े हुए थी—कड़क, आत्मविश्वास से भरी, अधिकार की चादर ओढ़े।
“मैडम, जल्दी से अपने नजदीकी पुलिस स्टेशन जाइए। वहाँ के अधिकारी को लाइन पर लाइए। अभी।”

थाने में महिला सिपाही ने उसे देखा—“मैडम, क्या बात है?”
डॉक्टर ने फोन आगे बढ़ा दिया, जैसे कोई भारी चीज़ हाथ से छुड़ाना चाहती हो—“इनसे बात करवा दीजिए… ये IPS ऑफिसर हैं… वी.के. गुप्ता।”

महिला सिपाही ने फोन कान से लगाया। दूसरी तरफ से आवाज़ आई—और कुछ ही सेकंड में लहजा बदल गया।


“तुम्हें किसने बैठाया वहाँ? तुम्हें तमीज़ नहीं है? पढ़ी-लिखी नहीं हो? बेवकूफ!”

सिपाही हड़बड़ा गई। उसे समझ ही नहीं आया कि जवाब क्या दे। वह थाने की एसएओ (महिला अधिकारी) की तरफ देखने लगी—और उसी वक्त एसएओ कमरे में आ गईं।

एसएओ ने फोन लिया। दो-तीन वाक्यों में ही उनकी आँखें सिकुड़ गईं। उन्होंने शांत स्वर में कहा—“आप अपना नाम, बैज नंबर और पोस्टिंग बताइए। और… आप RBI से पैसे रिलीज कराने की बात किस कानून के तहत कर रहे हैं?”

दूसरी तरफ से फिर गाली-गलौज, धमकी, दबाव।
एसएओ ने फोन स्पीकर पर रखा, डॉक्टर की तरफ देखा, और बहुत धीमे—पर साफ शब्दों में कहा:
“मैडम… आपके साथ फ्रॉड हो गया है। ये कोई IPS नहीं है। ये ठग है।”

डॉक्टर की पलकें फड़फड़ाईं। जैसे किसी ने उसके शरीर से सारी ताकत निकाल ली हो। वह कुर्सी पर बैठ गई, माथा पकड़ लिया। एक पल में उसे अपनी ही आवाज़ दूर से आती हुई लगी—“पर… पर… वो तो कोर्ट दिखा रहे थे… जज… लेटर… पुलिस… सब…”

एसएओ ने फाइल निकालते हुए कहा—“धीरे-धीरे बताइए। शुरुआत से।”

और फिर कहानी खुलने लगी—परत दर परत—जैसे किसी पुराने घाव से पट्टी हट रही हो।
और जब रकम सामने आई—14 करोड़ 85 लाख—थाने में मौजूद हर व्यक्ति का चेहरा सख्त हो गया। यह कोई छोटा अपराध नहीं था। यह “ठगी” नहीं—मानसिक कैद थी। इसे आजकल एक शब्द से पहचाना जाता है—डिजिटल अरेस्ट


भाग 1: कॉल जो ‘TRAI’ के नाम से आई, और डर जो नसों में उतर गया

सब कुछ शुरू हुआ था 24 दिसंबर 2025 को, दोपहर के करीब 12 बजे।
ग्रेटर कैलाश-2 में रहने वाली डॉ. इंदिरा तनेजा—जो अमेरिका में दशकों तक सेवा कर चुकी थीं—अपने घर में थीं। पति डॉ. ओम तनेजा, लगभग 80 वर्ष, हाल ही में दिल की सर्जरी के बाद कमजोर थे। दोनों ने 2015 में भारत लौटकर समाज सेवा शुरू की थी—एनजीओ से जुड़कर, गरीब बच्चों का इलाज, फ्री दवाइयाँ, मेडिकल कैंप। उनका जीवन सादगी भरा था, पर आर्थिक रूप से वे सुरक्षित थे।

उस दिन एक WhatsApp ऑडियो कॉल आई।
“मैं TRAI से बात कर रहा हूँ,” दूसरी तरफ से कहा गया।
TRAI—टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी। शब्द इतना “आधिकारिक” लगा कि डॉक्टर ने तुरंत ध्यान दिया।

“आपका नंबर हमेशा के लिए बंद किया जा रहा है,” कॉलर ने कहा, “ये आपकी आखिरी कॉल है।”

डॉ. इंदिरा को जैसे झटका लगा। एक डॉक्टर के लिए मोबाइल सिर्फ फोन नहीं होता—अपॉइंटमेंट, मरीज, सहयोगी, परिवार, सब कुछ।
वह बोलीं—“कैसे? मेरा नंबर क्यों बंद होगा?”

तुरंत दबाव शुरू हुआ—“आपके खिलाफ 26 शिकायतें हैं। आपत्तिजनक कॉल, वीडियो… देश विरोधी गतिविधियाँ… मनी लॉन्ड्रिंग… आतंकवाद!”

ये शब्द ऐसे थे जैसे किसी बुज़ुर्ग के सिर पर एक साथ कई हथौड़े पड़ रहे हों। डर का दिमाग अपना गणित नहीं करता। डर बस आदेश मानता है।

डॉक्टर ने कहा—“ये मेरा नंबर नहीं है।”
कॉलर ने एक दूसरा नंबर बताया—“ये आपके आधार पर जारी है।”

फिर वही चक्र—“आप गिरफ्तारी से पहले सहयोग करें… महाराष्ट्र के कोलाबा थाने में FIR… आपका नाम केस में…”

और फिर अचानक कॉलर ने कहा—“अब बड़े साहब बात करेंगे।”
ऑडियो कॉल… वीडियो कॉल में बदल गई।

स्क्रीन पर एक आदमी दिखा—वर्दी जैसा बैकग्राउंड, सख्त चेहरा, आँखों में अधिकार का अभिनय।
“मैं IPS वी.के. गुप्ता,” उसने कहा।

डॉ. इंदिरा की सांस अटक गई। एक “IPS” स्क्रीन पर है—इंसान अपने आप झुक जाता है।
“मैडम, आपको कोलाबा थाने आना पड़ेगा।”
“मैं दिल्ली में हूँ… इतने दूर कैसे?”
“बहाना मत बनाइए। 1370 किलोमीटर है, ज्यादा नहीं।”

यह वाक्य सिर्फ दूरी नहीं बताता—यह बताता है कि सामने वाला डर को हांक रहा है
फिर उसने बैंक का नाम लिया, अकाउंट का दावा किया, और कहा—“आपके नाम से कैनरा बैंक में अकाउंट खुला है।”

डॉ. इंदिरा घबरा गईं—“मेरे नाम से? मुझे नहीं पता!”
“अंगूठा कैसे दिया?” उसने चिल्लाकर कहा, “बिना बायोमैट्रिक अकाउंट नहीं खुलता!”

बुज़ुर्ग दंपति का दिमाग उलझ गया। तकनीकी बातें, कानून, बैंकिंग नियम—सब कुछ एक साथ। और इसी भ्रम में ठग का फायदा छिपा था।


भाग 2: सेवा का इतिहास, और ठग का ‘भावनात्मक जाल’

डॉ. इंदिरा ने हिम्मत करके अपनी कहानी बताई—“हमने 35 साल अमेरिका में सेवा की है। फिर भारत लौटकर गरीबों का इलाज… हमने कोई अपराध नहीं किया।”

यह वह क्षण था जब फेक IPS का लहजा “कड़क” से “पिघला हुआ” बन गया।
“मैडम, आप मेरी माँ जैसी हैं… बेटी जैसी हैं… परेशान मत होइए… मैं आपकी मदद करूंगा।”

ठग जानता था—डर के बाद अगर सहानुभूति दी जाए, तो पीड़ित उसे “रक्षक” मानने लगता है। और रक्षक पर भरोसा हो जाए, तो आदेश मानना आसान हो जाता है।

फिर उसने “प्रक्रिया” बताई—“आप सुप्रीम कोर्ट के नाम एक लेटर लिखिए, कि आप मुंबई क्यों नहीं आ सकतीं।”

कौन सुप्रीम कोर्ट के नाम लेटर मांगता है फोन पर?
पर डर में यह सवाल नहीं उठता। डर कहता है—“जो कह रहे हैं, कर दो।”

डॉ. इंदिरा ने लेटर लिखा—पति की सर्जरी, लंबी यात्रा संभव नहीं। फोटो खींचकर WhatsApp पर भेज दिया।
फिर एक दूसरा लेटर—“हम जांच में पूरी तरह सहयोग करेंगे, हमारे बैंक अकाउंट चेक करिए…”

और फिर सबसे खतरनाक आदेश—
“इस बात को किसी से शेयर मत करना। अगर आपने बताया, तो नरेश गोयल की टीम आपको मरवा देगी।”

डर को अब “खून” का रंग दे दिया गया था।
और इसी डर से पैदा हुई—चुप्पी

चुप्पी से पैदा हुआ—अलगाव
और अलगाव से पैदा हुई—कैद


भाग 3: ‘ऑनलाइन कोर्ट’, नकली जज और डिजिटल अरेस्ट

26 दिसंबर 2025।
वीडियो कॉल पर एक नया दृश्य—एक “अदालत” जैसा बैकग्राउंड। एक आदमी “जज” की तरह बैठा। शब्दों में ठंडा अधिकार।
डॉ. इंदिरा रोती रहीं, अपनी सेवा बताती रहीं। “जज” ने कहा—
“आपको जांच अधिकारी का सहयोग करना होगा। डॉक्यूमेंट्स देना होगा। यह आपके हित में है।”

यह वही था जिसे आज कई ठग “डिजिटल कोर्ट” के नाम से चलाते हैं—नकली सेटअप, नकली न्याय, और असली डर।

इसके बाद फेक IPS ने कहा—
“अब आप डिजिटल अरेस्ट में हैं। आप फोन कट नहीं करेंगी। किसी से बात नहीं करेंगी। हर निर्देश मानेंगी।”

डॉ. इंदिरा और उनके पति—दोनों को ऐसा लगा जैसे वे सच में कानून के शिकंजे में हैं।
और ठगों ने यही चाहा था:
फोन की लाइन को हथकड़ी बनाना।


भाग 4: हिसाब-किताब, बैंक, RTGS… और पैसा जो जीवन से निकलता गया

अब आदेश आया—“आपके हर बैंक खाते में कितना पैसा है, 1 रुपये तक बताइए।”

डॉ. इंदिरा ने बैंक बताए। रकम बताई। FD, सेविंग्स, निवेश—सब।
ठगों ने एक-एक खाते को “जांच” के नाम पर निशाना बनाना शुरू किया।

वे कहते—
“आपके पैसे ‘सस्पेक्टेड’ हैं। इन्हें ‘सेफ अकाउंट’ में ट्रांसफर करना होगा, ताकि RBI वेरिफिकेशन हो सके।”
और साथ ही—
“बैंक में कोई पूछे तो यही कहानी बोलना। आपने किसी को कुछ बताया तो आपको हथकड़ी लगेगी।”

यहाँ चाल बहुत महीन थी:
ठग पैसे खुद नहीं खींचते—वे पीड़ित से ही अपने हाथों से ट्रांसफर करवाते हैं। ताकि पीड़ित बाद में भी सोचता रहे—“मैंने ही किया…”

इस बीच एक दिन ड्राइवर घर आया। एक्स-रे दिखाने लगा।
डॉ. इंदिरा ने उसे इशारा किया—“शांत रहो, बाद में।”
वीडियो कॉल पर फेक IPS चीखा—
“घर में ये कौन है? आपने हमें क्यों नहीं बताया? बाहर देखिए—सादे कपड़ों में पुलिस घूम रही है। होशियारी की तो हथकड़ी!”

वह बाहर गईं। सच में कुछ लोग आते-जाते दिखे—दिल्ली की सड़क, आम लोग।
पर डर ने उन आम लोगों को “पुलिस” बना दिया।
यही होता है जब इंसान मानसिक कैद में हो—वह हर परछाईं में खतरा देखता है।

फिर बैंक जाना शुरू हुआ—बार-बार।
कभी 2 करोड़, कभी 2.10 करोड़, कभी फिर 2 करोड़…
RTGS की कतार, दस्तखत, फॉर्म, और हर बार एक नई राशि।
ठग “बैंक के सवालों” के जवाब पहले ही रटवा देते—“ये फैमिली ट्रांजैक्शन है… ये प्रॉपर्टी से जुड़ा है…”
(मैं यहां किसी गलत काम की विधि नहीं बता रहा, सिर्फ कहानी के संदर्भ में बता रहा हूँ कि ठग पीड़ितों को झूठ बोलने के लिए मजबूर करते हैं।)

डॉ. ओम तनेजा कमजोर थे। फिर भी पत्नी के साथ बैंक जाते। क्योंकि ठग ने कहा था—
“अगर आपने देरी की, एजेंसी आपको उठा लेगी।”

और यही चलने लगा—15 दिनों तक।
हर दिन कॉल, डर, आदेश, ट्रांसफर।
हर रात वही आवाज़—“फोन मत काटना।”

फिर उन्हें याद आया—50 लाख की एक FD छूट गई है।
पति ने कहा—“बताकर खत्म कर देते हैं, वरना और मुसीबत होगी।”
और वह 50 लाख भी चला गया।

अंत में, जब बैंक खाते खाली होने लगे, तो ठग ने कहा—
“अब नजदीकी पुलिस स्टेशन जाइए। अधिकारी से बात कराइए।”

शायद ठगों का आखिरी खेल था—थाने में जाकर भी उन्हें काबू में रखना।
पर वहाँ पहली बार—उनके सामने असली पुलिस थी।
और असली पुलिस ने पहली ही बात में पहचान लिया:
यह फेक IPS है।


भाग 5: थाने में टूटता भ्रम, और सच जो बहुत देर से आया

एसएओ ने डॉ. इंदिरा से पूछा—“मैडम, आपने अपने बच्चों को बताया?”
डॉ. इंदिरा ने सिर हिलाया—“नहीं… उन्होंने कहा था हत्या करा देंगे…”

“आपने किसी वकील को बताया?”
“नहीं…”

“आपने 1930 पर कॉल किया?”
“नहीं… हमें लगा हम गिरफ्तार हो जाएंगे…”

एसएओ ने गहरी सांस ली—“मैडम, ये पूरा पैटर्न साइबर फ्रॉड का है। आपने सही किया जो आप थाने आ गईं। अब हम तुरंत साइबर यूनिट में केस दर्ज करेंगे।”

कागज निकले। FIR लिखी गई। बैंक ट्रांजैक्शन की लिस्ट मांगी गई।
स्पेशल सेल की साइबर यूनिट—IFSO—को जांच दी गई।
और मीडिया को जब खबर लगी, वह दौड़कर पहुँचा। कैमरे चमके।
डॉ. इंदिरा और डॉ. ओम तनेजा रोते हुए बोले—
“हमने इतने साल सेवा की… हमें सिर्फ डराया गया… हम कुछ समझ नहीं पाए…”

उनका बेटा-बेटी अमेरिका में थे। वे बार-बार कहते थे—“मम्मी-पापा, अब वापस आ जाइए।”
पर दंपति को भारत में सेवा से संतोष मिलता था।
और वही “सेवा की भावना” ठगों ने हथियार बना ली—“आप देश सेवा करते हैं, इसलिए आपको सहयोग करना चाहिए।”


भाग 6: कहानी की सबसे बड़ी सीख—डर को काटिए, कॉल को नहीं

इस घटना का सबसे खौफनाक पहलू पैसा नहीं—मन की हार थी।
ठगों ने 14.85 करोड़ सिर्फ बैंक से नहीं निकाले—
उन्होंने एक बुज़ुर्ग दंपति के भीतर से विश्वास, सुरक्षा और सम्मान भी खींच लिया।

लेकिन अगर आप इस कहानी से एक चीज़ याद रखें—तो वह यह है:

    कोई भी सरकारी एजेंसी WhatsApp/वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी या कोर्ट की कार्यवाही नहीं चलाती।

    “डिजिटल अरेस्ट” जैसी बात—अक्सर ठगी का संकेत है।

    कोई भी अधिकारी आपको “गोपनीयता” के नाम पर परिवार से काटने को नहीं कहता।

    अगर कोई आपको डराए—कॉल काटिए, और खुद पुलिस/साइबर हेल्पलाइन से संपर्क कीजिए।

    भारत में साइबर फ्रॉड के लिए 1930 हेल्पलाइन और संबंधित पोर्टल पर तुरंत रिपोर्ट करने से रिकवरी की संभावना बढ़ती है (जितनी जल्दी, उतना बेहतर)।

और सबसे जरूरी—
डर को “आदेश” मत बनने दीजिए।
डर आता है—तो उसे किसी भरोसेमंद व्यक्ति के साथ बाँटिए। क्योंकि ठग की सबसे बड़ी ताकत होती है:
आपकी चुप्पी।


अंतिम दृश्य: एक खाली घर, और फिर भी बचा हुआ साहस

थाने से निकलते वक्त डॉ. इंदिरा ने एक बार पीछे मुड़कर देखा।
वह वही महिला थी जिसने हजारों मरीजों को भरोसा दिया था—“डरो मत, सब ठीक होगा।”
आज वही शब्द उसे खुद को कहने थे।

पैसा चला गया था।
पर सच सामने आ गया था।
और सच के साथ एक उम्मीद भी—कि सिस्टम अगर तेज़ चले, बैंक समय पर सहयोग करें, और ट्रांजैक्शन तुरंत फ्रीज हो पाए—तो कुछ वापस भी आ सकता है।

लेकिन चाहे कितना भी वापस आए—यह कहानी हर घर के लिए चेतावनी बनकर रहेगी:

फेक वर्दी से डरिए मत।
असली वर्दी से मदद लीजिए।