अहंकार की धूल और न्याय का शिखर: अनामिका और विकास की महागाथा

अध्याय 1: दिल्ली की तंग गलियाँ और सपनों का आंगन

दिल्ली के एक पुराने कोने में बसी वह बस्ती, जहाँ सूरज की रोशनी भी दीवारों के बीच रास्ता ढूंढती हुई पहुँचती थी, विकास और अनामिका का ठिकाना थी। हवा में नालियों की गंध और लोगों के शोर के बीच एक छोटा सा कमरा था, जिसे अनामिका ने अपनी सादगी से घर बना दिया था।

विकास के पिता एक थके हुए रिक्शा चालक थे, जिनकी पीठ समय से पहले झुक गई थी। उसकी माँ, जो दूसरों के घरों में बर्तन माँझती थी, अक्सर कहती थी— “बेटा, हमारे नसीब में सिर्फ मजदूरी है।” पर विकास की आँखों में वर्दी का सपना था। वह चाहता था कि एक दिन वह उस अन्याय को रोक सके जो उसने अपने पिता के साथ होते देखा था।

अनामिका, विकास के जीवन में एक ठंडी हवा के झोंके की तरह आई थी। वह साधारण थी, पर उसकी मेधा असाधारण थी। जब वे दोनों सरकारी लाइब्रेरी की धूल भरी कुर्सियों पर बैठकर पढ़ते थे, तो उन्हें नहीं पता था कि नियति उनके लिए क्या लिख रही है। शादी सादगी से हुई, पर वादे हिमालय जितने ऊँचे थे।

अध्याय 2: अहंकार का उदय और बिखरता संसार

समय बीतता गया, पर सफलता विकास से कोसों दूर रही। हर बार जब वह पुलिस भर्ती की परीक्षा में फेल होता, तो उसका पुरुष अहंकार उसे अंदर से डसने लगता। दूसरी ओर, अनामिका ने घर चलाने के लिए एक छोटी सी नौकरी कर ली थी। वह थककर घर आती, पर फिर भी रात-रात भर जागकर आईएएस (IAS) की तैयारी करती।

विकास को अब अनामिका की सफलता से चिढ़ होने लगी थी। उसे लगता था कि समाज उसे “पत्नी की कमाई पर पलने वाला” कहेगा। वह अक्सर चिल्लाता— “इतनी पढ़ाई किसके लिए? घर देखो, किताबें नहीं!”

अनामिका चुप रह जाती, पर उसके अंदर का स्वाभिमान एक दिन जाग उठा। एक मामूली सी बहस ने उस दिन भयानक रूप ले लिया जब विकास ने गुस्से में कह दिया— “चली जाओ यहाँ से, मुझे तुम्हारी ऊँची उड़ान का बोझ नहीं ढोना।”

तलाक के कागजात पर जब दस्तखत हुए, तो अनामिका ने रोते हुए नहीं, बल्कि गर्व से कहा— “आज तुम मुझे नहीं, अपनी खुशियों को छोड़ रहे हो विकास। एक दिन मैं वापस आऊँगी, पर टूटी हुई नहीं।”

अध्याय 3: संघर्ष की अग्नि में तपती अनामिका

तलाक के बाद अनामिका ने शहर छोड़ दिया। वह एक ऐसे शहर में चली गई जहाँ उसे कोई नहीं जानता था। उसने खुद को एक कमरे में कैद कर लिया। उसके पास अक्सर खाने के पैसे नहीं होते थे, पर उसके पास विकास के वे ताने थे जो उसे सोने नहीं देते थे।

हर बार जब वह प्रीलिम्स (Prelims) फेल होती, तो उसे विकास का चेहरा याद आता। वह फिर से उठती, फिर से पढ़ती। सात साल की कड़ी तपस्या के बाद, एक सुबह अखबार में उसका नाम ‘ऑल इंडिया रैंक 12’ पर चमक रहा था। वह जिला मजिस्ट्रेट (DM) बन चुकी थी।

दूसरी ओर, विकास को भी आखिरकार सफलता मिली। वह दिल्ली के एक थाने में दरोगा (Sub-Inspector) बन चुका था। पर सत्ता के नशे और पुराने जख्मों ने उसे एक कठोर और भ्रष्ट अधिकारी बना दिया था। वह भूल गया था कि उसने वर्दी क्यों पहनी थी।

अध्याय 4: गरीब का भेष और जमीर की परीक्षा

एक दिन डीएम अनामिका को उस थाने के बारे में कई शिकायतें मिलीं जहाँ विकास तैनात था। शिकायतें थीं कि वहाँ गरीबों की सुनवाई नहीं होती और दरोगा जी रिश्वत के बिना केस दर्ज नहीं करते। अनामिका ने तय किया कि वह खुद जाकर सच का पता लगाएगी।

उसने फटी हुई साड़ी पहनी, चेहरे पर धूल मली और एक साधारण मजदूरनी बनकर थाने पहुँची। वह बेंच पर घंटों बैठी रही, पर किसी ने उसे पानी तक नहीं पूछा। अंत में उसे दरोगा के कमरे में बुलाया गया।

जैसे ही अनामिका ने अंदर कदम रखा, उसकी साँसें रुक गईं। सामने कुर्सी पर विकास बैठा था, वही चेहरा जिसे वह कभी प्यार करती थी। विकास ने उसे नहीं पहचाना।

“क्या काम है? जल्दी बोल, मेरे पास समय नहीं है,” विकास ने रूखेपन से कहा।

अनामिका ने काँपती आवाज में अपनी समस्या बताई कि कुछ दबंगों ने उसकी जमीन छीन ली है। विकास ने बिना फाइल देखे कह दिया— “कल आना, और साथ में कुछ ले आना (रिश्वत का इशारा करते हुए)।”

अध्याय 5: जिलाधिकारी का न्याय

अनामिका का दिल टूट गया। उसने देखा कि उसका प्यार कितना गिर चुका है। वह धीरे से उठी और कमरे से बाहर चली गई।

दस मिनट बाद, थाने के बाहर सायरन गूँज उठा। पुलिस की दर्जनों गाड़ियाँ और सुरक्षाकर्मी वहाँ पहुँच गए। जिलाधिकारी की नीली बत्ती वाली गाड़ी से जब अनामिका उतरी, तो पुलिसकर्मी सन्न रह गए। वह अब मजदूरनी नहीं, बल्कि जिले की सबसे बड़ी अधिकारी थी।

जब वह विकास के कमरे में दोबारा दाखिल हुई, तो विकास की कुर्सी गिरते-गिरते बची। उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

“दरोगा जी, आपने अभी कहा था कि कल आना? कल कभी नहीं आता विकास, न्याय आज ही होगा,” अनामिका की आवाज में बिजली जैसी कड़क थी।

पूरे थाने की जाँच हुई। विकास को सस्पेंड (Suspend) करने के आदेश तुरंत जारी किए गए। विकास की आँखों से पछतावे के आँसू बह रहे थे। वह अपनी पत्नी के सामने नहीं, बल्कि अपने ही जमीर के सामने हार चुका था।

अध्याय 6: प्रायश्चित और पुनर्मिलन

अनामिका ने विकास को जेल नहीं भेजा, बल्कि उसे एक मौका दिया अपनी गलती सुधारने का। विकास ने महीनों तक एक आम नागरिक की तरह संघर्ष किया। उसे अहसास हुआ कि उसने क्या खोया है।

अनामिका ने उसे अपने ऑफिस बुलाया। “विकास, वर्दी का मान पद से नहीं, नीयत से होता है। मैंने तुम्हें माफ कर दिया है, पर क्या तुम खुद को माफ कर पाओगे?”

विकास ने अनामिका के हाथ पकड़ लिए। “मुझे डीएम की पत्नी नहीं, अपनी वही अनामिका चाहिए। मुझे एक मौका दो।”

अनामिका ने मुस्कुराते हुए कहा— “इस बार अहंकार के लिए कोई जगह नहीं होगी।”

उपसंहार: एक नई सुबह

आज उस जिले में विकास एक ईमानदार पुलिस अधिकारी के रूप में जाना जाता है और अनामिका एक न्यायप्रिय डीएम के रूप में। उनकी कहानी दिल्ली की उन तंग गलियों के हर उस युवा के लिए मिसाल है जो सपनों और रिश्तों के बीच संघर्ष कर रहा है।


अगला कदम: क्या आप चाहते हैं कि मैं इस कहानी के उस हिस्से को विस्तार दूँ जहाँ अनामिका और विकास के बीच दोबारा प्यार पनपता है? या फिर आप चाहेंगे कि मैं अनामिका द्वारा किए गए अन्य बड़े प्रशासनिक सुधारों पर एक नई कहानी लिखूँ?