SP मैडम सादे कपड़े में पानी पूरी खा रही थी महिला दरोगा ने साधारण महिला समझ कर बाजार में मारा थप्पड़
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आखिरी दीपक

शहर की भीड़-भाड़ से दूर, पहाड़ियों के बीच बसा एक छोटा-सा गाँव था—सुरजपुर। नाम भले ही सूरजपुर था, लेकिन पिछले कई वर्षों से वहाँ जैसे अंधेरा ही छाया रहता था। कारण था—गाँव में बिजली का न होना। रात होते ही पूरा गाँव घुप्प अंधेरे में डूब जाता, और हर घर में बस एक-एक मिट्टी का दीपक टिमटिमाता।
उसी गाँव में रहती थी एक लड़की—किरण। नाम के अनुसार ही वह अपने परिवार की आशा की किरण थी। उसके पिता रामू किसान थे और माँ गीता एक सरल गृहिणी। गरीबी उनके घर की स्थायी मेहमान थी, लेकिन फिर भी उनके चेहरे पर कभी शिकायत नहीं दिखती थी।
किरण पढ़ाई में बहुत तेज थी। गाँव का छोटा-सा स्कूल ही उसका संसार था। स्कूल में केवल एक ही शिक्षक थे—मास्टर जी, जो बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ उन्हें जीवन के मूल्य भी सिखाते थे। वे अक्सर कहा करते, “अंधेरा कभी स्थायी नहीं होता, बस एक दीपक जलाने की देर होती है।”
किरण इस बात को दिल से लगाकर रखती थी।
एक दिन जिला मुख्यालय से कुछ अधिकारी गाँव में आए। उन्होंने बताया कि सरकार जल्द ही गाँव में बिजली लाने की योजना बना रही है। यह सुनकर पूरे गाँव में खुशी की लहर दौड़ गई। लेकिन यह खुशी ज्यादा दिन नहीं टिक पाई।
कुछ महीनों बाद खबर आई कि योजना किसी कारण से रुक गई है। लोग निराश हो गए। उन्हें लगा कि अब शायद कभी उनके गाँव में रोशनी नहीं आएगी।
लेकिन किरण ने हार नहीं मानी।
वह रोज रात को दीपक की हल्की रोशनी में पढ़ाई करती। कई बार तेज हवा के कारण दीपक बुझ जाता, लेकिन वह फिर उसे जलाती और पढ़ाई जारी रखती। उसकी माँ कहती, “बेटी, इतनी मेहनत मत कर, आँखें खराब हो जाएँगी।”
किरण मुस्कुरा कर जवाब देती, “अम्मा, जब गाँव में रोशनी आएगी, तब मैं खुलकर पढ़ूँगी। अभी तो बस शुरुआत है।”
समय बीतता गया। किरण ने दसवीं की परीक्षा पूरे जिले में प्रथम स्थान से पास की। यह खबर पूरे गाँव के लिए गर्व की बात थी। पहली बार सुरजपुर का नाम अखबार में छपा।
जिला अधिकारी ने किरण को शहर में आगे की पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति दी। यह उसके जीवन का सबसे बड़ा मौका था।
लेकिन एक समस्या थी।
किरण शहर जाना नहीं चाहती थी।
उसने अपने पिता से कहा, “बाबा, अगर मैं भी चली गई तो इस गाँव का क्या होगा? यहाँ अभी भी अंधेरा है। मैं पढ़कर वापस आना चाहती हूँ और गाँव को बदलना चाहती हूँ।”
रामू ने गहरी साँस ली और कहा, “बेटी, बदलाव लाने के लिए पहले खुद मजबूत बनना पड़ता है। तू जा, पढ़-लिखकर बड़ी अफसर बन। फिर इस गाँव में जितनी चाहे रोशनी ले आना।”
आखिरकार किरण शहर चली गई।
शहर की जिंदगी उसके लिए बिल्कुल नई थी। ऊँची-ऊँची इमारतें, चमकती रोशनी, हर तरफ बिजली—उसे यह सब किसी सपने जैसा लगता। लेकिन वह अपने लक्ष्य को नहीं भूली।
वह दिन-रात मेहनत करती। कई बार उसे अपने गाँव की याद आती, माँ के हाथ का खाना याद आता, लेकिन वह खुद को संभाल लेती।
कुछ वर्षों बाद, उसने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और फिर सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी।
यह सफर आसान नहीं था।
पहली बार में वह असफल हुई। दूसरी बार भी सफलता नहीं मिली। लेकिन तीसरी बार उसने पूरी ताकत लगा दी।
और इस बार—वह सफल हो गई।
किरण अब एक प्रशासनिक अधिकारी बन चुकी थी।
जब उसकी पहली पोस्टिंग का आदेश आया, तो वह उसे देखकर हैरान रह गई। उसे उसी जिले में भेजा गया था, जहाँ उसका गाँव सुरजपुर स्थित था।
उसकी आँखों में आँसू आ गए।
“अब समय आ गया है,” उसने खुद से कहा।
जिले में पहुँचते ही उसने सबसे पहले सुरजपुर की स्थिति का जायजा लिया। वर्षों बाद भी गाँव वैसा ही था—अंधेरे में डूबा हुआ।
उसने तुरंत बिजली विभाग के अधिकारियों की बैठक बुलाई।
“यह गाँव अभी तक अंधेरे में क्यों है?” उसने सख्त आवाज में पूछा।
एक अधिकारी बोला, “मैडम, फंड की कमी और कुछ तकनीकी समस्याओं के कारण…”
किरण ने उसकी बात बीच में ही काट दी, “बहाने नहीं, समाधान चाहिए। एक महीने के अंदर मुझे इस गाँव में बिजली चाहिए।”
उसकी सख्ती देखकर सभी अधिकारी सक्रिय हो गए।
काम तेजी से शुरू हुआ। बिजली के खंभे लगाए गए, तार बिछाए गए, ट्रांसफॉर्मर लगाए गए।
गाँव के लोग हैरानी से यह सब देख रहे थे।
एक दिन, किरण खुद गाँव पहुँची।
रामू और गीता उसे देखकर भावुक हो गए। वर्षों बाद अपनी बेटी को उस रूप में देखकर उनकी आँखों में गर्व था।
“बेटी, तूने सच में कर दिखाया,” रामू ने कहा।
किरण मुस्कुराई, “अभी नहीं बाबा, असली काम तो आज रात होगा।”
उस दिन पूरे गाँव में उत्साह था।
शाम होते ही सब लोग एक जगह इकट्ठा हो गए। बिजली विभाग के कर्मचारी तैयार थे।
किरण ने स्विच ऑन करने से पहले एक दीपक जलाया।
सबने आश्चर्य से उसकी ओर देखा।
उसने कहा, “यह दीपक उस अंधेरे की याद है, जिसमें हमने इतने साल बिताए। और यह हमें याद दिलाएगा कि छोटी-सी रोशनी भी कितना बड़ा बदलाव ला सकती है।”
फिर उसने स्विच ऑन किया।
और अचानक—पूरा गाँव रोशनी से जगमगा उठा।
लोगों की खुशी का ठिकाना नहीं था। बच्चे उछल रहे थे, महिलाएँ खुशियों के गीत गा रही थीं, बुजुर्गों की आँखों में आँसू थे।
रामू ने आसमान की ओर देखा और कहा, “आज सच में सूरजपुर में सूरज उग आया।”
किरण ने चारों ओर देखा।
उसे अपने बचपन की हर वो रात याद आ रही थी, जब वह दीपक की रोशनी में पढ़ती थी।
अब वही गाँव रोशनी में नहा रहा था।
उसने मन ही मन कहा, “मास्टर जी सही कहते थे—अंधेरा कभी स्थायी नहीं होता।”
उस रात किरण अपने पुराने घर के बाहर बैठी थी। पास में वही पुराना मिट्टी का दीपक रखा था।
अब उसके आसपास बिजली की तेज रोशनी थी, लेकिन फिर भी उसने उस दीपक को बुझाया नहीं।
क्योंकि वह जानती थी—
हर बड़ी रोशनी की शुरुआत एक छोटे से दीपक से होती है।
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