ममता का मोल: जब तीन अनाथों की ‘अभागन’ माँ के दरवाजे पर 25 साल बाद तीन अरबपतियों ने दी दस्तक

शांतिपुर। कहते हैं कि नेकी कभी बेकार नहीं जाती, वह लौटकर जरूर आती है—कभी दुआओं के रूप में, तो कभी चमत्कार के रूप में। शांतिपुर की तंग गलियों में रहने वाली राधा की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। यह कहानी एक ऐसी महिला की है जिसे समाज ने ‘अपशकुन’ और ‘अभागन’ कहकर दुत्कार दिया था, लेकिन उसकी ममता ने तीन अनाथों की तकदीर बदल दी और अंततः वही बच्चे उसकी ढाल बनकर लौटे।

1. खुशियों का आंगन और विधाता का क्रूर मजाक

राधा और हरीश का जीवन सादगी और प्रेम की मिसाल था। हरीश एक दफ्तर में मामूली क्लर्क थे। उनकी शादी के 5 साल बीत चुके थे, लेकिन घर में किसी बच्चे की किलकारी नहीं गूंजी थी। राधा की सास, सावित्री देवी, उसे ‘बांझ’ और ‘पत्थर की मूरत’ कहकर हर रोज मानसिक प्रताड़ना देती थीं।

एक बार सुकून की तलाश में वे मनाली गए, जहाँ एक सिद्ध पहाड़ी बाबा ने राधा को आशीर्वाद दिया कि उसकी गोद जल्द भरेगी। मनाली से लौटने के कुछ समय बाद राधा गर्भवती हुई। खुशी का ठिकाना नहीं था, लेकिन विधाता को कुछ और ही मंजूर था। जिस दिन राधा ने हरीश को फोन पर यह खुशखबरी दी, उसी पल एक भीषण सड़क दुर्घटना में हरीश की मृत्यु हो गई।

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2. अभागन का ठप्पा और बेघर होने का दर्द

हरीश की मौत का सदमा राधा बर्दाश्त नहीं कर सकी और उसी तनाव में उसने अपना गर्भस्थ शिशु भी खो दिया। अस्पताल में अभी उसके जख्म ताजे ही थे कि उसकी सास सावित्री देवी काल बनकर पहुँचीं। उन्होंने राधा पर अपने बेटे को ‘खा जाने’ और वंश का चिराग बुझाने का आरोप लगाया। राधा को ‘कुलक्षणी’ और ‘अपशकुन’ कहकर घर से धक्के मारकर निकाल दिया गया।

राधा के पास न सिर छिपाने को छत थी, न सहारा। वह रेलवे स्टेशन के पास एक छोटी सी झुग्गी में रहने लगी।

3. ‘राधा की रसोई’ और तीन अनाथों का सहारा

भूख और अपमान ने राधा को तोड़ना चाहा, लेकिन उसने हार नहीं मानी। पति के शब्दों को याद करते हुए—”राधा, तुम्हारे हाथ के खाने में अन्नपूर्णा का वास है”—उसने एक छोटा सा लकड़ी का ठेला लगाया और ‘राधा की रसोई’ शुरू की।

एक शाम, उसने बरगद के पेड़ के नीचे तीन छोटे बच्चों—सूरज, आकाश और पवन—को भूख से तड़पते देखा। वे अनाथ थे और तीन दिन से कचरे में खाना ढूंढ रहे थे। राधा ने अपनी कोख का खालीपन उन बच्चों में भर दिया। उसने उनसे वादा किया, “जब तक इस माँ का हाथ चल रहा है, तुम कभी भूखे नहीं सोओगे।”

अगले 15 साल राधा ने अपनी भूख और नींद की कुर्बानी दी। उसने पसीना बहाया ताकि वे तीन बच्चे पढ़ सकें। सूरज इंजीनियर बना, आकाश ने कानून की पढ़ाई की और पवन व्यापार में निपुण हुआ।

4. साजिश का जाल और रिश्तों की परीक्षा

राधा की कामयाबी एक स्थानीय बिल्डर की आंखों में चुभ रही थी, जिसने सालों पहले राधा को बेघर किया था। उसने उन तीनों भाइयों के मन में जहर घोल दिया। बिल्डर ने झूठे दस्तावेज दिखाकर उन्हें यकीन दिलाया कि राधा और हरीश ही उनके असली माता-पिता की मौत के जिम्मेदार थे।

क्रोध और नफरत में अंधे होकर, उन तीनों ने उसी रात राधा को ठुकरा दिया और उसे ‘धोखेबाज’ कहकर अकेला छोड़ दिया। राधा एक बार फिर शून्य पर आ गई।

5. 25 साल बाद का वो ऐतिहासिक दिन: पश्चाताप की आंसू

वक्त बीता, राधा बूढ़ी और जर्जर हो गई। उधर, बिल्डर ने अपनी अंतिम सांसों के दौरान भाइयों को सच बताया। पश्चाताप की आग में जलते हुए, 25 साल बाद शांतिपुर की उस धूल भरी बस्ती में एक ऐसा नजारा दिखा जिसने सबका दिल दहला दिया।

तीन चमकती हुई रोल्स रॉयस (Rolls Royce) गाड़ियां राधा की टूटी झोपड़ी के सामने रुकीं। शहर के तीन सबसे शक्तिशाली और अमीर आदमी कीचड़ में घुटनों के बल बैठकर एक बूढ़ी औरत के पैर पकड़कर रो रहे थे।

सूरज ने सिसकते हुए कहा, “माँ, हम अपराधी हैं। हमने आपकी ममता पर शक किया।” राधा ने कांपते हाथों से उनके सिर छुए और कहा, “माँ कभी अपने बच्चों से नाराज नहीं होती, बेटा।”

6. राधा निवास: प्यार और नेकी की जीत

आज शांतिपुर में ‘राधा निवास’ और ‘राधा मेमोरियल आश्रम’ प्रेम और न्याय का प्रतीक है। राधा अब हजारों अनाथ बच्चों की ‘माँ’ है। हरीश की तस्वीर मुख्य द्वार पर लगी है, जो मानो मुस्कुराते हुए कह रही है कि प्यार और सच्चाई की कभी हार नहीं होती।


निष्कर्ष: राधा की कहानी हमें सिखाती है कि समाज जिसे ‘अपशकुन’ कहता है, वही किसी के लिए ‘वरदान’ हो सकता है। यह लेख समाज की उस संकुचित सोच पर प्रहार है जो विधवाओं और बेसहारा महिलाओं को तिरस्कृत करती है। याद रखिए, आपके द्वारा किया गया एक छोटा सा निस्वार्थ कार्य आपके भविष्य की सबसे बड़ी पूंजी बन सकता है।