“न्याय की दहलीज: एक बेटी का धर्मयुद्ध”

अध्याय १: वह फोन कॉल और एक खौफनाक झूठ

जयपुर की गुलाबी सुबह अभी पूरी तरह जागी भी नहीं थी। सिविल लाइन्स के पॉश इलाके में स्थित अपने बुटीक में बैठी ४९ वर्षीय राजेश्वरी अग्रवाल नए स्टॉक की जांच कर रही थीं। तभी उनके फोन की स्क्रीन पर उनके भाई ‘विकास’ का नाम चमका।

विकास और राजेश्वरी के बीच पिछले तीन सालों से केवल कोर्ट-कचहरी और जायदाद को लेकर ही बातचीत होती थी। उर्मिला ने फोन उठाया। दूसरी तरफ से विकास की आवाज़ आई, जिसमें एक नकली भारीपन और उससे भी ज्यादा एक हिंसक विजय का स्वर था।

“राजेश्वरी, माँ कल रात गुजर गई। अंतिम संस्कार शुक्रवार को है। और हाँ, वसीयत मेरे पास है। माँ ने मरने से पहले अपनी सारी संपत्ति, यह सिविल लाइन्स वाला घर और बैंक बैलेंस सब मेरे नाम कर दिया है। तेरे लिए उन्होंने फूटी कौड़ी भी नहीं छोड़ी। अब तू अपना बोरिया-बिस्तर समेट ले।”

राजेश्वरी के हाथ में पकड़ी हुई चाय की प्याली स्थिर रही। उन्होंने एक पल के लिए अपनी आँखें बंद कीं और फिर रसोई की तरफ देखा, जहाँ उनकी ७२ वर्षीय माँ, उर्मिला देवी, बिल्कुल स्वस्थ अवस्था में अदरक कूट रही थीं और गुनगुना रही थीं।

राजेश्वरी मुस्कुरा दीं। उन्होंने शांत स्वर में कहा, “विकास, तुमने माँ के ‘मरने’ का समय क्या तय किया है? क्योंकि वह तो अभी मेरे ठीक बगल में ताज़ा चाय बना रही हैं।”

फोन के दूसरी तरफ एक सन्नाटा छा गया, जैसे किसी ने विकास की सांसें छीन ली हों। राजेश्वरी ने फोन काट दिया, लेकिन वे जानती थीं कि यह अंत नहीं, बल्कि एक युद्ध की शुरुआत है।

.

.

.


अध्याय २: विषैले रिश्तों की जड़ें

राजेश्वरी की जिंदगी कभी आसान नहीं थी। २९ साल की उम्र में उनकी शादी अमित गुप्ता से हुई थी, जो एक शराबी और हिंसक व्यक्ति था। ६ साल तक उस नरक को झेलने के बाद, जब अमित ने राजेश्वरी की बांह तोड़ दी, तब उन्होंने अपनी माँ की गोद में शरण ली।

उनके पिता, जो एक रिटायर्ड पोस्ट मास्टर थे, ने हमेशा राजेश्वरी का साथ दिया। लेकिन उनके भाई विकास को अपनी ‘तलाकशुदा’ बहन का घर वापस आना कभी रास नहीं आया। विकास को लगता था कि राजेश्वरी उसके हिस्से की जायदाद में बंटवारा करने आई है।

जब पिता का निधन हुआ, तब विकास का असली चेहरा सामने आया। वह जुए और सट्टे की लत में डूबा हुआ था। उसने पिता की बचत के १५ लाख रुपये व्यापार के नाम पर माँ से ऐंठ लिए और उन्हें जुए में उड़ा दिया। अब उसकी नज़र उस आलीशान पुश्तैनी मकान पर थी जिसकी कीमत आज के बाज़ार में करोड़ों में थी।


अध्याय ३: रिकॉर्डिंग और रणनीति

राजेश्वरी केवल एक बुटीक चलाने वाली महिला नहीं थीं, वे एक रणनीतिकार थीं। पिछले ३ सालों से, उन्होंने विकास की हर उस बातचीत को रिकॉर्ड किया था जिसमें वह माँ को धमकाता था। उनके पास सीसीटीवी (CCTV) फुटेज थे जिसमें विकास और उसकी पत्नी नीतू माँ की अलमारी से कागजात चुराने की कोशिश कर रहे थे।

राजेश्वरी ने अपनी वकील सहेली, अदिति त्यागी, के साथ मिलकर एक अभेद्य किला तैयार किया था। उन्होंने ३ साल पहले ही माँ की सहमति से घर का आधा हिस्सा कानूनी रूप से अपने नाम करवा लिया था—एक ऐसा सच जिससे विकास पूरी तरह बेखबर था।


अध्याय ४: ‘मौत’ का जाली व्यापार (नया विस्तार)

विकास ने अब अपनी चालें तेज़ कर दी थीं। उसे लगा कि राजेश्वरी को डराने के लिए ‘मौत’ का नाटक सबसे प्रभावी होगा। उसने एक भ्रष्ट दलाल और एक जाली नोटरी के साथ मिलकर माँ का ‘मृत्यु प्रमाण पत्र’ और एक ‘जाली वसीयत’ तैयार करवा ली थी।

विकास का इरादा था कि वह राजेश्वरी को घर से बाहर निकाल देगा और इससे पहले कि माँ समाज के सामने आ पाएं, वह घर को किसी बिल्डर को बेचकर फरार हो जाएगा।

लेकिन राजेश्वरी ने ‘अंडरकवर’ काम किया। उन्होंने अपने पड़ोसी, जो एक रिटायर्ड फॉरेंसिक एक्सपर्ट थे, की मदद से उन जाली कागजों की तस्वीरें हासिल कर लीं जो विकास के दलाल ने तैयार किए थे।


अध्याय ५: अंतिम संस्कार का नाटक और न्याय का प्रहार (नया अध्याय)

शुक्रवार का दिन आया। विकास ने शहर के एक बाहरी इलाके में एक ‘शोक सभा’ का आयोजन किया था, जहाँ उसने कुछ किराए के रिश्तेदारों और अपने दोस्तों को बुलाया था। उसका इरादा था कि वह वहां माँ की वसीयत पढ़ेगा और कानूनी कब्जा जमा लेगा।

राजेश्वरी वहां पहुँचीं, लेकिन अकेली नहीं। उनके साथ पुलिस की एक टीम, ज़िले के सब-रजिस्ट्रार और स्वयं उर्मिला देवी थीं।

जैसे ही विकास ने वह जाली वसीयत लहराई और कागजों पर दस्तखत करने के लिए पेन उठाया, राजेश्वरी ने पीछे से आवाज़ दी— “भाई साहब, मुर्दों को तो शांति मिलती है, लेकिन ज़िंदा माँ को मारने वालों को केवल जेल मिलती है।”

जैसे ही उर्मिला देवी भीड़ के सामने आईं, विकास के हाथ से कागज़ गिर गए। पुलिस ने तुरंत विकास, उसके दलाल और उस भ्रष्ट नोटरी को गिरफ्तार कर लिया।


अध्याय ६: जेल की सलाखें और नया सवेरा (नया अध्याय)

विकास पर धारा ४२० (धोखाधड़ी), ४६७ (जालसाजी) और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिनियम के तहत मामला दर्ज हुआ। उसे ७ साल की कड़ी कैद की सजा सुनाई गई। उसकी पत्नी नीतू ने अपनी नौकरी बचाने के लिए उसे तलाक दे दिया और अपने बेटे को लेकर अलग रहने लगी। विकास आज जेल में अकेलेपन और पछतावे की रोटियां तोड़ रहा है।

राजेश्वरी ने अपनी माँ के सम्मान में सिविल लाइन्स में एक ‘उर्मिला केयर सेंटर’ खोला है, जो उन बुजुर्गों की मदद करता है जिनके बच्चे संपत्ति के लिए उन्हें प्रताड़ित करते हैं।

आज राजेश्वरी अपने बुटीक में बैठती हैं, तो उनके चेहरे पर वही पुरानी शांति होती है। लेकिन अब वह शांति कमजोरी की नहीं, बल्कि एक विजेता की है। उन्होंने साबित कर दिया कि एक ‘साधारण औरत’ जब अपनों की सुरक्षा के लिए ढाल बनती है, तो वह किसी भी चक्रव्यूह को तोड़ सकती है।

निष्कर्ष: मानवता का संदेश

यह कहानी हमें सिखाती है कि संपत्ति से बड़ा संस्कार होता है। जो बेटा अपनी माँ की सांसों का सौदा करता है, वह कभी सुखी नहीं रह सकता। न्याय की चक्की भले ही धीरे चलती है, लेकिन वह अहंकार के हर दाने को बारीक पीस देती है।

माँ का आशीर्वाद वह संपत्ति है जिसे कोई जाली वसीयत नहीं छीन सकती।


समाप्त

https://www.youtube.com/watch?v=x2iAEo-W4pAz