साध्वी ने आखिरी पलों में क्या कहा? | Instagram पोस्ट का अनसुलझा रहस्य | Jodhpur Shadhvi Prem Baisha
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सेवा कुटीर का अनसुलझा अध्याय: साध्वी प्रेम बाईसा की रहस्यमयी मृत्यु और न्याय की अंतिम पुकार
जोधपुर, राजस्थान। जनवरी की वह सर्द शाम जोधपुर के इतिहास में एक ऐसे काले धब्बे की तरह दर्ज हो गई, जिसकी टीस आने वाले कई दशकों तक महसूस की जाएगी। 28 जनवरी 2026 की शाम जब सूरज सेवा कुटीर आश्रम की दीवारों के पीछे ढल रहा था, तब किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि राजस्थान की एक बुलंद आध्यात्मिक आवाज हमेशा के लिए खामोश होने वाली है। 25 वर्षीय साध्वी प्रेम बाईसा, जिनके भजनों और कथाओं को सुनने के लिए हजारों की भीड़ उमड़ पड़ती थी, उस शाम एक ऐसे रहस्य के घेरे में दुनिया छोड़ गईं जिसने आस्था, रिश्तों और कानून के बीच एक गहरी खाई पैदा कर दी है।
इस पूरी घटना की शुरुआत जितनी साधारण दिखती है, इसका अंत उतना ही डरावना और उलझा हुआ है। आश्रम के सेवादार सुरेश कुमार की गवाही उस शाम की कड़ियों को जोड़ने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। सुरेश के अनुसार, साध्वी को उस दिन मामूली जुकाम और थकान थी, जो अक्सर अत्यधिक यात्रा और कार्यक्रमों के कारण हो जाती थी। लेकिन शाम के पांच बजते ही कहानी में एक ऐसे पात्र का प्रवेश होता है जिसे पुलिस अब इस केस की सबसे बड़ी कड़ी मान रही है। वह एक निजी मेडिकल सहायक था, जिसे विशेषज्ञ डॉक्टर न होने के बावजूद आश्रम के भीतर साध्वी को ‘उपचार’ देने के लिए बुलाया गया था। महज दस मिनट के उस बंद कमरे के भीतर क्या हुआ, यह आज भी एक राज है, लेकिन उस सहायक के जाते ही साध्वी की हालत बिजली की गति से बिगड़ने लगी।

अस्पताल ले जाते समय गाड़ी के भीतर का दृश्य किसी के भी रोंगटे खड़े कर देने वाला था। एक तरफ पिता गाड़ी चला रहे थे और दूसरी तरफ साध्वी दर्द से तड़पते हुए अपने अंतिम क्षण गिन रही थीं। उसी तड़प के बीच उन्होंने अपने पिता की ओर देखते हुए जो शब्द कहे, वे आज जोधपुर की गलियों में एक यक्ष प्रश्न बनकर गूँज रहे हैं। उन्होंने कहा था, “पापा, मुझे न्याय दिला देना।” एक बेटी अपनी आखिरी सांसों में जीवन की भीख नहीं, बल्कि न्याय मांग रही थी। यह गुहार किसके खिलाफ थी? क्या यह उस अज्ञात उपचार के विरुद्ध थी, या उस गहरे मानसिक दवाब के खिलाफ जिसे वह पिछले छह महीनों से झेल रही थीं?
घटना के तीन घंटे बाद जब पूरा जोधपुर शोक में डूबा था, तब साध्वी के आधिकारिक इंस्टाग्राम हैंडल से एक पोस्ट साझा की गई जिसने मामले में आग में घी डालने का काम किया। उस पोस्ट में अपनी सच्चाई साबित करने के लिए महान संतों को लिखे गए पत्रों का जिक्र था और एक ‘अग्नि परीक्षा’ की बात कही गई थी। सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि यह पोस्ट साध्वी की मृत्यु के बाद उनके पिता के कहने पर ड्राइवर द्वारा अपलोड की गई थी। इस कदम ने पुलिस और जनता के मन में यह सवाल पैदा कर दिया कि आखिर एक पिता को अपनी बेटी की मृत्यु के तुरंत बाद सोशल मीडिया पर स्पष्टीकरण देने की इतनी जल्दी क्या थी? क्या वह पहले से ही जानते थे कि साध्वी की मृत्यु होने वाली है और उन्होंने यह ‘अंतिम संदेश’ पहले ही तैयार कर लिया था?
इस रहस्य की परतें तब और गहरी हो गईं जब पुलिस ने पाया कि आश्रम के सुरक्षा कैमरे या तो हटा दिए गए थे या काम नहीं कर रहे थे। पड़ोसियों के बयानों में विरोधाभास और पिता द्वारा पोस्टमार्टम प्रक्रिया में शुरुआती हिचकिचाहट ने जांच की सुई को अपनों की ओर ही मोड़ दिया। 13 जुलाई 2025 को वायरल हुआ वह विवादित वीडियो, जिसमें पिता-पुत्री के रिश्तों को गलत नजरिए से पेश किया गया था, इस पूरी साजिश का केंद्र माना जा रहा है। हालांकि उस मामले में ब्लैकमेलर्स पकड़े गए थे, लेकिन साध्वी को लगने लगा था कि उनकी आध्यात्मिक छवि को जानबूझकर खंडित किया गया है।
आज सेवा कुटीर आश्रम के उस कमरे में सन्नाटा है, लेकिन वहां की दीवारें कई अनुत्तरित सवाल पूछ रही हैं। क्या वह मेडिकल उपचार महज एक बहाना था? क्या साध्वी की बढ़ती लोकप्रियता और आश्रम की विशाल संपत्ति किसी की आंखों की किरकिरी बन गई थी? क्या उनके अपने ही लोग उनकी विरासत को हड़पने की योजना बना रहे थे? ‘न्याय दिला देना’ के वे अंतिम शब्द किसी वसीयत से कम नहीं हैं, जो अब राजस्थान पुलिस की एसआईटी (SIT) के कंधों पर एक भारी बोझ की तरह रखे हैं।
साध्वी प्रेम बाईसा की कहानी एक साधारण लड़की के असाधारण उत्थान और फिर एक अत्यंत संदिग्ध पतन की दास्तां है। जब तक फॉरेंसिक रिपोर्ट और मोबाइल डेटा का पूरा विश्लेषण सामने नहीं आता, तब तक यह कहना मुश्किल है कि वह शाम एक हादसा थी या सोची-समझी हत्या। लेकिन इतना तय है कि 28 जनवरी की उस काली रात ने मानवता और भरोसे का कत्ल किया है। अब देखना यह है कि कानून उस बेटी की आखिरी इच्छा पूरी कर पाता है या नहीं, जिसने मरते हुए भी केवल ‘न्याय’ की ही मांग की थी।
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