गाजियाबाद घटना का आंखों देखा हाल | Ghaziabad | Three Sisters | Korean Game

गाजियाबाद का खौफनाक मंजर: नौवें फ्लोर से गिरती तीन मासूम जिंदगियां और एक चश्मदीद की रूह कंपा देने वाली कहानी
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश: लोनी क्षेत्र की ‘भारत सिटी’ सोसाइटी में हाल ही में हुई एक घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। एक ही परिवार की तीन मासूम बच्चियां नौवें फ्लोर की बालकनी से नीचे गिर गईं। पुलिस फिलहाल इस गुत्थी को सुलझाने में लगी है कि यह एक सोची-समझी खुदकुशी थी, कोई जानलेवा ऑनलाइन गेम (जैसे ‘कोरियन गेम’) का असर था या महज एक दर्दनाक हादसा।
लेकिन, उस काली रात में क्या हुआ था? उस मंजर को सबसे पहले देखने वाली चश्मदीद अपर्णा ने जो बताया, वह किसी भी पत्थर दिल इंसान को रुला देने के लिए काफी है।
रात 2:00 बजे का वह सन्नाटा और अजीब हलचल
अपर्णा बताती हैं कि रात के करीब 2:00 बज रहे थे। वह सोने की तैयारी कर रही थीं और अपना चश्मा उतार चुकी थीं। तभी उनके जीजा (अरुण) ने बालकनी की तरफ इशारा करते हुए कहा कि सामने वाली बिल्डिंग की नौवीं मंजिल पर कुछ अजीब हो रहा है।
“मेरे जीजू ने बोला कि वहां कोई अपनी बॉडी बार-बार बहुत ज्यादा झुका रहा है। इतना ज्यादा कि देखकर डर लग रहा था। हमें लगा कि शायद कोई एक्सरसाइज कर रहा है या फिर पति-पत्नी का कोई झगड़ा है।”
“बचा लो… मैं गिर गई”: मौत से पहले की आखिरी पुकार
अपर्णा के अनुसार, विजिबिलिटी कम थी लेकिन सामने वाली बालकनी में हलचल साफ दिख रही थी। उन्होंने देखा कि पहले दो बच्चियों ने अपनी बॉडी को रेलिंग से नीचे कर लिया था।
घटना का क्रम कुछ इस तरह रहा:
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पहला प्रयास: बच्चियां एक बार रेलिंग के पास आईं, फिर पीछे हट गईं। शायद हिम्मत नहीं हुई।
टूल का इस्तेमाल: बाद में पता चला कि उन्होंने बालकनी तक पहुंचने के लिए किसी स्टूल या टूल का सहारा लिया था।
शरीर से लिपटी छोटी बहन: अपर्णा को दूर से लगा कि केवल दो लोग हैं, लेकिन असल में एक बच्ची दूसरी से लिपटी हुई थी।
आखिरी लम्हा: जब दो बच्चियां हवा में लटक गईं, तो तीसरी ने उनका हाथ पकड़ रखा था। तभी अंधेरे को चीरती हुई एक आवाज आई— “देखो, मैं गिर गई!”
अगले ही पल, वजन के असंतुलन के कारण तीसरी बच्ची भी नीचे खिंची चली गई।
शेड्स से टकराती आवाजें और सोसाइटी की चीख-पुकार
नौवें फ्लोर से नीचे गिरते समय बच्चियां सीधे जमीन पर नहीं गिरीं, बल्कि हर फ्लोर पर लगे हुए प्लास्टिक या लोहे के शेड्स से टकराती हुई गईं। वह ‘ठक-ठक’ की आवाज इतनी तेज थी कि पूरी सोसाइटी की नींद खुल गई।
अपर्णा ने तुरंत रात 2:04 बजे पुलिस और एम्बुलेंस को फोन किया। वह जैकेट पहनकर नीचे भागीं ताकि गार्ड को सूचित कर सकें। जब वह नीचे पहुंचीं, तो वहां का मंजर बेहद दर्दनाक था—परिवार वाले खून से लथपथ बच्चियों को देखकर दहाड़े मारकर रो रहे थे।
क्या यह ‘कोरियन गेम’ का असर है?
इस घटना में एक एंगल ‘Korean Game’ या किसी ऑनलाइन सुसाइड चैलेंज का भी सामने आ रहा है। पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि क्या बच्चियां किसी ऐसे डिजिटल जाल में फंसी थीं जो उन्हें मौत के करीब ले गया। अक्सर ऐसे गेम्स में बच्चों को खतरनाक स्टंट करने या खुद को नुकसान पहुंचाने के टास्क दिए जाते हैं।
चश्मदीद का पछतावा: “क्या हम उन्हें बचा सकते थे?”
जब अपर्णा से पूछा गया कि क्या उन्होंने आवाज लगाकर उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की? तो उन्होंने भारी मन से कहा: “सब कुछ इतनी जल्दी हुआ कि दिमाग ने काम ही नहीं किया। हमें लगा कि कोई बचा रहा है उन्हें। और इतनी दूर आवाज भी नहीं पहुंचती, रात के सन्नाटे में भी आवाजें अक्सर हवा में फैल जाती हैं।”
निष्कर्ष
गाजियाबाद की यह घटना हर माता-पिता के लिए एक चेतावनी है। बच्चों की इंटरनेट एक्टिविटी, उनकी मानसिक स्थिति और बालकनी की सुरक्षा जैसे विषयों पर अब गंभीरता से सोचने की जरूरत है। पुलिस की जांच जारी है, लेकिन उन तीन मासूमों की कमी उनके परिवार को ताउम्र खलेगी।
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