एक बेघर लड़के ने एक अरबपति के अपहृत बेटे को बचाया – अरबपति का हृदय परिवर्तन

कहते हैं, इंसान की असली कीमत उसके बटुए में नहीं, उसके दिल में होती है। यह एक ऐसा सच था जिसे 10 साल का राजू शायद शब्दों में बयान नहीं कर सकता था। लेकिन वह हर सांस के साथ इसे जीता था। राजू की दुनिया मुंबई की उस गीली ठंडी पटरी तक सीमित थी, जो देश के सबसे अमीर उद्योगपतियों में से एक अर्जुन खन्ना के आलीशान बंगले, स्वर्ण महल के ठीक सामने थी। राजू के पास अपना कहने के लिए सिर्फ एक चीज थी: उसकी 7 साल की बहन चकी और एक आधा फटा हुआ कंबल, जिसे वह दोनों रात में ओढ़कर आसमान के तारों को गिनते थे।

राजू का संघर्ष

राजू दिन भर प्लास्टिक की बोतलें और कबाड़ बिनता ताकि वह चकी के लिए एक वक्त की रोटी का जुगाड़ कर सके। गेट के उस पार स्वर्ण महल की ऊंची ठंडी दीवारों के पीछे एक दूसरी दुनिया बसती थी। यह अर्जुन खन्ना की दुनिया थी, एक ऐसा आदमी जिसने दौलत को अपना भगवान और गुरूर को अपना धर्म बना लिया था। उसके लिए राजू जैसे लोग शहर पर एक धब्बे से ज्यादा कुछ नहीं थे।

अर्जुन खन्ना का भी एक बेटा था, रोहन। वह भी 10 साल का था, लेकिन उसकी दुनिया राजू से कोसों दूर थी। रोहन उस दिन सुबह से इसीलिए नाराज था क्योंकि उसके जन्मदिन पर उसे जो नई स्पोर्ट्स कार खिलौने वाली मिली थी, उसका रंग काला था, नीला नहीं। अर्जुन खन्ना अपने बेटे को अपनी परछाई की तरह पालता था, कठोर और घमंडी, यह मानते हुए कि पैसा हर ताले की चाबी है।

बारिश की रात

उस शाम मुंबई में मॉनसून की पहली बारिश जोरों पर थी। राजू बारिश में लगभग अंधा, अपनी कबाड़ की बोरी घसीट रहा था, उम्मीद कर रहा था कि कोई उसे बस इतने पैसे दे दे कि वह चकी के लिए दवा की एक गोली खरीद सके। तभी स्वर्ण महल के गेट के पास अर्जुन खन्ना की काली मर्सिडीज रुकी। रोहन पीछे की सीट पर बैठा था। उसने आधा खाया हुआ सैंडविच देखा और घिन्न से खिड़की का शीशा नीचे किया।

“ए कटर के चूहे!” उसने आवाज लगाई। राजू ने नजर उठाई। रोहन ने वह सैंडविच राजू की तरफ उछाला और हंस पड़ा। वह सैंडविच राजू के पैरों के पास कीचड़ में जा गिरा। राजू की आंखें अपमान से जल उठीं। उसने कुछ कहा नहीं, बस अपनी भीगी हुई बहन चकी को और कसकर पकड़ लिया, जो उसके कंधे पर बेसुध पड़ी थी।

अपहरण का डर

ठीक उसी पल जब गार्ड गेट खोलने के लिए आगे बढ़ा, एक पुरानी काली वैन ने मर्सिडीज का रास्ता रोक दिया। इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, तीन नकाबपश आदमी बाहर कूदे। उन्होंने ड्राइवर को बंदूक की नोक पर बाहर खींचा और रोहन का दरवाजा खोला। राजू जो सब कुछ देख रहा था, डर के मारे जम गया। उन्होंने रोहन को बाहर घसीटा, जोर-जोर से चीख रहा था।

एक अपहरणकर्ता की नजर पटरी पर खड़े राजू पर पड़ी। “बॉस, यह लड़का इसने सब देख लिया है।” लीडर ने एक पल के लिए सोचा। “गवाह नहीं छोड़ना है। इसे भी उठा लो। यह भिखारी वैसे भी किसी को याद नहीं रहेगा।” इससे पहले कि राजू चीख पाता, एक मजबूत हाथ ने उसका मुंह दबा दिया और उसे एक बोरी की तरह उठाकर वैन में फेंक दिया गया।

अंधेरे में कैद

उसे उस घने अंधेरे में रोहन खन्ना के ठीक बगल में धकेल दिया गया। वैन के दरवाजे जोर से बंद हुए और गाड़ी तेजी से ओझल हो गई। वैन के अंदर घुप अंधेरा था। सड़क के गड्ढों से गाड़ी उछल रही थी और हर झटके के साथ रोहन की सिसकियां एक चीख में बदल जातीं। “मुझे छोड़ दो। तुम जानते नहीं मेरे पापा कौन हैं। वो तुम्हें फांसी पर लटका देंगे,” रोहन रोते हुए चिल्ला रहा था।

राजू दूसरी तरफ दुबका हुआ था। उसका दिल किसी हथौड़े की तरह धड़क रहा था। लेकिन उसका डर सिर्फ अपनी जान के लिए नहीं था। “मेरी बहन अकेली है।” यह ख्याल उसे किसी खंजर की तरह चुभ रहा था। वह बुखार में तप रही थी। क्या वह उस बारिश में अकेली बची होगी? क्या वह उसे फिर कभी देख पाएगा? राजू की आंखों से आंसू बह रहे थे। लेकिन वह खामोश था। उसने रोना सीखा हुआ ही नहीं था।

अपहरणकर्ताओं का जश्न

“चुप कराओ इस अमीर के पिल्ले को,” आगे बैठे एक अपहरणकर्ता ने गुर्रा कर कहा। “अरे, रोने दे मंटू,” दूसरे ने कहा। “जितना यह रोएगा, इसका बाप उतनी जल्दी पैसा उगलेगा। वैसे भी अर्जुन खन्ना के लिए 50 करोड़ क्या है? उसके बाथरूम में लगे सोने जितने।”

राजू का कलेजा कांप गया। वे सही कह रहे थे। वह दुनिया के लिए अदृश्य था। अगर वह मर भी गया तो पटरी पर बस एक फटी चादर कम हो जाएगी। लगभग एक घंटे बाद वैन एक झटके से रुकी। दरवाजे खुले और उन्हें बेरहमी से बाहर खींचा गया। वे एक पुरानी वीरान फैक्ट्री में थे।

फैक्ट्री में कैद

हर तरफ जंग लगी मशीनें और टूटे शीशे बिखरे पड़े थे। बारिश की आवाज टिन की छत पर एक डरावना संगीत पैदा कर रही थी। उन्हें एक छोटे सीलन भरे कमरे में धकेल दिया गया और दरवाजा बाहर से बंद कर दिया गया। कमरे में सिर्फ एक छोटा सा बल्ब जल रहा था, जिसकी पीली रोशनी में रोहन का डरा हुआ, आंसुओं से लथपथ चेहरा चमक रहा था।

“मुझे भूख लगी है। मुझे मेरे पापा के पास जाना है,” रोहन ने जमीन पर पैर पटकते हुए कहा। राजू ने कुछ नहीं कहा। वह चुपचाप कोने में गया और दरवाजे के नीचे की दरार से बाहर झांकने की कोशिश करने लगा। वह सुन सकता था कि अपहरणकर्ता बाहर बात कर रहे हैं।

अर्जुन खन्ना की चिंता

फोन लगा। लीडर ने कहा, “उधर स्वर्ण महल में अर्जुन खन्ना का महंगा इटालियन सूट पसीने से भीग रहा था। पुलिस कमिश्नर उसके सामने बैठे थे। तभी उसका फोन बजा। एक अनजाना नंबर। ‘हेलो,’ खन्ना ने कांपते हाथ से फोन उठाया।

“मिस्टर अर्जुन खन्ना, आपका बेटा हमारे पास है और हां, उसके साथ एक छोटा सा बोनस भी है। पटरी पर रहने वाला एक कीड़ा,” दूसरी तरफ से एक खुरदरी आवाज आई। “50 करोड़ कल सुबह तक। कोई पुलिस नहीं, कोई होशियारी नहीं। अगर तुमने कुछ भी चालाकी की, तुम्हें कितना पैसा चाहिए। मैं सब दूंगा। बस मेरे बेटे को कुछ मत करना।”

खन्ना का गुस्सा

खन्ना चीखा, “मैंने कहा 50 करोड़। और सुनो, अगर पुलिस को भनक लगी तो तुम अपने बेटे के साथ उस भिखारी के टुकड़े भी नहीं पहचान पाओगे।” फोन कट गया। अर्जुन खन्ना ने कमिश्नर की तरफ देखा। “मेरे बेटे को ढूंढो। अभी हर जगह है।”

“सर, दो बच्चे अगवा हुए हैं,” कमिश्नर ने शुरू किया। “भाड़ में गया दूसरा,” खन्ना दहाड़ा। “मुझे सिर्फ रोहन चाहिए। क्या तुम समझे?”

राजू का साहस

फैक्ट्री के कमरे में राजू बेताब हो रहा था। उसके नाखून झंग लगे लोहे से छिल गए थे और खून बह रहा था। “मुझे कुछ चाहिए, कुछ नुकीला।” रोहन जो अब तक स्थिर हो गया था, ने नीचे देखा। अंधेरे में ड्रम के पास दीवार से टूटे हुए प्लास्टर का एक टुकड़ा और एक छोटी नुकीली कील पड़ी थी।

“यहां अब यहां कुछ है,” उसने फुसफुसाया। राजू धीरे से नीचे उतरा। उसने वो कील उठाई। यह छोटी थी, लेकिन शायद काफी थी। वह फिर से रोहन के कंधों पर चढ़ गया।

अंतिम प्रयास

उसने कील को पहले बोल्ट के जंग में फंसाया और उसे लीवर की तरह इस्तेमाल किया। रोहन का पूरा शरीर तनाव में कांप रहा था। राजू ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। “क्रैक,” जंग लगी धातु के टूटने की एक हल्की आवाज आई। पहला बोल्ट ढीला पड़ गया। तभी बाहर के खर्राटे बंद हो गए।

एक खामोशी छा गई। दोनों लड़कों ने अपनी सांसे रोक ली। जब उन्हें यकीन हो गया कि वे जा चुके हैं। राजू की आंखें अंधेरे में चमक उठीं। अब उसने कहा, “उठो।”

भागने का समय

“उठो, हमें यहां से निकलना है,” उसने रोहन को झकझोरते हुए फुसफुसाया। रोहन नींद में घबरा कर उठा। “क्या हुआ? क्या वो आ गए?” “चुप,” राजू ने उसकी घबराहट को अपनी शांत आवाज से काटा। “हमें यहां से निकलना है।”

उसने ऊपर जाली की तरफ इशारा किया। रोहन ने ऊपर देखा। “लेकिन वह बहुत ऊंचा है। हम वहां तक नहीं पहुंच सकते।” “हम पहुंचेंगे,” राजू ने दृढ़ता से कहा। उसकी नजर कमरे के एक कोने में पड़े पुराने झं खाए तेल के ड्रम पर पड़ी।

योजना बनाना

“उसे दीवार तक घसीटने में मेरी मदद कर,” दोनों लड़कों ने अपनी पूरी ताकत लगा दी। ड्रम को जमीन पर घसीटने से एक तीखी घिसटने की आवाज हुई। दोनों एक पल के लिए जम गए। बाहर से आती आवाजों को सुनने लगे। “सिर्फ खर्राटों की गूंज थी।”

उन्होंने ड्रम को जाली के ठीक नीचे टिका दिया। राजू ड्रम पर चढ़ा लेकिन जाली अभी भी एक हाथ की पहुंच से दूर थी। “यह काफी नहीं है,” उसने कहा। वह नीचे कूदा। “तुम्हें ड्रम पर चढ़ना होगा और मुझे तुम्हारे कंधों पर,” रोहन ने झिझकते हुए ऐसा ही किया।

राजू का साहस

राजू ने फिर से ड्रम पर चढ़ा। “अब मैं कोशिश करूंगा,” उसने कहा। “तुम्हारे कंधों पर चढ़कर मैं जाली तक पहुंच जाऊंगा।” रोहन ने कांपते हुए सहमति दी। “ठीक है,” उसने कहा।

राजू ने अपनी पूरी ताकत लगाई और जाली को धकेलने की कोशिश की। लेकिन जाली बाहर से चार झंक खाए बोल्ट से कसी हुई थी। “यह फंसा हुआ है,” उसने दांत पीसते हुए कहा।

अर्जुन खन्ना की चिंता

ठीक उसी समय स्वर्ण महल में सुबह के 4:00 बज रहे थे। अर्जुन खन्ना 50 करोड़ कैश के साथ तैयार था। लेकिन उसका सब्र जवाब दे रहा था। पुलिस कमिश्नर उसे समझा रहे थे कि वे कॉल को ट्रेस करने के करीब हैं। “मैं तुम्हारे करीब होने का इंतजार नहीं कर सकता,” खन्ना चिल्लाया। “वे मेरे बेटे को मार देंगे।”

अंतिम क्षण

फैक्ट्री के कमरे में राजू बेताब हो रहा था। उसके नाखून झंग लगे लोहे से छिल गए थे और खून बह रहा था। “मुझे कुछ चाहिए, कुछ नुकीला।” रोहन ने नीचे देखा। “यहां कुछ है,” उसने फुसफुसाया।

राजू ने कील उठाई। “यह छोटी थी, लेकिन शायद काफी थी।” उसने फिर से रोहन के कंधों पर चढ़ गया। “हमारे पास ज्यादा वक्त नहीं है,” उसने कहा।

भागने की कोशिश

जाली को बाहर की तरफ धकेलने की कोशिश की। “क्रैक,” जंग लगी धातु के टूटने की एक हल्की आवाज आई। “अब हमें भागना होगा,” राजू ने कहा।

“तुम्हें जाना होगा,” राजू चिल्लाया। “तुम्हें अपनी बहन के पास जाना है।” रोहन ने डरते हुए कहा, “मैं नहीं जा सकता।”

राजू की हिम्मत

राजू ने अपनी पूरी ताकत लगाई। “तुम्हें जाना होगा।” लीडर ने राजू को पकड़ लिया। “कहां?” “कहां है वो?” उसने दहाड़ा।

राजू ने कहा, “मैं अपनी बहन को बचाने जा रहा हूं।” लीडर ने राजू को पकड़कर खींचा। “तू भिखारी तेरा अमीर दोस्त कहां है?”

अंत का सामना

इससे पहले कि राजू जवाब देता, लीडर ने अपनी जेब से एक तेज धार वाला चाकू निकाल लिया। “तेरी इतनी हिम्मत,” उसी पल फैक्ट्री के मुख्य दरवाजे पर एक जोरदार धमाका हुआ।

अर्जुन खन्ना की ताकत

अर्जुन खन्ना की प्राइवेट सिक्योरिटी टीम काली परछाइयों की तरह धुएं और तेज रोशनी के गोलों, फ्लैशबक्स के बीच अंदर घुस आई। “नीचे, सब नीचे,” कमांडो चीख रहे थे।

राजू का बलिदान

राजू कांपता हुआ दीवार से सटकर जमीन पर बैठ गया। वह उस खंजर को देख रहा था जो उससे कुछ इंच दूर पड़ा था। “यह लड़का,” उसने सोचते हुए कहा।

रोहन का साथ

“पापा, रोहन ने कहा, “यह राजू है। अगर वह नहीं होता तो मैं आज जिंदा नहीं होता।” अर्जुन खन्ना ने राजू को देखा। “तुमने सिर्फ मेरे बेटे की जान नहीं बचाई। तुमने मेरी आंखें खोल दीं।”

नया जीवन

तब राजू को एहसास हुआ कि इंसानियत का चिराग दौलत से नहीं, करुणा से जलता है। राजू और रोहन ने एक नई जिंदगी की शुरुआत की, जहां दोस्ती और इंसानियत की अहमियत थी।

निष्कर्ष

इस कहानी ने हमें यह सिखाया कि असली अमीरी दिल में होती है, जो दूसरों की मदद करती है। राजू ने साबित कर दिया कि इंसानियत का चिराग कभी नहीं बुझता।

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