यूएई के राष्ट्रपति का अचानक भारत दौरा: पर्दे के पीछे क्या चल रहा है?

संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन ज़ायद अल नहयान का हालिया भारत दौरा जितना अचानक था, उतना ही रहस्यमय भी। सिर्फ़ तीन घंटे का यह दौरा, तमाम कूटनीतिक प्रोटोकॉल तोड़ते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्वयं एयरपोर्ट पर स्वागत—इन सबने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

सवाल यह नहीं है कि बातचीत हुई या नहीं, बल्कि यह है कि असल बातचीत क्या थी और क्यों सब कुछ गोपनीय रखा गया

अचानक दौरा, असामान्य संकेत

भारत सरकार और विदेश मंत्रालय की ओर से आधिकारिक बयान में कहा गया कि यह दौरा व्यापार, ऊर्जा, अंतरिक्ष सहयोग और निवेश से जुड़ा था। लेकिन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में तीन घंटे का दौरा, वह भी बिना पूर्व घोषणा के, कभी साधारण नहीं होता।

विशेषज्ञ मानते हैं कि यह दौरा केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके पीछे क्षेत्रीय सुरक्षा और सैन्य संतुलन से जुड़े गंभीर मुद्दे थे।

यूएई–सऊदी अरब: रिश्तों में दरार

पिछले पांच वर्षों में सऊदी अरब और यूएई के रिश्तों में स्पष्ट बदलाव आया है। कभी “भाई देशों” की तरह देखे जाने वाले ये दोनों देश अब कई मोर्चों पर आमने-सामने हैं।

यमन में यूएई द्वारा समर्थित गुट और सऊदी समर्थित सरकार के बीच टकराव
सूडान में यूएई द्वारा रैपिड सपोर्ट फोर्स का समर्थन, जबकि सऊदी अरब सेना के पक्ष में
इज़राइल के साथ यूएई के खुले संबंध, जिसे सऊदी अरब संदेह की नज़र से देखता है

इन घटनाओं ने दोनों देशों के बीच अविश्वास को और गहरा किया है।

इज़राइल फैक्टर और अरब दुनिया की नाराज़गी

यूएई 2020 में इब्राहिमी समझौते पर हस्ताक्षर करने वाला पहला अरब देश था। इसके बाद इज़राइल के साथ उसके राजनयिक, व्यापारिक और सैन्य संबंध तेज़ी से बढ़े।

ग़ज़ा पर इज़राइली हमलों और ईरान-इज़राइल टकराव के दौरान यूएई द्वारा इज़राइल को दी गई मदद ने अरब जनता में नाराज़गी पैदा की। सऊदी समर्थक मीडिया और सोशल मीडिया पर यूएई को “ज़ायोनी समर्थक” तक कहा गया।

सऊदी–पाकिस्तान–तुर्की रक्षा गठबंधन

हाल ही में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुआ म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट, और उसमें तुर्की की भागीदारी, ने क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को बदल दिया है।

इस गठबंधन के बाद यूएई खुद को रणनीतिक रूप से अकेला महसूस करने लगा है। इज़राइल से खुला सैन्य समझौता यूएई के लिए अरब दुनिया में मुश्किलें खड़ी कर सकता है। ईरान के साथ ऐसा कोई समझौता अमेरिका की नाराज़गी मोल ले सकता है।

तो फिर भारत क्यों?

ऐसे में यूएई की नज़र भारत पर जाती है—

एक उभरती सैन्य शक्ति
सऊदी अरब का करीबी, लेकिन पाकिस्तान से प्रतिस्पर्धा में
अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदार

संभावना जताई जा रही है कि यूएई भारत के साथ रक्षा सहयोग या रणनीतिक साझेदारी चाहता है, भले ही इसे सार्वजनिक रूप से स्वीकार न किया जाए।

आधिकारिक बयान बनाम वास्तविकता

भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने बताया कि बातचीत का केंद्र:

अंतरिक्ष सहयोग
एलएनजी आपूर्ति
गुजरात के धुलेरा में विशेष निवेश क्षेत्र
न्यूक्लियर ऊर्जा (शांतिपूर्ण उपयोग)
व्यापार और इंफ्रास्ट्रक्चर

लेकिन रक्षा या सुरक्षा समझौते पर चुप्पी इस पूरे दौरे को और संदिग्ध बनाती है।

भारत के लिए चुनौती

भारत के सामने मुश्किल यह है कि:

वह यूएई से नज़दीकी बढ़ाए तो सऊदी अरब नाराज़ हो सकता है
ईरान के साथ चाबहार पोर्ट को लेकर अमेरिका पहले से दबाव बना रहा है
रूस और ईरान से तेल खरीद पर भी अमेरिकी चेतावनियाँ जारी हैं

ऐसे में भारत को बेहद संतुलित कूटनीति अपनानी होगी।

पाकिस्तान की दुविधा

सऊदी अरब और यूएई—दोनों में लाखों पाकिस्तानी काम करते हैं, खासकर रक्षा और सुरक्षा क्षेत्रों में। यदि दोनों देशों के बीच टकराव बढ़ता है, तो पाकिस्तान के लिए किसी एक का पक्ष लेना आसान नहीं होगा।

निष्कर्ष: आने वाले दिनों में क्या होगा?

शेख मोहम्मद बिन ज़ायद का अचानक भारत दौरा संकेत देता है कि कुछ बड़ा पक रहा है, भले ही अभी सार्वजनिक न किया गया हो।

क्या भारत और यूएई के बीच कोई गुप्त रक्षा समझौता हुआ है?
क्या भारत सऊदी अरब की नाराज़गी मोल लेगा?
या फिर यह केवल रणनीतिक संतुलन बनाने की कोशिश है?

इन सवालों के जवाब आने वाला वक्त देगा।

एक बात तय है—यह दौरा साधारण नहीं था।