जिस बिल्डिंग पर लड़की मजदूरी करती थी उसका मालिक निकला तलाकशुदा पति फिर जो हुआ…

“मिट्टी से महल तक: मजदूर की बेटी, मालिक की किस्मत”

भूमिका

उत्तर प्रदेश के छोटे से गांव बेलापुर में सुबह सूरज निकलने से पहले ही लोगों की जिंदगी की जंग शुरू हो जाती थी। मिट्टी के घर, टपकती छतें, दरारों से भरी दीवारें, और सामने पुराना नीम का पेड़—यही था सागर का बचपन। उसकी मां कमला देवी अक्सर इसी नीम के नीचे बैठकर भगवान से अपने बेटे के लिए कुछ बुदबुदाती रहती थी। पिता रामनाथ ईंट भट्ठे पर मजदूरी करते थे। सुबह अंधेरे में निकल जाते, हाथ में सिर्फ सूखी रोटी। शाम को लौटते तो कपड़े मिट्टी और पसीने से सने होते, आंखों में थकान और चेहरे पर बेबसी।

भाग 1: गरीबी और सपनों की शुरुआत

सागर ने बचपन से ही अपने पिता के पैरों के छाले देखे थे, मां के फटे हाथ महसूस किए थे, और खुद भूखे पेट सोते हुए कई रातें गुजारी थीं। स्कूल जाता तो उसकी कॉपी आधी भरी होती, पेंसिल छोटी, जूते इतने पुराने कि तलाक खुला रहता। बच्चे उसका मजाक उड़ाते—कोई कहता, “मजदूर का बेटा आ गया,” कोई उसकी फटी शर्ट पर हंसता।

सागर चुपचाप सब सह लेता, मन ही मन सोचता—एक दिन सबको दिखाऊंगा कि मजदूर का बेटा भी कुछ बन सकता है। पढ़ाई में वह होशियार था। मास्टरजी उसकी पीठ थपथपाते, कहते, “हालात साथ दें तो यह लड़का बड़ा अफसर बनेगा।” लेकिन हालात साथ देने वाले नहीं थे।

दसवीं के बाद फीस भरने का वक्त आया तो घर में पैसे नहीं थे। मां ने अपने कान के झुमके गिरवी रखे, पिता ने मजदूरी बढ़ाई, फिर भी रकम पूरी नहीं हुई। जिस दिन सागर को स्कूल छोड़ना पड़ा, वह पूरी रात चुपचाप रोता रहा। मां ने उसे सीने से लगाया—”भगवान सब देख रहा है, बेटा। एक दिन सब ठीक करेगा।”

भाग 2: शहर की पहली मजदूरी और शादी

अगले ही दिन सागर शहर चला गया मजदूरी करने। शहर उसके लिए किसी और दुनिया जैसा था—ऊंची इमारतें, तेज आवाजें, गाड़ियां, धूल, शोर, भागती जिंदगी। पहली बार कंस्ट्रक्शन साइट पर पहुंचा तो ठेकेदार ने ऊपर से नीचे देखा—”तू काम करेगा?” सागर ने सिर हिलाया। पहले दिन ईंट ढोने का काम मिला। सिर पर टोकरा रखकर सीढ़ियां चढ़ी, गर्दन टूटने लगी, हाथ छिल गए। लेकिन हार नहीं मानी। शाम को मजदूरी मिली तो पैसे मुट्ठी में भींच लिए, जैसे खजाना मिल गया हो।

रात को आकाश की तरफ देखकर सोचता—एक दिन मैं भी ऐसी बिल्डिंग बनवाऊंगा।

इसी बीच उसके माता-पिता ने उसकी शादी तय कर दी। लड़की थी रामपुर गांव की संगीता। संगीता उससे बिल्कुल अलग थी—मिडिल क्लास फैमिली, घर में टीवी, फ्रिज, कूलर। पिता श्यामलाल सरकारी क्लर्क, मां उषा देवी धार्मिक। संगीता पढ़ी-लिखी, फैशनेबल, मोबाइल में लगी रहने वाली, Instagram पर रील देखने वाली।

जब रिश्ता आया तो संगीता ने मना कर दिया—”मां, वो तो मजदूर है, मैं ऐसी जिंदगी कैसे जी पाऊंगी?” मां ने समझाया—”लड़का मेहनती है, दिल का अच्छा है।” पिता बोले—”आज मजदूर है, कल कुछ बन जाएगा।” समाज का दबाव पड़ा, आखिरकार शादी तय हो गई। शादी धूमधाम से हुई।

भाग 3: दो अलग दुनिया, एक घर

सागर बारात लेकर पहुंचा तो उसकी आंखों में सपने थे। संगीता को देखकर दिल जोर-जोर से धड़कने लगा—”कितनी सुंदर है, मेरी किस्मत खुल गई।” शादी के बाद संगीता गांव आई। शुरू में सब कुछ नया और अच्छा लगा—सागर का प्यार, उसकी सादगी, छोटी-छोटी बातें।

सागर सुबह मजदूरी पर जाता, जाते वक्त कहता, “आज जल्दी लौटूंगा, तुम्हारे लिए जलेबी लाऊंगा।” संगीता मुस्कुरा देती। लेकिन धीरे-धीरे गांव की जिंदगी उसे चुभने लगी—मिट्टी का घर, बिजली कट, रात को मच्छर, रोज वही दाल-रोटी, सागर के पसीने की गंध, उसकी फटी चप्पल। सबकुछ उसे अंदर ही अंदर खा रहा था।

वो खिड़की से बाहर देखती, सोचती—क्या यही मेरी जिंदगी है? क्या मैं इसी गरीबी में फंस गई हूं? सागर की कमाई इतनी नहीं थी कि वह उसे वह सब दे सके जो वह चाहती थी। शहर के मॉल, ब्रांडेड कपड़े, रेस्टोरेंट—सब उसके सपनों में ही रह गए। धीरे-धीरे उसके चेहरे से मुस्कान गायब होने लगी। छोटी-छोटी बातों पर चिढ़ने लगी। सागर देर से आए तो ताना, कम पैसे लाए तो ताना।

एक दिन उसने साफ कह दिया—”तुम पूरी जिंदगी मजदूरी ही करोगे क्या? तुम्हारे पास मुझे देने के लिए है ही क्या?” सागर का दिल टूट गया। उसने शांत होकर कहा—”मैं कोशिश कर रहा हूं, एक दिन सब बदल जाएगा।” लेकिन संगीता को सब्र नहीं था। वो रोते हुए मायके फोन करती है।

भाग 4: अलगाव और टूटन

अगले दिन उसके पिता श्यामलाल गांव आ गए। संगीता उनके गले लगकर रोती—”मुझे यहां नहीं रहना।” सागर हाथ जोड़कर कहता—”बाबूजी, मेरी गलती बताइए, मैं सुधार लूंगा।” लेकिन श्यामलाल गुस्से में—”तुम हमारी बेटी को खुश नहीं रख पाए।” संगीता सामान बांधकर चली जाती है। सागर पीछे-पीछे दौड़ता है—”मत जाओ, मैं सब बदल दूंगा।” लेकिन संगीता अपना हाथ छुड़ा लेती है।

वो मायके चली जाती है। उस दिन सागर पूरी रात आंगन में बैठकर रोता रहा। मां ने समझाया, पिता ने ढांढस बंधाया। लेकिन उसका दिल टूट चुका था। उसे लग रहा था जैसे उसकी दुनिया उजड़ गई हो। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसने क्या गलती की थी। बस इतना जानता था कि उसकी गरीबी उसकी सबसे बड़ी सजा बन गई थी।

संगीता के मायके चले जाने के बाद सागर की जिंदगी थम सी गई थी। घर के आंगन में पड़ी वही टूटी चारपाई अब उसे काटने दौड़ती थी। रात को जब मां खाना परोसती तो सागर बस दो निवाले खाकर उठ जाता। मां पूछती—”बेटा, भूखा क्यों रह जाता है?” तो वह नजरें झुका लेता। उसे हर कोने में संगीता की याद दिखती थी—कभी रसोई में, कभी आंगन में, कभी दरवाजे पर। उसे लगता था जैसे वह अभी बोलेगी—”सागर, चाय बना दो।” लेकिन वहां सिर्फ सन्नाटा होता।

कई बार वह खुद से बातें करता—”शायद मेरी ही गलती थी।” अगले ही दिन वो उसके मायके चला जाता। कई बार अकेले, कई बार मां-बाप के साथ। दरवाजे पर खड़ा होकर कहता—”संगीता, चलो घर चलो, सब बदल दूंगा।” लेकिन हर बार वही जवाब मिलता—”अब बहुत देर हो चुकी है।” श्यामलाल गुस्से में—”तुम हमारी बेटी को कुछ नहीं दे सके।” संगीता भी अंदर से बदल चुकी थी। शहर की सहेलियां, अच्छे कपड़े, आराम की जिंदगी उसे ज्यादा प्यारी लगने लगी थी। वो सोचती थी—”मैंने सही फैसला लिया। उस गरीबी में मर जाती।”

भाग 5: तलाक और नई जिद

एक दिन पंचायत बैठी। गांव वालों ने कहा—”अब फैसला कर लो, रोज-रोज की लड़ाई ठीक नहीं।” आखिरकार तलाक की बात तय हो गई। कोर्ट में सागर कांपते हाथों से बैठा था। जज ने पूछा—”क्या आप दोनों अलग होना चाहते हैं?” संगीता ने बिना सोचे—”हां।” सागर कुछ नहीं बोल पाया। उसके गले से आवाज नहीं निकली।

फैसला हो गया। तलाक के कागजों पर जब उसने साइन किए तो ऐसा लगा जैसे किसी ने उसकी रगों में जहर घोल दिया हो। बाहर आकर वो सीढ़ियों पर बैठ गया। आंखों से आंसू बहते रहे, लेकिन उसने किसी को नहीं दिखाया। मां ने सिर पर हाथ रखा तो वह रो पड़ा, जैसे छोटा बच्चा हो।

उस दिन उसने खुद से वादा किया—”अब रोऊंगा नहीं। अब खुद को साबित करूंगा।”

भाग 6: मेहनत, संघर्ष और उन्नति

तलाक के बाद सागर ने खुद को काम में झोंक दिया। पहले जहां वह दिन में 8 घंटे काम करता था, अब 14 घंटे करने लगा। ठेकेदार जिस साइट पर भेजता, वहां सबसे पहले पहुंचता और सबसे बाद में लौटता। लोग कहते—”इतनी मेहनत क्यों करता है?” वह बस मुस्कुरा देता।

रात को जब सब सो जाते, वह छत पर बैठकर आसमान देखता—”एक दिन मैं भी बड़ा आदमी बनूंगा।” उसने ठेकेदार के पास बैठकर काम सीखना शुरू किया—लेबर का हिसाब, सामान खरीदना, बिल बनाना। धीरे-धीरे ठेकेदार उस पर भरोसा करने लगे। छोटे-मोटे काम मिलने लगे—दीवार बनवाने का ठेका, दुकान का शटर लगवाने का काम। शुरुआत में नुकसान हुआ—कई लोग पैसे नहीं देते, सामान खराब निकलता, मजदूर भाग जाते। लेकिन वह हार नहीं मानता।

एक दिन उसके पिता रामनाथ ने कहा—”बेटा, तू बहुत बदल गया है।” सागर बोला—”बाबा, अब मुझे कुछ बनना है।”

भाग 7: संगीता की मजबूरी और मुलाकात

उधर संगीता मायके में आराम की जिंदगी जी रही थी। अच्छे कपड़े, सहेलियों के साथ घूमना, सोशल मीडिया पर फोटो डालना—उसे लगता था उसने सही फैसला लिया। उसे सागर की कोई याद नहीं आती थी। वह सोचती थी—”वह तो अब भी मजदूर ही होगा।”

लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। दो साल बाद अचानक संगीता के पिता श्यामलाल को सीने में तेज दर्द उठा। अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टर ने जवाब दे दिया। घर में मातम छा गया। मां उषा देवी बेसुध हो गई। संगीता की दुनिया उजड़ गई। अब घर की कमाई बंद हो गई। धीरे-धीरे हालात बिगड़ने लगे। रिश्तेदार पहले आते रहे, फिर आना बंद कर दिया। पैसे खत्म होने लगे। मां की दवाइयां, घर का खर्च सब संगीता पर आ गया।

उसने नौकरी ढूंढी। कई जगह इंटरव्यू दिए, लेकिन ढंग की नौकरी नहीं मिली। मजबूरी में उसने एक लेडी कॉन्ट्रैक्टर के साथ मजदूरी शुरू कर दी। पहली बार जब उसने सिर पर सीमेंट की बोरी उठाई तो उसे सागर याद आ गया। उसकी आंखों से आंसू गिर पड़े। वो सोचने लगी—”जिस जिंदगी से मैं भागी थी वही मेरी किस्मत बन गई।”

भाग 8: सागर की सफलता और संगीता का संघर्ष

सागर अब सिर्फ मजदूर नहीं था, बल्कि छोटे-छोटे ठेके खुद लेने लगा था—दुकान का शटर लगवाना, मकान की छत डलवाना, बाउंड्री वॉल बनवाना। शुरुआत में बहुत नुकसान हुआ, लेकिन हार नहीं मानी। धीरे-धीरे उसकी मेहनत रंग लाने लगी। शहर के बड़े ठेकेदार उसे पहचानने लगे। लोग कहने लगे—”यह लड़का भरोसेमंद है।”

चार साल बीत गए। सागर ने अपनी छोटी सी कंपनी रजिस्टर करवाई—”सागर बिलकॉन”। अब उसके पास खुद की बाइक थी, फिर कार आ गई। वो मजदूरों को खुद काम देता था। वही लोग जो कभी उसे मजदूर कहकर हंसते थे, अब उसे “साहब” कहने लगे थे।

उधर संगीता की जिंदगी और मुश्किल होती जा रही थी। मजदूरी करते-करते उसके हाथ छिल गए थे, सिर में हमेशा दर्द रहता, पैरों में सूजन आ जाती। एक दिन मां उषा देवी ज्यादा बीमार पड़ गई। अस्पताल ले जाने के पैसे नहीं थे। संगीता ने अपने कंगन बेच दिए। उस रात वह मां के पास बैठकर रोती रही—”काश मैंने सागर का साथ नहीं छोड़ा होता।”

उसे याद आने लगा कि कैसे सागर हर दिन उसके लिए जलेबी लाता था, कैसे थक कर भी मुस्कुराता था, कैसे कहता था—”सब ठीक हो जाएगा।” अब उसे समझ आ रहा था कि असली अमीरी क्या होती है।

भाग 9: किस्मत का खेल—मुलाकात बिल्डिंग पर

इधर सागर अब शहर के बड़े प्रोजेक्ट लेने लगा था। एक दिन उसे शहर में एक मल्टीस्टोरी बिल्डिंग बनाने का बड़ा टेंडर मिला। यह उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट था। उसने पूरे जोश से काम शुरू किया—दर्जनों मजदूर, मशीनें, ट्रक, पूरा इलाका उसके नाम से गूंजने लगा। चार महीने की कड़ी मेहनत के बाद बिल्डिंग लगभग तैयार हो गई। उद्घाटन की तैयारी होने लगी। बड़े नेता, अफसर, मीडिया को बुलाया गया।

उसी बिल्डिंग पर संगीता एक लेडी कॉन्ट्रैक्टर के साथ मजदूरी करने पहुंची। उसे नहीं पता था कि यह प्रोजेक्ट किसका है। वो रोज की तरह सिर पर टोकरा उठाकर काम करने लगी। उस दिन सागर साइड पर निरीक्षण के लिए आया। उसने दूर से देखा—एक महिला मजदूर सीमेंट ढो रही है। चेहरा धूप से जला हुआ, बाल बिखरे हुए, लेकिन आंखें वही जानी पहचानी।

सागर का दिल जोर से धड़क उठा। वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा। पास जाकर देखा तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। सामने संगीता थी। दोनों की नजरें टकराई। पल भर के लिए वक्त थम गया। संगीता के हाथ से टोकरा गिर गया। सीमेंट फैल गया। वह कांपने लगी। उसे यकीन नहीं हुआ कि सामने खड़ा आदमी वही सागर है—महंगी शर्ट, घड़ी, गाड़ी, चेहरे पर आत्मविश्वास।

वो शर्म से जमीन में गढ़ गई। सागर भी कुछ पल बोल नहीं पाया। फिर धीरे से बोला—”संगीता।” उसका नाम सुनते ही संगीता फूट-फूट कर रो पड़ी। आसपास मजदूर खड़े रह गए। सागर ने खुद को संभाला और बोला—”तुम यहां?” संगीता की आवाज कांप रही थी—”मजदूरी कर रही हूं।”

सागर का दिल अंदर से टूट गया। जिस लड़की ने कभी उसकी गरीबी पर उसे छोड़ा था, आज वही लड़की मजदूरी कर रही थी और वह खुद इस बिल्डिंग का मालिक बन चुका था। किस्मत ने जैसे दोनों को आमने-सामने खड़ा कर दिया था।

भाग 10: इंसानियत और दूसरा मौका

सागर ने सुपरवाइजर को इशारा किया—”इसे आज का काम छोड़ने दो। बाकी मजदूर संभालेंगे।” संगीता डर गई। उसे लगा शायद सागर उसे नौकरी से निकलवा देगा। वो कांपती आवाज में बोली—”अगर मैंने कोई गलती की हो, तो माफ कर दीजिए। मैं काम अच्छे से करती हूं।”

सागर ने उसकी तरफ देखा—”मैंने तुम्हें काम से निकालने के लिए नहीं रोका। तुम बहुत थकी हुई लग रही हो। आज आराम कर लो।” संगीता को यकीन नहीं हुआ। उसने पहली बार सागर की आंखों में नफरत नहीं बल्कि इंसानियत देखी।

शाम को सागर ने अपने ड्राइवर को बुलाया—”इन्हें घर छोड़ दो।” संगीता झिझकते हुए कार में बैठी। कार के अंदर बैठते ही उसे अपनी हालत पर शर्म आने लगी। जिस लड़की को कभी बाइक पर बैठना भी बुरा लगता था, आज वह मजबूरी में किसी और की कार में बैठी थी।

रास्ते भर दोनों चुप रहे। सागर कभी-कभी शीशे में संगीता को देख लेता। उसके चेहरे पर थकान, आंखों के नीचे काले घेरे, हाथों पर छाले देखकर उसका दिल भर आता। घर पहुंचकर संगीता उतर गई। सागर बोला—”अगर किसी चीज की जरूरत हो तो बताना।” संगीता ने सिर झुका लिया—”धन्यवाद।”

उस रात सागर को नींद नहीं आई। उसे पुराने दिन याद आने लगे। दूसरी तरफ संगीता भी पूरी रात जागती रही—”जिस इंसान को मैंने छोड़ दिया, आज वही मेरा सहारा बन रहा है।”

भाग 11: ऑफिस में नया रिश्ता

अगले दिन सागर ने ऑफिस में संगीता को बुलाया। वो डरी-सहमी पहुंची। सागर ने कुर्सी ऑफर की, पानी दिया—”तुम ऐसे काम क्यों कर रही हो?” संगीता की आंखों से आंसू निकल पड़े। उसने सारी कहानी सुना दी—पिता की मौत, मां की बीमारी, पैसों की तंगी, मजदूरी की मजबूरी।

सागर चुपचाप सुनता रहा। जब संगीता बोलते-बोलते रो पड़ी तो सागर ने मेज से टिश्यू बढ़ा दिया। कुछ पल की खामोशी के बाद सागर बोला—”यहां ऑफिस में काम कर लो। सैलरी भी ठीक मिलेगी।” संगीता घबरा गई—”नहीं, मैं आपकी दया नहीं चाहती।” सागर ने शांत स्वर में कहा—”यह दया नहीं है, इंसानियत है।”

संगीता को समझ नहीं आ रहा था कि क्या बोले। उसे याद आया कि कैसे उसने सागर को उसके हालात के कारण छोड़ा था। उसकी आंखें शर्म से झुक गईं—”आप मुझसे नफरत नहीं करते?” सागर हल्की मुस्कान के साथ बोला—”नफरत करने से दिल और भारी हो जाता है। मैं उस दर्द से निकलना चाहता हूं।”

यह सुनकर संगीता फूट-फूट कर रो पड़ी। उसने महसूस किया कि सागर अब पहले वाला सीधा साधा मजदूर नहीं रहा। वह अंदर से बहुत मजबूत इंसान बन चुका है।

भाग 12: पुरानी गलती, नई शुरुआत

ऑफिस से निकलते वक्त संगीता के कदम लड़खड़ा रहे थे। उसका मन बार-बार पीछे मुड़कर सागर को देखने का कर रहा था, लेकिन शर्म उसे रोक रही थी। वो समझ नहीं पा रही थी कि जो इंसान कभी उसकी नजरों में कुछ भी नहीं था, आज वही उसके लिए भगवान बनकर खड़ा है।

रात को जब वह घर पहुंची तो मां उषा देवी ने पूछा—”आज कुछ अलग लग रही हो बेटा।” संगीता चुप रही। फिर मां की गोद में सिर रखकर रो पड़ी। मां घबरा गई—”क्या हुआ?” संगीता ने कांपती आवाज में कहा—”मां, आज सागर से मिली।” मां सन्न रह गई—”कहां?” संगीता ने सब कुछ बता दिया—कैसे वह उसी बिल्डिंग पर मजदूरी कर रही थी, कैसे सागर मालिक निकला, कैसे उसने कार से घर छोड़ा।

मां की आंखों में आंसू आ गए—”बेटा, वही लड़का आज इतना बड़ा बन गया, और तू…” मां की आवाज भर गई। संगीता ने सिर झुका लिया—”मां, मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी थी।” उस रात मां-बेटी दोनों रोती रही।

भाग 13: सागर की सोच और संगीता की मेहनत

उधर सागर भी घर जाकर बेचैन था। उसके मन में अजीब सी हलचल थी। एक तरफ पुराना दर्द था, दूसरी तरफ इंसानियत। वो सोचता रहा—”क्या मैं उसे माफ कर पाऊंगा?” उसे याद आया कि तलाक के दिन कैसे वह कोर्ट की सीढ़ियों पर बैठकर रोया था, कैसे उसे लगा था जिंदगी खत्म हो गई। लेकिन आज वही लड़की उसकी मदद की मोहताज थी।

अगले दिन संगीता ऑफिस पहुंची। सागर ने उसे रिसेप्शन पर काम समझाया—फाइलें रखना, कॉल उठाना, एंट्री करना। संगीता ने पूरी ईमानदारी से काम करना शुरू किया। उसे पहली बार लगा कि शायद भगवान उसे एक मौका दे रहा है।

धीरे-धीरे ऑफिस के लोग भी उससे घुलने-मिलने लगे। कोई नहीं जानता था कि वह बॉस की एक्स-वाइफ है। संगीता हर दिन सागर को दूर से देखती—वो काम में व्यस्त रहता, मीटिंग, कॉल, साइट विजिट। संगीता को एहसास हुआ कि सागर अब सिर्फ मेहनती नहीं, समझदार और जिम्मेदार इंसान बन चुका है।

एक दिन ऑफिस में एक मजदूर की तबीयत खराब हो गई। सागर खुद उसे अस्पताल लेकर गया और खर्च उठाया। यह देखकर संगीता की आंखें भर आईं—”जिस इंसान को मैंने सिर्फ गरीबी से तोला था, उसके दिल की अमीरी मैंने कभी देखी ही नहीं।”

भाग 14: दूसरा मौका और रिश्तों की कीमत

धीरे-धीरे सागर भी संगीता के बदले हुए व्यवहार को महसूस करने लगा। वो अब शांत थी, मेहनती थी, किसी से ऊंची आवाज में बात नहीं करती थी। एक शाम सागर ने उससे पूछा—”मां कैसी है?” संगीता बोली—”अब थोड़ी ठीक है, आपकी मदद से इलाज हो पाया।” सागर ने सिर हिलाया। दोनों के बीच एक अजीब सी खामोशी थी जिसमें पुराने जख्म भी थे और नई उम्मीद भी।

उस दिन संगीता देर तक ऑफिस में बैठी रही—”अगर वक्त पीछे जा सकता तो मैं कभी सागर का हाथ नहीं छोड़ती।” लेकिन अब वह सिर्फ मन ही मन पछता सकती थी।

सागर भी अपने केबिन में बैठा सोच रहा था—”क्या इंसान को दूसरा मौका देना गलत है?” उसकी आंखों के सामने संगीता का थका हुआ चेहरा घूम रहा था। वो जानता था कि अंदर से वह अब वही घमंडी लड़की नहीं रही।

दिन बीतते गए और ऑफिस का माहौल धीरे-धीरे दोनों के लिए सहज होने लगा। संगीता पूरी लगन से काम करने लगी थी—सुबह सबसे पहले आती और शाम को सबसे आखिरी में निकलती। उसे लगने लगा था जैसे वह अपने पुराने गुनाहों की सजा मेहनत करके चुका रही है।

भाग 15: हादसा, इंसानियत और कबूलियत

एक दिन साइट पर अचानक हादसा हो गया। एक मजदूर ऊंचाई से गिर गया। अफरातफरी मच गई। सागर तुरंत वहां पहुंचा, खुद उसे गोद में उठाकर गाड़ी में डाला और अस्पताल ले गया। संगीता भी साथ चली गई। रास्ते में मजदूर बेहोश हो गया। संगीता रोने लगी—”कुछ हो गया तो?” सागर ने मजबूती से कहा—”कुछ नहीं होगा, भरोसा रखो।”

अस्पताल पहुंचते ही सागर ने बिना देर किए भर्ती करवाया और सारे खर्च की जिम्मेदारी ले ली। मजदूर की पत्नी आई तो सागर के पैर पकड़ने लगी—”साहब, आप भगवान हो।” सागर ने उसे उठाया—”मैं भी इंसान हूं, आप जैसी ही।”

यह सब देखकर संगीता की आंखें भर आईं। उसे याद आया कि एक समय वह इसी इंसान को तुच्छ समझती थी। उस रात वह घर जाकर बहुत रोई। मां ने पूछा—”फिर वही बात याद आ गई?” संगीता बोली—”मां, सागर बहुत बड़ा इंसान बन गया है और मैं…” मां ने उसका सिर सहलाया—”बेटा, गलती इंसान से होती है, भगवान से नहीं। अगर दिल से पछता रही है तो शायद भगवान ही रास्ता दिखाएगा।”

भाग 16: कबूलियत और नया रिश्ता

अगले दिन ऑफिस में सागर और संगीता देर तक अकेले बैठे रहे। सागर ने पहली बार खुद पहल करते हुए पूछा—”अगर आज वक्त पीछे चला जाए तो क्या तुम फिर वही फैसला करोगी?” संगीता की आंखें भर आई—”नहीं, कभी नहीं। मैंने आपकी गरीबी नहीं, अपनी सोच की गरीबी दिखाई थी।”

सागर कुछ देर चुप रहा—”तुम्हें पता है, उस दिन कोर्ट के बाहर मैं घंटों बैठकर रोया था।” संगीता का दिल कांप गया। उसने पहली बार उस दर्द को महसूस किया जो उसने सागर को दिया था। वो बोली—”मुझे माफ कर दीजिए, मैंने आपको तोड़ा था।” सागर ने गहरी सांस ली—”टूटने के बाद इंसान मजबूत बनता है। शायद भगवान ने हमें इसलिए तोड़ा था।”

दोनों की आंखें भर आईं। उस पल दोनों के दिल हल्के हो गए थे। जैसे बरसों का बोझ उतर गया हो। लेकिन फिर भी दोनों चुप थे। अंदर कहीं एक डर था कि कहीं फिर वही गलती ना हो जाए।

भाग 17: उद्घाटन, कबूलियत और नई शुरुआत

उद्घाटन का दिन आ गया। पूरी साइट सज चुकी थी—रंग बिरंगे गुब्बारे, बैनर, फूलों की मालाएं, मीडिया, नेता, अफसर। सागर मंच पर खड़ा था, कैमरे चमक रहे थे। उसके चेहरे पर मुस्कान थी, लेकिन दिल के अंदर तूफान चल रहा था।

उद्घाटन शुरू हुआ। नेता ने फीता काटा, तालियां बजी। सागर को माइक दिया गया। उसने बोलना शुरू किया—”दोस्तों, आज मैं जो कुछ भी हूं वो मेरी मेहनत का नतीजा है, लेकिन उससे ज्यादा उन गलतियों का नतीजा है जो मैंने अपनी जिंदगी में की है।”

लोग चौंक गए। उसने आगे कहा—”कभी-कभी हम रिश्तों की कीमत हालात से लगाते हैं, इंसान से नहीं। और यही हमारी सबसे बड़ी भूल होती है।” उसकी नजर भीड़ में खड़ी संगीता पर पड़ी। वो कांप रही थी। सागर ने गहरी सांस ली—”आज इस बिल्डिंग पर जो मजदूर काम कर रहे हैं वही मेरी असली ताकत हैं, क्योंकि कभी मैं भी उन्हीं में से एक था।”

मजदूरों ने तालियां बजाई। फिर सागर ने अचानक संगीता की तरफ कदम बढ़ाए। सब लोग हैरान रह गए। कैमरे उसकी तरफ घूम गए। सागर संगीता के सामने खड़ा हो गया—”संगीता, जिंदगी ने हमें अलग-अलग रास्तों पर चलाया, लेकिन आज फिर आमने-सामने खड़ा कर दिया।”

संगीता की आंखों से आंसू बहने लगे—”मैंने आपको बहुत दुख दिया, मुझसे बड़ी गलती हुई।” सागर ने सबके सामने उसका हाथ पकड़ लिया—”गलतियां इंसान से होती हैं, भगवान से नहीं। और जो अपनी गलती मान ले उससे बड़ा कोई नहीं।”

भीड़ सन्न रह गई। सागर ने कहा—”अगर तुम्हारा दिल आज भी वही है, अगर तुम आज भी साथ निभाने का वादा कर सकती हो तो क्या तुम मुझे दोबारा अपना पाओगी?” संगीता फूट-फूट कर रो पड़ी—”हां, इस बार मैं कभी आपका हाथ नहीं छोड़ूंगी।”

लोग तालियां बजाने लगे। कैमरे फ्लैश करने लगे। सागर ने सबके सामने संगीता को गले लगा लिया। मां-बाप की आंखों में आंसू थे। सागर की मां कमला देवी ने कहा—”भगवान ने मेरे बेटे को इंसान बनाया है।”

कुछ दिनों बाद दोनों ने सादगी से दोबारा शादी की। कोई ढोल-नगाड़ा नहीं, कोई दिखावा नहीं, बस कुछ अपने लोग और सच्चे आंसू। इस बार संगीता ने गरीबी से नहीं, इंसान से रिश्ता जोड़ा था। सागर ने भी उसे माफ करके साबित कर दिया कि असली जीत बदला लेने में नहीं, माफ करने में होती है।

निष्कर्ष

दोनों ने मिलकर एक नया जीवन शुरू किया, जहां पैसा नहीं, इंसानियत सबसे बड़ी दौलत थी। कहानी यहीं खत्म नहीं होती—असल में यहीं से शुरू होती है, क्योंकि अब दोनों ने सीखा था कि हालात कैसे भी हो, रिश्ता छोड़ देना सबसे आसान और सबसे गलत फैसला होता है।

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मिलते हैं फिर से एक नई और इंटरेस्टिंग कहानी के साथ।
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