“भेष बदलकर निकली DM पूजा और पकड़ा सिस्टम का गंदा सच |

इंसाफ की गूंज – एक बेटी, एक मां और वर्दी का सच
भाग 1: सुबह की शुरुआत और संघर्ष का सामना
सुबह का समय था। जिले की एएसपी वैशाली सिंह की छोटी बहन राधिका सिंह और उनकी मां कमला देवी ट्रैक्टर पर ईख लेकर चीनी मिल बेचने जा रही थीं। राधिका कॉलेज की स्टूडेंट थी, लेकिन आज मां का हाथ बटाने के लिए आई थी। उसकी बड़ी बहन वैशाली सिंह उसी जिले की एक बहुत बड़ी एसपी अधिकारी थी, जिनका नाम हर जगह सम्मान से लिया जाता था।
जैसे ही वे ट्रैक्टर लेकर कुछ दूर गईं, आगे सड़क पर पुलिस बैरियर लगा हुआ था।
इंस्पेक्टर रमाकांत सिंधे अपने दो हवलदारों के साथ रोड पर हर आने-जाने वाले को जबरदस्ती चालान काट रहे थे और उनसे जबरन पैसे वसूल कर रहे थे।
जब राधिका और कमला देवी वहां पहुंचीं, रमाकांत सिंधे ने उन्हें भी रोक लिया।
“ए लड़की, ट्रैक्टर साइड में लगा और फटाफट गाड़ी का कागज दिखा!”
राधिका ने ट्रैक्टर रोक लिया। मां-बेटी नीचे उतरीं।
“साहब, हम फसल काटकर पास वाली चीनी मिल में ले जा रहे हैं। सारे कागजात हमारे पास हैं।”
रमाकांत सिंधे ने ठहाका लगाया।
“ओहो, बड़ी हीरोइन बन रही है! और यह बुढ़िया कौन है?”
“यह मेरी मां है।”
इंस्पेक्टर अकड़ते हुए बोला, “तुम लोग ईखों के आड़ में कुछ छुपाकर तो नहीं ले जा रही हो?”
राधिका ने बोला, “सर, आपको तलाशी चाहिए तो औपचारिक तौर पर करें, लेकिन हमें अपमानित करने का हक आपको नहीं है।”
एक सिपाही ने ईख को खींचा और हंसकर बोला, “चेहरा देखो इनका, जैसे इसका बाप डीएम हो!”
दूसरे सिपाही ने बेहूदे अंदाज में कहा, “सर, ये मां-बेटी मुझे धंधा करने वाली लग रही हैं।”
राधिका के दिल में यह शब्द चुभ गए।
उसकी आंखें लाल हो उठीं।
“जुबान संभालकर बात करो। यह मेरी मां है। हमारे पास सारे कागजात मौजूद हैं। अब सिर्फ अपना काम करो। किसी के बारे में ऐसे शब्द बोलना पुलिस वालों के मुंह से शोभा नहीं देता।”
इंस्पेक्टर रमाकांत सिंधे गुस्से में आग बबूला हो गया।
“अबे चुप! तेरी जैसी लड़की हमें बोलना सिखाएगी? हमें कानून मत सिखा!”
राधिका ने ट्रैक्टर की डिग्गी से लाइसेंस और कागजात निकालकर दिए।
इंस्पेक्टर ने कागजात को बिना देखे ही फाड़ दिया।
“अबे मूर्ख लड़की, नकली कागज दिखाकर सोचती है निकल जाएगी!”
राधिका को गुस्सा आ गया।
“सर, ये सारे ओरिजिनल कागज थे। आपने क्यों फाड़ दिए? आपको किसने अधिकार दिया है कि लोगों के साथ ऐसे बदतमीजी करो?”
इतना सुनते ही इंस्पेक्टर ने एक जोरदार थप्पड़ राधिका के चेहरे पर जड़ दिया।
पूरी सड़क पर सन्नाटा छा गया।
राधिका की आंखों में आंसू तैर आए।
कमला देवी चीख पड़ी, “मेरी बेटी को क्यों मारा तुमने? जानते हो किस पर हाथ उठाया है?”
इंस्पेक्टर ने उन्हें धक्का दिया, “चुप भिखारी! ज्यादा बोलेगी तो तुझे भी थप्पड़ मिलेगा।”
भीड़ तमाशा देख रही थी, लेकिन किसी में हिम्मत नहीं थी कि आगे बढ़कर कुछ कह सके।
एक नौजवान लड़का आगे बढ़ा, “सर, यह सब गलत है। आपको इनके साथ ऐसा दुर्व्यवहार नहीं करना चाहिए।”
इंस्पेक्टर ने गुस्से से कहा, “क्यों, तेरी रखैल है क्या?”
फिर बोला, “इन दोनों को गाड़ी के अंदर ठूंसो और थाने ले चलो। वहां बताएंगे पुलिस की पावर क्या होती है।”
मां-बेटी को जीप में ठूंस दिया गया।
भाग 2: थाने की कोठरी में अपमान
थाने पहुंचते ही इंस्पेक्टर रमाकांत सिंधे गरजा, “अबे हवाले में ठूंस दो इन दोनों को। सुबह तक सारी अकड़ निकाल देंगे।”
दोनों सिपाहियों ने मां-बेटी को एक बदबूदार कोठरी में बंद कर दिया।
कोठरी की दीवारों में उनकी सिसकियों की गूंजने लगी।
कमला देवी रोते हुए बोली, “बेटी, यह लोग हमें कहां बंद करके रख दिए? अब क्या होगा?”
राधिका ने मां को गले लगाया, “मां, फिक्र मत करो। बस थोड़ी देर की बात है, सब ठीक हो जाएगा।”
कमला देवी को सांस की बीमारी थी।
राधिका मां की हालत देखकर समझ गई।
वह भागती हुई शोर मचाने लगी, “जल्दी मेरी मां को यहां से निकालो! उसका दम घुट रहा है!”
इंस्पेक्टर ने नजरअंदाज किया।
फिर गुस्से में अंधेरी कोठरी में जाकर बोला, “क्या तूने बकबक लगा रखी है? सारे सुकून की ऐसी की तैसी कर दी!”
राधिका ने कहा, “मेरी मां की हालत बहुत खराब है, उसे यहां से निकाल दें।”
इंस्पेक्टर बोला, “यहीं मरने दे इस बूढ़िया को। वैसे भी दो-चार दिन में टपक ही जाना है।”
यह सुनकर राधिका अपने आप पर काबू नहीं रख पाई और इंस्पेक्टर के मुंह पर एक जोरदार थप्पड़ मार दिया।
इंस्पेक्टर आग बबूला होकर राधिका की चोटी पकड़कर उसे घसीटते हुए जेल से बाहर लाने लगा।
कमला देवी चिल्लाने लगी, “छोड़ दे मेरी बेटी को!”
इंस्पेक्टर ने एक ना सुनी।
राधिका को मारते-घसीटते हुए स्पेशल रूम में ले गया।
अंदर जाते ही दरवाजा लॉक किया और राधिका को जमीन पर धक्का दे दिया।
“तूने मौत को दावत दी है। ऐसा कभी नहीं हुआ कि इंस्पेक्टर रमाकांत सिंधे पर किसी ने हाथ उठाया हो।”
राधिका बोली, “तुम गैरकानूनी काम कर रहे हो। और तुमने मेरी मां को बुरा भला कहा इसलिए मैंने यह किया। तुम्हें यह करने का कोई हक नहीं।”
इंस्पेक्टर ने एक और थप्पड़ राधिका के मुंह पर मारा।
वह पीछे जा गिरी।
“बड़ी आई तू हमें कानून सिखाएगी!”
कमला देवी लगातार आवाजें लगा रही थी, “छोड़ दो मेरी बेटी को!”
राधिका इंस्पेक्टर के पैरों में गिर गई, “मेरी मां को छोड़ दो, अस्पताल ले जाओ। उसकी तबीयत खराब है!”
इंस्पेक्टर ने ठोकर मारते हुए कहा, “मर जाएगी मरने दे बुढ़िया को। धरती से कुछ तो बोझ कम होगा।”
मां के बारे में यह शब्द सुनकर राधिका के वजूद में बिजली दौड़ गई।
तभी उसे अपनी बहन वैशाली का ख्याल आया – जो इसी जिले की एसपी ऑफिसर थी।
राधिका बोली, “मेरे साथ जो करना है कर लो, लेकिन मेरी मां को जल्दी अस्पताल ले जाओ। अगर उसे कुछ हो गया तो तुम और तुम्हारे सब पुलिस वाले जिंदगी भर उसकी सजा भुगतोगे। सबकी वर्दियां उतर जाएंगी।”
इंस्पेक्टर हंसने लगा, “तो दो टके की छोकरी हमारी वर्दियां उतारवाएगी?”
कमला देवी की आवाजें कमजोर पड़ गईं।
इंस्पेक्टर ने राधिका को कमरे में धक्का देकर बंद कर दिया।
राधिका दरवाजा पीटने लगी, “खोलो दरवाजा! मुझे मां के पास जाना है!”
इंस्पेक्टर दफ्तर में जाकर सुकून से बैठ गया।
कमला देवी आवाजें लगाते-लगाते जमीन पर ढेर हो पड़ी।
सांसे धीमी पड़ गईं और वह बेहोश होकर लेट गई।
कुछ पल बाद इंस्पेक्टर की आंख खुली, “यह बुढ़िया चुप कैसे बैठी है?”
वह कोठरी में गया, कमला देवी को जमीन पर पड़ी देखकर उसे लगा वह इस दुनिया से चली गई है।
“चलो बड़ी मुश्किल से जान छोड़ी है तूने।”
उसकी आंखों में संतोष था।
भाग 3: बहन की ताकत और इंसाफ की जीत
इंस्पेक्टर ने राधिका को जिस कमरे में बंद किया था, उसकी कुंडी खोली और अंदर गया।
राधिका दौड़ती हुई इंस्पेक्टर के पास आई, “मेरी मां की तबीयत कैसी है? मुझे उनसे मिलने दो।”
इंस्पेक्टर ने कहा, “तुझे उस बुढ़िया से मिलने के लिए अब अगले जन्म का इंतजार करना होगा।”
राधिका के शरीर से जैसे जीवन ही निकल गया।
“कहां है मेरी मां? क्या हुआ उसको?”
इंस्पेक्टर बोला, “बुढ़िया एक कोने में पड़ी है, मरी सी।”
राधिका ने इंस्पेक्टर को धक्का देकर पीछे हटाया और अंधेरी कोठरी की ओर दौड़ी।
वहां पहुंचकर देखा कि कमला देवी बेहोशी की हालत में जमीन पर पड़ी थी।
“मां, मां, आंखें खोलो! देखो, मैं राधिका हूं।”
राधिका जोर-जोर से मां को हिलाने लगी।
तभी रमाकांत सिंधे आया, “ए छोकरी, बुढ़िया गुजर चुकी है या ड्रामेबाजी कर रही है?”
कांस्टेबलों को बुलाया, “इस बुढ़िया को उठाकर ले जाओ, ठिकाने लगाओ। कोई पूछे तो कहना एक्सीडेंट में मारी गई है।”
राधिका चीख उठी, “कोई हाथ मत लगाना मेरी मां को!”
राधिका ने इंस्पेक्टर का कॉलर पकड़ लिया, “तुम लोगों को वो सजा दिलवाऊंगी जो आज तक किसी ने नहीं दी होगी।”
इंस्पेक्टर ने झटका देकर अपना गला छुड़ाया, “किससे शिकायत करेगी? डीएसपी, एसपी सब मेरे भाई-बहन हैं!”
राधिका ने आंसू भरी आंखों से मां के ठंडे चेहरे को देखा।
तभी कमला देवी की सांसे फिर धीमे-धीमे चलने लगीं।
राधिका बोली, “मां, सुन रही हो?”
कमला देवी की आंखें धीरे-धीरे खुलीं।
राधिका चिल्लाकर उनके गले लग गई, “मां, तुम जिंदा हो!”
इंस्पेक्टर और सिपाही थर्रा गए।
इंस्पेक्टर बोला, “अरे बुढ़िया, तू तो जिंदा है! अब दोनों मां-बेटी को पूरी जिंदगी इसी थाने में सड़ाऊंगा।”
भाग 4: एएसपी वैशाली सिंह की एंट्री
उधर वैशाली सिंह काफी देर से अपनी मां और बहन को कॉल कर रही थी, लेकिन नंबर बंद आ रहा था।
हफ्ते में सिर्फ एक बार ही घर आ पाती थी।
जब काफी समय तक फोन नहीं लगा तो वैशाली सिंह को चिंता हुई।
उसने फैजान राव को कॉल किया, “मेरे घर जाकर देखो, मां और बहन का नंबर नहीं मिल रहा।”
फैजान ने देखा, घर पर ताला लगा था।
वैशाली सिंह परेशान हो गई।
उसने तुरंत घर जाने का फैसला किया और पुलिस अधिकारियों के साथ अपने शहर की तरफ निकल गई।
घर पहुंचकर ताला तोड़ा गया, लेकिन कोई नहीं मिला।
अब वैशाली सिंह अपनी मां और बहन की गुमशुदगी पता करने पास वाले थाने पहुंची।
भाग 5: वर्दी का डर और इंसाफ की गूंज
इंस्पेक्टर रमाकांत सिंधे ऑफिस में बैठा चाय पी रहा था।
जैसे ही उसने वैशाली सिंह की वर्दी पर लगे स्टार्स और अशोक स्तंभ को देखा, चौंक गया।
डरते हुए सैल्यूट मारा, “जी मैडम, हुक्म कीजिए!”
वैशाली बोली, “मेरी मां और बहन लापता हैं। मुझे 3 घंटे के अंदर पता लगाओ कि वे कहां हैं।”
इंस्पेक्टर बोला, “अगर आपके पास उनकी तस्वीर हो तो…”
वैशाली ने मोबाइल में तस्वीर दिखाई।
राधिका और कमला देवी की तस्वीर देखकर इंस्पेक्टर का चेहरा उड़ गया।
उसके हाथ कांपने लगे।
वैशाली सिंह ने कठोर आवाज में पूछा, “क्या हुआ?”
इंस्पेक्टर बोला, “कुछ नहीं मैडम, हम जल्द ढूंढ निकालेंगे।”
तभी लॉकअप से किसी औरत की दर्द भरी चीख सुनाई दी।
वैशाली सिंह रुक गई।
“यह आवाज किसकी है?”
इंस्पेक्टर का चेहरा सफेद पड़ गया।
वैशाली सिंह तेजी से लॉकअप की तरफ दौड़ी।
दरवाजा खोला, तो उसकी मां और बहन फटे कपड़ों में बैठी थी।
कमला देवी रोते हुए बोली, “बेटी, तू यहां कैसे आई?”
वैशाली ने मां के पैर पकड़ लिए, “मां, यह किसने किया?”
राधिका बहन के सीने से लिपट गई, “दीदी, ये पुलिस वाले बहुत बुरे हैं।”
भाग 6: कानून सबके लिए बराबर है
वैशाली सिंह के चेहरे पर क्रोध की ज्वाला फैल गई।
अब एक अफसर नहीं, एक बेटी और बहन खड़ी थी वहां।
वह गरजती आवाज में बोली, “वर्दी पहनकर तुमने औरतों पर हाथ उठाया, वह भी मेरी मां और बहन पर!”
इंस्पेक्टर हकलाया, “मैडम, गलती हो गई।”
वैशाली चीखी, “गलती नहीं, पाप किया है तुमने!”
उसने तुरंत आदेश दिया – इंस्पेक्टर और शामिल सिपाहियों की ड्यूटी से सस्पेंड करो, वर्दी उतारो।
दो पुलिस अधिकारी आगे बढ़े और सबके सामने थाने में जबरन इंस्पेक्टर और सिपाहियों की बेल्ट और टोपी उतारी गई।
“अब इन्हें उसी लॉकअप में डालो जहां मेरी मां और बहन को रखा था। इन्हें दिन में सिर्फ एक बार खाना दो, वह भी सूखी रोटी।”
मीडिया और अधिकारी जमा हो चुके थे।
वैशाली ने बयान दिया, “कानून सबके लिए बराबर है, चाहे अपराधी पुलिस की वर्दी में ही क्यों न हो।”
कमला देवी और राधिका को सम्मानपूर्वक थाने से बाहर लाया गया।
वैशाली ने अपनी मां का हाथ थामा, “अब कोई भी तुम्हारे साथ अन्याय नहीं करेगा, मां। जब तक तुम्हारी बेटी जिंदा है!”
थाने के ऊपर तिरंगा लहरा रहा था और पहली बार उस इमारत में इंसाफ की गूंज सुनाई दे रही थी।
अंतिम संदेश
यह कहानी यहीं खत्म होती है, लेकिन एक मजबूत सीख के साथ –
अगर आप सच्चाई के रास्ते पर अकेले भी खड़े हैं तो याद रखिए, आपकी एक चिंगारी व्यवस्था में लगी आग को बुझाने की ताकत रखती है।
जीत हमेशा सच की होती है।
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कहानी के सभी पात्र, घटनाएं और संवाद काल्पनिक हैं।
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जय हिंद।
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