उन्हें लगा मेरे पास सिर्फ एक तकिया है , लेकिन सच्चाई कुछ और थी , मेरे नाम करोड़ों की…
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पुरानी वसीयत और फटा हुआ तकिया: एक माँ के स्वाभिमान की गाथा
अध्याय 1: विदाई और शून्य की शुरुआत
शहर की उस आलीशान हवेली में सन्नाटा पसरा हुआ था। सरदार जी, यानी मेरे पति, इस दुनिया को छोड़कर जा चुके थे। चालीस साल का साथ एक पल में यादों के धुएँ में बदल गया। घर में रिश्तेदारों का जमावड़ा था, सफेद कपड़े पहने लोग सांत्वना दे रहे थे, लेकिन मेरी आँखों के आगे सिर्फ अंधेरा था। अमित, रवि और सौम्या—मेरे तीनों बच्चे—अपने पिता की तस्वीर के पास बैठे थे। उनकी आँखों में आँसू तो थे, पर उन आँसुओं के पीछे एक अजीब सी बेचैनी थी, जिसे मैं उस वक्त समझ नहीं पाई।
सरदार जी एक दूरदर्शी व्यक्ति थे। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी मेहनत की ताकि बच्चे एक अच्छी जिंदगी जी सकें। लेकिन उनके जाने के सातवें दिन, जब वकील ने वसीयत पढ़ी, तो कमरे की हवा ही बदल गई।
वकील ने कागज़ खोलकर पढ़ना शुरू किया, “बड़े बेटे अमित को शहर वाला बड़ा बंगला। छोटे बेटे रवि को दूसरा पुश्तैनी घर और दुकान। बेटी सौम्या को पॉश इलाके वाला फ्लैट और बैंक में जमा 12 लाख रुपये की एफडी।”
बच्चों के चेहरों पर एक चमक आ गई। जैसे ही वसीयत का आखिरी हिस्सा आया, वकील थोड़ा झिझका। उसने मेरी तरफ देखा और कहा, “और अपनी पत्नी सविता देवी के लिए, सरदार जी ने सिर्फ उनका वह पुराना तकिया छोड़ा है, जो शादी के समय उनके साथ आया था।”
पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। अमित की पत्नी (मेरी बड़ी बहू) धीरे से मुस्कुराई। रवि और सौम्या ने एक-दूसरे को देखा, जैसे वे मन ही मन कह रहे हों, “पापा ने माँ के साथ यह क्या मज़ाक किया?” मुझे वह फटा-पुराना, घिसा हुआ तकिया थमा दिया गया। मैंने उसे सीने से लगा लिया। उस वक्त मुझे संपत्ति की लालसा नहीं थी, मुझे तो बस अपने पति की आखिरी निशानी मिल गई थी, यही मेरे लिए काफी था।
अध्याय 2: पराये घर की मेहमान
वसीयत लागू होते ही घर के समीकरण बदल गए। वह घर, जिसे मैंने ईंट-ईंट जोड़कर बनाया था, अब अमित का था। पहले कुछ दिन तो सब ठीक रहा, लेकिन धीरे-धीरे मुझे अहसास होने लगा कि मैं अब उस घर की मालकिन नहीं, बल्कि एक ‘अनचाही मेहमान’ हूँ।
एक दिन रसोई में बड़ी बहू ने टोक दिया, “माँ जी, अब आप आराम किया कीजिए, रसोई में हाथ बँटाने की ज़रूरत नहीं है। चीज़ें इधर-उधर हो जाती हैं तो मुझे परेशानी होती है।” उसका लहजा ठंडा था। फिर बारी आई रवि की। रवि ने कहा, “माँ, अमित के घर में प्राइवेसी की दिक्कत है, आप कुछ दिन मेरे यहाँ रह लीजिए।”
मैं रवि के यहाँ गई। वहाँ के हालात और भी बदतर थे। छोटी बहू को मेरा वहाँ होना एक बोझ की तरह लगता था। वह अक्सर कहती, “आजकल के ज़माने में बुजुर्गों को अकेले रहने की आदत डालनी चाहिए।” मेरी बेटी सौम्या, जिससे मुझे सबसे ज्यादा उम्मीद थी, उसने भी हाथ खड़े कर दिए। उसने कहा, “माँ, मेरा फ्लैट छोटा है, बच्चों की पढ़ाई का शोर रहता है, आप वहाँ परेशान हो जाएँगी।”
मैं समझ गई थी। जिन बच्चों को मैंने अपनी नींदें देकर सुलाया, आज उन्हें मेरी मौजूदगी से उनकी नींद में खलल पड़ रहा था।

अध्याय 3: वह काली रात और तकिये का सच
अपमान का घूँट पीते-पीते तीन महीने बीत गए। एक शाम तीनों बच्चे एक साथ बैठे थे। अमित ने साफ शब्दों में कह दिया, “माँ, हम तीनों ने बात की है। हम अपनी जिंदगी चैन से जीना चाहते हैं। पापा ने आपको कुछ नहीं दिया, सिर्फ यह तकिया दिया है। तो अब आप अपना इंतज़ाम कहीं और देख लीजिए। वृद्धाश्रम बुरा नहीं होता, वहाँ आपके जैसे और भी लोग होंगे।”
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। “इंतज़ाम कहीं और?” मैंने काँपती आवाज़ में पूछा। “बेटा, मैंने सब कुछ तो तुम्हें दे दिया।” सौम्या ने तुच्छता से कहा, “पापा ने दिया है माँ, आपने नहीं। और पापा ने आपके लिए सिर्फ यादें छोड़ी हैं, तो उन्हीं के सहारे रहिए।”
उस रात मैं अपना सामान और वह पुराना तकिया लेकर घर से निकल गई। बाहर बारिश हो रही थी। शहर के एक ओवरब्रिज के नीचे मैं बैठ गई। मुझे अपने पति पर गुस्सा आ रहा था। “क्यों सरदार जी? क्यों मुझे इस हाल में छोड़ दिया? क्या मैं एक घर के लायक भी नहीं थी? क्या यह तकिया ही मेरा नसीब था?”
गुस्से और हताशा में मैंने वह तकिया ज़मीन पर पटक दिया। तकिया पुराना था, उसकी सिलाई कमज़ोर थी। जैसे ही वह ज़मीन से टकराया, उसका एक कोना फट गया। लेकिन रुई के साथ कुछ और भी बाहर निकला।
मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। वह सोने की चमक थी! मैंने काँपते हाथों से तकिये को पूरा फाड़ दिया। उसके भीतर रुई के बीच मखमली थैली में 20 सोने के बिस्कुट थे। और उसके नीचे एक प्लास्टिक की फाइल थी।
अध्याय 4: सरदार जी का आखिरी पत्र
मैंने उस फाइल को खोला। उसमें एक पत्र था, जिस पर लिखा था—”मेरी प्रिय सविता के लिए।”
पत्र में लिखा था: “सविता, मुझे पता है कि जब तुम यह पढ़ रही होगी, तो तुम्हारा दिल टूटा हुआ होगा। मुझे अपने बच्चों पर कभी भरोसा नहीं था। मैं जानता था कि संपत्ति मिलते ही वे अपना असली रंग दिखाएंगे। अगर मैं यह सब तुम्हारे नाम सीधे कर देता, तो वे तुमसे लड़कर या धोखे से सब छीन लेते और तुम्हें कहीं का नहीं छोड़ते। इसलिए मैंने उन्हें वो दिया जो वे चाहते थे, और तुम्हें वो दिया जिसकी तुम्हें ज़रूरत थी—सुरक्षा और सम्मान।”
फाइल में शहर से 100 किलोमीटर दूर हमारी 50 एकड़ की पुश्तैनी ज़मीन और एक बड़ी कोठी के कागज़ात थे, जो सरदार जी ने चुपचाप मेरे नाम करवा दिए थे। उन 20 सोने के बिस्कुटों की कीमत करोड़ों में थी।
मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। वह गुस्सा, जो कुछ देर पहले मेरे पति के लिए था, अब अथाह प्रेम में बदल गया। उन्होंने मुझे ‘बेसहारा’ नहीं, बल्कि ‘अजेय’ बना दिया था।
अध्याय 5: सविता देवी का नया अवतार
अगली सुबह मैं शहर छोड़कर अपने गाँव पहुँची। वहाँ की कोठी धूल से सनी थी, लेकिन उसकी नींव मज़बूत थी। जैसे ही मैंने दरवाज़ा खोला, पुराने वफादार चौकीदार ने मुझे पहचान लिया। उसने झुककर प्रणाम किया, “मालकिन, साहब कह गए थे कि आप एक दिन ज़रूर आएँगी।”
मैंने कोठी को सँवारा। खेतों में काम शुरू करवाया। मैंने तय किया कि अब मैं किसी के सामने हाथ नहीं फैलाऊँगी। मैंने गाँव में औरतों के लिए एक छोटा केंद्र खोला और खुद को व्यस्त कर लिया।
कुछ ही हफ्तों में खबर आग की तरह फैल गई कि ‘सविता देवी’ अब करोड़ों की मालकिन हैं।
अध्याय 6: रिश्तों का मुखौटा
एक दिन कोठी के बाहर तीन महँगी गाड़ियाँ आकर रुकीं। अमित, रवि और सौम्या अपनी पत्नियों और बच्चों के साथ बाहर निकले। उनके चेहरों पर वह पुरानी ‘बेचारगी’ और ‘लालच’ साफ दिख रहा था।
सौम्या दौड़कर मेरे गले लग गई, “माँ! हमें पता था आप यहीं होंगी। हमें माफ़ कर दो, हमें तो बस आपकी चिंता हो रही थी।” अमित ने पैर छुए, “माँ, अकेले यहाँ क्या करेंगी? चलिए शहर चलते हैं, मैंने आपके लिए नया कमरा तैयार करवाया है।”
मैंने उनकी बातें सुनीं, पर इस बार मेरे चेहरे पर ममता की जगह एक कठोर मुस्कान थी। मैंने मेज पर वही फटा हुआ तकिया रख दिया।
“यह देख रहे हो?” मैंने शांत स्वर में पूछा। “यह तकिया मेरे पति का दिया हुआ वह सच है, जिसने मुझे तुम्हारी हकीकत दिखाई। जब मेरे पास ‘सिर्फ’ तकिया था, तब मैं बोझ थी। आज जब इस तकिये के अंदर का सच बाहर आ गया, तो मैं फिर से ‘माँ’ बन गई?”
बहुओं ने कुछ बोलने की कोशिश की, पर मैंने हाथ उठाकर उन्हें चुप कर दिया। “अमित, रवि, सौम्या… तुम लोग जिस संपत्ति के लिए आए हो, वह अब कभी तुम्हारी नहीं होगी। सरदार जी ने इसे मेरे नाम किया है, और मैं इसे एक ट्रस्ट को दान कर रही हूँ जो अनाथ बच्चों और बेसहारा बुजुर्गों की सेवा करेगा।”
“माँ, आप ऐसा नहीं कर सकतीं!” रवि चिल्लाया। मैंने ठंडे स्वर में कहा, “मैं कर चुकी हूँ। चौकीदार! इन मेहमानों को बाहर का रास्ता दिखाओ। और हाँ, अब यहाँ बिना अनुमति के कदम मत रखना।”
अध्याय 7: एक नई सुबह
वे लोग चले गए। धूल उड़ाती उनकी गाड़ियाँ जैसे-जैसे ओझल हुईं, मेरा मन और हल्का होता गया।
आज मैं अपनी कोठी के बरामदे में बैठी हूँ। हाथ में चाय का प्याला है और गोद में वही फटा हुआ तकिया है, जिसे मैंने अब मखमल से मढ़वा लिया है। यह तकिया अब मेरे लिए सिर्फ रुई का ढांचा नहीं, बल्कि मेरे स्वाभिमान का प्रतीक है।
मैंने सीखा कि बुढ़ापा तब तक अभिशाप है जब तक आप दूसरों पर निर्भर हैं। आत्मनिर्भरता ही वह ताकत है जो आपको समाज में सिर उठाकर जीना सिखाती है। सरदार जी जहाँ भी होंगे, मुस्कुरा रहे होंगे।
एक संदेश: यह कहानी उन सभी माताओं और पिताओं के लिए है जो अपनी पूरी जमा-पूँजी बच्चों पर लुटा देते हैं। प्रेम और मोह में फर्क करना सीखिए। अपना ‘तकिया’ (आत्मनिर्भरता) हमेशा अपने पास रखिए।
क्या सविता देवी ने अपने बच्चों को माफ़ न करके सही किया? अपनी राय कमेंट में ज़रूर साझा करें।
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