जब Station Master ने अपने खोए हुए बेटे को ऑटो चलाते देखा फिर जो हुआ

खोया हुआ बेटा – चिंटू की कहानी

भूमिका

यह कहानी है एक मासूम बच्चे चिंटू की, जो जीवन की कठिनाइयों के बीच अपनी दादी मां के लिए संघर्ष करता है। उसकी मासूमियत, मेहनत और किस्मत ने उसे उसके असली पिता से फिर मिला दिया। यह कहानी आपको भावुक कर देगी, सोचने पर मजबूर करेगी कि समाज में कितने चिंटू आज भी न्याय और प्यार के लिए तरस रहे हैं।

पहला भाग: झुग्गी का जीवन

सुबह के 5:00 बजे चिंटू अपनी टूटी-फूटी झुग्गी से निकलता था। उसके हाथ में एक पुराना तौलिया रहता, जिससे वह अपने जंग लगे ऑटो को साफ करता। 9 साल का चिंटू स्टेशन रोड पर खड़ा होकर अपनी कमजोर आवाज में सवारियों को बुलाता, “भैया जी, दीदी जी ऑटो चाहिए? सिर्फ ₹10 में बस स्टैंड तक, ₹15 में मार्केट तक।” उसकी आवाज में मासूमियत थी, जो राहगीरों के दिल को छू जाती थी।

चिंटू की दिनचर्या बहुत साधारण थी। सुबह उठना, ऑटो साफ करना, दादी मां के लिए चाय बनाना, फिर स्टेशन पहुंचना, दिनभर सवारियों का इंतजार करना, शाम को घर लौटकर दादी मां के साथ खाना खाना, रात को उनके पैर दबाना। यही था उसका जीवन। लेकिन इसी साधारण जीवन में वह खुश रहता था।

चिंटू को अपने असली माता-पिता के बारे में कुछ पता नहीं था। बस इतना जानता था कि कमला देवी उसकी दादी मां है, जो उससे बहुत प्यार करती है। कमला देवी ने उसे कभी नहीं बताया था कि वह उसे 7 साल पहले भटकता हुआ मिला था।

दूसरा भाग: स्टेशन की दुनिया

स्टेशन के बाहर चिंटू को कई तरह के लोग मिलते थे। कुछ अच्छे, कुछ बुरे। अच्छे लोग उसे प्यार से बात करते, कभी-कभी चॉकलेट या बिस्कुट दे देते। बुरे लोग डांटते, भगाते, धमकी भी देते। लेकिन चिंटू सबके साथ अच्छे से पेश आता था।

उसके पास एक छोटी सी डायरी थी, जिसमें वह रोज का हिसाब-किताब लिखता था। “आज ₹35 कमाए। दादी मां की दवाई ₹25 की ली। बचे ₹10।” यही उसकी रोजाना की एंट्री होती थी। कभी-कभी जब ज्यादा पैसे बच जाते तो वह दादी मां के लिए मिठाई भी ले आता था।

चिंटू को पढ़ना-लिखना बहुत कम आता था। कमला देवी ने थोड़ा बहुत हिंदी सिखाई थी। अंग्रेजी के कुछ शब्द रामदीन चाचा ने सिखाए थे। लेकिन वह बहुत तेज था। लोगों की बातें सुनकर बहुत कुछ सीख जाता था। उसे जगहों के नाम याद थे, पैसों का हिसाब बहुत अच्छा करता था। बड़े-बड़े लोग भी उसकी समझदारी देखकर हैरान हो जाते थे। “यह बच्चा पढ़-लिख जाए तो बहुत आगे जाएगा,” लोग कहते थे। लेकिन स्कूल जाने के लिए पैसे चाहिए थे, यूनिफॉर्म, किताबें, फीस — ये सब चिंटू के पास नहीं था।

तीसरा भाग: प्रदीप गुप्ता की तलाश

स्टेशन मास्टर प्रदीप गुप्ता रोज सुबह 7:00 बजे अपने ऑफिस पहुंच जाते थे। उनकी मेज पर कई फाइलें रहती थीं। लेकिन इन सबके बीच एक छोटी सी फोटो भी थी — 2 साल के मासूम बच्चे की, जो उनका बेटा चिंटू था। इस फोटो को देखते ही प्रदीप गुप्ता की आंखें नम हो जाती थीं।

7 साल हो गए थे उस रात को, जब उनका लाडला बेटा चिंटू गायब हो गया था। 15 जुलाई 2017 की रात थी। प्रदीप गुप्ता नाइट ड्यूटी में थे। घर में सुनीता और 2 साल का चिंटू था। रात के 11:00 बजे सुनीता का फोन आया था — “प्रदीप, चिंटू कहीं नहीं मिल रहा। मैं बाथरूम गई थी, जब वापस आई तो चिंटू कमरे में नहीं था।”

प्रदीप गुप्ता का दिल धक्क से रह गया। उन्होंने तुरंत पुलिस स्टेशन जाकर एफआईआर दर्ज कराई। पुलिस वालों ने कहा, “सर, छोटे बच्चे कभी-कभी छुप जाते हैं। कल तक मिल जाएगा।” लेकिन कल आया, महीना बीता, साल बीता, चिंटू नहीं मिला। प्रदीप गुप्ता ने कोई कसर नहीं छोड़ी — प्राइवेट डिटेक्टिव, अखबारों में विज्ञापन, रेडियो-टीवी अपील, पोस्टर, इनाम की घोषणा, लेकिन कुछ नहीं मिला।

6 महीने बाद सुनीता को हार्ट अटैक आया। डॉक्टर ने कहा, “बहुत ज्यादा स्ट्रेस की वजह से हुआ है।” सुनीता रोज-रोज रोती रहती थी। दिन-रात बस चिंटू की बात करती थी। मृत्यु के समय उसके आखिरी शब्द थे, “प्रदीप, चिंटू को ढूंढना। वादा करो कि तुम उसे ढूंढोगे।” प्रदीप गुप्ता ने वादा किया था।

चौथा भाग: कमला देवी और चिंटू

कमला देवी जब चिंटू को 7 साल पहले मिली थी, तब वह केवल 2 साल का था। रात के 10:00 बजे उसकी झुग्गी के बाहर किसी बच्चे के रोने की आवाज आई। कमला देवी ने देखा — एक छोटा सा बच्चा गली में भटक रहा है और जोर-जोर से रो रहा है, “मम्मा, पापा!” कमला देवी का दिल पिघल गया। वह बच्चे के पास गई, उसे गोद में उठा लिया। “बेटा, क्या हुआ? कहां से आया है?” लेकिन बच्चा कुछ नहीं बोल पाया।

कमला देवी ने आसपास देखा, लेकिन रात का समय था, गली में कोई नहीं था। वह बच्चे को अपने घर ले गई, दूध पिलाया, साफ कपड़े पहनाए, प्यार से सुलाया। सुबह होते ही पूरे इलाके में पूछना शुरू किया, “किसी का बच्चा खो गया है क्या?” लेकिन किसी को कोई जानकारी नहीं थी।

काफी दिन तक कमला देवी ने बच्चे को अपने पास रखा, लेकिन उसके माता-पिता का कोई सुराग नहीं मिला। कमला देवी ने चिंटू को अपने बेटे की तरह पालना शुरू कर दिया। अच्छे संस्कार दिए, बड़ों का सम्मान करना सिखाया, सच बोलना, कभी चोरी न करना सिखाया। चिंटू भी कमला देवी को अपनी असली दादी मां समझकर प्यार करता था।

पाँचवाँ भाग: रामदीन चाचा से सीख

जब चिंटू 6 साल का था, तभी उसकी मुलाकात रामदीन चाचा से हुई थी। रामदीन चाचा एक बूढ़े ऑटो ड्राइवर थे। उनकी उम्र 65 साल थी, अपनी कोई औलाद नहीं थी। वह चिंटू को देखकर बहुत प्रभावित हुए। “बेटा, तू इतना छोटा होकर काम करता है?” चिंटू ने अपनी पूरी कहानी बताई। रामदीन चाचा का दिल भर आया। “बेटा, तू मेरे साथ काम कर, मैं तुझे ऑटो चलाना सिखाऊंगा।”

रामदीन चाचा ने धीरे-धीरे ऑटो चलाना सिखाया। पहले अपने साथ बिठाते थे, फिर धीरे-धीरे चलाने देते थे। चिंटू बहुत तेज था, जल्दी ही सब कुछ सीख गया। जब रामदीन चाचा की मृत्यु हुई, चिंटू को बहुत दुख हुआ। वह रोते-रोते कमला देवी के पास आया, “दादी मां, रामदीन चाचा चले गए।” कमला देवी ने समझाया, “बेटा, जो भी इस दुनिया में आता है, उसे एक दिन जाना पड़ता है। लेकिन रामदीन चाचा ने तुझे जो सिखाया, वह हमेशा तेरे काम आएगा।”

छठा भाग: संघर्ष और पुलिस की बेरहमी

कमला देवी की तबीयत खराब हो गई। अस्पताल में भर्ती कराया तो पता चला इलाज में काफी पैसे लगेंगे। चिंटू ने फैसला किया — किसी भी तरह से दादी मां का इलाज कराएगा। उसने रामदीन चाचा का ऑटो संभाला और अकेले काम करना शुरू किया। कमला देवी को चिंटू पर गर्व था।

एक दिन पुलिस वालों की नजर चिंटू पर पड़ी। हेड कांस्टेबल सुरेश यादव, कांस्टेबल अमित शर्मा, राकेश तिवारी, मनोज गुप्ता और संदीप सिंह — ये पांचों गरीबों को परेशान करने में मशहूर थे। उन्होंने चिंटू को घेर लिया, “लाइसेंस है?” चिंटू को नहीं पता था लाइसेंस क्या होता है। पुलिस वालों ने उसे धक्का दिया, थप्पड़ मारा, लात मारी। चिंटू रोता रहा, माफी मांगता रहा।

चाय की दुकान के मालिक सुरेश कुमार ने पूरी घटना रिकॉर्ड कर ली। चिंटू को छोड़ दिया गया, वह रोता हुआ घर गया। कमला देवी ने उसके घावों पर दवाई लगाई।

सातवाँ भाग: सोशल मीडिया का असर

सुरेश कुमार ने वीडियो Facebook पर अपलोड किया — “9 साल के मासूम बच्चे के साथ रेलवे पुलिस की बर्बरता।” वीडियो वायरल हो गया। लोग गुस्सा हुए, कमेंट्स, शेयर, लाइक्स की बाढ़ आ गई। न्यूज़ चैनल वालों ने खबर दिखाई। पत्रकार मनीष अग्रवाल ने चिंटू का इंटरव्यू लिया।

“तुम क्यों काम करते हो?” चिंटू ने कहा, “दादी मां बहुत बीमार है अंकल। उन्हें दवाई चाहिए।” मनीष ने डिटेल्ड रिपोर्ट तैयार की। देशभर में हैशटग #JusticeForChintu ट्रेंड करने लगा। कई लोग चिंटू की मदद के लिए आगे आए। राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल्स ने खबर दिखाई।

रेलवे मंत्रालय ने जांच के आदेश दिए। सामाजिक कार्यकर्ता, वकील — सब चिंटू के लिए आवाज उठाने लगे। 3 दिन तक मामला देशभर में चर्चा का विषय बना रहा।

आठवाँ भाग: पिता-पुत्र का मिलन

स्टेशन मास्टर प्रदीप गुप्ता ने न्यूज़ में वीडियो देखा। उन्हें लगा — यह बच्चा उनके खोए हुए बेटे चिंटू जैसा दिखता है। उन्होंने बार-बार वीडियो देखा, फोटो मिलान किया। चेहरा, आंखें, नाक, तिल — सबकुछ मिलता-जुलता था।

उन्होंने अपने मित्र अमर सिंह से पता लगाया, “यह बच्चा कहां रहता है?” पता मिलते ही प्रदीप गुप्ता अपनी मोटरसाइकिल लेकर कमला देवी की झुग्गी पहुंचे। अंदर एक बुजुर्ग महिला और बच्चा बैठा था। प्रदीप गुप्ता ने हकलाते हुए कहा, “आंटी जी, मैं चिंटू से मिलने आया हूं।”

चिंटू के हाथ पर जन्म का निशान, माथे पर तिल देखकर प्रदीप गुप्ता को पूरा यकीन हो गया। उन्होंने कहा, “बेटा, मैं तुम्हारा पापा हूं।” कमला देवी और चिंटू दोनों हैरान रह गए। प्रदीप गुप्ता ने पूरी कहानी बताई। चिंटू को कुछ धुंधली यादें आने लगीं। “पापा?” चिंटू ने हिचकिचाते हुए कहा। प्रदीप गुप्ता ने चिंटू को गले लगा लिया। 7 साल बाद अपने बेटे को पाकर वह जोर-जोर से रोने लगे।

नौवाँ भाग: न्याय की जीत

प्रदीप गुप्ता ने कमला देवी और चिंटू को अपने क्वार्टर ले गए। चिंटू को उसका पुराना कमरा दिखाया, उसकी मम्मी सुनीता की फोटो दिखाई। “बेटा, यह तेरी मम्मी है।” अगले दिन प्रदीप गुप्ता ने उन पांच पुलिस वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की। रेलवे बोर्ड ने उन्हें निलंबित कर दिया, बाल अत्याचार का मामला दर्ज हुआ।

देशभर में खुशी की लहर दौड़ गई। सोशल मीडिया पर हैशटग #ChintuFoundHisFather ट्रेंड करने लगा। कमला देवी को प्रदीप गुप्ता ने अपनी मां का दर्जा दिया, उसका इलाज करवाया। चिंटू अब स्कूल जाता था, पढ़ाई करता था, दोस्त बनाता था। लेकिन वह कमला देवी को अपनी दादी मां ही कहता था।

कुछ महीनों बाद कोर्ट से उन पुलिस वालों को सजा मिली। नौकरी से बर्खास्त, जुर्माना। न्याय मिलने पर चिंटू खुश था।

अंतिम भाग: नई शुरुआत

चिंटू अब सामान्य बच्चे की तरह जीवन जीता था। स्कूल जाता, खेलता, पढ़ाई करता। लेकिन अपने संघर्ष के दिनों को नहीं भूला। वह हमेशा कहता, “पापा, मैं बड़ा होकर गरीब बच्चों की मदद करूंगा।”

कमला देवी अब स्वस्थ थी, खुश थी। प्रदीप गुप्ता को उनका बेटा मिल गया था। देशभर में चिंटू की कहानी मिसाल बन गई — एक मासूम बच्चे की हिम्मत, प्यार और किस्मत की कहानी।

समाप्त