प्राणदाता: सरहद का वह ‘अनाम’ डॉक्टर
अध्याय 1: सन्नाटे की गूँज
सोनपुर नाम का वह गाँव भारत की उस सीमा पर बसा था जहाँ नक्शे की लकीरें धुंधली हो जाती हैं। यहाँ की हवा में मिट्टी की खुशबू कम और बारूद की गंध ज़्यादा महसूस होती थी। अभिनव, जिसकी उम्र महज़ 19 साल थी, इसी गाँव की धूल में पला-बढ़ा था। उसके लिए ‘धमाका’ कोई डरावनी चीज़ नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की आवाज़ थी।
अभिनव के घर की छत कच्ची थी, लेकिन उसके सपने फौलादी थे। उसके पिता एक दिहाड़ी मज़दूर थे जो सालों पहले सीमा पर बाड़ लगाने गए और फिर कभी लौटकर नहीं आए। माँ, जानकी देवी ने उसे पालने के लिए अपनी उंगलियों की खाल घिस दी। गाँव के रईसों के यहाँ बर्तन माँझना और फर्श पोंछना ही उनकी नियति बन गई थी ताकि अभिनव शहर के मेडिकल कॉलेज में पढ़ सके।
“बेटा, ये रोटियाँ और थोड़ा नमक ले जा। शहर में खाना महँगा होता है,” जानकी देवी ने फटे हुए थैले में खाना बांधते हुए कहा। उनकी आँखों में थकान थी, पर अभिनव की किताबों को देखकर वह अपनी सारी पीड़ा भूल जाती थीं।

अध्याय 2: नियति का बुलावा
मेडिकल कॉलेज का पहला साल अभिनव के लिए चुनौतियों भरा था। जहाँ बाकी छात्र बड़ी कारों में आते थे, अभिनव फटी हुई चप्पल पहनकर बस से उतरता था। लोग उसे ‘गरीब लड़का’ कहकर पुकारते थे। प्रोफेसर भी उसे गंभीरता से नहीं लेते थे। लेकिन अभिनव का ध्यान केवल एक चीज़ पर था—’मानव शरीर’।
एक दोपहर, जब अभिनव छुट्टियों में गाँव आया हुआ था, सरहद पर अचानक हलचल हुई। भारतीय सेना की एक टुकड़ी गश्त पर थी जब एक जवान, लांस नायक विक्रम सिंह, अचानक ज़मीन पर गिर पड़े। उन्हें आनन-फानन में गाँव के पास के छोटे से सैन्य अस्पताल ले जाया गया।
अभिनव उस वक्त पास ही एक पेड़ के नीचे अपनी एनाटॉमी की किताब पढ़ रहा था। उसने एम्बुलेंस की सायरन सुनी और उसका दिल धक से रह गया। बिना कुछ सोचे, वह अस्पताल की ओर दौड़ पड़ा।
अध्याय 3: मौत का ऐलान और एक आवाज़
अस्पताल के भीतर अफरातफरी मची थी। सीनियर डॉक्टर खन्ना जवान का परीक्षण कर रहे थे। जवान का चेहरा नीला पड़ चुका था, नाड़ी (Pulse) गायब थी।
“I’m sorry, he’s gone. No pulse, no respiration. Declare him dead,” डॉक्टर खन्ना ने ठंडी आवाज़ में कहा और अपना स्टेथोस्कोप हटा लिया।
पूरे कमरे में मातम छा गया। नर्स ने सफेद चादर उठाई ताकि जवान का चेहरा ढका जा सके। तभी भीड़ को चीरते हुए एक आवाज़ आई— “रुकिए! ये ज़िंदा हैं!”
सबकी नज़रें मुड़ गईं। वहाँ अभिनव खड़ा था, पसीने से तर-बतर।
“तुम कौन हो? अंदर कैसे आए?” एक सिपाही ने उसे धक्का देते हुए पूछा।
“मैं मेडिकल स्टूडेंट हूँ। मैंने देखा… जवान के गले की नस (Carotid Artery) में एक बहुत सूक्ष्म हरकत हुई है। ये मरे नहीं हैं, ये ‘हाइपोथर्मिक शॉक’ में हैं!” अभिनव चिल्लाया।
अध्याय 4: मौत से छीनी गई साँस
डॉक्टर खन्ना ने उपहास उड़ाया, “मूर्ख मत बनो लड़के। मशीनें झूठ नहीं बोलतीं। मॉनिटर पर सीधी लकीर (Flatline) दिख रही है।”
अभिनव आगे बढ़ा और जवान के सीने पर हाथ रखा। “मशीनें कभी-कभी बहुत कम वोल्टेज नहीं पकड़ पातीं। सर, अगर हमने अभी सीपीआर (CPR) और वार्म सलाइन (Warm Saline) शुरू नहीं किया, तो ये वाकई मर जाएंगे।”
मेजर कुलदीप, जो वहाँ मौजूद थे, ने अभिनव की आँखों में वह जिद्द देखी जो सिर्फ एक रक्षक में होती है। “डॉक्टर, इसे एक मौका दीजिए,” मेजर ने आदेश दिया।
अगले 15 मिनट एक युद्ध की तरह थे। अभिनव ने अपनी पूरी ताकत से जवान के सीने को दबाना शुरू किया। 1… 2… 3… 4… वह रुक नहीं रहा था।
“वापस आ जाओ… वापस आ जाओ…” अभिनव बुदबुदा रहा था। अचानक, मॉनिटर पर एक ‘बीप’ सुनाई दी। फिर दूसरी। फिर तीसरी।
“पल्स वापस आ रही है!” नर्स चिल्लाई। डॉक्टर खन्ना के हाथ से फाइल गिर गई। जिस जवान को उन्होंने मृत घोषित कर दिया था, उसने एक लंबी और गहरी साँस ली।
अध्याय 5: सिस्टम की तलवार
जवान की जान तो बच गई, लेकिन अभिनव के लिए मुसीबतें शुरू हो गईं। अगले दिन मिलिट्री पुलिस और मेडिकल काउंसिल के लोग कॉलेज पहुँच गए।
“अभिनव कुमार, आपने एक सैन्य अस्पताल में बिना अनुमति के हस्तक्षेप किया। आप अभी डॉक्टर नहीं हैं। अगर वह जवान मर जाता, तो आप पर हत्या का मुकदमा चलता,” डीन ने चिल्लाकर कहा।
अभिनव चुपचाप खड़ा था। उसकी आँखों में कोई पछतावा नहीं था।
“सर, मेरा धर्म कहता है कि जान बचाना नियमों से बड़ा है। अगर कानून मुझे अपराधी मानता है, तो मैं तैयार हूँ,” अभिनव ने शांति से जवाब दिया।
उसे सस्पेंड (Suspend) कर दिया गया। गाँव में खबर फैली कि ‘गरीब लड़के’ ने कोई बड़ी गलती की है। उसकी माँ फिर से लोगों के घरों में बर्तन माँझने गई, जहाँ उसे ताने मिले—”तेरा बेटा बड़ा डॉक्टर बनने चला था, जेल जाएगा अब।”
अध्याय 6: सच का सूरज
लेकिन कहानी अभी बाकी थी। लांस नायक विक्रम सिंह, जिन्हें होश आ चुका था, ने जब सुना कि उन्हें किसने बचाया है, तो उन्होंने अपने अधिकारियों से मिलने की जिद्द की।
“सर, जब मैं अंधेरे में डूब रहा था, मुझे एक आवाज़ सुनाई दे रही थी। वह लड़का मुझे वापस खींच रहा था। अगर वह नहीं होता, तो मेरी पत्नी विधवा हो जाती और मेरा बच्चा अनाथ,” विक्रम ने नम आँखों से कहा।
मेजर कुलदीप ने दिल्ली तक यह रिपोर्ट भेजी। उन्होंने लिखा—”अभिनव ने नियम तोड़े, लेकिन उसने वह किया जो एक सच्चा डॉक्टर और एक सिपाही करता है। उसने हार नहीं मानी।”
अध्याय 7: सम्मान का शिखर
एक हफ़्ते बाद, दिल्ली से एक विशेष विमान सोनपुर पहुँचा। गाँव के लोग डर गए कि पुलिस अभिनव को पकड़ने आई है। लेकिन विमान से सेना के जनरल और स्वास्थ्य मंत्री उतरे।
गाँव के उसी धूल भरे मैदान में एक छोटा सा मंच सजाया गया। अभिनव को वहाँ बुलाया गया।
“अभिनव कुमार,” जनरल ने माइक पर कहा, “नियम व्यवस्था बनाए रखने के लिए होते हैं, लेकिन इंसानियत व्यवस्था को अर्थ देती है। आज भारतीय सेना आपको ‘मानद नागरिक सम्मान’ और आपकी पूरी पढ़ाई के लिए पूर्ण छात्रवृत्ति (Full Scholarship) प्रदान करती है।”
पूरा गाँव तालियों की गूँज से भर गया। वह लड़का, जिसे सब ‘गरीब’ और ‘अदना’ समझते थे, आज देश का हीरो था।
विक्रम सिंह, जो अब पूरी तरह स्वस्थ थे, मंच पर आए और अभिनव को एक कड़क सैल्यूट (Salute) दिया। अभिनव ने उन्हें गले लगा लिया।
अध्याय 8: माँ का सपना
स्टेज से उतरकर अभिनव सीधा अपनी माँ के पास गया। जानकी देवी कोने में खड़ी रो रही थीं। उसने अपना मेडल माँ के गले में डाल दिया।
“माँ, अब तुझे किसी के यहाँ बर्तन नहीं माँझने पड़ेंगे। अब तेरा बेटा डॉक्टर बनेगा,” अभिनव ने कहा।
जानकी देवी ने उसके माथे को चूमते हुए कहा, “तू तो डॉक्टर उसी दिन बन गया था बेटा, जिस दिन तूने मौत को हरा दिया था।”
निष्कर्ष (The Essence)
यह कहानी केवल एक जान बचाने की नहीं है, बल्कि उस साहस की है जो हमें सही और गलत के बीच फर्क करना सिखाता है। कभी-कभी नियम इंसानों को बचाने के लिए नहीं, बल्कि खुद को बचाने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। लेकिन जो व्यक्ति जोखिम उठाकर दूसरों के लिए खड़ा होता है, दुनिया उसी के सामने सिर झुकाती है।
सन्देश: काबिलियत कपड़ों या बैंक बैलेंस से नहीं, बल्कि आपके चरित्र और संकट के समय लिए गए फैसलों से तय होती है।
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