तलाक के बाद टैक्सी में जाते हुए पति पत्नि ने कैसे बदला फैसला। दिल छू लेने वाली कहानी।
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तलाक के बाद टैक्सी में जाते हुए पति-पत्नी ने कैसे बदला फैसला — दिल छू लेने वाली कहानी
लखनऊ सिविल कोर्ट के बाहर हल्की धूप थी। भीड़ के बीच दो साए धीरे-धीरे बाहर निकल रहे थे। मीरा और समीर एक-दूसरे से दो कदम की दूरी पर थे, लेकिन उनके दिलों में मीलों का फासला था। दोनों के हाथों में एक ही कागज था — तलाक का आदेश। मीरा ने अपना दुपट्टा मजबूती से पकड़ लिया था, उसकी उंगलियां कांप रही थीं, जैसे यह कागज उनके रिश्ते की आखिरी निशानी हो। समीर ने अपनी घड़ी देखी, जैसे जल्दी में हो, लेकिन जाने की कोई मंजिल न हो।
कोई तीसरी नजर उन्हें देखती तो कहती, “क्या जोड़ी थी!” लेकिन किसी को पता नहीं था कि उस जोड़ी की हर कड़ी हर रोज़ कितनी चुपचाप टूटती रही थी।
मीरा की आंखों में एक पुरानी याद तैर गई — उनकी पहली मुलाकात की। जब समीर ने कॉफी शॉप में उसकी किताब गिरने से बचाई थी और हंसकर कहा था, “किताबें गिरती हैं, तो कहानी खत्म नहीं होती, बस नया अध्याय शुरू होता है।” आज वह कहानी खत्म हो रही थी, और नया अध्याय कहीं नजर नहीं आ रहा था।
पांच साल पहले उनकी शादी हुई थी। प्यार से भरी शुरुआत, सपनों से भरा एक घर। मीरा याद करती है उस दिन को, जब वे पहली बार अपने छोटे से फ्लैट में आए थे। समीर ने उसे गोद में उठाया था और हंसते हुए कहा था, “यह हमारा महल है, रानी जी।” मीरा ने शर्माते हुए उसे चूम लिया था। वे रात भर बातें करते रहे — भविष्य के सपनों की, बच्चों की, यात्राओं की।
लेकिन शादी के दो साल बाद समीर ने अपनी अच्छी खासी नौकरी छोड़कर अपना स्टार्टअप शुरू किया। मीरा ने उसका पूरा साथ दिया। शुरुआत में सब अच्छा था, पर धीरे-धीरे बिजनेस डूबने लगा। घर वाले जो पहले समीर के फैसले की तारीफ करते थे, अब ताने देने लगे। “बहू के पैर ही अच्छे नहीं हैं। जब से यह आई है, सब उल्टा हो रहा है। हमने तो पहले ही कहा था, नौकरी मत छोड़ो।”
मीरा ने समीर की तरफ कई बार देखा था, “कुछ कहोगे?” समीर चुप रहा। उसे अपनी नाकामी का बोझ इतना भारी लगता था कि वह किसी से नजरें नहीं मिला पाता था। उसे लगा, बातों से क्या होगा? सब ठीक हो जाएगा। पर सब ठीक नहीं हुआ।
मीरा की चुप्पी धीरे-धीरे शिकायत में बदलने लगी, और समीर का मौन दूरी में। एक शाम मीरा घर आई तो समीर ऑफिस की टेबल पर सिर झुकाए बैठा था। चेक बुक खाली थी। मीरा ने उसके कंधे पर हाथ रखा, लेकिन समीर ने उसे झटक दिया। “क्या करोगी तुम? सब खत्म हो गया।”
मीरा चुपचाप रसोई में चली गई, लेकिन अंदर से टूट रही थी। उस रात वह बिस्तर पर लेटी रोती रही। मीरा की सहेलियां कहतीं, “तुम क्यों सहती हो? छोड़ दो।” लेकिन मीरा सोचती, “कैसे छोड़ दूं? यह मेरा घर है, मेरा प्यार है।” फिर भी हर सुबह उठकर वह घर संभालती, समीर के लिए चाय बनाती। लेकिन अब वह चाय ठंडी रह जाती। समीर काम में डूबा रहता, और मीरा अकेलेपन में।
एक दिन मीरा ने डायरी में लिखा, “क्या प्यार इतना कमजोर होता है कि असफलता उसे तोड़ दे?” लेकिन उस डायरी को कभी समीर ने नहीं देखा। फिर एक दिन मीरा ने कहा, “मैं अब नहीं रह सकती।” समीर ने जवाब दिया, “शायद यही ठीक है।”
उस दिन मीरा की आंखों में आंसू थे, लेकिन समीर ने उन्हें नजरअंदाज कर दिया। वह सोच रहा था, “मैं उसे खुश नहीं रख सकता, तो बेहतर है अलग हो जाएं।” लेकिन रात भर वह सो नहीं पाया। पुरानी तस्वीरें देखता रहा — शादी की हनीमून की।
मीरा भी अपनी मां के घर जाकर रोती रही, “मैंने क्या गलत किया?”
आज उसी तलाक का आखिरी दिन था।

सड़क पर एक टैक्सी खड़ी थी। समीर ने मीरा का हाथ दिया, और जैसे ही वह बैठने लगा, पीछे से आवाज आई, “मैं भी चलूं।”
वह मुड़ी, मीरा थी। समीर ने कुछ नहीं कहा, बस थोड़ा खिसक कर जगह बना दी। मीरा बैठ गई, और उसका दिल धड़क रहा था। “क्यों आई हूं मैं? क्या उम्मीद है अभी भी?” वह सोच रही थी।
टैक्सी ने रफ्तार पकड़ी, शहर की हलचल पीछे छूटने लगी। समीर खिड़की की ओर देख रहा था। बाहर दौड़ते पेड़, दुकानें, ट्रैफिक। मीरा उसके बगल में बैठी थी, पर जैसे दोनों के बीच अब भी एक अदृश्य दीवार थी।
मीरा की नजरें समीर की गर्दन पर पड़ीं, जहां एक पुरानी चैन लटक रही थी। वही चैन जो उसने शादी में दी थी। उस चैन को देखकर मीरा की यादें ताजा हो गईं। शादी की पहली रात जब समीर ने कहा था, “यह चैन हमेशा पहनूंगा क्योंकि यह तुम्हारी है।” आज वह चैन अभी भी थी, लेकिन रिश्ता टूट चुका था।
मीरा की आंखें नम हो गईं। कुछ मिनट तक कोई नहीं बोला। फिर मीरा ने धीरे से कहा, “बस स्टेशन तक का सफर तुम्हारे साथ करना चाहती हूं।”
समीर ने पहली बार उसकी तरफ देखा। “मैं ऑफिस का सारा फर्नीचर बेच दूंगा,” समीर ने अचानक कहा। “वो सपना तेरे साथ ही देखा था। अब जब तू ही नहीं है तो उन टूटी कुर्सियों का क्या करूं?”
मीरा ने चौंक कर उसकी तरफ देखा। “फर्नीचर मत बेचना। मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैंने एक स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया है। मेरा गुजारा हो जाता है।” लेकिन अंदर से वह सोच रही थी, “क्या वह अभी भी मेरे बारे में सोचता है? क्या उसका दर्द भी मेरे जैसा है?”
कुछ पल को खामोशी छा गई। मीरा की उंगलियां उसकी दुपट्टे की झालर से खेल रही थीं। वह जानती थी समीर कभी अपनी भावनाओं को जाहिर नहीं करता। लेकिन आज उसके शब्दों में दर्द साफ था।
“तुमने कभी कुछ कहा क्यों नहीं समीर?” उसकी आवाज कांपी। “जब सब लोग मुझे तुम्हारी नाकामी का दोषी ठहरा रहे थे, तुम चुप क्यों रहे?”
समीर ने सिर झुका लिया। “मुझे अपनी हार से इतनी शर्मिंदगी थी कि मैं खुद से नजरें नहीं मिला पा रहा था। मुझे लगा तुम्हें मुझ पर भरोसा है, और यही काफी होगा। पर शायद मैं गलत था।”
वह रुक गया, और उसकी आंखों में पुरानी यादें घुमड़ आईं। “रात जब मैं देर से घर आया और तुम इंतजार कर रही थी। तुमने गले लगाकर कहा था, ‘तुम्हारी सफलता मेरी है।’ मैंने वह भरोसा तोड़ दिया।”
मीरा ने आंखें बंद कीं। तभी एक तेज झटका लगा। टैक्सी वाले ने अचानक ब्रेक मारा। मीरा का सिर सामने की सीट से टकराने ही वाला था कि समीर ने झटके से उसकी बाह पकड़ ली। मीरा ठिठक गई। वह कुछ पल तक उसी स्थिति में बैठी रही। फिर धीरे से बोली, “अलग हो गए, मगर परवाह करने की आदत अब भी नहीं गई तुम्हारी।”
समीर का स्पर्श अभी भी उसके बाजू पर था। गर्म और परिचित। मीरा को लगा जैसे समय रुक गया हो। समीर कुछ नहीं बोला, सिर्फ उसकी आंखों में एक नमी सी तैर गई।
टैक्सी दोबारा चल पड़ी, लेकिन अब माहौल बदल चुका था। समीर ने धीरे से उसकी बाह छोड़ दी, लेकिन उसका दिल अब भी धड़क रहा था। “क्या अभी भी मौका है?” वह सोच रहा था।
मीरा ने अपनी नजरें उसके हाथ पर टिका दीं। वही हाथ जो कभी उसके लिए सपने बनाता था। आज वही हाथ झटके से उसे बचा गया था।
मीरा की आंखें भर आईं, लेकिन उसने तुरंत मुंह फेर लिया। वह कमजोर नहीं दिखना चाहती थी। फिर भी उसके मन में सवाल घूम रहे थे, “क्या हमने वाकई सब कुछ ट्राई किया? क्या प्यार इतना आसानी से खत्म हो जाता है?”
फिर उसने हिम्मत जुटाकर पूछा, “एक बात पूछूं?”
समीर ने धीरे से सिर मोड़ा, “पूछो।”
“इन दो सालों में क्या कभी मेरी याद आई?”
समीर कुछ क्षण चुप रहा। उसने खिड़की की तरफ देखा। “बहुत बार,” वह बोला। “जब सुबह अकेले चाय पीता था, और दूसरा कप बनाने की आदत याद आती थी। जब कोई बिजनेस की बात करता था, और तुम्हारा वो यकीन याद आता था, जो तुम्हें मुझ पर मुझसे ज्यादा था। जब घर में वो किताबें दिखती थीं, जो तुम मेरे लिए लाई थीं।”
उसकी आवाज कांप गई। “पर अब बताने से क्या फायदा? मीरा, अब तो सब कुछ खत्म हो गया ना।”
वह रुक गया, और एक और याद आई — मीरा की हंसी की, जो घर को रोशन कर देती थी। “याद है वो ट्रिप मनाली की? तुमने बर्फ में गिरकर भी हंसते हुए कहा था, ‘तुम्हारे साथ गिरना भी मज़ा है।’ मैंने वो मज़ा खो दिया।”
मीरा अब खुद को रोक नहीं पाई। उसकी आंखों से आंसू बह चले। उसने समीर के कंधे पर सिर रखकर कहा, “जो हिम्मत मिलती थी, वह हिम्मत दो साल में एक बार भी नहीं मिली।”
उसने हाथों से चेहरा ढक लिया और फफक पड़ी। उसके आंसू टपकते हुए समीर के हाथ पर गिरे, और समीर ने उन्हें पोंछने की कोशिश की।
“मैंने सब बर्बाद कर दिया,” वह बोला, उसकी आवाज में पछतावा था।
मीरा ने उसके हाथ को पकड़ लिया, जैसे डूबते जहाज की आखिरी उम्मीद। “नहीं, हम दोनों ने चुप रहकर बर्बाद किया।”
टैक्सी की रफ्तार अब धीमी हो गई थी। रेलवे स्टेशन 200 मीटर।
मीरा ने अपने आंसुओं को पोंछा। “माफ करना,” उसने बुदबुदाकर कहा।
समीर ने उसकी तरफ देखा। “माफी की जरूरत नहीं है, मीरा। शायद हम दोनों ही कमजोर थे, लेकिन प्यार कभी कम नहीं हुआ।” वह सोच रहा था, “क्या हम फिर से शुरू कर सकते हैं? क्या मीरा मुझे माफ करेगी?”
टैक्सी अब स्टेशन के सामने रुक चुकी थी। समीर ने किराया चुकाया। मीरा धीरे से बाहर निकली। जैसे ही उसने मुड़कर जाने की कोशिश की, समीर ने उसका हाथ पकड़ लिया था।
मीरा बिना कुछ बोले उसकी तरफ मुड़ी। समीर की आंखों में आंसू थे, लेकिन आवाज मजबूत थी, “चलो अपने घर चलते हैं।”
“पर तलाक के कागजों का क्या होगा?” उसने फुसफुसाते हुए पूछा।
मीरा का दिल जोरों से धड़क रहा था — उम्मीद और डर के बीच। समीर ने मुस्कुरा कर जेब से वह कागज निकाले और बिना कुछ बोले, सामने सबके बीच उन्हें फाड़ दिया। कागज हवा में उड़ गए, और मीरा फफक कर उसके सीने से लग गई।
समीर ने उसे कसकर गले लगाया, जैसे कभी न छोड़ने का वादा कर रहा हो। “मैं तुम्हें कभी नहीं खोऊंगा, मीरा। हम फिर से बनाएंगे सब कुछ।”
स्टेशन की भीड़ अपने-अपने रास्तों पर थी, लेकिन उन दो लोगों के लिए आज पूरी दुनिया वहीं थम गई थी।
मीरा ने समीर के सीने से सिर उठाया और कहा, “चलो घर चलें। लेकिन इस बार हर बात कहेंगे, हर दर्द बांटेंगे।”
मीरा ने धीरे से कहा, “अगर हम पहले बात कर लेते, तो ये दो साल ऐसे ना बीतते।”
समीर ने सिर हिलाया, “हमने अपने रिश्ते को दूसरों की आवाजों के बीच खो दिया था।”
मीरा अब सिर्फ एक-दूसरे को सुनेंगे।
वे स्टेशन से बाहर निकलते हुए एक-दूसरे का हाथ पकड़े। रास्ते में मीरा ने कहा, “तुम्हारा स्टार्टअप फिर से शुरू करेंगे। मैं तुम्हारे साथ हूं।”
समीर ने मुस्कुरा कर कहा, “हां, लेकिन इस बार सिर्फ हमारा सपना होगा। कोई दबाव नहीं।”
उसने मीरा का हाथ और कसकर पकड़ लिया।
अब कोई कोर्ट नहीं था, कोई दस्तावेज नहीं था, सिर्फ दो दिल थे जो दो साल के खामोश इम्तिहान के बाद फिर से एक-दूसरे की जुबान समझने लगे थे।
शाम की धूप अब फीकी हो चुकी थी, और वे घर की ओर चल पड़े थे — एक नई शुरुआत करने।
और उस रात वे एक-दूसरे के बाहों में सोए, जैसे कभी अलग हुए ही न हों।
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