देहरादून की पुकार: एक बेटी के इंसाफ की कहानी
देहरादून की सुबह थी, लेकिन परेड ग्राउंड के बाहर माहौल सामान्य नहीं था। हवा में नारे थे, आंखों में गुस्सा, और दिलों में एक ही सवाल—अंकिता को इंसाफ कब मिलेगा?
मंच पर भीड़ जुटी थी। सामाजिक कार्यकर्ता, महिला संगठन, छात्र, बुज़ुर्ग—सब एक नाम के साथ खड़े थे: अंकिता भंडारी।
उस बेटी के लिए, जो अब इस दुनिया में नहीं थी, पर जिसकी याद लोगों के दिलों में ज़िंदा थी।

मंच पर खामोश दर्द
भीड़ के बीच दो चेहरे ऐसे थे जो सबसे ज्यादा बोल रहे थे—बिना कुछ कहे।
वो थे अंकिता के माता-पिता।
एक मां जिसकी आंखें सूख चुकी थीं रोते-रोते,
एक पिता जिसकी आवाज़ अब सिर्फ न्याय मांगती थी।
उनके हाथ में एक चिट्ठी थी—वही चिट्ठी जो उन्होंने मुख्यमंत्री को दी थी।
मांग साफ थी:
सीबीआई जांच हो, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में।
उन्हें डर था कि कहीं उनकी बेटी की कहानी अधूरी न रह जाए।
भीड़ क्यों गुस्से में थी?
लोगों का कहना था—जांच शुरू हुई, आरोपी जेल में हैं, लेकिन कई सवाल अब भी जिंदा हैं।
सबसे बड़ा सवाल—
वो “वीआईपी” कौन था?
प्रदर्शनकारियों का दावा था कि अंकिता पर किसी खास व्यक्ति को “स्पेशल सर्विस” देने का दबाव था।
अंकिता ने मना किया।
और फिर वह हमेशा के लिए खामोश हो गई।
ये आरोप प्रदर्शनकारियों और परिवार की ओर से लगाए जा रहे थे—और वे चाहते थे कि सच पूरी तरह सामने आए।
जनता का भरोसा क्यों डगमगाया?
कुछ लोगों ने जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाए।
कहा गया कि सबूतों के साथ लापरवाही हुई,
घटनास्थल पर बुलडोज़र चलाया गया,
कुछ महत्वपूर्ण चीजें समय पर सुरक्षित नहीं रखी गईं।
ये बातें मंच से उठ रही थीं—आक्रोश के साथ, दर्द के साथ।
सरकार की ओर से कहा गया कि जांच एजेंसियां अपना काम कर रही हैं।
लेकिन परिवार और प्रदर्शनकारी चाहते थे कि निगरानी सबसे ऊंचे स्तर से हो।
अंकिता सिर्फ एक नाम नहीं रही
भीड़ में खड़ी एक महिला ने कहा:
“अंकिता सिर्फ एक लड़की नहीं थी। वो हर उस बेटी का चेहरा है जो घर से निकलती है अपने सपनों के लिए।”
किसी ने बताया कि अंकिता अपनी पहली तनख्वाह से घर की टपकती छत ठीक करवाना चाहती थी।
वो सपना अब अधूरा रह गया।
एक आंदोलन की शक्ल
ये मामला अब सिर्फ एक परिवार का नहीं रहा था।
ये एक प्रतीक बन गया था—
महिलाओं की सुरक्षा का,
सिस्टम पर भरोसे का,
और सच सामने लाने की जिद का।
लोग नारे लगा रहे थे,
लेकिन उन नारों में राजनीति कम और पीड़ा ज्यादा थी।
खामोश सवाल
शाम ढल रही थी।
मंच पर भाषण खत्म हो रहे थे।
भीड़ छंट रही थी।
लेकिन कुछ सवाल वहीं रह गए—हवा में तैरते हुए:
क्या सच पूरी तरह सामने आएगा?
क्या एक मां-बाप को सुकून मिलेगा?
क्या एक बेटी की कहानी न्याय तक पहुंचेगी?
अंत नहीं, इंतज़ार
देहरादून की सड़कों ने उस दिन सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं देखा,
उन्होंने देखा—
एक परिवार का दर्द,
एक समाज की बेचैनी,
और इंसाफ की उम्मीद।
क्योंकि जब एक बेटी न्याय मांगती है,
तो उसकी आवाज़ बहुत दूर तक जाती है।
और शायद…
कभी न कभी,
सच भी उतनी ही दूर तक पहुंचे।
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