एक साधारण वेटर लड़की की नेकी और करोड़पति सरदार जी की सच्ची सेवा
क्या होता है जब एक छोटी सी नेकी बिना किसी दिखावे के अंधेरे में एक दिए की तरह जलती है? क्या सेवा का असली मतलब बड़े-बड़े भंडारे करवाना है या फिर अपनी थाली का एक निवाला किसी भूखे के मुंह में डालना है?
यह कहानी चंडीगढ़ की है, जहाँ सेक्टर 17 के पौश इलाके में एक पाँच सितारा होटल “द रॉयल पैलेस” था। यहाँ की शानो-शौकत, लजीज पकवान और शाही मेहमाननवाजी के लिए होटल पूरे उत्तर भारत में मशहूर था। लेकिन इसी चमक-दमक के पीछे एक और दुनिया थी—हरलीन कौर की। 22 साल की हरलीन इस होटल के सबसे महंगे रेस्टोरेंट “द पर्शियन कोर्ट” में वेटर थी। वह अपने बूढ़े माता-पिता के साथ एक साधारण कॉलोनी में रहती थी। उसके पिता कभी पंजाब रोडवेज में ड्राइवर थे, मगर एक एक्सीडेंट के बाद अब कोई काम नहीं कर सकते थे। घर की सारी जिम्मेदारी हरलीन के कंधों पर थी।
हरलीन की सुबह गुरुद्वारे में माथा टेकने से शुरू होती थी और रातें होटल में अमीर ग्राहकों की झूठी प्लेटें उठाने में गुजरती थीं। वह देखती थी कि कैसे लोग हजारों की डिश मंगवाते, दो चम्मच खाते और बाकी खाना फेंक देते। वही खाना किसी गरीब परिवार के लिए हफ्ते भर का राशन हो सकता था। होटल के नियमों के अनुसार, टेबल पर रखा गया खाना वापस किचन में नहीं जा सकता था, उसे फेंकना ही पड़ता था। हरलीन को अपने गुरुओं की सीख याद आती—वंड छको, यानी मिल बांट कर खाओ। उसे लगता कि यह सिर्फ खाने की बर्बादी नहीं, बल्कि उस अन्न का अपमान है।
इसी शहर में एक और शख्स थे—सरदार मनजीत सिंह रंधावा। रंधावा स्टील्स के मालिक, करोड़पति उद्योगपति। उन्होंने अपनी मेहनत से छोटे कारोबार को हजारों करोड़ के साम्राज्य में बदल दिया था। उनके नाम पर कई स्कूल, अस्पताल और धर्मशालाएँ चलती थीं। वह हर साल लाखों रुपए दान देते और बड़े लंगर करवाते। लेकिन उन्हें लगता था कि उनके दान और लंगर सिर्फ रस्म अदायगी बनकर रह गए हैं। उनमें वह रूहानी सुकून नहीं था जो सच्ची सेवा में मिलता है। वह अपनी पत्नी से कहते, “मैं सिर्फ पैसा दान कर रहा हूँ, अपनी रूह का हिस्सा नहीं। मैं उस निस्वार्थ सेवा को देखना चाहता हूँ जो बिना नाम या शोहरत के की जाती है।”
एक सर्द रात सरदार मनजीत सिंह अपने विदेशी मेहमानों के साथ “द पर्शियन कोर्ट” में डिनर पर आए। डिनर के बाद टेबल पर बहुत सारा खाना बच गया। होटल के नियम के मुताबिक वह खाना फेंकना था। हरलीन जब टेबल साफ करने आई, तो उसने उस खाने को देखा और उसकी आँखों में दर्द उभरा। उसने प्लेटें उठाईं और किचन की ओर चली गई। सरदार जी देख रहे थे कि हरलीन किचन के बजाय एक कोने में रुक गई, वहाँ उसने बचा हुआ खाना साफ-सुथरी थैलियों में पैक करना शुरू कर दिया। वह यह काम इतनी सावधानी से कर रही थी जैसे कोई प्रसाद बाँट रही हो।

सरदार जी ने सोचा शायद यह लड़की अपने घर के लिए खाना ले जा रही होगी, लेकिन फिर उन्होंने देखा कि वह खाना अलग-अलग थैलियों में पैक कर रही है। उनके मन में सवाल आया—क्या राज है इन अलग-अलग थैलियों का? उन्होंने तय किया कि वे इस लड़की के पीछे का सच जानेंगे।
रात के बारह बजे होटल बंद हुआ, हरलीन बाहर निकली, कंधे पर वही भारी बैग था। वह बस स्टॉप की ओर चली। सरदार जी अपनी गाड़ी से उसके पीछे-पीछे गए। हरलीन बस में बैठी और शहर के पुराने इलाके में उतर गई। वहाँ वह एक अंधेरी तंग गली में गई, जहाँ बेघर और मजदूर लोग रहते थे। सरदार जी ने देखा कि हरलीन फ्लाईओवर के नीचे पहुँची, जहाँ कुछ बूढ़े और लाचार लोग फटे कम्बलों में सोने की कोशिश कर रहे थे। हरलीन को देखते ही उनके चेहरे पर चमक आ गई। एक बूढ़ी माँ ने कहा, “
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