मेरठ में इंस्पेक्टर दयाराम सिंह को मारकर बेटे ने लिया बाप की बेज्जती का 17 साल पुराना बदला!

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17 साल पुरानी बे-इ-ज्ज-ती का बदला: रिटायर्ड इंस्पेक्टर दयाराम सिंह की ह-त्या, एक अधूरी मोहब्बत, एक टूटा परिवार और लंबे इंतजार के बाद लिया गया खु-नी इ-ंत-काम

उत्तर प्रदेश से जुड़ी यह कहानी केवल एक ह-त्या की नहीं है। यह कहानी है अपमान, बदले, बिखरते परिवार, अधूरी प्रेमकथा, पुलिसिया दबाव, अदालत, जेल और 17 साल तक सीने में पलते गुस्से की। ऊपर से देखने पर मामला एक रिटायर्ड पुलिस इंस्पेक्टर की ह-त्या का लगता है, लेकिन जब इसकी परतें खुलती हैं, तो सामने एक ऐसा घटनाक्रम आता है जिसमें निजी बे-इ-ज्ज-ती, पारिवारिक टूटन, असफल प्रेम, अपराध की दुनिया में फिसलता एक युवक, और आखिरकार “बदला लेकर ही चैन मिलेगा” जैसी सोच का भयानक परिणाम दिखाई देता है।

यह पूरा मामला जुलाई 2025 में फिर चर्चा में आया, जब उत्तर प्रदेश पुलिस में डीएसपी पद से रिटायर हो चुके विनोद कुमार सिरोही बिजनौर कचहरी पहुंचे। उनके साथ सब-इंस्पेक्टर मीर हसन भी थे। कचहरी का काम निपटाकर जैसे ही दोनों बाहर निकले, एक व्यक्ति उनके पास आया। उसने पैर छुए, नमस्ते की और पूछा—“साहब, आपने मुझे पहचाना?” जब विनोद सिरोही ने कहा कि वे पहचान नहीं पा रहे, तो उसने जो बात कही, उसने पूरे पुराने केस की परतें फिर खोल दीं। उसने कहा कि साल 2016 में जिस इंस्पेक्टर का म-र्-ड-र हुआ था, उसे उसी ने अंजाम दिया था, और वही पकड़ा भी गया था। लेकिन उसके मन में एक ही सवाल आज तक जिंदा था—“मैं पकड़ा कैसे गया, जबकि मैंने घटनास्थल पर एक भी सबूत नहीं छोड़ा था?”

यह सवाल केवल उस व्यक्ति का नहीं था, बल्कि इस पूरी कहानी का केंद्र भी था।


मेरठ का मामला: सुबह की मॉर्निंग वॉक और बीच रास्ते हुई ह-त्या

यह कहानी उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के मेडिकल थाना क्षेत्र की जागृति विहार कॉलोनी, सेक्टर 9 से शुरू होती है। तारीख थी 4 अगस्त 2016। सुबह करीब 4 बजे का समय था। एक रिटायर्ड इंस्पेक्टर दयाराम सिंह हर रोज की तरह मॉर्निंग वॉक पर निकले थे। उनके साथ उनके दोस्त प्रेम सिंह भी थे, जो बैंक से रिटायर्ड मैनेजर बताए जाते हैं। दोनों रोज सुबह टहलते, फिर घर लौटकर सामान्य दिनचर्या निभाते।

उस दिन भी सब कुछ सामान्य ही लग रहा था। लेकिन एलएलआरएम मेडिकल कॉलेज के पास सोमदत्त विहार के नजदीक बने एक क्षेत्र में अचानक एक युवक उनके पास आया। उसने नमस्ते की और कहा, “इंस्पेक्टर साहब, आपने मुझे पहचाना?” प्रेम सिंह कुछ कदम आगे निकल चुके थे। दयाराम सिंह रुक गए। उन्होंने सामने खड़े युवक को गौर से देखा और कहा कि वे पहचान नहीं पा रहे।

इसी बीच, आरोप है कि युवक ने अचानक ह-थि-या-र निकाला और बेहद करीब से गो-ली चला दी। पहली गो-ली दिल के पास लगी। फिर दूसरी गो-ली चली। जब तक प्रेम सिंह पीछे मुड़ते और कुछ समझते, हमलावर इत्मीनान से वहां से निकल चुका था। थोड़ी दूरी पर खड़ी कार में बैठकर वह फरार हो गया। दयाराम सिंह गंभीर रूप से घायल थे। उन्होंने प्रेम सिंह से कहा कि उन्हें पलट दिया जाए ताकि जमा हो रहा खून बाहर निकल सके, लेकिन तब तक हालात बहुत खराब हो चुके थे। पुलिस पहुंची, उन्हें अस्पताल ले जाया गया, और डॉक्टरों ने उन्हें मृ-त घोषित कर दिया।

यह खबर आग की तरह फैल गई। सवाल उठने लगे—एक रिटायर्ड इंस्पेक्टर को आखिर किसने मारा? क्यों मारा? और इतनी नजदीक से मारी गई गो-ली क्या किसी प्रशिक्षित व्यक्ति ने चलाई थी?


जांच: पुलिस को हर दिशा से खाली हाथ लौटना पड़ा

जांच शुरू हुई। एसएचओ, एसएसआई, वरिष्ठ अधिकारी, सभी सक्रिय हुए। दयाराम सिंह का पारिवारिक इतिहास, पुराने दुश्मन, दोस्त, रिश्तेदार, सबकी सूची बनाई गई। परिवार में पत्नी महेंद्री, बेटा डॉक्टर उमेश कुमार, दूसरा बेटा सुभाष कुमार—सबसे पूछताछ हुई। यहां तक कि उनके एक बेटे पर भी संदेह गया, क्योंकि उसकी शादी परिवार की मर्जी के खिलाफ दूसरे समुदाय में हुई थी और पिता उससे नाराज रहते थे। कुछ सूत्रों ने यह भी बताया कि दयाराम सिंह ने कभी उसे संपत्ति से बेदखल करने तक की बात कही थी। लेकिन जांच में इस दिशा से भी कुछ मजबूत हाथ नहीं लगा।

इसी बीच मेडिकल थाने के एसएसआई विनोद कुमार को बिजनौर से फोन आया। फोन करने वाले ने कहा कि उसके पास इस ह-त्या से जुड़ा एक “क्लू” है और अगर पुलिस वहां आए, तो शायद रास्ता खुले। विनोद कुमार अपने दो कॉन्स्टेबलों—बंटी और नरेंद्र यादव—के साथ बिजनौर पहुंच गए। वहीं से वह असली कहानी सामने आने लगी, जिसने इस ह-त्या को सिर्फ एक क़-त्-ल नहीं, बल्कि 17 साल पुरानी बे-इ-ज्ज-ती का बदला साबित कर दिया।


कहानी की जड़: एक सरकारी नर्स का बेटा, पड़ोस की लड़की और अधूरी मोहब्बत

बिजनौर में जो कहानी खुली, उसके केंद्र में एक परिवार था—एक सरकारी नर्स, उनके पति, दो बेटे और एक बेटी। छोटा बेटा लंबा-चौड़ा, करीब साढ़े छह फुट का, पढ़ाई में ठीक-ठाक लेकिन खेल—खासकर बास्केटबॉल—में बेहद अच्छा था। सामने ही एक महिला डॉक्टर रहती थीं, जिनकी एक बेटी थी। महिला डॉक्टर की नौकरी थी, पति बरेली में रहते थे, और बेटी अक्सर अकेली रहती थी। धीरे-धीरे दोनों युवाओं के बीच आंखों-ही-आंखों में प्यार पनपा। बाद में दोनों वर्धमान कॉलेज में एक साथ बीए में दाखिल हुए और उनका रिश्ता गहरा हो गया।

एक दिन महिला डॉक्टर ने दोनों को साथ देख लिया। बात दबा दी गई ताकि बदनामी न हो। बेटी को समझाया गया, लेकिन मां नौकरी पर जाती थीं, घर खाली होता था, और उधर लड़के की मां 1997 में बी-मा-री के कारण गुजर चुकी थीं। इस अकेलेपन और नजदीकी ने रिश्ते को और गहरा कर दिया।

फिर 6 अक्टूबर 1999 को लड़का लड़की को लेकर देहरादून भाग गया। उसे लगा कि समाज उन्हें साथ नहीं रहने देगा। देहरादून जाने से पहले उसने एक दोस्त को कहा कि घर की सारी खबर उसे देता रहे। जैसे ही लड़की की मां को पता चला, उन्होंने अपने पति को बुलाया और पुलिस में गए। वहीं दयाराम सिंह की एंट्री होती है, जो उस समय सिविल लाइंस चौकी में तैनात थे।


दयाराम सिंह पर आरोप: पिता की बे-इ-ज्ज-ती, ₹5000 की रिश्वत, और वही दिन जिसने सब बदल दिया

बताया जाता है कि दयाराम सिंह ने उस लड़के के पिता को उठवाया। रात भर थाने में रखा। उन्हें गा-लियां दी गईं, धक्का-मुक्की हुई, और उनकी सार्वजनिक बे-इ-ज्ज-ती की गई। लड़के के दोस्त ने उसे देहरादून में फोन कर बताया कि “तुम्हारे पिताजी को थाने में बहुत बेइज्जत किया गया है, लात तक मारी गई है।” यह बात उस लड़के के दिल में गहरे उतर गई।

9 अक्टूबर 1999 को वह लड़की को लेकर वापस थाने पहुंचा। उसने कहा कि लड़की यहीं है, लेकिन उसके पिता के साथ ऐसा व्यवहार नहीं होना चाहिए था। ऐसा भी कहा जाता है कि दयाराम सिंह ने यह मामला रफा-दफा करने के लिए ₹5000 की रि-श्व-त ली। चूंकि लड़की बालिग थी और अपनी मर्जी से गई थी, इसलिए मामला दर्ज नहीं हुआ। लेकिन उस घटना ने उस लड़के के भीतर आग भर दी।

उसकी गर्लफ्रेंड बाद में बरेली शिफ्ट हो गई। वह उससे अलग हो गया। वह इंतजार करता रहा कि जब उसकी उम्र 21 साल होगी तो शादी करेगा, लेकिन हालात बदलते गए। घर में पहले मां की मौत, फिर बड़े भाई की शादी और मौत, भाभी का घर छोड़ जाना, बहन की शादी, पिता का बुढ़ापा—सब कुछ उसके सामने बिखरता चला गया। उसके पिता उससे बेहद प्रेम करते थे। वह बेटे के कपड़े तक धोते, खाना बनाते, झाड़ू लगाते। बेटा बार-बार उन्हें उस रात की बे-इ-ज्ज-ती याद करते देखता। पिता उसे रोकते रहते—“कुछ भी करना, लेकिन बदला मत लेना।”


अपराध की ओर झुकाव: 2001 और 2007 की घटनाएं

इस युवक का गुस्सा सिर्फ दयाराम सिंह तक सीमित नहीं रहा। साल 2001 में उसने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर शराब कारोबार से जुड़े तीन लोगों—सोनू, गजवीर और नरदेव—की ह-त्या कर दी। आरोप है कि उसके दोस्त ने कहा था कि उसकी भी कभी हत्या हो सकती है। उस समय तक यह युवक अंदर से विद्रोही हो चुका था। इस तिहरे क़-त्-ल के बाद वह जेल गया। जेल में भी पढ़ाई जारी रखी। पुलिसकर्मी उसे हथकड़ी में परीक्षा दिलाने ले जाते थे।

फिर 2007 में वह एक और हिंसक घटना में नामजद हुआ, जिसमें दे-सी ब-म, फा-यरिंग और कई दौर की हिंसा हुई। हालांकि उस मामले में अंतिम परिणाम अदालत तक नहीं पहुंचा। गवाह नहीं मिले, लोग मुकर गए, और मामला ठंडा पड़ गया।


पिता की मौत और बदले की आग का फिर भड़कना

21 नवंबर 2015 को उसके पिता की भी मौत हो गई। अब वह पूरी तरह अकेला पड़ गया। मां पहले ही जा चुकी थीं, भाई मर चुका था, बहन अपने घर में थी, और पिता, जो उसे बार-बार बदला लेने से रोकते थे, वे भी नहीं रहे। यही वह समय था जब उसने तय कर लिया कि अब दयाराम सिंह से हर कीमत पर बदला लिया जाएगा।

उसने महीनों तक दयाराम सिंह को ढूंढा। बिजनौर, संभल, चंदौसी, कासगंज—कई जगह गया। फिर उसे पता चला कि दयाराम सिंह 2016 में इंस्पेक्टर पद से रिटायर होकर मेरठ के जागृति विहार, सेक्टर 9 में रह रहे हैं। इसके बाद उसने ढाई महीने तक इलाके की रेकी की। गली-गली घूमकर सही घर तलाशा। फिर 15 दिन तक यह समझने की कोशिश की कि दयाराम कब बाहर निकलते हैं। आखिर उसे पता चला कि वे सुबह 4 बजे मॉर्निंग वॉक के लिए निकलते हैं।

4 अगस्त 2016 की वही सुबह इस लंबे इंतजार का अंत बनी। वह पूरी तैयारी से पहुंचा और दयाराम सिंह को ग-ो-लियां मारकर मौत के घाट उतार दिया।


गिरफ्तारी, जेल और एक अजीब-सी शांति

जांच बिजनौर तक पहुंची, कहानी खुली, और पुलिस ने उसे उसके घर से गिरफ्तार किया। बताया जाता है कि गिरफ्तारी के समय भी उसने सिर्फ एक सवाल पूछा—“मैं पकड़ा कैसे गया?” पुलिस ने राज़ नहीं खोला। वह जेल गया। करीब आठ महीने तक बंद रहा। बाद में उसने कहा कि जिस दिन उसने दयाराम सिंह को मारा, उसी दिन उसे जिंदगी का सबसे बड़ा “सुकून” मिला। उसके शब्दों में—17 साल से वह ठीक से सो नहीं पाया था, खा नहीं पाया था, चैन से जी नहीं पाया था।

लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं होती।


जेल से बाहर, बस में मुलाकात, शादी और नई जिंदगी

जेल से बाहर आने के बाद एक दिन वह बस में सफर कर रहा था। भीड़ थी। एक लड़की उसके पास खड़ी थी। उसने इंसानियत के नाते अपनी सीट छोड़ी। बातचीत शुरू हुई। धीरे-धीरे दोनों करीब आए। बाद में दोनों ने शादी कर ली। उनकी एक प्यारी बेटी भी हुई। बताया जाता है कि अब वह लोगों और बच्चों को ट्रेनिंग देता है, उन्हें खिलाड़ी बनाने की कोशिश करता है और एक सामान्य जिंदगी जीते हुए यह संदेश देना चाहता है कि बुरा काम नहीं करना चाहिए।

जब उससे पूछा गया कि उसने जो किया वह सही था या गलत, तो उसका जवाब था—“मैंने कुछ नहीं किया, हालात ने मुझसे करवाया। अगर 1999 में मेरे पिता की बे-इ-ज्ज-ती नहीं हुई होती, तो शायद मेरी जिंदगी कुछ और होती।”


यह कहानी क्या सिखाती है?

यह घटना कई गंभीर सवाल उठाती है। क्या एक पुलिसकर्मी द्वारा की गई कथित बे-इ-ज्ज-ती किसी इंसान के भीतर इतनी गहरी चोट छोड़ सकती है कि वह 17 साल बाद भी उसका बदला लेने निकले? क्या परिवार की टूटन, अधूरी मोहब्बत, पिता के अपमान और लगातार अकेलेपन ने इस युवक को उस दिशा में धकेला? और सबसे महत्वपूर्ण—अगर 1999 की घटना में कानून और पुलिस ने संवेदनशील, मर्यादित और ईमानदार तरीके से काम किया होता, तो क्या 2016 की यह ह-त्या रोकी जा सकती थी?

यह कहानी एक तरफ इंसानी मन की गहराई को दिखाती है, जहां अपमान कई बार ह-त्या की वजह बन जाता है। दूसरी तरफ यह चेतावनी भी देती है कि सत्ता में बैठे लोग—चाहे पुलिस में हों या किसी और पद पर—अगर अपने अधिकार का दुरुपयोग करते हैं, तो उसका असर कभी-कभी दशकों तक बना रहता है।

यह भी उतना ही सच है कि बदला कभी न्याय का विकल्प नहीं हो सकता। किसी व्यक्ति का अपमान, चाहे जितना बड़ा क्यों न हो, क़-त्-ल को सही नहीं ठहरा सकता। लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि सत्ता की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति अगर अपमान करता है, जबरन दबाव बनाता है, रि-श्व-त लेता है या बे-इ-ज्ज-ती करता है, तो वह केवल एक घटना नहीं करता—वह कई जिंदगियां बर्बाद कर सकता है।

यह पूरी घटना हमें यही सोचने पर मजबूर करती है कि कानून की ताकत सिर्फ दंड देने में नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण व्यवहार में भी होती है। जहां न्याय नहीं होगा, वहां बदले की आग कभी भी जन्म ले सकती है।

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