पति की मौत के बाद अकेली दिल्ली जा रही थी… ट्रेन में मिला एक अजनबी… फिर जो हुआ

एक नई सुबह की ओर
कहते हैं ना, जिसके पास कोई नहीं होता उसके साथ ऊपर वाला होता है।
सुबह के चार बजे थे। बनारस का कैंट रेलवे स्टेशन हल्की धुंध और अनजाने चेहरों की भीड़ में धीरे-धीरे जाग रहा था। लेकिन प्लेटफार्म नंबर चार की एक बेंच पर एक नौजवान युवती – तनवी – अपने दो साल के बेटे परीक्षित को गोद में लिए चुपचाप बैठी थी। न किसी को आवाज दे रही थी, न किसी से मदद मांग रही थी। बस आंखों में नमी, चेहरा उतरा हुआ और मन ऐसा जैसे भीतर ही भीतर कोई तूफान थमने का नाम नहीं ले रहा।
हर गुजरती ट्रेन की आवाज से वह हल्का सा चौंक जाती, जैसे मन के भीतर उठती उम्मीद को फिर से जमीन पर पटक देती हो। उसका छोटा बेटा कभी पापड़ वाले की तरफ देखता, कभी बिस्कुट वाले की ओर हाथ बढ़ाता। तनवी उसका हाथ थाम कर प्यार से कहती, “नहीं बेटा, यह नहीं लेना।” उसकी आवाज में ममता थी, लेकिन आंखों में वह बेबसी थी जो एक मां भूखे बच्चे को देखकर भी कुछ न कर पाने पर महसूस करती है।
उसी बेंच से कुछ दूरी पर बैठा था 28 साल का अंश। एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर, जो दिल्ली में नौकरी करता था और त्यौहार मनाकर वापस लौट रहा था। उसने सुबह से ही तनवी को देखा था – वही पीली सी शॉल ओढ़े, बच्चे को सीने से लगाए बैठी युवती, जो हर बार ट्रेन रुकते ही खड़ी होती और फिर भीड़ देखकर लौट आती। अंश की आंखों में बस एक ही सवाल घूम रहा था: कौन है यह युवती, जो इतनी तकलीफ में भी अकेली है, और इतनी बहादुर भी?
जब परीक्षित ने तीसरी बार पापड़ की ओर इशारा किया, तो अंश से रहा नहीं गया। वह उठा, पापड़ वाले से एक पैकेट लिया और तनवी के सामने लाकर बोला, “लो नन्हे दोस्त, थोड़ा सा खा लो।”
तनवी ने चौंक कर देखा, आंखों में सवाल था, गुस्सा नहीं। पर हां, आत्मसम्मान जरूर छलक आया था।
“आपने यह क्यों लिया? यह बस यूं ही हाथ बढ़ा देता है, इसका पेट भरा है,” उसने शांत लेकिन थकी हुई आवाज में कहा।
“कोई बात नहीं, बच्चे का मन है, थोड़ा सा खा लेगा तो क्या बिगड़ जाएगा?” अंश ने मुस्कुरा कर जवाब दिया।
तनवी कुछ नहीं बोली, सिर्फ अपने बेटे को देखने लगी, जो पापड़ खाते हुए पहली बार उस दिन मुस्कुरा रहा था। और उसी पल अंश ने जान लिया – यह सिर्फ भूख नहीं, यह उस मासूमियत की मुस्कान है जो शायद बहुत दिनों बाद आई है।
थोड़ी देर बाद अंश ने पास आकर धीरे से पूछा, “आप कहां जाना चाहती हैं? सुबह से आपको यही बैठा देख रहा हूं, कोई परेशानी है क्या?”
तनवी पहले थोड़ी झिझकी, फिर बोली, “मुझे दिल्ली जाना है। मेरे पास जनरल टिकट है, लेकिन हर ट्रेन में इतनी भीड़ होती है कि बच्चे के साथ चढ़ने की हिम्मत नहीं हो रही। मैं बस सोच रही थी कि कोई ट्रेन कम भीड़ वाली मिल जाए।”
“अरे, तो फिर आप चिंता क्यों कर रही हैं? मैं भी दिल्ली जा रहा हूं। मेरे पास एसी कोच का टिकट है और मेरे केबिन में जगह भी है। चलिए मेरे साथ, मैं टीटी से बात कर लूंगा,” अंश ने ईमानदारी से कहा।
तनवी कुछ पल चुप रही, जैसे जिंदगी में पहली बार कोई भरोसे की डोर थमा रहा हो। फिर बोली, “पर मेरे पास तो सिर्फ जनरल का टिकट है। अगर टीटी ने कुछ कहा तो मेरे पास पैसे भी नहीं हैं।”
“आपके पास हिम्मत है और वह बहुत बड़ी चीज है। टिकट मैं संभाल लूंगा, आप सिर्फ चलिए।”
वो झिझकी, लेकिन फिर सिर हिला दिया। शायद अब उसके पास और कोई रास्ता भी नहीं था।
कुछ देर बाद ट्रेन आई। अंश ने तनवी का छोटा सा बैग उठाया और उसे अपने साथ एसी कोच तक ले गया। पहली बार ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने तनवी का बोझ सिर्फ बैग का नहीं, बल्कि दिल का भी हल्का कर दिया हो। अंदर घुसते ही ठंडी हवा के झोंके से तनवी सहम गई, “इतना ठंडा क्यों है यहां?”
“क्योंकि आप पहली बार यहां आई हैं,” अंश ने मुस्कुरा कर कहा और उसे सीट पर बैठने को कहा।
तनवी अब भी डरी हुई थी। जैसे ही टीटी आया, अंश ने उसे इशारे से बुलाया और कुछ दूर ले जाकर बात की। तनवी बस दूर से देखती रही, उसकी आंखों में डर था। लेकिन थोड़ी देर बाद टीटी मुस्कुरा कर चला गया।
“सब ठीक है, अब बस चैन से बैठिए,” अंश ने लौट कर कहा और पहली बार तनवी की आंखों में राहत की चमक आई।
“आपने इतना सब किया, क्यों?”
“क्योंकि आप इंसान हैं और इंसानियत आज भी जिंदा है।”
उसकी यह बात तनवी के दिल को छू गई।
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