दो सगे बेटों ने अपने पिता के साथ कर दिया बड़ा कां#ड/असली वजह जानकर पुलिस के होश उड़ गए/

लोन की किस्त और गिरता जमीर: अलवर की एक दर्दनाक दास्तां

राजस्थान का अलवर जिला अपनी ऐतिहासिक धरोहरों के लिए जाना जाता है, लेकिन इसी जिले के कठूमर गांव से एक ऐसी घटना सामने आई जिसने रिश्तों की पवित्रता और इंसानियत को शर्मसार कर दिया। यह कहानी है भूपेश कुमार की, जिसने गरीबी और कर्ज के दलदल से निकलने के लिए अपने जमीर का सौदा कर लिया और अंततः अपने ही बेटों के हाथों अपनी जान गंवा बैठा।

१. खुशहाल परिवार से तंगहाली का सफर

भूपेश कुमार अलवर के कठूमर गांव में रहता था और ऑटो रिक्शा चलाकर अपने परिवार का पालन-पोषण करता था। उसके परिवार में उसकी पत्नी खुशी देवी और दो बेटे, कृष्ण (१०वीं कक्षा) और बल्लू (८वीं कक्षा) थे। भूपेश की मेहनत से घर का गुजारा ठीक-ठाक चल रहा था।

लेकिन एक सुबह उसकी ऑटो रिक्शा दुर्घटनाग्रस्त हो गई। रिक्शा पूरी तरह टूट गई, हालांकि भूपेश बाल-बाल बच गया। इस हादसे ने उसके मन में डर बिठा दिया और उसने ऑटो चलाना छोड़ दिया। इसके बाद उसने एक कारखाने में मजदूरी शुरू की, लेकिन वहां की कमाई से घर की जरूरतें पूरी नहीं हो पा रही थीं।

२. दुकान का सपना और /विवादास्पद/ मार्ग

बच्चों की स्कूल फीस और फटे हुए कपड़ों ने भूपेश को व्याकुल कर दिया। उसने गांव में कपड़े की दुकान खोलने का फैसला किया और बैंक से ४ लाख रुपये का लोन लिया। दुकान अच्छी चलने लगी, लेकिन सफलता के साथ भूपेश के कदम भटकने लगे। वह /नशीले पदार्थों/ का सेवन करने लगा और उसका चरित्र बिगड़ने लगा।

रजनी देवी से मुलाकात

४ फरवरी २०२६ को रजनी देवी नामक एक महिला उसकी दुकान पर आई। भूपेश की नीयत रजनी को देखकर डगमगा गई। रजनी ने ५००० रुपये के कपड़े खरीदे लेकिन पैसे न होने का बहाना बनाया। उसने भूपेश को रात में अपने घर बुलाया। उस रात भूपेश ने रजनी के साथ /अनैतिक संबंध/ स्थापित किए। यहाँ से भूपेश की नैतिकता का पतन शुरू हुआ।

३. कर्ज का बोझ और साहूकार की /गंदी नजर/

किस्मत का खेल देखिए, २४ फरवरी २०२६ को बिजली के शॉर्ट सर्किट से भूपेश की दुकान जलकर राख हो गई। बैंक का ४ लाख का कर्ज अभी बाकी था। बैंक कर्मचारी घर आने लगे और घर की कुर्की की धमकी दी। हताशा में भूपेश ने गांव के साहूकार रोशन लाल से ५ लाख रुपये का कर्ज लिया और अपना घर गिरवी रख दिया।

रोशन लाल की शर्त

रोशन लाल की नजर भूपेश की पत्नी खुशी देवी पर थी। जब भूपेश पहली किस्त नहीं चुका पाया, तो रोशन लाल उसके घर आया और खुशी के साथ /दुर्व्यवहार/ करने की कोशिश की। खुशी ने उसे थप्पड़ मारा, लेकिन रोशन लाल ने धमकी दी कि “एक दिन तुम्हें मेरे पास आना ही पड़ेगा।”

जब भूपेश को यह पता चला, तो वह साहूकार से लड़ने के बजाय अपनी लाचारी के आगे झुक गया। साहूकार ने शर्त रखी कि अगर भूपेश अपनी पत्नी को उसके पास /वक्त गुजारने/ के लिए भेजेगा, तो वह सारा कर्ज और ब्याज माफ कर देगा। कर्ज के बोझ तले दबे भूपेश ने अपना /जमीर बेच दिया/ और अपनी पत्नी को रोशन लाल के पास जाने के लिए मजबूर किया।

४. दरिंदगी की इंतिहा और मासूमों की गवाही

साहूकार रोशन लाल और उसका दोस्त नरेंद्र कुमार लगातार खुशी का /शारीरिक शोषण/ करने लगे। भूपेश खुद अपनी पत्नी को साहूकार के घर छोड़कर आता था। ५ अप्रैल २०२६ को रोशन लाल ने दिन में ही खुशी के पास आने की जिद की। भूपेश ने अपने दोनों बेटों को १०० रुपये देकर बाहर खेलने भेज दिया।

तभी अचानक बड़ा बेटा कृष्ण घर लौटा क्योंकि उसकी चप्पल टूट गई थी। उसने घर का दरवाजा बंद पाया। जब वह कमरे के पास पहुंचा, तो उसने रोशन लाल को अपनी मां के कमरे से /आपत्तिजनक हालत/ में बाहर निकलते देखा। कृष्ण सब समझ गया। साहूकार ने जाते-जाते कृष्ण को भी कह दिया कि “तेरे बाप ने ५ लाख लिए हैं, इसलिए यह सब हो रहा है।”

५. प्रतिशोध और /रक्तपात/

अपने पिता की इस नीचता और मां की बेबसी ने कृष्ण के भीतर गुस्से की आग जला दी। उसने अपने दोस्त सोनू से एक तलवार ली। रात के ११:०० बजे, जब पूरा घर सो रहा था, कृष्ण और उसके छोटे भाई बल्लू ने एक /भयानक/ फैसला लिया।

कृष्ण ने हाथ में तलवार और बल्लू ने चाकू लिया। वे अपने पिता भूपेश के कमरे में घुसे। कृष्ण ने तलवार से भूपेश की /गर्दन/ पर कई वार किए, जबकि बल्लू ने चाकू से उसके पेट पर हमला किया। भूपेश की मौके पर ही मौत हो गई।

पुलिस कार्रवाई

शोर सुनकर मां और पड़ोसी वहां पहुंचे। पुलिस बुलाई गई और दोनों भाइयों को गिरफ्तार कर लिया गया। पूछताछ में कृष्ण ने रोते हुए सारी सच्चाई बताई कि उसके पिता ने कैसे उसकी मां को साहूकार के हाथों /सौंप दिया/ था।

निष्कर्ष: यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या कर्ज और मजबूरी इंसान को इतना अंधा बना देती है कि वह अपने परिवार की मर्यादा भी भूल जाए? और क्या बच्चों का कानून हाथ में लेना सही था? यह मामला आज भी कोर्ट में विचाराधीन है।

रिपोर्ट: अपराध एवं समाज डेस्क