बहू बूढ़ी माँ पर जुल्म ढाहती रही, बेटा पत्थर बना रहा… फिर जो हुआ

श्यामा देवी की खामोशी – एक मां की कहानी
श्यामा देवी, उत्तर प्रदेश के बरेली की एक साधारण मां। उम्र 70 के पार, चेहरे पर समय की थकान और आंखों में हौसला। बारिश की उस सुबह, जब आसमान भी किसी की कहानी सुनकर रो रहा था, श्यामा देवी सब्जियों से भरा थैला लिए दीवार से सटकर खड़ी थीं। पान वाले ने आवाज दी, “अम्मा जी, यहां आ जाइए, वरना भीग जाएंगी।” श्यामा देवी मुस्कुराईं, वो मुस्कान जिसमें दर्द छुपा था, बोली, “अब क्या बचाऊं खुद को? भीग तो कब की चुकी हूं, बस कोई समझता नहीं।”
रिक्शा वाला आया, “अम्मा जी, बैठिए, छोड़ देता हूं घर तक।” श्यामा देवी बोलीं, “उम्र कहती है आराम करो, लेकिन घर वाले कहते हैं आराम सिर्फ उन्हीं के लिए है जिनकी सुनने वाला कोई हो।” रिक्शा घर के सामने रुका। बहू नेहा ने दरवाजा खोला, ताने दिए, “बारिश में क्यों आईं? सब्जी सड़ गई होगी, इतनी जल्दी आने की क्या जरूरत थी?”
श्यामा देवी चुप रहीं। शब्द गले में अटक गए। बेटे दीपक ने मां को बाहर देखा, कुछ पूछना चाहा, लेकिन बहू की आवाज पर चाय के लिए अंदर चला गया। मां की आत्मा ठंडी हो चुकी थी। कपड़े बदलकर पति की तस्वीर के सामने बैठ गईं। “देखिए जी, आज फिर भीग गई। नेहा अब घर की मालकिन बन गई है, हर बात पर ताना देती है। दीपक भी बदल गया है।”
रात को खिड़की से बाहर देखती रहीं, जहां कभी बेटी सविता कॉलेज जाती थी। अब वही खिड़की बेटी की दूरी का एहसास देती थी। वीडियो कॉल्स से मुस्कान आती थी, लेकिन वक्त के साथ कॉल्स कम होने लगीं। बहू नेहा हर बार बहाना बना देती, “मां जी मंदिर गई हैं, सो रही हैं।” दीपक भी चुप रहता, डरता था कि नेहा घर सिर पर उठा लेगी।
फिर एक दिन बहू की मां और बहन घर आईं। नेहा खुश, घर में रौनक, हंसी-ठहाके। श्यामा देवी दूर से नमस्ते कर कमरे में चली गईं। शाम को बेटे दीपक ऑफिस से लौटा, श्यामा देवी मिठाई लाने रसोई गईं, पैर फिसल गया, मिठाई गिर गई। नेहा चिल्लाई, “एक दिन भी चैन से नहीं रहने देतीं, आपसे कुछ होता नहीं तो बोल दिया करो।” श्यामा देवी चुपचाप मिठाई समेटती रहीं, डस्टबिन में डाल दी। नेहा फिर फट पड़ी, “इतनी महंगी मिठाई डस्टबिन में डाल दी? आप तो खा सकती थीं ना?”
वो आखिरी बात थी जिसने श्यामा देवी को अंदर तक तोड़ दिया। कमरे में जाकर दीवार से टिक गईं, सांसें तेज, चेहरा पीला, और फिर जमीन पर गिर पड़ीं। किसी ने आवाज नहीं सुनी। नेहा अपनी मां के साथ हंस रही थी, दीपक ऑफिस कॉल में व्यस्त था। रात 8 बजे रमेश को एहसास हुआ, मां की आवाज नहीं आई। कमरे में जाकर देखा, मां बेसुध पड़ी थीं। अस्पताल ले गए, डॉक्टर बोले, “हार्ट अटैक आया है, स्थिति नाजुक है।”
रमेश की आंखों में पछतावा, “क्या अब भी मां से कह सकूंगा कि मुझसे गलती हुई?” तभी सविता का फोन आया, “भैया, मां कैसी है?” रमेश बोला, “मां की हालत बहुत खराब है।” सविता बोली, “मैं आ रही हूं, बस एक बार मेरी बात मां से करवा दो।” आईसीयू में फोन पहुंचा, सविता बोली, “मां, देखो ना, मैं सविता हूं, बस एक बार आंखें खोल दो।” लेकिन सुबह डॉक्टर ने कहा, “हमें अफसोस है, आपकी मां अब हमारे बीच नहीं रहीं।”
रमेश सिर पकड़ कर बैठ गया, “मां…” उस एक शब्द में पूरी जिंदगी की लापरवाही, अपराधबोध और पछतावा था। सविता दौड़ती हुई पहुंची, “मां, तू तो कहती थी मैं तेरे दिल के सबसे करीब हूं, फिर इतनी दूर क्यों चली गई?” दोनों भाई-बहन फूट-फूटकर रो पड़े। मां की अंतिम यात्रा की तैयारी हो गई। रमेश ने मां की तस्वीर उठाई, “माफ करना मां, मैं तेरा बेटा कहलाने लायक नहीं था।”
घर लौटे, नेहा ड्राइंग रूम में बैठी थी। कोई पश्चाताप नहीं। बोली, “मर तो नहीं गई ना तुम्हारी मां?” रमेश ने तमाचा जड़ दिया, “मर गई मेरी मां, अब खुश हो? अब कोई नहीं जो तेरी जुबान से जहर निकले तो रोक सके।” नेहा रोती रही, बोली, “माफ कर दो रमेश, मैं बदल जाऊंगी।” रमेश बोला, “अब बहुत देर हो चुकी है, यह घर अब नहीं बचा, निकल जा।” सविता बोली, “अब इस घर में बस मां की यादें रहेंगी। अपमान करने वाली बहू नहीं।” नेहा अपनी मां के साथ चली गई।
रमेश ने दरवाजा बंद किया, पहली बार घर में सुकून का सन्नाटा फैल गया। अगले दिन मां की तस्वीर के सामने बैठा, “मां, तेरा मौन मेरी सबसे बड़ी सजा बन गया। अब यह खामोशी मुझे जिंदगी भर सुनाई देगी।”
सीख और सवाल
दोस्तों, कभी अगर आपकी मां चुप हो जाए ना, तो समझना वो नाराज नहीं, वो टूट रही है। एक मां कुछ नहीं कहती, इसका मतलब ये नहीं कि वो कुछ से नहीं रही। जिस दिन मां की चुप्पी आपको चुभने लगे, उस दिन खुद को आईना दिखा लेना, वरना रमेश की तरह पछताना पड़ेगा।
क्या आपकी मां ने भी कभी बिना कुछ कहे सब कुछ सह लिया था? क्या आपने कभी उनके दर्द को नजरअंदाज कर दिया या आज भी वो खामोश रहती हैं और आप सब समझकर भी कुछ नहीं कह पाते? एक बार अपनी मां की आंखों में झांक कर देखना। और उन्हें आखिरी बार “आई लव यू मां” कब कहा था, याद करना।
रिश्तों को समय दीजिए, क्योंकि जब रिश्ते टूटते हैं तो सिर्फ आवाज नहीं आती, एक जिंदगी चुपचाप बिखर जाती है।
जय हिंद।
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