“Zalim Betay Ne Dekho Apni Boorhi Maa Ko Maar Kar Ghar Se Nikaal Diya

मां की ममता और बेटे की बेवफाई

बहुत समय पहले की बात है, एक छोटे से गांव में एक बेहद गरीब लेकिन इज्जतदार बेवा औरत रहती थी। उसका एक ही सहारा था—उसका इकलौता बेटा। मां ने अपनी सारी खुशियां, आराम और जवानी की सारी उमंगें बेटे की परवरिश और तालीम के लिए कुर्बान कर दी थीं। दिन हो या रात, धूप हो या बारिश, वह मेहनत-मजदूरी करके पैसे जोड़ती ताकि उसका बेटा पढ़ सके और उस मुकाम तक पहुंच सके, जहां वह खुद कभी नहीं पहुंच सकी।

जब बेटा स्कूल जाने लगा, उसके कपड़े अक्सर पुराने होते, लेकिन मां के चेहरे पर गर्व की चमक रहती। वह कहती, “मेरा बेटा पढ़ेगा, बड़ा आदमी बनेगा, मेरा सहारा बनेगा।” वक्त गुजरता गया, बेटा पढ़ाई में दिन-दूनी, रात-चौगुनी तरक्की करता गया। गांव वाले भी उसकी मिसाल देने लगे कि बेवा का बेटा कितना समझदार और काबिल है। कई सालों की मेहनत और कुर्बानियों के बाद उसने शहर जाकर ऊँची तालीम हासिल की और एक अच्छी नौकरी भी मिल गई।

मां की आंखों में खुशी के आंसू थे। उसकी बरसों की दुआएं रंग लाई थीं। एक शाम जब बेटा दफ्तर से लौटा, मां ने प्यार से कहा, “बेटा, अब तू जवान हो गया है। मैंने तुझे अपनी जिंदगी के एक-एक लम्हे और एक-एक पैसे से पढ़ाया है। अब तेरी नौकरी लग गई है तो मेरी ख्वाहिश है कि मैं तेरी शादी कर दूं। तेरे मामा की बेटी है, उसे मैंने वादा किया था कि जब मेरा बेटा पढ़ लिखकर अच्छे मुकाम पर पहुंच जाएगा तो मैं उसे तेरी जिंदगी की साथी बना दूंगी।”

मगर बेटे के चेहरे पर नाखुशी के आसार उभर आए। उसने सख्त लहजे में कहा, “मां, आप क्या बातें कर रही हैं? उस गरीब लड़की से मेरी शादी? आप जानती हैं ना कि मैं तालीमयाफ्ता इंसान हूं, बड़ी मेहनत से डिग्री हासिल की है, बड़े ओहदे पर हूं। मैं उस मामूली घराने की लड़की से कैसे शादी कर सकता हूं? आपको अब यह पुरानी बातें छोड़ देनी चाहिए। दुनिया बदल गई है और मैं भी अब बड़ा आदमी हूं।”

मां की आंखों में खामोश आंसू तैरने लगे। वो आंसू जिनमें बरसों की मेहनत, कुर्बानी और उम्मीदों का समंदर छुपा था। मां के कलेजे पर जैसे छुरी चल गई। उसने कुछ नहीं कहा, बस दिल ही दिल में आह भरी, “शायद मैंने अपने रब से उसकी कामयाबी तो मांगी थी, मगर यह नहीं सोचा था कि कामयाबी के साथ उसके दिल से इंसानियत छीन ली जाएगी।”

यह खबर जब उस लड़की तक पहुंची, जिससे मां ने वादा किया था, तो उसके दिल पर भी कयामत गुजर गई। वो खामोशी से रातों को जागने लगी, उसके चेहरे की हंसी गायब हो गई। उसके ख्वाब जो बरसों से संभाले हुए थे, एक लम्हे में मिट्टी का ढेर बन गए।

कुछ महीनों बाद बेटा खुशी-खुशी घर आया, “मां, मेरा तबादला शहर में हो गया है। अब हम गांव में क्यों रहें? शहर में जाएंगे, नया घर बनाएंगे, बेहतर जिंदगी गुजारेंगे।” मां ने बेटे की खुशी देखी तो अपने दुख भूल गई। चंद दिनों में अपना छोटा सा घर समेटा, पुरानी यादें और टूटी हुई तमन्नाएं संदूक में बंद की और बेटे के साथ शहर चली गई।

शहर में किराए के मकान में रहने लगे। मां ने दिन-रात उस घर को संवारने में लगा दी। कुछ अरसे बाद बेटे ने वहां एक खूबसूरत सा घर बना लिया। उसी गली में उनका एक खुशहाल पड़ोसी था, जिसके यहां एक हसीन और नाजुक मिजाज लड़की रहती थी। बेटे की नजर अक्सर उस पर पड़ जाती। पहले बेधियानी में, फिर चाहत के साथ सलाम-दुआ होने लगी। कुछ ही दिनों में यह रोजमर्रा की बातचीत एक खामोश मगर गहरी मोहब्बत में बदल गई।

एक दिन बेटे ने मां से कहा, “मां, जो हमारे पड़ोस में लोग रहते हैं, उनकी बेटी बहुत अच्छी है। मैं चाहता हूं कि आप उनके घर रिश्ता लेकर जाएं और उससे मेरी शादी कर दें।” मां के दिल में जैसे किसी ने पुरानी चोट ताजा कर दी, मगर अगले ही लम्हे उसने खुद को तसल्ली दी—अगर उसकी खुशी इसी में है तो ठीक है।

शादी हो गई। दुल्हन घर में आई। मां ने उसे बेटियों की तरह गले लगाया, उसके लिए खाने बनाए, कमरा सजाया और दिल से दुआ की कि अल्लाह करे मेरा बेटा और बहू हमेशा खुश रहें। कुछ दिन बड़े सुकून से गुजरे। फिर एक दिन अल्लाह ने उन्हें एक बेटे की नेमत दी। मां की खुशी का कोई ठिकाना ना रहा। वह पोते से इतनी मोहब्बत करने लगी कि जैसे अपनी सांसों में बसाया हो।

मगर वक्त के साथ कुछ बदलने लगा। बहू जो पहले बहुत नरम मिजाज थी, अब बदलने लगी। एक दिन उसने अपने शौहर से कहा, “यह जो तुम्हारी मां है ना, अब यह घर में रहने के काबिल नहीं रही। तुम उन्हें कहीं और भेज दो, वरना मैं अब यहां नहीं रहूंगी।” बेटे का दिल दहल गया। मगर बहू ने जिद पकड़ ली। आखिरकार बेटे ने मां को रिश्तेदारों के यहां भेज दिया।

मां का दिल टूट गया, मगर उसने बेटे के लिए दुआ की। दिन महीनों में बदल गए, ना कोई पैगाम, ना कोई सलाम। एक दिन मां ने सोचा, “मैं आखिर कब तक दूसरों के सहारे रहूं?” वह अपने घर गई, दरवाजा खटखटाया। बहू ने दरवाजा खोला, चेहरे पर गुरूर, आंखों में नागवारी। बेटे ने भी ठंडे लहजे में कहा, “मां, अब आ ही गई हो तो आ जाओ अंदर।”

मां की आंखें आसमान की तरफ उठ गईं, “अल्लाहू अकबर! यह जमाना भी दिखा दिया।” मां का दिल टूट गया। कुछ दिन ऐसे ही बीत गए। बहू ने फिर कहा, “अगर अपनी मां को तुमने मेरे घर से नहीं निकाला तो मैं यह घर छोड़ दूंगी।” बेटे ने मां को ओल्ड हाउस छोड़ने का फैसला किया। मां ने कुछ नहीं कहा, बस बेटे की मर्जी मान ली।

मां को ओल्ड हाउस में छोड़कर बेटा लौट रहा था, तभी एक हादसा हुआ। गाड़ी ट्रक से टकरा गई। उसकी बीवी वहीं मर गई, बच्चा सही सलामत रहा लेकिन बेटे के दोनों पैर कट गए। अस्पताल में बेटे को अपनी मां की याद सताने लगी। उसने तड़पते हुए कहा, “मां, मैंने तुझे बहुत दुख दिया, मुझे माफ कर दे।”

जब मां को बेटे की हालत का पता चला, वह दौड़ी-दौड़ी अस्पताल आई। बेटे से कहा, “बेटा, तूने मां को दुख दिया, अल्लाह को यह पसंद नहीं आया। मां को नाराज करता है तो खुदा भी नाराज हो जाता है। अब मैं तुझसे नाराज नहीं हूं, लेकिन याद रख—मां-बाप को कभी तकलीफ ना देना। उनकी खिदमत करना, उनकी दुआ लेना।”

मां-बाप की दुआ में बरकत है, जन्नत मां के कदमों में है और बाप जन्नत का दरवाजा है। जो मां-बाप की इज्जत करता है, उसकी जिंदगी में सुकून आता है। जो उन्हें दुख देता है, उसका अंजाम बुरा होता है। इसलिए, हमेशा मां-बाप की खिदमत करो, उनकी दुआ लो। यही असली कामयाबी है।

सीख:
मां-बाप की ममता और उनकी कुर्बानियों की कोई कीमत नहीं। उनकी इज्जत करो, उनकी खिदमत करो। वरना वक्त की मार सबको सीख देती है।