पिता ने पसंद की शादी करने से रोका तो बेटा घर छोड़कर गया, लेकिन जब 10 साल बाद जो हुआ देख पिता के होश

“गुरूर, मोहब्बत और एक नन्हा फरिश्ता”
लखनऊ की शानो-शौकत वाली खान हवेली में शाकिर खान रहते थे। उम्र 60 के पार, कपड़े का बड़ा कारोबार, पूरे मोहल्ले में इज्जत और रसूख। उनके लिए खानदान के उसूल, परंपराएं और इज्जत सबसे ऊपर थी। पर उनके दिल में अपने इकलौते बेटे आदिल के लिए एक अनकहा, अनदेखा प्यार भी था। आदिल उनकी दुनिया था, लेकिन बाप-बेटे के बीच अदब की दीवार हमेशा बनी रही। शाकिर खान ने अपने बेटे को कभी गले नहीं लगाया, कभी खुले दिल से प्यार नहीं जताया, लेकिन हर रात चुपके से उसके कमरे में जाकर उसे सोते हुए देखते और उसकी हर जरूरत बिना कहे पूरी करते।
आदिल एक होशियार, संस्कारी और सुलझा हुआ नौजवान था। वह अपने अब्बा से बेइंतहा मोहब्बत करता था, पर उनके सामने अपनी भावनाएं कभी जाहिर नहीं कर पाया। उसकी दुनिया थी उसकी पढ़ाई, दोस्त और अम्मी, जो हमेशा बाप-बेटे के बीच नरम पुल का काम करती थी। कॉलेज में उसकी मुलाकात सरीना से हुई — आधुनिक सोच वाली, समझदार और प्यारी लड़की। दोस्ती कब मोहब्बत में बदल गई, दोनों को पता ही नहीं चला। सरीना के परिवार वाले इस रिश्ते के लिए तैयार थे, अब बस एक ही बाधा थी — शाकिर खान।
कई दिनों तक हिम्मत जुटाकर आदिल ने अपने अब्बा से बात की। “अब्बा, मैं सरीना से शादी करना चाहता हूं।” शाकिर खान ने सब कुछ सुना, फिर सख्त आवाज में बोले, “हमारे खानदान में बच्चे अपनी पसंद से शादी नहीं करते। यह हमारी रवायत है। मैं अपने जीते जी इसे टूटते नहीं देख सकता।” आदिल की दुनिया उजड़ गई। सालों का दबा प्यार, दर्द और उम्मीद एक ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा। “अगर आपके लिए जिद मेरी खुशी से बड़ी है, तो मैं ऐसा बेटा बनकर नहीं रह सकता।” बहस बढ़ गई, दीवारें टूट गईं, खाई बन गई।
अगली सुबह आदिल घर छोड़कर चला गया। मेज पर एक खत था — “अब्बा, मैं आपकी इज्जत पर आंच नहीं आने दूंगा, पर अपनी मोहब्बत को भी नहीं छोड़ सकता। हो सके तो माफ कर दीजिएगा।” शाकिर खान का दिल टूटा, पर उनका गुरूर और जिद फिर से हावी हो गई। “आज से इस घर में कोई आदिल नहीं रहता।”
वक्त बीतता गया। खान हवेली की रौनक खो गई। शाकिर खान ने खुद को कारोबार में डुबो लिया, लेकिन रात के अंधेरे में आदिल के कमरे में जाकर उसकी चीजें छूते, तस्वीरें देखते और चुपचाप रोते। उन्हें पता चला आदिल ने सरीना से शादी कर ली है, दिल्ली में संघर्ष कर रहा है। लेकिन जिद उन्हें बेटे से मिलने नहीं देती।
दिल्ली में आदिल और सरीना ने एक छोटी सी दुनिया बसाई। प्यार था, संघर्ष था, लेकिन साथ था। दो साल बाद उनके घर में एक नन्हा फरिश्ता आया — बेटा मोहसिन। आदिल ने तय किया कि वह अपने बेटे को प्यार जताएगा, उसे गले लगाएगा, वही संस्कार देगा जो उसने अपने अब्बा से सीखे थे। मोहसिन अपने दादा से कभी नहीं मिला, मगर पिता की कहानियों में रोज मिलता और उनसे बेइंतहा प्यार करने लगा।
समय के साथ आदिल का काम जम गया, खुद की फर्म खोल ली, खुशहाल परिवार बना लिया। लेकिन दिल में एक खालीपन था — पिता की दूरी का। 10 साल गुजर गए। शाकिर खान अब बूढ़े और अकेले हो गए थे। पछतावा गहरा होता गया।
एक दिन शाकिर खान को शहर के सबसे प्रतिष्ठित स्कूल के वार्षिक समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाया गया। कार्यक्रम में जब मंच पर “मोहसिन आदिल खान” नाम सुनाई दिया, शाकिर खान चौकन्ने हो गए। 8 साल का मोहसिन मंच पर आया, अपने अब्बा के लिए कविता पढ़ी — “मेरे अब्बा की आंखें गुस्से वाली हैं, पर उनमें प्यार का समंदर है…” पूरी कविता में अपने पिता के लिए मोहब्बत और इज्जत थी। शाकिर खान की आंखों से आंसू बहने लगे। उन्होंने महसूस किया कि यही तो आदिल की भावनाएं थीं, जो कभी कह नहीं पाया।
कार्यक्रम के बाद शाकिर खान ने प्रिंसिपल से आदिल का पता लिया। अगली सुबह वह आदिल के घर पहुंचे। 10 साल बाद बाप-बेटा आमने-सामने थे। आंखों में अदब, मोहब्बत और सालों का दर्द था। तभी मोहसिन दौड़ता हुआ आया, “आप दादा अब्बा हैं?” शाकिर खान घुटनों के बल बैठ गए, पोते को गले लगा लिया। आदिल अपने पिता के पैरों पर गिर पड़ा, “अब्बा मुझे माफ कर दीजिए।” शाकिर खान ने उसे उठाकर पहली बार गले लगाया, “गलती तेरी नहीं, मेरी थी बेटा। मेरा गुरूर मेरे प्यार पर हावी हो गया था।”
सरीना भी बाहर आई, शाकिर खान ने उसके सिर पर हाथ रखा, “बहू, इस नासमझ बूढ़े को माफ कर देना।” उस दिन उस घर में सिर्फ आंसू थे — पर यह खुशी के आंसू थे। शाकिर खान ने आदिल का हाथ पकड़ा, “चलो बेटा, घर चलो।” पूरा परिवार खान हवेली लौटा। हवेली की दीवारें फिर से खिलखिला उठीं। एक पिता को उसका बेटा मिल गया, बेटे को जन्नत मिल गई और पोते को अपने हीरो दादा का प्यार।
सीख:
यह कहानी सिखाती है कि रिश्तों में जिद और गुरूर की कोई जगह नहीं होती। खामोशी की खाई को पाटने में सालों लग सकते हैं। अपने दिल की बात कहने में देर नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वक्त और अपने बहुत कीमती होते हैं।
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धन्यवाद!
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